किसे खटकती थीं यशोधरा राजे सिंधिया?
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कभी कभी किसी शहर को अपने ही इतिहास की कीमत बहुत देर से समझ आती है। शिवपुरी आज शायद उसी मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। गलियों में, चौराहों पर, चाय की दुकानों में, सरकारी दफ्तरों के बाहर, यहाँ तक कि राजनीतिक बैठकों के बीच भी एक नाम बार बार सुनाई देता है - यशोधरा राजे सिंधिया। यह केवल किसी नेता की अनुपस्थिति का स्मरण नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था की तुलना है जिसे लोग कभी कठोर कहते थे, लेकिन अब उसी कठोरता में उन्हें सुरक्षा, अनुशासन और नियंत्रण दिखाई देने लगा है।
शिवपुरी की जनता आज जब बढ़ते अपराध, भू-माफियाओं की सक्रियता, प्रशासनिक शिथिलता, राजनीतिक अव्यवस्था और नगर पालिका के निरंतर विवादों को देखती है, तब उसे वह दौर याद आता है जब सत्ता का भय भी था और व्यवस्था का संतुलन भी। राजनीति केवल चुनाव नहीं होती। राजनीति वह अदृश्य शक्ति होती है जो यह तय करती है कि शहर भय में जियेगा या विश्वास में। शिवपुरी के लोगों का एक बड़ा वर्ग आज यह मानने लगा है कि जब तक यशोधरा राजे सिंधिया सक्रिय रहीं, तब तक बहुत से चेहरे सीमाओं में बंधे रहे। कुछ लोग असहमत हो सकते हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि उस दौर में खुलेआम सत्ता को चुनौती देकर अराजकता फैलाने वालों की संख्या सीमित थी। प्रशासन पर एक अदृश्य नियंत्रण था। अधिकारियों को यह पता था कि ऊपर तक बात पहुँच सकती है। राजनीतिक कार्यकर्ताओं में भी एक मर्यादा थी। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि शिवपुरी की राजनीति का सबसे प्रभावशाली चेहरा धीरे धीरे किनारे होता चला गया?
यही वह प्रश्न है जो आज जनचर्चाओं में सबसे अधिक तैर रहा है। लोग कहते हैं कि यह केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित प्रक्रिया थी। ऐसी प्रक्रिया जिसमें मुस्कुराते चेहरे थे, लेकिन भीतर गहरी प्रतिस्पर्धा और भय छिपा था। शिवपुरी की राजनीति में कुछ ऐसे लोग उभरे जिनकी अपनी कोई स्थायी जनस्वीकृति नहीं थी, पर वे सत्ता के गलियारों में फुसफुसाहटों की राजनीति जानते थे। कहा जाता है कि इन्हीं लोगों ने धीरे धीरे ऐसा वातावरण तैयार किया जिसमें शीर्ष नेतृत्व तक यह संदेश पहुँचाया गया कि यशोधरा राजे सिंधिया का जनाधार समाप्त हो चुका है, जनता उनसे दूर हो चुकी है और अब शिवपुरी नई राजनीति चाहता है।
परंतु प्रश्न यह है कि यदि जनाधार समाप्त हो गया था, तो आज वही जनता उन्हें क्यों याद कर रही है? क्या यह केवल संयोग है कि जैसे जैसे शहर में अव्यवस्था बढ़ी, वैसे वैसे लोगों की स्मृतियों में यशोधरा राजे सिंधिया का व्यक्तित्व और मजबूत होता गया? या फिर जनता अब उन चेहरों को पहचानने लगी है जिन्होंने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के लिए एक पूरे शहर की राजनीतिक स्थिरता को दांव पर लगा दिया?
