समुद्र, साम्राज्य और भारत की खोज : वास्को डी गामा का रहस्य - दिवाकर शर्मा
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पुर्तगाल के पश्चिमी तट पर खड़ा एक दुबला-पतला युवक अटलांटिक की लहरों को देख रहा था। उसके सामने फैला समुद्र केवल पानी नहीं था, वह एक रहस्य था - ऐसा रहस्य, जिसके उस पार सोना था, मसाले थे, ईश्वर था, युद्ध था, और एक ऐसा देश था जिसके बारे में यूरोप में किंवदंतियाँ सुनाई जाती थीं - भारत। उस युवक का नाम था Vasco da Gama।
उस समय यूरोप भूखा था। केवल भोजन के लिए नहीं, बल्कि धन, शक्ति और धार्मिक विस्तार के लिए। मध्यकालीन यूरोप में काली मिर्च, दालचीनी, लौंग और इलायची सोने से भी अधिक मूल्यवान मानी जाती थीं। यूरोप की सर्दियों में भोजन को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए मसाले जरूरी थे। लेकिन ये मसाले यूरोप में पैदा नहीं होते थे। वे आते थे भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया से। सदियों से अरब व्यापारी इन्हें भारतीय तटों से लेकर लाल सागर और भूमध्यसागर तक पहुँचाते थे, जहाँ से वे वेनिस जैसे यूरोपीय नगरों तक जाते थे। रास्ते में हर व्यापारी अपना लाभ जोड़ता जाता था और अंततः मसाले यूरोप पहुँचते-पहुँचते अत्यंत महंगे हो जाते थे।
यूरोप भारत को “इंडिया” से अधिक “धन की भूमि” मानता था। वहाँ के लोगों के मन में भारत की छवि किसी आध्यात्मिक स्वर्ग और सोने की खान जैसी थी। उन्हें लगता था कि भारत में नदियों में सोना बहता है, मंदिर हीरों से भरे हैं और वहाँ ऐसे ईसाई राजा भी रहते हैं जो मुसलमानों के विरुद्ध यूरोप की सहायता कर सकते हैं। यह कल्पना “प्रेस्टर जॉन” नामक एक काल्पनिक ईसाई सम्राट की कहानियों से जन्मी थी।
लेकिन समस्या यह थी कि भारत तक पहुँचने वाले पारंपरिक स्थल मार्गों पर मुसलमान शक्तियों का नियंत्रण था। 1453 में Fall of Constantinople के बाद जब ऑटोमन तुर्कों ने कॉन्स्टेंटिनोपल पर कब्जा कर लिया, तब यूरोप को लगा कि पूर्व की ओर जाने वाले द्वार बंद हो रहे हैं। इसी क्षण यूरोप ने समुद्र की ओर देखना शुरू किया।
उसी समय यूरोप में एक और उथल-पुथल चल रही थी। ईसाईयत केवल धर्म नहीं थी, राजनीति भी थी। पोप का प्रभाव विशाल था। यूरोप स्वयं को “क्रूसेड” की मानसिकता में देखता था - इस्लामी शक्तियों के विरुद्ध ईसाई विस्तार। स्पेन और पुर्तगाल अभी-अभी मुस्लिम शासन से अपने क्षेत्रों को पुनः जीतकर निकले थे। Reconquista ने उनके भीतर धार्मिक जोश भर दिया था। वे अब इस्लामी व्यापारिक प्रभुत्व को तोड़ना चाहते थे। समुद्र उनके लिए केवल व्यापार नहीं था, धार्मिक युद्ध का नया मोर्चा था।
इसीलिए जब Christopher Columbus पश्चिम की ओर समुद्र में उतरा, तब उसका लक्ष्य अमेरिका नहीं था। वह भारत पहुँचना चाहता था। उसे लगता था कि पृथ्वी गोल है और पश्चिम से जाकर वह पूर्व में भारत पहुँच जाएगा। लेकिन वह एक अनजान महाद्वीप से टकरा गया। दूसरी ओर पुर्तगाल ने अलग रणनीति चुनी। उन्होंने अफ्रीका के चारों ओर घूमकर भारत पहुँचने का मार्ग खोजने का निश्चय किया।
यहाँ से शुरू होती है समुद्री खोजों की सबसे रोमांचक कहानी।
