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शिवपुरी के मौसमी पत्रकार - पत्रकारिता या सौदेबाजी का खेल?

 


शिवपुरी में आज पत्रकारिता दो तरह की दिखाई देती है। एक वह, जो सच दिखाने और जनता की आवाज उठाने के लिए होती थी और दूसरी वह, जो अब केवल दिखावे, पहचान और फायदे तक सीमित होती जा रही है। आज शहर में कई ऐसे “मौसमी पत्रकार” सक्रिय हैं, जिनका ध्यान खबरों से ज्यादा अपने लाभ पर रहता है। कौन अधिकारी आया, कौन नेता नाराज़ है, किस व्यापारी से विज्ञापन मिल सकता है, कहां मंच मिलेगा, किसके साथ फोटो खिंचवानी है, यही उनकी प्राथमिकता बन चुकी है।

अब पत्रकारिता कम और सोशल मीडिया पर खुद को बड़ा दिखाने की होड़ ज्यादा दिखाई देती है। कोई खुद को राष्ट्रीय पत्रकार बताता है, कोई प्रदेश अध्यक्ष, कोई संस्थापक, तो कोई मीडिया प्रभारी। ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता से ज्यादा पद और पहचान जरूरी हो गई है। शहर में छोटे-छोटे कार्यक्रमों में भी मंच, माला और सम्मान पत्र की होड़ लगी रहती है। अगले दिन सोशल मीडिया पर फोटो ऐसे डाली जाती हैं मानो बहुत बड़ा राष्ट्रीय कार्य कर दिया गया हो।

कुछ लोगों ने तो पत्रकारिता की आड़ में पैसे कमाने का नया तरीका भी बना लिया है। पहले किसी व्यापारी, डॉक्टर, स्कूल संचालक या किसी प्रभावशाली व्यक्ति को निशाना बनाया जाता है। फिर सोशल मीडिया पर उसके खिलाफ माहौल बनाया जाता है। आधी-अधूरी जानकारी, आरोप, वायरल पोस्ट और फेसबुक लाइव के जरिए उसकी छवि खराब करने की कोशिश की जाती है। जब सामने वाला व्यक्ति डरने लगता है, तब शुरू होती है “समझौते” की बात। कहीं विज्ञापन के नाम पर पैसा, कहीं सहयोग राशि, कहीं दूसरी तरह की सेटिंग। और जैसे ही मामला तय हो जाता है, वही व्यक्ति अचानक अच्छा और सम्मानित घोषित कर दिया जाता है। पोस्ट बंद हो जाती हैं, आरोप शांत हो जाते हैं और पूरा मामला खत्म। यह पत्रकारिता नहीं, बल्कि डर और बदनामी के जरिए फायदा लेने का तरीका बनता जा रहा है।

दूसरी तरफ आज भी कई ईमानदार और मेहनती पत्रकार मौजूद हैं, जो बिना किसी लालच के जनता की समस्याएं उठाते हैं। लेकिन ऐसे लोगों को अक्सर पीछे कर दिया जाता है, क्योंकि वे चापलूसी और सौदेबाजी में विश्वास नहीं रखते।

सबसे चिंता की बात यह है कि खबर अब कई जगह सच दिखाने का माध्यम कम और निजी फायदे का साधन ज्यादा बनती जा रही है। यदि विज्ञापन मिल गया तो सब अच्छा और यदि नहीं मिला तो वही व्यक्ति गलत घोषित कर दिया जाता है।

शिवपुरी की जनता अब धीरे-धीरे सब समझने लगी है। उसे पता है कि कौन सच में पत्रकारिता कर रहा है और कौन केवल प्रेस कार्ड और सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहा है। पत्रकारिता का असली काम जनता के सवाल उठाना है, न कि सत्ता, पैसे या पहचान के लिए झुक जाना और जिस दिन फिर से सच को महत्व मिलेगा, उस दिन पत्रकारिता पर लगे ऐसे दाग अपने आप मिटने लगेंगे।

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