पानी नहीं, चेतना सूख रही है शिवपुरी की…
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शिवपुरी प्यासा है… पर प्रश्न यह है कि क्या शिवपुरी सचमुच पानी के अभाव से प्यासा है, या फिर उस मानसिकता से प्यासा है जिसने भ्रष्टाचार को व्यवस्था और अव्यवस्था को नियति मान लिया है?
जिस शहर को बसाने से पहले उसकी भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन कर लिया गया था, जिस नगर की जल समस्या को समझते हुए तत्कालीन शासकों ने तालाबों, जलाशयों और प्राकृतिक जल संरक्षण की परंपरा विकसित की थी, वही शिवपुरी आज बूंद-बूंद पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रहा है। यह केवल जल संकट नहीं, यह चरित्र संकट है। यह प्रशासनिक असफलता से अधिक सामाजिक पतन का विषय है।
जब माधो महाराज ने शिवपुरी को बसाने की योजना बनाई थी, तब उन्हें ज्ञात था कि यह क्षेत्र वर्षा आधारित जल संरचना पर निर्भर रहेगा। इसलिए तालाब बनवाए गए, जल संरक्षण की प्राकृतिक श्रृंखलाएँ निर्मित की गईं, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ प्यास से न जूझें। परंतु समय बीतते-बीतते उन तालाबों को बचाने की जिम्मेदारी समाज और प्रशासन दोनों भूल गए। तालाब सिकुड़ते गए, किनारों पर अतिक्रमण बढ़ता गया, फिर धीरे-धीरे उन पर कॉलोनियाँ उग आईं। जिन जलाशयों में कभी शहर का भविष्य दिखाई देता था, वहाँ अब सीमेंट, ईंट और अवैध प्लॉटिंग का साम्राज्य खड़ा है।
विडंबना देखिए कि यह सब रातों-रात नहीं हुआ। यह वर्षों तक सबकी आँखों के सामने हुआ। समाज देखता रहा, प्रशासन मौन रहा और राजनीति मुस्कुराती रही।
भू-माफिया केवल वे लोग नहीं हैं जो जमीन खरीद-बेच रहे हैं। असली भू-माफिया वह नेटवर्क है जिसमें दलाल, अधिकारी, कर्मचारी, ठेकेदार और सत्ता से जुड़े चेहरे एक अदृश्य गठबंधन बनाकर शहर के भविष्य का सौदा करते हैं। पहले ये लोग गिने-चुने थे, अब लगभग हर मोहल्ले में कोई न कोई “जमीन का खिलाड़ी” दिखाई देता है। और दुखद यह है कि समाज उन्हें अपराधी नहीं, “प्रभावशाली व्यक्ति” मानने लगा है। यहीं से भ्रष्टाचार ने शिष्टाचार का रूप लेना प्रारंभ किया।
आज यदि कोई व्यक्ति अवैध कनेक्शन लेकर सरकारी पानी से व्यवसाय चला रहा है तो समाज उसे चतुर कहता है। यदि कोई तालाब पाटकर कॉलोनी काट देता है तो लोग उसे सफल व्यवसायी कहते हैं। यदि कोई नेता अपने प्रभाव से नलकूप स्वीकृत करवा देता है तो जनता उसे जनसेवक मानती है। प्रश्न यह है कि फिर अपराधी कौन है? केवल वह व्यक्ति जिसने नियम तोड़ा, या वह समाज भी जिसने नियम टूटते देखे और उसे स्वीकार कर लिया?
शिवपुरी का जल संकट प्राकृतिक कम, कृत्रिम अधिक प्रतीत होता है। क्योंकि जिस शहर में जल स्रोतों पर अतिक्रमण हो, जहाँ हर वार्ड में अंधाधुंध नलकूप खनन राजनीतिक प्रभाव का प्रतीक बन जाए, जहाँ भूमिगत जल का दोहन वोट बैंक की राजनीति से संचालित होने लगे, वहाँ संकट पानी का नहीं, नीयत का होता है।
और इसी मानसिकता का सबसे चिंताजनक पक्ष यह है कि इस शहर में कुछ लोग केवल निःशुल्क पानी के टैंकर वितरित करके जनप्रतिनिधि तक निर्वाचित हो गए। अब वे पुनः उसी राजनीति के सहारे जनता के बीच सक्रिय हैं और संभव है कि फिर सफल भी हो जाएँ। यह स्थिति केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि शहर की सामूहिक मनोस्थिति का आईना है।
जिस समाज को स्थायी जल समाधान माँगना चाहिए था, वह अस्थायी टैंकर व्यवस्था पर ताली बजा रहा है। जिस जनता को तालाबों के पुनर्जीवन, पाइपलाइन सुधार और जल संरक्षण की नीति पर प्रश्न करना चाहिए था, वह कुछ दिनों के मुफ्त पानी को उपकार मानकर राजनीतिक समर्थन दे रही है। यह लोकतंत्र का वह दुखद मोड़ है जहाँ समस्या का समाधान नहीं, समस्या का प्रबंधन ही राजनीति बन जाता है।
