बिहार की राजनीति - सत्ता, समाज और संघर्ष की अनकही गाथा - दिवाकर शर्मा
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स्वतंत्रता प्राप्ति के समय 1947 का बिहार आज के बिहार से भिन्न था। उस समय वर्तमान झारखंड भी बिहार का हिस्सा था और राज्य प्राकृतिक संसाधनों, खनिज सम्पदा, कृषि उत्पादन, ऐतिहासिक विरासत तथा सांस्कृतिक दृष्टि से देश के सबसे महत्वपूर्ण प्रदेशों में गिना जाता था। ब्रिटिश शासन के अंतिम वर्षों में बिहार एक ओर औपनिवेशिक शोषण, गरीबी, अशिक्षा और जमींदारी व्यवस्था की समस्याओं से जूझ रहा था, तो दूसरी ओर स्वतंत्रता आंदोलन में इसकी भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही थी। चंपारण सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक बिहार ने राष्ट्रीय चेतना को दिशा देने का कार्य किया था। यही कारण था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद बिहार से जनता की अपेक्षाएँ अत्यधिक थीं। 1947 में बिहार की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी। अधिकांश आबादी गाँवों में निवास करती थी और कृषि उत्पादन का नियंत्रण बड़े जमींदारों के हाथों में था। भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण तथा कुछ अन्य प्रभावशाली परिवार विशाल भू-भागों के स्वामी थे, जबकि बड़ी संख्या में किसान बटाईदार अथवा खेतिहर मजदूर के रूप में जीवन व्यतीत करते थे। सामाजिक विषमता गहरी थी और भूमि का वितरण अत्यंत असंतुलित था। यही कारण था कि स्वतंत्रता के बाद भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा विषय बन गया।
स्वतंत्र भारत में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह बने, जिन्हें जनता प्रेम से "श्री बाबू" कहती थी। वे आधुनिक बिहार के निर्माता माने जाते हैं। उनके साथ अनुग्रह नारायण सिंह उपमुख्यमंत्री एवं वित्त मंत्री के रूप में कार्य कर रहे थे। इन दोनों नेताओं की जोड़ी को बिहार की राजनीति में उसी प्रकार याद किया जाता है, जैसे स्वतंत्र भारत में नेहरू और पटेल की जोड़ी को राष्ट्रीय स्तर पर स्मरण किया जाता है। श्रीकृष्ण सिंह प्रशासनिक दृढ़ता और विकासवादी सोच के लिए प्रसिद्ध थे, जबकि अनुग्रह बाबू अपनी सादगी, आर्थिक अनुशासन और जनता के प्रति समर्पण के लिए जाने जाते थे। स्वतंत्रता के तुरंत बाद बिहार सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती जमींदारी व्यवस्था को समाप्त करना था। अंग्रेजों द्वारा स्थापित स्थायी बंदोबस्त प्रणाली के कारण कुछ परिवारों के पास विशाल भूमि-संपत्ति थी जबकि अधिकांश किसान भूमिहीन थे। डॉ. श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिंह ने भूमि सुधार को सामाजिक न्याय और आर्थिक विकास की दृष्टि से आवश्यक माना। परिणामस्वरूप बिहार देश के उन प्रारंभिक राज्यों में शामिल हुआ जहाँ जमींदारी उन्मूलन कानून लागू किया गया।
1950 में बिहार भूमि सुधार अधिनियम पारित किया गया। यह स्वतंत्र भारत के सबसे महत्वपूर्ण भूमि सुधार कानूनों में से एक था। इसके माध्यम से जमींदारों की मध्यस्थता समाप्त करने तथा भूमि को सीधे राज्य के नियंत्रण में लाने का प्रयास किया गया। यद्यपि व्यावहारिक स्तर पर इस कानून की सफलता सीमित रही और अनेक प्रभावशाली जमींदार कानूनी उपायों के माध्यम से अपनी भूमि बचाने में सफल रहे, फिर भी इसने बिहार की सामाजिक संरचना में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन की नींव रखी। आगे चलकर यही परिवर्तन पिछड़े वर्गों और सामाजिक न्याय की राजनीति के उदय का आधार बना। 