पुर्तगाल छोटा देश था, लेकिन उसकी दृष्टि विशाल थी। वहाँ के राजकुमार Henry the Navigator ने अफ्रीकी तटों की खोज को प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे पुर्तगाली नाविक अफ्रीका के पश्चिमी तट पर नीचे उतरते गए। वे सोना, दास और समुद्री मार्ग खोज रहे थे। अंततः Bartolomeu Dias ने 1488 में अफ्रीका के दक्षिणी छोर “केप ऑफ गुड होप” को पार कर लिया। अब भारत केवल कल्पना नहीं रह गया था, वह समुद्री मानचित्र पर संभव हो चुका था।
दस वर्ष बाद, 1498 में, वास्को डी गामा चार जहाजों के साथ निकला। उसके पास केवल कम्पास और नक्शे नहीं थे, बल्कि धार्मिक आदेश भी थे। उसकी यात्रा व्यापारिक कम और सामरिक अधिक थी। अफ्रीका के पूर्वी तट पर उसे अरब व्यापारियों का प्रभाव दिखाई दिया। मोम्बासा में उसका स्वागत नहीं हुआ, क्योंकि अरब व्यापारी समझ चुके थे कि ये लोग केवल ग्राहक नहीं, प्रतिस्पर्धी बनकर आए हैं। अंततः मालिंदी में उसे एक कुशल नाविक मिला, जिसने मानसूनी हवाओं का उपयोग करते हुए उसके जहाजों को सीधे भारत की ओर मोड़ दिया। और फिर एक दिन अरब सागर के क्षितिज पर हरे तट दिखाई दिए - मलाबार।
वास्को डी गामा भारत के पश्चिमी तट पर Kozhikode पहुँचा, जिसे यूरोप “कालीकट” कहता था। उसने सबसे पहले केरल ही क्यों चुना? क्योंकि सदियों से वही भारतीय महासागर व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र था। अरब व्यापारी वहाँ नियमित आते थे। मसालों की दुनिया का हृदय वहीं धड़कता था। मलाबार का काली मिर्च व्यापार पूरी दुनिया को आकर्षित करता था। वहाँ हिंदू राजा शासन करते थे, लेकिन बंदरगाहों में अरब, यहूदी, फारसी और चीनी व्यापारी भी रहते थे। यह उस समय का वैश्विक व्यापारिक नेटवर्क था।
कालीकट पर शासन था Zamorin का। जब वास्को डी गामा दरबार में पहुँचा, तो वह अपने साथ कुछ साधारण उपहार लाया - सस्ते कपड़े, मूंगे की मालाएँ, चीनी। भारतीय दरबार इन्हें देखकर प्रभावित नहीं हुआ। उन्हें लगा कि ये कोई छोटे-मोटे व्यापारी हैं। भारत उस समय यूरोप से अधिक समृद्ध था। यूरोप जिसे चमत्कार मान रहा था, भारत के लिए वह सामान्य व्यापार था। लेकिन तनाव शीघ्र बढ़ा। अरब व्यापारियों ने पुर्तगालियों को खतरे के रूप में देखा। पुर्तगाली समझ चुके थे कि केवल व्यापार से काम नहीं चलेगा। वे समुद्र पर एकाधिकार चाहते थे। आने वाले वर्षों में उन्होंने हिंसा शुरू की। जहाज लूटे गए, बंदरगाहों पर हमला हुआ, तीर्थयात्रियों को जिंदा जलाया गया। हिंद महासागर, जो सदियों से अपेक्षाकृत खुला व्यापारिक क्षेत्र था, अब तोपों और युद्धपोतों का क्षेत्र बनने लगा।
पुर्तगालियों ने जल्दी ही समझ लिया कि केरल में स्थायी सत्ता स्थापित करना आसान नहीं होगा। मलाबार के राजा शक्तिशाली थे, अरब व्यापारिक नेटवर्क मजबूत था, और स्थानीय समाज समुद्री गतिविधियों में अत्यंत अनुभवी था। इसलिए उन्होंने ऐसी जगह खोजी जहाँ राजनीतिक परिस्थितियाँ उनके पक्ष में हों। वह स्थान था Goa।