यदि किसी शहर में प्यास बुझाने के स्थायी उपाय करने वाले नहीं, बल्कि टैंकर भेजने वाले नायक बन जाएँ, तो समझ लेना चाहिए कि वहाँ व्यवस्था नहीं, निर्भरता विकसित की जा रही है। जनता आत्मनिर्भर नागरिक से बदलकर कृपा पर आश्रित मतदाता बना दी गई है।
पुराने सरकारी बस स्टैंड का वह नलकूप इसका जीवंत उदाहरण है, जो कभी आधे शहर की प्यास बुझाता था। आज वह अवैध कार बाजार की भीड़ में ऐसा दब चुका है मानो उसका अस्तित्व ही मिटा दिया गया हो। यह केवल एक नलकूप का गायब होना नहीं, यह शहर की स्मृति का मिटना है। यह उस मानसिकता का प्रमाण है जिसमें सार्वजनिक संपत्ति को धीरे-धीरे निगल जाना सामान्य बात मान ली गई है।
फिजिकल रोड स्थित पीएचई की पानी की टंकी का उदाहरण और भी भयावह है। सरकारी जल आपूर्ति लाइन से अवैध अंडरग्राउंड कनेक्शन लेकर व्यवसाय संचालित हो रहे हैं, गाड़ियाँ धोई जा रही हैं, पानी बेचा जा रहा है और प्रशासन या तो अनजान बना हुआ है या फिर उस अदृश्य मायाजाल का हिस्सा बन चुका है जहाँ फाइलें भी मौन रहती हैं और कार्रवाई भी चयनित होती है।
सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि समाज अब अपने अधिकारों को अधिकार नहीं मानता। वह पानी को मूलभूत आवश्यकता नहीं, किसी नेता या प्रभावशाली व्यक्ति की कृपा समझने लगा है। मोहल्लों में लोग यह सोचकर खुश हो जाते हैं कि “हमारे यहाँ तो टैंकर आ गया”, “हमारे वार्ड में तो बोर हो गया”, पर कोई यह नहीं पूछता कि शहर की स्थायी जल नीति कहाँ है? तालाबों का पुनर्जीवन क्यों नहीं हो रहा? अवैध कॉलोनियों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती? जल संरक्षण जन आंदोलन क्यों नहीं बन पाया?
दरअसल समाज ने संघर्ष छोड़कर जुगाड़ स्वीकार कर लिया है। और जब कोई समाज जुगाड़ को व्यवस्था मान लेता है, तब वहाँ भ्रष्टाचार केवल कार्यालयों तक सीमित नहीं रहता, वह संस्कृति बन जाता है।
आज शिवपुरी का आम नागरिक गर्मियों में पानी के लिए लाइन में खड़ा है, महिलाएँ बाल्टियाँ लेकर भटक रही हैं, बच्चे टैंकरों के पीछे दौड़ रहे हैं, पर दूसरी ओर सत्ता के गलियारों में जल संकट भी अवसर बन चुका है। कहीं टैंकर राजनीति चल रही है, कहीं नलकूप राजनीति, कहीं जल आपूर्ति के नाम पर कमीशन का खेल। जनता प्यास से परेशान है और व्यवस्था इस प्यास का प्रबंधन करके अपने समीकरण साध रही है। यह स्थिति केवल प्रशासन की विफलता नहीं है। यह समाज के सामूहिक मौन की भी पराजय है।
जिस दिन शिवपुरी का नागरिक यह तय कर लेगा कि तालाब बचाना राजनीति नहीं, भविष्य बचाना है… जिस दिन अवैध कब्जे करने वाले को “सेटिंग वाला आदमी” नहीं बल्कि “शहर का अपराधी” कहा जाएगा… जिस दिन जनता टैंकर की फोटो खिंचवाने वाले नेताओं से यह पूछेगी कि स्थायी जल प्रबंधन कहाँ है… उस दिन यह संकट समाप्त होने की दिशा में पहला कदम होगा। अन्यथा आने वाले वर्षों में शिवपुरी केवल जल संकट से नहीं जूझेगा, बल्कि सामाजिक संघर्ष, भूमिगत जल युद्ध, मोहल्लों के विवाद और संसाधनों की लड़ाई का भी केंद्र बन जाएगा। क्योंकि जब पानी व्यवस्था से नहीं मिलता, तब समाज में तनाव जन्म लेता है।
शिवपुरी को अब केवल पानी नहीं चाहिए… उसे जागरूक नागरिक चाहिए। उसे ईमानदार प्रशासन चाहिए। उसे ऐसे जनप्रतिनिधि चाहिए जो तालाबों को वोट से ऊपर और भविष्य को राजनीति से बड़ा समझें। अन्यथा इतिहास यही लिखेगा कि एक शहर, जिसे उसके पूर्वजों ने तालाबों से बसाया था, उसे उसकी अगली पीढ़ियों ने लालच से सुखा दिया।
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दिवाकर की दुनाली से

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