राजनीति में सबसे खतरनाक हमला किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उसके आत्मसम्मान पर किया जाता है। जनचर्चाओं में यह भी कहा जाता है कि यही खेल खेला गया। धीरे धीरे ऐसे हालात निर्मित किए गए जहाँ एक वरिष्ठ नेता को यह महसूस कराया जाए कि अब उन्हें नहीं चाहा जाता। उनके निर्णयों पर सवाल उठे, उनके समर्थकों को कमजोर किया गया, उनके निकट लोगों को तोड़ा गया, और सबसे बड़ी बात उनके वर्षों के योगदान को सामान्य साबित करने की कोशिश की गई। शिवपुरी की राजनीति को करीब से देखने वाले लोग जानते हैं कि यह सब अचानक नहीं हुआ। यह वर्षों तक चली एक शांत लेकिन गहरी रणनीति थी। सामने सम्मान, पीछे असहमति। मंचों पर जयकारे, भीतर सत्ता की बेचैनी। कुछ लोगों को यह भय था कि जब तक यशोधरा राजे सिंधिया सक्रिय रहेंगी, तब तक वे स्वयं कभी पूर्ण नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाएंगे। इसलिए राजनीति के भीतर एक ऐसा वातावरण बनाया गया जिसमें धीरे धीरे उन्हें अकेला महसूस कराया जाए। लेकिन राजनीति का सबसे बड़ा सत्य यही है कि जनता अंततः तुलना करती है। और आज शिवपुरी वही तुलना कर रहा है।
जब नगर पालिका विवादों का अखाड़ा बनती है, जब आम नागरिक अपनी सुनवाई के लिए भटकता है, जब अपराधी तत्वों का मनोबल बढ़ता दिखाई देता है, जब भू-माफियाओं की चर्चा आम होने लगती है, तब लोगों को वह समय याद आता है जब कम से कम सत्ता की दिशा स्पष्ट दिखाई देती थी। लोग कहते हैं कि उस दौर में गलतियाँ भी थीं, नाराज़गियाँ भी थीं, लेकिन एक नियंत्रण था, एक जवाबदेही थी।
सबसे रहस्यमयी बात यह है कि जिन लोगों ने कभी यह दावा किया था कि शिवपुरी अब नए नेतृत्व को स्वीकार कर चुका है, आज वही लोग जनता के बीच उस स्वीकार्यता को खोजते दिखाई देते हैं। राजनीति में निर्मित कृत्रिम भीड़ और वास्तविक जनसमर्थन का अंतर अब धीरे धीरे सामने आने लगा है। शिवपुरी के कई बुजुर्ग यह कहते सुनाई देते हैं कि राजनीति में विरोध होना स्वाभाविक है, लेकिन किसी जननेता को षड्यंत्रपूर्वक उसके ही क्षेत्र से भावनात्मक रूप से काट देना केवल व्यक्ति के साथ अन्याय नहीं होता, वह पूरे क्षेत्र के भविष्य के साथ खिलवाड़ बन जाता है। शायद इसी कारण आज यशोधरा राजे सिंधिया का नाम केवल एक नेता के रूप में नहीं, बल्कि एक खोई हुई राजनीतिक स्थिरता के प्रतीक के रूप में लिया जा रहा है और यही कारण है कि समय समय पर उनके पुनः सक्रिय राजनीति में लौटने की चर्चाएँ फिर उठ खड़ी होती हैं। क्योंकि जनता जब वर्तमान से असंतुष्ट होती है, तब वह अतीत में उन चेहरों को खोजती है जिन्होंने कभी व्यवस्था को नियंत्रण में रखा था।
अब आगे क्या होगा, यह भविष्य के गर्भ में है। क्या यशोधरा राजे सिंधिया फिर शिवपुरी की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाएँगी? क्या वे उन लोगों को जवाब देंगी जिन्होंने उन्हें राजनीतिक रूप से अकेला करने का प्रयास किया? क्या शिवपुरी फिर किसी पुराने नेतृत्व की ओर लौटेगा? या फिर यह केवल स्मृतियों का राजनीतिक उबाल है? फिलहाल इतना तय है कि शिवपुरी की हवा में एक बेचैन सवाल तैर रहा है कि क्या एक सुनियोजित राजनीतिक खेल ने शिवपुरी से उसका सबसे प्रभावशाली नेतृत्व छीन लिया?
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दिवाकर की दुनाली से

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