जनजातीय गौरव दिवस जनजातीय हितों का संरक्षण एवं संवर्धन - डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर
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जनजातीय गौरव दिवस, वनवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के योगदान और बलिदानों को सम्मानित करने तथा आमजन एवं भावी नागरिकों को उनके बलिदान से प्रेरणा लेने के लिए मनाया जाता है। वर्ष 2021 को केन्द्रीय मंत्रिमंडल द्वारा 15 नवंबर को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती के उपलक्ष्य में इसे जनजातीय गौरव दिवस घोषित किया व रांची में वनवासी स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय उद्घाटन भी शामिल हैं। इस वर्ष भगवान बिरसा मुण्डा की 150वीं जयंती है।’’सामाजिक, आर्थिक विकास, आजीविका एवं उद्यमिता, कला-संस्कृति एवं धरोहर, शिक्षा और कौशल विकास, स्वास्थ्य जनजातीय समाज की जीवन शैली है। जनजातीय गौरव दिवस का मुख्य उद्देश्य वनवासी के हितों का संरक्षण एवं संवर्धन करना है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान कि भारत की वनवासी विरासत, संस्कृति, परंपराओं को जीवंत रखने के लिए व्यापक जागरूकता की अलख जगाने की आवश्यकता है और स्वतंत्रता संग्राम में वनवासी नायकों द्वारा दिए गए बलिदानों को उचित मान्यता प्रदान की जानी चाहिए। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार पिछले 11 वर्षों से 'परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के साथ-साथ विकास' के सिद्धांत पर अथक रूप से कार्यरत है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय ज्ञान प्रणालियों, परंपराओं और सांस्कृतिक लोकाचार के संरक्षण और प्रोत्साहन को अत्यधिक महत्व दिया है। प्रधानमंत्री के विज़न के अनुसार भविष्य के सुदृढ़ आत्मनिर्भर भारत के लिए 8.6% वनवासी समुदाय को प्रोत्साहित और सशक्त बनाना हमारा कर्तव्य और साझा जिम्मेदारी है।
जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत
जनजातीय समाज ने हमें प्रकृति के संरक्षण का मार्ग दिखाया जनजातीय संस्कृति में छिपी है, गहरी आध्यात्मिकता, देश के लिए संघर्ष करने की परम्परा जनजातीय परम्परा रही हैI जीवन जीने की कला जनजातीय समाज से सीखनी चाहिए I सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और राष्ट्रीय गौरव, वीरता तथा आतिथ्य के भारतीय मूल्यों को बढ़ावा देने में वनवासियों के प्रयासों को मान्यता देने हेतु प्रतिवर्ष ‘जनजातीय गौरव दिवस’ का आयोजन किया जाएगा। उन्होंने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ भारत के विभिन्न क्षेत्रों में कई वनवासी आंदोलन किये। इन वनवासी समुदायों में तामार, संथाल, खासी, भील, मिज़ो और कोल शामिल हैं। ’जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत, ऐतिहासिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक योगदान’ पर कार्यशाला आयोजित कर इसे भव्य रूप से मनाया जाए। जनजातीय समाज का गौरवशाली इतिहास रहा है। यह सोचकर गर्व होता है कि अनेक महान स्वतंत्रता सेनानियों का जन्म जनजातीय समाज में हुआ। अपने देश के लिए संघर्ष करने की परम्परा जनजातीय समाज में प्रारंभ से रही है। शहीद वीर नारायण सिंह, गैंदसिंह, गुण्डाधूर जैसे अनेक महान नायकों ने अपना बलिदान दिया। पूरी दुनिया