भारत में मध्यम वर्ग की 70 प्रतिशत आय कर्ज और इलाज में खर्च हो जाती है - स्नेहा सिंह
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संयुक्त राष्ट्र द्वारा हाल ही में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गई थी। इस रिपोर्ट ने भारत के विकास, वर्चुअल रियलिटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिकता की वास्तविकता को उजागर कर दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विकास की अंधी दौड़ के कारण आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्याएं पैदा हुई हैं। रिपोर्ट के अनुसार विश्व की कुल आबादी के 40 प्रतिशत लोगों के पास रहने योग्य मकान नहीं हैं। इनमें भारत की स्थिति और भी खराब है। भारत में अनुमानतः 6.5 करोड़ से अधिक लोग झुग्गियों और स्लम क्षेत्रों में रहने के लिए मजबूर हैं।
भारत के करोड़ों लोगों के पास ऐसा सुरक्षित मकान नहीं है, जिसमें सामान्य सुविधाएं हों और जिसे वे वहन कर सकें। ये लोग कच्चे, टूटे-फूटे और अस्थाई मकानों में रहते हैं। विकसित शहरों की चमक-दमक के बीच लाखों लोग झोपड़ियों, टीन-शेडों और फुटपाथों पर जीवन गुजारते हैं। इन लोगों की स्थिति अत्यंत दयनीय और कष्टदायक है। विकास की अंधी दौड़ में समाज का एक वर्ग ऐसा पीछे छूट गया है या पीछे छोड़ दिया गया है, जिसके सिर पर मजबूत छत और घर में दो वक्त का भोजन तक नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र ने वर्ल्ड सिटी रिपोर्ट्स 2026 नामक रिपोर्ट जारी की है। इसमें कहा गया है कि भारत में राजनीतिक चालबाजियों, भ्रष्टाचार, नौकरशाही और रिश्वतखोरी के कारण आवास का बड़ा संकट उत्पन्न हुआ है। यह समस्या केवल शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब छोटे गांवों तक पहुंच गई है। इसके कारण सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता, पर्यावरणीय स्थिरता और सबसे बढ़कर मानवीय गरिमा को व्यापक नुकसान पहुंचा है। चिंताजनक बात यह है कि मकानों की लगातार बढ़ती कीमतों, महंगाई, बढ़ते किराए और सीमित उपलब्धता के कारण लाखों लोग बेघर हो रहे हैं। लोगों के पास घर न होना अब एक बड़ी चुनौती बन गया है।
जानकारों के अनुसार जिस गति से शहरीकरण बढ़ा है, उसके कारण गांव टूट गए हैं और शहरों में लोगों के पास रहने के लिए मकान नहीं हैं। भारत में शहरीकरण ने गंभीर समस्याएं पैदा की हैं। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया की सबसे तेजी से शहरीकरण करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि 2050 तक भारत की लगभग आधी आबादी शहरों में रहने लगेगी। वर्तमान में भी करोड़ों लोग बेहतर शिक्षा, रोजगार, सुविधाओं, स्वास्थ्य सेवाओं और नए अवसरों की तलाश में गांव छोड़कर शहरों में आ रहे हैं। शहर तेजी से फैल रहे हैं और बड़े हो रहे हैं, लेकिन फिर भी लोगों के लिए पर्याप्त मकान नहीं हैं। एक ओर शहरों में गगनचुंबी इमारतें बन रही हैं, तो दूसरी ओर हजारों लोग झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं।
भारत में आधिकारिक रूप से करोड़ों लोग झुग्गियों में रहते हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार शहरों में रहने वाला हर छठा व्यक्ति झुग्गी या पिछड़े क्षेत्र में रहने के लिए मजबूर है। औसतन शहरों की 17 प्रतिशत आबादी झुग्गियों में रहती है। इसके कारण झुग्गी-बस्तियों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। मुंबई की धारावी दुनिया की सबसे बड़ी झुग्गी-बस्ती है, जहां 15 लाख से अधिक लोग रहते हैं। इसी प्रकार कोलकाता की एक-तिहाई आबादी झुग्गियों या स्लम क्षेत्रों में रहती है। यहां की बसंती स्लम एक बहुत बड़ा क्षेत्र है, जहां लाखों लोग बिना सुविधाओं के जीवन गुजारते हैं। चेन्नई की 28 प्रतिशत आबादी स्लम क्षेत्रों में रहती है। दिल्ली में जे.जे. क्लस्टर्स और यमुना किनारे स्थित भलस्वा जैसे स्लम क्षेत्रों में लोग अत्यंत बदबूदार पानी और कचरे के बीच रहने को मजबूर हैं।