1952 में स्वतंत्र भारत का पहला विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुआ। उस समय बिहार विधानसभा में 330 सीटें थीं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत प्राप्त किया और डॉ. श्रीकृष्ण सिंह पुनः मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस को लगभग 41 प्रतिशत मत प्राप्त हुए और स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के कारण जनता का व्यापक समर्थन मिला। उस समय विपक्ष बिखरा हुआ था। सोशलिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी तथा कुछ स्वतंत्र उम्मीदवार अवश्य मौजूद थे, लेकिन वे कांग्रेस के वर्चस्व को चुनौती देने की स्थिति में नहीं थे। 1952 से 1967 तक बिहार में कांग्रेस का लगभग निर्विरोध प्रभुत्व बना रहा। यह वह काल था जब कांग्रेस केवल एक राजनीतिक दल नहीं, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की उत्तराधिकारी संस्था के रूप में देखी जाती थी। गाँवों से लेकर शहरों तक कांग्रेस संगठन मजबूत था। राज्य के अधिकांश प्रभावशाली नेता कांग्रेस से जुड़े हुए थे। भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ समुदायों का बड़ा वर्ग कांग्रेस का समर्थन करता था, जबकि दलित और पिछड़े वर्ग भी उसी राजनीतिक धारा के साथ जुड़े हुए थे क्योंकि उस समय उनके लिए कोई सशक्त वैकल्पिक नेतृत्व उपलब्ध नहीं था।
1957 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने पुनः विजय प्राप्त की। श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में औद्योगिक विकास, शिक्षा विस्तार, सिंचाई योजनाओं तथा आधारभूत संरचना के निर्माण पर बल दिया गया। इसी अवधि में सिंदरी उर्वरक कारखाना, बरौनी रिफाइनरी, भारी उद्योगों की स्थापना तथा कोयला और इस्पात क्षेत्र का विकास प्रारम्भ हुआ। चूँकि वर्तमान झारखंड उस समय बिहार का हिस्सा था, इसलिए खनिज संपदा के कारण राज्य देश के औद्योगिक मानचित्र पर विशेष स्थान रखता था। 1961 में डॉ. श्रीकृष्ण सिंह का निधन हो गया। उनके निधन के साथ बिहार के प्रथम राजनीतिक युग का अंत माना जाता है। इसके बाद विनोदानंद झा मुख्यमंत्री बने और बाद में के. बी. सहाय ने नेतृत्व संभाला। कांग्रेस सत्ता में बनी रही, लेकिन उसके भीतर गुटबाजी बढ़ने लगी। यही गुटबाजी आगे चलकर कांग्रेस के कमजोर होने का कारण बनी।
अनुग्रह नारायण सिंह का योगदान भी बिहार के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वे वित्तीय अनुशासन, प्रशासनिक दक्षता और ईमानदार सार्वजनिक जीवन के प्रतीक माने जाते थे। उनके नेतृत्व में बिहार की वित्तीय व्यवस्था मजबूत हुई। ग्रामीण विकास, कृषि सुधार और सहकारी संस्थाओं के विस्तार में उनकी विशेष भूमिका रही। बिहार के अनेक राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि अनुग्रह बाबू का जीवन अधिक लंबा होता तो राज्य की राजनीति की दिशा कुछ भिन्न हो सकती थी। 1962 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने तीसरी बार सत्ता प्राप्त की। हालांकि इस समय तक समाजवादी विचारधारा और वामपंथी दलों का प्रभाव बढ़ने लगा था। ग्रामीण क्षेत्रों में पिछड़ी जातियों के बीच राजनीतिक चेतना का विस्तार हो रहा था। शिक्षा के प्रसार और लोकतांत्रिक व्यवस्था ने नए सामाजिक वर्गों को राजनीतिक रूप से सक्रिय बनाना शुरू कर दिया था। स्वतंत्रता के बाद के इन दो दशकों में बिहार में कांग्रेस का प्रभुत्व केवल राजनीतिक कारणों से नहीं था, बल्कि इसके पीछे स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रति जनता का विश्वास, विपक्ष की कमजोरी और सामाजिक नेतृत्व का पारंपरिक स्वरूप भी जिम्मेदार था। लेकिन इसी काल में समाज के भीतर ऐसे परिवर्तन प्रारम्भ हो चुके थे जो आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति को पूरी तरह बदलने वाले थे।