आज जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों से गुजर रही है। ऐसे में प्रकृति का संरक्षण बहुत आवश्यक है। जनजातीय समाज ने हमें प्रकृति के संरक्षण का मार्ग दिखाया है I, जो आज भी अनुकरणीय है। जनजातीय समाज में प्रकृति की पूजा की जाती है। जनजातीय संस्कृति में गहरी आध्यात्मिकता छिपी है। प्रकृति को सहेजकर, प्रकृति के अनुकूल जीवन जीना। बड़े-छोटे, स्त्री-पुरुष में किसी तरह का भेदभाव नहीं। सब बराबर हैं और प्रकृति का उपहार सबके लिए है। ये बातें हमें इस समाज से सीखने की आवश्यकता है। वास्तव में जीवन जीने की कला जनजातीय समाज से सीखनी चाहिए। जनजातीय समाज में दहेज जैसी सामाजिक बुराई का अस्तित्व नहीं है। भगवान बिरसा मुण्डा का शौर्य हमें हमेशा जीवन में साहस की राह दिखाता है। उन्होंने शोषण मुक्त समाज का सपना देखा था। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हीं की परिकल्पना के अनुरूप प्रधानमंत्री जनमन योजना प्रारंभ कर विशेष पिछड़ी जनजाति के लोगों के जीवन में समृद्धि लाने का प्रयास किया है। जिसमें जनजातीय बहुल 63 हजार गांवों के 5 करोड़ से अधिक लोग लाभान्वित होंगे। जनजातीय लोग कभी दिखावा नहीं करते, उनकी सरलता-सहजता मन मोह लेती है। जनजातीय समाज की खानपान की शैली बीपी-शुगर जैसी लाइफ स्टाईल से जुड़ी बीमारियों से दूर रखती है। शिक्षा विभाग द्वारा ’जनजातीय समाज का गौरवशाली अतीत पर कार्यशाला आयोजित कर जनजातीय समाज के गौरव को पूरे समाज के सामने लाने में मील का पत्थर साबित होगी। देश के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समाज का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इस समाज में अनेक महापुरूषों ने जन्म लिया जिन्होंने 1857 क्रांति के पहले ही अंग्रेजों के विरूद्ध संघर्ष की शुरूआत की। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों को बड़ा नुकसान जनजातीय क्षेत्रों में हुआ, अनेक मौकों पर उन्हें मजबूर होकर पीछे हटना पड़ा। अंग्रेजों ने जब बस्तर में रेल लाईन बिछाने का काम शुरू किया उसमें लकड़ी का उपयोग किया जाता था। जनजातीय समाज ने इसका विरोध किया और यह भाव जताया कि हमारा जंगल कोई नहीं काटेगा। सामाजिक एकजुटता के कारण बहुत कुछ संरक्षित रहा। बस्तर दशहरा सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा प्रमाण है। इस समाज में 80 प्रतिशत परिवार संयुक्त परिवार है।
मिलेट का उपयोग, जैविक खेती जैसी अनेक बातें जनजातीय समाज से शिक्षित समाज को सीखने की आवश्कता है। पारंपरिक अनाज, जिन्हें भूल चुके थे भारतीय, पर आज दुनिया कहती है ‘सूपरफूड’बाजार में आज ज्वार, बाजरा और क्विनोवा जैसे अनाजों की मांग बढ़ गई है और ये बेवजह नहीं है। लेकिन जिस अनाज को छोड़ हम आगे बढ़े थे, आज पूरी दुनिया फिर से उसी अनाज की तरफ वापस लौट रही है। अब तो बाजार में भी इन्हें सुपरफूड्स का दर्जा मिला हुआ है और इनकी दुनियाभर में डिमांड है। इनमें मौजूद मिनरल्स, आयरन और कैल्शियम, शरीर में होने वाली बीमारियों के जोखिम को कम करते हैं। जनजातीय संस्कृति में अनेक प्रगतिशील परम्पराएं हैं।
