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तमिलनाडु में भाजपा का उभार: द्रविड़ राजनीति को सबसे बड़ी चुनौती

 

तमिलनाड़ु की राजनीति भारत के राजनीतिक इतिहास की सबसे विशिष्ट, जटिल और वैचारिक रूप से संगठित राजनीति मानी जाती है। भारत के अधिकांश राज्यों में जहाँ जाति, विकास, धर्म, क्षेत्रीय समीकरण या नेतृत्व परिवर्तन के आधार पर राजनीतिक धारा बदलती रही, वहीं तमिलनाडु में लगभग छह दशकों तक एक विशेष वैचारिक आंदोलन ने राजनीति को नियंत्रित किया। यह आंदोलन था द्रविड़ आंदोलन। इसी द्रविड़ राजनीति ने कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय शक्ति को समाप्त कर दिया, हिंदी विरोध को जनांदोलन बनाया, उत्तर भारतीय राजनीतिक प्रभाव का विरोध किया और क्षेत्रीय अस्मिता को राजनीतिक शक्ति में बदल दिया। किंतु वर्ष 2014 के बाद और विशेष रूप से 2021 तथा 2026 के चुनावों के बाद पहली बार ऐसा प्रतीत होने लगा कि तमिलनाडु की राजनीति में राष्ट्रवादी विचारधारा धीरे-धीरे स्थायी स्थान बनाने लगी है।

आजादी के समय तत्कालीन मद्रास राज्य में इंडियन नेशनल कांग्रेस का पूर्ण प्रभुत्व था। 1952 के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने लगभग 152 सीटें जीतकर सरकार बनाई। उस समय मद्रास राज्य में वर्तमान तमिलनाडु के अतिरिक्त आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक के कुछ भाग भी सम्मिलित थे। सी. राजागोपालचारी और बाद में के.कमराज जैसे नेताओं ने कांग्रेस को मजबूत बनाए रखा। किंतु इसी काल में एक वैचारिक आंदोलन धीरे-धीरे आकार ले रहा था।

द्रविड़ आंदोलन की जड़ें 1916 में स्थापित साउथ इंडियन लिबरल फेडरेशन अर्थात जस्टिस पार्टी तक जाती हैं। इस संगठन ने दक्षिण भारत में गैर-ब्राह्मण राजनीति को संगठित किया। बाद में ईवी. रामासामी ने आत्मसम्मान आंदोलन चलाया। पेरियार ने ब्राह्मणवाद, सनातन परंपराओं, हिंदी भाषा और उत्तर भारतीय राजनीतिक प्रभाव का तीव्र विरोध किया। उन्होंने “द्रविड़ राष्ट्र” की अवधारणा तक प्रस्तुत की। उनका प्रभाव इतना व्यापक हुआ कि तमिल समाज का बड़ा भाग धीरे-धीरे द्रविड़ पहचान के साथ स्वयं को जोड़ने लगा।

1949 में सी. एन. अन्नादुरई ने द्रविड़ा मुन्नेत्र कज़हगम (डी एम के) की स्थापना की और द्रविड़ आंदोलन को चुनावी राजनीति का रूप दिया। 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन ने तमिल राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। पूरे राज्य में व्यापक प्रदर्शन हुए। केंद्र सरकार के प्रति असंतोष बढ़ा और 1967 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पराजित हो गई। DMK ने लगभग 138 सीटें जीतकर सत्ता प्राप्त की। यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था बल्कि तमिलनाडु में राष्ट्रीय राजनीति से क्षेत्रीय राजनीति की ओर स्थायी संक्रमण था।

इसके बाद द्रविड़ राजनीति ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1972 में M. G. Ramachandran ने DMK से अलग होकर ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ा मुन्नेत्र कज़हगम (AIDMK) की स्थापना की। एमजीआर की लोकप्रियता इतनी विशाल थी कि AIADMK शीघ्र ही DMK की सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी बन गई। 1977 में AIADMK ने लगभग 130 सीटें जीतकर सरकार बनाई। इसके बाद तमिलनाडु की राजनीति लगभग पाँच दशकों तक DMK और AIADMK के बीच घूमती रही।

1989, 1991, 1996, 2001, 2006, 2011 और 2016 के चुनावों में सत्ता कभी DMK तो कभी AIADMK के हाथों में जाती रही। 1991 में जे. जयाललिता के नेतृत्व में AIADMK ने कांग्रेस गठबंधन के साथ भारी जीत प्राप्त की। 2011 में जयललिता ने पुनः प्रचंड बहुमत हासिल किया। दूसरी ओर एम. करूणानिधि ने DMK को लंबे समय तक वैचारिक और राजनीतिक रूप से जीवित रखा।