1510 में Afonso de Albuquerque ने गोवा पर कब्जा कर लिया। उस समय गोवा बीजापुर सल्तनत के अधीन था। स्थानीय संघर्षों और राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाकर पुर्तगालियों ने वहाँ स्थायी सत्ता स्थापित कर ली। गोवा उनके लिए केवल बंदरगाह नहीं था; वह एशिया में ईसाई साम्राज्य का मुख्यालय बन गया।
केरल पूरी तरह कभी पुर्तगाली शासन में नहीं गया। इसके पीछे कई कारण थे - स्थानीय राजाओं की शक्ति, समुद्री प्रतिरोध, अरब व्यापारियों का नेटवर्क और लगातार बदलते गठबंधन। Kunjali Marakkar जैसे योद्धाओं ने पुर्तगालियों को चुनौती दी। मलाबार के समुद्र में कई दशकों तक संघर्ष चलता रहा। केरल ने व्यापारिक समझदारी और सैन्य प्रतिरोध दोनों का उपयोग किया, जबकि गोवा अपेक्षाकृत अलग-थलग पड़ गया।
लेकिन गोवा की कहानी भयावह भी है। वहाँ धर्मांतरण हुए, चर्च सत्ता का केंद्र बने, और Goa Inquisition जैसी संस्थाएँ स्थापित हुईं। स्थानीय परंपराओं पर नियंत्रण लगाया गया। कई लोगों के लिए यह शासन केवल विदेशी प्रशासन नहीं, सांस्कृतिक दमन भी था। फिर भी, समय के साथ गोवा एक मिश्रित सांस्कृतिक क्षेत्र बन गया, जहाँ भारतीय और पुर्तगाली प्रभाव आपस में घुलने लगे।
सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि जब मुगल साम्राज्य आया और चला गया, मराठे उठे और बिखरे, अंग्रेज आए और चले गए - तब भी पुर्तगाली गोवा में बने रहे। 1498 से 1961 तक फैला यह कालखंड केवल उपनिवेशवाद नहीं, इतिहास की एक लंबी छाया था। फिर प्रश्न उठता है - हमें यह सब विस्तार से क्यों नहीं पढ़ाया गया? शायद इसलिए कि भारतीय इतिहास की शिक्षा लंबे समय तक कुछ सीमित अध्यायों में बाँध दी गई। दिल्ली-केंद्रित इतिहास ने समुद्री भारत की कहानियों को पीछे छोड़ दिया। भारतीय महासागर का इतिहास, अरब-भारतीय व्यापार, मलाबार की राजनीति, पुर्तगाली हिंसा, गोवा का धार्मिक संघर्ष - ये सब विद्यालयी पुस्तकों के छोटे पैराग्राफ बनकर रह गए। औपनिवेशिक इतिहासकारों ने यूरोपीय “खोजों” को सभ्यता का विस्तार बताया, जबकि भारतीय दृष्टि से वह व्यापार, धर्म और साम्राज्यवाद का जटिल मिश्रण था। स्वतंत्र भारत में भी इतिहास लेखन कई वैचारिक ध्रुवों में बँट गया और समुद्री इतिहास आम पाठकों तक बहुत कम पहुँच पाया। लेकिन इतिहास की सबसे बड़ी विशेषता यही है - वह कभी पूरी तरह छिपा नहीं रहता। कोई-न-कोई पुस्तक, कोई यात्री, कोई भूला हुआ बंदरगाह, कोई पुराना चर्च, कोई अरबी दस्तावेज, कोई मंदिर का अभिलेख - समय-समय पर फिर बोलने लगता है। और शायद इसी कारण आज भी जब कोई पाठक “द लास्ट क्रूसेड” जैसी पुस्तक पढ़ता है, तो उसके भीतर केवल अतीत जानने की इच्छा नहीं जगती, बल्कि एक बेचैनी जन्म लेती है कि आखिर हम कौन थे, दुनिया हमें कैसे देखती थी, और समुद्र की उन लहरों पर सवार होकर आए लोगों ने हमारे इतिहास को कितना बदल दिया?
क्योंकि वास्को डी गामा केवल एक नाविक नहीं था। वह उस क्षण का प्रतीक था जब पहली बार यूरोप ने समुद्र के रास्ते भारत के दरवाज़े पर दस्तक दी और उसके बाद दुनिया कभी वैसी नहीं रही।
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इतिहास

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