जनजातीय समाज के गुमनाम महानायकों के योगदान से नई पीढ़ी को परीचित कराने की जरूरत है। वनवासी, जनजातीय समाज के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों पर केंद्रित प्रदर्शनी से प्रेरित करना चाहिए। आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर, 1875 को हुआ था। वे मुंडा जनजाति से संबद्ध थे। उन्होंने 19वीं शताब्दी के अंत में आधुनिक झारखंड और बिहार के आदिवासी क्षेत्रों में ब्रिटिश शासन के दौरान एक भारतीय आदिवासी धार्मिक सहस्त्राब्दि आंदोलन का नेतृत्व किया। जल जंगल नारा दिया, सदा रहे निज धाम। राज देश स्व का रहे, बिरसा का पैगाम। धरती आबा बिरसा मुंडा का जन्म खूंटी के उलिहातू में 15 नवंबर 1875 को हुआ। बिरसा की प्रारंभिक शिक्षा चाईबासा के जर्मन मिशन स्कूल में हुई। पढ़ाई के दौरान ही बिरसा की क्रांतिकारी तेवर का पता चलने लगा। शहीद वीर नारायण सिंह को छत्तीसगढ़ में सोनाखान का गौरव माना जाता है, उन्होंने वर्ष 1856 के अकाल के बाद व्यापारियों के अनाज के स्टॉक को लूट लिया और गरीबों में बाँट दिया। वीर नारायण सिंह के बलिदान ने उन्हें आदिवासी नेता बना दिया और 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में छत्तीसगढ़ के पहले शहीद बने। श्री अल्लूरी सीता राम राजू का जन्म 4 जुलाई, 1897 को आंध्र प्रदेश में भीमावरम के पास मोगल्लु नामक गाँव में हुआ था। अल्लूरी को अंग्रेज़ों के खिलाफ ‘रम्पा विद्रोह’ का नेतृत्व करने के लिये सबसे ज़्यादा याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने विशाखापत्तनम और पूर्वी गोदावरी ज़िलों के आदिवासी लोगों को विदेशियों के खिलाफ विद्रोह करने के लिये संगठित किया। वह ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध लड़ने के लिये बंगाल के क्रांतिकारियों से प्रेरित थे।
रानी गौंडिल्यू वह नगा समुदाय की आध्यात्मिक और राजनीतिक नेता थीं, जिन्होंने भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह का नेतृत्व किया। 13 वर्ष की आयु में वह अपने चचेरे भाई हाइपौ जादोनांग के हेराका धार्मिक आंदोलन में शामिल हो गईं। उनके लिये नगा लोगों की स्वतंत्रता की यात्रा स्वतंत्रता हेतु भारत के व्यापक आंदोलन का हिस्सा थी। उन्होंने मणिपुर क्षेत्र में गांधी जी के संदेश का भी प्रसार किया। सिद्धू और कान्हू मुर्मू 30 जून, 1855 को 1857 के विद्रोह से दो वर्ष पूर्व दो संथाल भाइयों सिद्धू और कान्हू मुर्मू ने 10,000 संथालों का एकत्र किया और अंग्रेज़ों के खिलाफ विद्रोह की घोषणा की। आदिवासियों ने अंग्रेज़ों को अपनी मातृभूमि से भगाने की शपथ ली। मुर्मू भाइयों की बहनों फूलो और झानो ने भी विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई। तिलका माझी संथाल क्षेत्र में 1770 में एक भयानक अकाल आया था, जिसके बाद संथालों का विद्रोह शुरू हुआ था । इस विद्रोह को 'संथाल हूल' कहा जाता है । इस विद्रोह में तिलका माझी का भी योगदान था। राजमोहिनी देवी, मांझी जनजाति से ताल्लुक रखती थीं । उन्होंने बापू धर्म सभा आदिवासी सेवा मंडल की स्थापना की थी ।
जननायक टंट्या भील की वीरता की कहानी