स्थिति यह है कि भारतीय शहरों में लाखों लोग अवैध झुग्गी-बस्तियों में रहते हैं। वहां पीने का स्वच्छ पानी, शौचालय, स्वच्छता, सीवरेज व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं का व्यापक अभाव है। वहां रहने वाले अधिकांश लोग बीमारियों, अभावों, प्राकृतिक आपदाओं और महामारियों का शिकार होते हैं। शहरी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद इन लोगों को बुनियादी सुविधाएं नहीं मिलतीं।
भारत में सरकारी अधिकारियों, बिल्डरों और नेताओं की मिलीभगत के कारण जमीनों के दाम आसमान छू रहे हैं। बड़े शहरों में महंगी जमीन खरीदने के बाद एफएसआई, करों और लक्जरी सुविधाओं के नाम पर करोड़ों रुपए के फ्लैट और मकान बेचे जा रहे हैं। भ्रष्टाचार और अन्य खर्चों की भरपाई के लिए यह सब किया जाता है। सरकार झुग्गियों को हटाकर लोगों को सरकारी आवासों में बसाने का प्रयास कर रही है, लेकिन ऐसी आवास योजनाएं भी भ्रष्टाचार का केंद्र बन जाती हैं। अक्सर आवास शहर से बहुत दूर बनाए जाते हैं। इनमें भी सरकारी अधिकारियों, नेताओं और मंत्रियों द्वारा कथित रूप से अपने चहेतों को फ्लैट आवंटित कर दिए जाते हैं। उन्हें सस्ते दामों पर फ्लैट मिल जाते हैं और वास्तविक जरूरतमंद लोग प्रतीक्षा करते रह जाते हैं। ये फ्लैट भी सामान्य सुविधाओं वाले होते हैं। बाद में इनके किराए का काला बाजार शुरू हो जाता है। परिणामस्वरूप लोग फिर नई झुग्गियां बना लेते हैं और शहर में कहीं बस जाते हैं। इससे गंदगी और बीमारियां बढ़ती रहती हैं तथा लोग परेशान होते रहते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि मकानों की कीमत और लोगों की आय के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। इसके कारण लोग इच्छा और मेहनत के बावजूद मकान खरीदने की स्थिति में नहीं हैं। जानकारों के अनुसार 2010 में मकानों की कीमत और आय का अनुपात 9.5 था, जो 2023 में बढ़कर 11.7 हो गया। मध्य और दक्षिण एशिया में यह अनुपात 16.8 तक पहुंच गया है। मुंबई में यह अनुपात 14.1 और दिल्ली में 10.1 दर्ज किया गया है।
देश के आठ बड़े शहरों में नए प्रोजेक्ट तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन वे आम लोगों की पहुंच से बाहर हैं। यहां किफायती आवास (अफोर्डेबल हाउसिंग) की अवधारणा लगभग समाप्त होती जा रही है। वर्ष 2018 तक ऐसे आवासों की हिस्सेदारी 52 प्रतिशत थी, जो 2025 में घटकर मात्र 17 प्रतिशत रह गई है। अधिकांश डेवलपर अब लक्जरी सुविधाओं वाले प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता दे रहे हैं।
वैश्विक स्तर पर बेघर लोगों की तुलना करें तो चीन में प्रति 10,000 व्यक्तियों पर 21 लोग बेघर हैं। भारत में यह आंकड़ा 13 है, जबकि विकसित और महाशक्ति माने जाने वाले अमेरिका में प्रति 10,000 व्यक्तियों पर 20 लोग बेघर हैं। ब्राज़ील में यह आंकड़ा 11 है।
भारत के शहरों में मकानों की भारी कमी है। बिल्डर मुनाफाखोरी और काले धन के लिए महंगे मकान बनाते हैं। सामान्य लोगों, गरीबों और मध्यम वर्ग के लिए किफायती घर बनाए ही नहीं जाते। यदि सरकारी अधिकारियों और नेताओं की रिश्वतखोरी तथा बिल्डरों की मुनाफाखोरी और अत्यधिक करों को हटा दिया जाए, तो आज औसतन 75 लाख रुपए में बिकने वाला मकान लोगों को 25 से 30 लाख रुपये तक में मिल सकता है।
हालिया अर्बन हाउसिंग डेफिसिट रिपोर्ट के अनुसार भारत के बड़े और प्रमुख शहरों में 1 करोड़ से अधिक मकानों की कमी है। इस दशक के अंत अर्थात 2030 तक यह कमी बढ़कर 3.5 करोड़ से अधिक हो सकती है। निजी क्षेत्र की वर्तमान कार्यप्रणाली के कारण किफायती आवास परियोजनाएं लगभग नहीं बन रही हैं। वर्ष 2021 में ऐसे मकानों की हिस्सेदारी कुल इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में 26 प्रतिशत थी, जो अब घटकर 10 प्रतिशत रह गई है। देश में मुनाफाखोरी, भ्रष्टाचार और भारी करों के कारण कुल नए मकानों में से 53 प्रतिशत मकान लक्जरी श्रेणी के बनाए जा रहे हैं। इसके कारण मध्यम वर्ग के लिए मकान उपलब्ध नहीं हो रहे और गरीबों के पास झुग्गियों में रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बच रहा है।
स्नेहा सिंह
जेड-436ए, सेक्टर-12,
नोएडा-201301 (उ.प्र.)
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लेख

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