इन दशकों में भारतीय जनता पार्टी तमिलनाडु में लगभग नगण्य शक्ति रही। 1980 और 1990 के दशक में भाजपा का मत प्रतिशत प्रायः 1 से 3 प्रतिशत के बीच रहता था। पार्टी का संगठन कमजोर था और उसे “उत्तर भारतीय पार्टी” के रूप में देखा जाता था। हिंदी विरोधी भावना और द्रविड़ राजनीति के कारण भाजपा को व्यापक स्वीकार्यता नहीं मिली। फिर भी भाजपा ने धीरे-धीरे गठबंधन राजनीति के माध्यम से प्रवेश करने का प्रयास किया। 1998 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने AIADMK के साथ गठबंधन किया। उस चुनाव में राष्ट्रीय स्तर पर अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री बने। 1999 में भाजपा ने DMK के साथ गठबंधन किया और तमिलनाडु में NDA को उल्लेखनीय सफलता मिली। किंतु यह सफलता भाजपा के स्वतंत्र जनाधार की नहीं बल्कि गठबंधन की सफलता मानी गई।

2001, 2006 और 2011 के विधानसभा चुनावों में भाजपा प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर सकी। 2016 में भाजपा ने लगभग 188 सीटों पर चुनाव लड़कर स्वतंत्र शक्ति बनने का प्रयास किया। किंतु पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। उसका कुल मत प्रतिशत लगभग 2.8 प्रतिशत रहा। हालांकि कोयंबटूर, कन्याकुमारी और कुछ शहरी क्षेत्रों में भाजपा को अपेक्षाकृत अच्छे वोट प्राप्त हुए।

2014 के बाद स्थिति बदलनी प्रारम्भ हुई। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने दक्षिण भारत पर विशेष ध्यान देना शुरू किया। पार्टी ने समझ लिया कि तमिलनाडु में केवल उत्तर भारतीय शैली का हिंदुत्व सफल नहीं होगा। इसलिए उसने तमिल संस्कृति और सनातन परंपरा को जोड़ने वाली राजनीति प्रारम्भ की। काशी-तमिल संगमम, तमिल संतों का राष्ट्रीय सम्मान, चोल और पांड्य इतिहास का प्रचार, प्राचीन मंदिरों के संरक्षण और तमिल भाषा के सम्मान जैसे मुद्दों को भाजपा ने प्रमुखता दी. 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने लगभग 8 सीटों पर चुनाव लड़ा और कन्याकुमारी सीट जीतने में सफल रही। पोन राधाकृष्णन सांसद बने। भाजपा का मत प्रतिशत लगभग 5.5 प्रतिशत तक पहुँचा। यह तमिलनाडु में भाजपा की पहली बड़ी स्वतंत्र सफलता मानी गई।

2019 लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए कठिन रहा। पार्टी ने AIADMK गठबंधन के साथ लगभग 5 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी। राज्यव्यापी मत प्रतिशत लगभग 3.6 प्रतिशत रहा। DMK गठबंधन ने 39 में से 38 सीटें जीत लीं। किंतु भाजपा ने इस पराजय के बाद भी अपना संगठन विस्तार जारी रखा।

2021 विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। भाजपा ने AIADMK गठबंधन के अंतर्गत 20 सीटों पर चुनाव लड़ा और 4 सीटें जीत लीं। नागरकोइल, तिरुनेलवेली, मोडक्कुरिची और कोयंबटूर दक्षिण में भाजपा को सफलता मिली। कोयंबटूर दक्षिण सीट पर वनाथी श्रीनिवासन ने अभिनेता कमल हासन को पराजित किया। भाजपा का कुल मत प्रतिशत लगभग 2.6 प्रतिशत रहा, किंतु महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि कई सीटों पर भाजपा 30 से 40 प्रतिशत तक वोट प्राप्त करने लगी थी। इसी काल में के. अन्नामलाइ का उदय हुआ। पूर्व आईपीएस अधिकारी अन्नामलाई को तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने भाजपा की राजनीति को अधिक आक्रामक, युवा और वैचारिक स्वरूप दिया। उन्होंने द्रविड़ राजनीति पर सीधे प्रश्न उठाए कि क्या सामाजिक न्याय की राजनीति परिवारवाद में बदल गई है? क्या मंदिर प्रशासन में भेदभाव हो रहा है? क्या सनातन विरोध तमिल संस्कृति का वास्तविक स्वरूप है? अन्नामलाई ने “एन मन्न, एन मक्कल” यात्रा निकाली, सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं तक पहुँच बनाई और भाजपा को केवल चुनावी दल नहीं बल्कि वैचारिक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया।