सन् 1857 में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी वीरों एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों में मध्यप्रदेश के जनजातीय समाज के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी टंट्या भील का नाम बड़े सम्मान एवं आदर के साथ लिया जाता है। जनजातीय समाज के इस महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को भारत का रॉबिनहुड भी कहा जाता है। दिलचस्प पहलू यह है कि टंट्या भील की वीरता, साहस और अप्रतिम स्वतंत्रता भाव से संकट में आये अंग्रेजी शासन के नुमाइंदों ने ही जननायक टंट्या भील को "भारतीय रॉबिनहुड" की उपाधि दी थी। टंट्या भील का जन्म सन् 1840 में तत्कालीन मध्य प्रांत के पूर्वी निमाड़ (खंडवा जिले) की पंधाना तहसील के बडदाअहीर गाँव में श्री भाऊसिंह भील के घर पर हुआ था। टंट्या भील का वास्तविक नाम तॉतिया था। उन्हें प्यार से टंट्या मामा के नाम से भी बुलाया जाता था। उनका "मामा" नाम का यह संबोधन इतना लोकप्रिय हुआ कि भील जनजाति के लोग आज भी उन्हें “मामा' कहने पर गर्व महसूस करते हैं। मध्यप्रदेश के जनजातीय समाज के गौरव एवं महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी टंट्या भील की वीरता की कहानी को स्थानीय लोगों ने अपनी बोली में "गीतों" में भी पिरोया।
जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के लिए सरकार ने संग्रहालय स्थापित करने का निर्णय लिया है स्मरण करो स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासियों का योगदान। स्वीकृत संग्रहालयों के विवरण, संग्रहालय का स्थान और आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों / संग्रहालय से जुड़े नायकों के रूप में हैं: - राज्य का नाम, संग्रहालय का स्थान, जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी / नायक - गुजरात- गर्देशवार, राजपिपला, देश भर से प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी। छत्तीसगढ़, रायपुर, शहीद वीर नारायण सिंह, झारखंड, रांची, बिरसा गार्डन, आंध्र प्रदेश, लांबासिंगी, श्री अल्लूरी सीता राम राजू, मध्य प्रदेश, चिंदवा, तंत्रभेल, भीम नायक, खजायनायक, आदि। केरल, कोझिकोड, थालक्कल चंदू, मणिपुर, मखाल गाँव, सेनापति, रानी गेदिनिलिउ, हैदराबाद, रामजी गोंड |
भगवान बिरसा मुंडा और आदिवासी नेताओं के साथ-साथ जनजाति समुदायों के अन्य महान व्यक्तित्वों और गुमनाम नायकों की विरासत का प्रसार किया जाना चाहिए। विश्व आदिवासी दिवस प्रत्येक वर्ष 9 अगस्त को मनाया जाता है I आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों के कर दिए थे दांत खट्टे; बौखला गई थी पुलिस भी आदिवासियों के भगवान बिरसा मुंडा ने लोगों के जीवन पर ऐसी छाप छोड़ी कि आदिवासियों ने उन्हें भगवान का दर्जा दे दिया। पोड़ाहाट में सरकार ने सुरक्षित वन घोषित कर दिया था, जिसको लेकर आदिवासियों में काफी आक्रोश था और लोग सरकार के खिलाफ आंदोलन करने लगे। बिरसा भी इस आंदोलन में कूद गए। बिरसा मुंडा ने एक दिन घोषणा भी की थी कि वह पृथ्वी पिता यानी ‘धरती आबा हैं। जनजातीय गौरव दिवस का मुख्य उद्देश्य वनवासी के हितों का संरक्षण एवं संवर्धन करना है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के आह्वान कि भारत की वनवासी विरासत, संस्कृति, परंपराओं को जीवंत रखने के लिए व्यापक जागरूकता की अलख जगाने की आवश्यकता है और स्वतंत्रता संग्राम में वनवासी नायकों द्वारा दिए गए बलिदानों को उचित मान्यता प्रदान की जानी चाहिए।
डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर
सहायक प्रोफेसरहिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय।
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