2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा ने तमिलनाडु में लगभग 23 सीटों पर चुनाव लड़ा। पार्टी कोई सीट नहीं जीत सकी, किंतु उसका मत प्रतिशत लगभग 11 से 12 प्रतिशत तक पहुँच गया। यह तमिलनाडु में भाजपा का अब तक का सर्वोच्च लोकसभा मत प्रतिशत था। कोयंबटूर में अन्नामलाई को लगभग 32 से 33 प्रतिशत वोट मिले। कन्याकुमारी में भाजपा को लगभग 35 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। चेन्नई दक्षिण में लगभग 26 प्रतिशत वोट मिले। राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे “सीट नहीं, आधार विस्तार” का चुनाव कहा।

2026 विधानसभा चुनाव में अभिनेता जोसफ विजय की पार्टी तमिलगा वैटरी कज़हगम (टीवीके) के मैदान में उतरने से राजनीति त्रिकोणीय हो गई। भाजपा ने NDA गठबंधन के तहत 27 सीटों पर चुनाव लड़ा। पार्टी केवल ऊधगमंडलम सीट जीत सकी, किंतु कई सीटों पर उसका प्रदर्शन उल्लेखनीय रहा। भाजपा लगभग 5 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही जिसमें सत्तूर, रासीपुरम, मोडक्कुरिची, कोयंबटूर उत्तर और नागरकोइल प्रमुख रहे। अनेक सीटों पर भाजपा का मत प्रतिशत 30 प्रतिशत से ऊपर पहुँच गया। मोडक्कुरिची में भाजपा लगभग 47 से 48 प्रतिशत तक वोट प्राप्त करने में सफल रही।

आज भाजपा की सबसे मजबूत उपस्थिति पश्चिमी तमिलनाडु में दिखाई देती है। कोयंबटूर, तिरुप्पुर, इरोड, सलेम और नामक्कल जैसे क्षेत्रों में पार्टी का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। कन्याकुमारी और दक्षिण तमिलनाडु में भी भाजपा का आधार मजबूत हुआ है। चेन्नई के शहरी, आईटी और उच्च मध्यम वर्ग में भी भाजपा को समर्थन मिलने लगा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा तमिलनाडु में पश्चिम बंगाल जैसी त्वरित ध्रुवीकरण राजनीति नहीं कर रही। बंगाल में भाजपा ने अवैध घुसपैठ, हिंदू ध्रुवीकरण और सत्ता विरोधी लहर के सहारे तेजी से विस्तार किया। लेकिन तमिलनाडु में भाजपा बहुत अधिक सावधानीपूर्वक दीर्घकालिक रणनीति पर कार्य कर रही है। यहाँ वह “तमिल गौरव + सनातन राष्ट्रवाद” का मिश्रित मॉडल तैयार कर रही है। मंदिर प्रशासन, सनातन विरोधी बयान, तमिल सभ्यता, प्राचीन मंदिरों की परंपरा और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम से भाजपा धीरे-धीरे वैचारिक आधार तैयार कर रही है। यदि भविष्य में AIADMK और कमजोर होती है तो एंटी-DMK वोटों का बड़ा भाग भाजपा की ओर आ सकता है।

फिर भी भाजपा के सामने बड़ी चुनौतियाँ हैं। DMK का मजबूत संगठन, तमिल पहचान की गहरी राजनीति, ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित पकड़ और TVK का उभार उसके विस्तार को सीमित कर सकते हैं। किंतु यह स्पष्ट दिखाई देता है कि भाजपा तमिलनाडु में केवल चुनाव नहीं लड़ रही, बल्कि दीर्घकालिक वैचारिक परिवर्तन की प्रक्रिया पर कार्य कर रही है।

तमिलनाडु में राष्ट्रवादी राजनीति का जो बीज कभी लगभग नगण्य था, वह अब धीरे-धीरे एक संगठित शक्ति का रूप लेता दिखाई दे रहा है। आने वाले वर्षों में भाजपा तुरंत सत्ता प्राप्त करे या नहीं, किंतु इतना स्पष्ट है कि अब तमिलनाडु की राजनीति केवल द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द सीमित नहीं रहने वाली। धीरे-धीरे एक नया वैचारिक संघर्ष आकार ले रहा है, और भाजपा उसी संघर्ष की सबसे प्रमुख राष्ट्रवादी शक्ति बनकर उभरने का प्रयास कर रही है।

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