भूमि सुधारों ने पारंपरिक जमींदार वर्ग की शक्ति को आंशिक रूप से कमजोर किया, शिक्षा के विस्तार ने पिछड़े वर्गों में नई चेतना उत्पन्न की, समाजवादी विचारधारा गाँवों तक पहुँचने लगी और युवाओं के बीच वैकल्पिक राजनीति की खोज प्रारम्भ हो गई। यही कारण था कि 1967 के बाद बिहार की राजनीति में कांग्रेस का एकाधिकार धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 1947 से 1967 तक का काल बिहार की राजनीति का "कांग्रेस युग" माना जाता है। इस अवधि में राज्य की प्रशासनिक नींव रखी गई, लोकतांत्रिक संस्थाएँ मजबूत हुईं, भूमि सुधारों की शुरुआत हुई और आधुनिक बिहार के निर्माण की आधारशिला रखी गई। यद्यपि बाद के दशकों में अनेक राजनीतिक परिवर्तन हुए, फिर भी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह और अनुग्रह नारायण सिंह का काल बिहार के इतिहास में स्थिरता, विकास और संस्थागत निर्माण के युग के रूप में स्मरण किया जाता है। इसी काल में भविष्य की उन सामाजिक शक्तियों का भी जन्म हुआ, जिन्होंने आगे चलकर समाजवादी आंदोलन, पिछड़ा वर्ग राजनीति, जेपी आंदोलन और सामाजिक न्याय की नई धारा को जन्म दिया। इस प्रकार स्वतंत्रता से लेकर 1967 तक का बिहार एक संक्रमणशील समाज था, जो परंपरागत अभिजात राजनीति से निकलकर धीरे-धीरे जनाधारित राजनीति की ओर बढ़ रहा था।
लोहियावाद, कर्पूरी युग और जेपी की सम्पूर्ण क्रांति से उभरी सामाजिक न्याय की राजनीति
1967 के बाद बिहार की राजनीति एक ऐसे दौर में प्रवेश करती है जिसने राज्य की सत्ता संरचना, सामाजिक नेतृत्व और राजनीतिक विमर्श को स्थायी रूप से बदल दिया। स्वतंत्रता के बाद लगभग दो दशकों तक कांग्रेस के प्रभुत्व के कारण जो राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हुई थी, उसके विरुद्ध धीरे-धीरे वैचारिक और सामाजिक असंतोष विकसित होने लगा। भूमि सुधारों की सीमित सफलता, ग्रामीण असमानता, बेरोजगारी, बढ़ती महँगाई और सत्ता में ऊँची जातियों के वर्चस्व के कारण समाज के नए वर्ग राजनीतिक भागीदारी की मांग करने लगे। इसी वातावरण में समाजवादी आंदोलन बिहार की राजनीति की सबसे प्रभावशाली धारा बनकर उभरा। बिहार में समाजवादी विचारधारा की जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही मौजूद थीं। जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, डॉ. राममनोहर लोहिया और अन्य समाजवादी नेताओं ने कांग्रेस के भीतर और बाहर रहकर वैकल्पिक राजनीति की नींव रखी थी। स्वतंत्रता के बाद जब कांग्रेस एक व्यापक सत्ता संगठन में परिवर्तित हो गई, तब समाजवादी धारा ने स्वयं को गरीबों, किसानों, मजदूरों और वंचित वर्गों की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत करना प्रारम्भ किया।
डॉ. राममनोहर लोहिया का बिहार की राजनीति पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने "पिछड़ा पावे सौ में साठ" का नारा देकर भारतीय राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठाया। लोहिया का मानना था कि केवल आर्थिक समानता पर्याप्त नहीं है, बल्कि सामाजिक रूप से वंचित समुदायों को राजनीतिक सत्ता में उचित भागीदारी मिलनी चाहिए। उनके विचारों ने बिहार के पिछड़े वर्गों, विशेषकर यादव, कुर्मी, कोइरी (कुशवाहा) तथा अन्य पिछड़ी जातियों के बीच नई राजनीतिक चेतना उत्पन्न की। लोहिया की विचारधारा ने बिहार में एक नई नेतृत्व पीढ़ी को जन्म दिया। इन्हीं विचारों से प्रभावित होकर कर्पूरी ठाकुर, रामानंद तिवारी, भोला प्रसाद सिंह, रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और बाद की अनेक पीढ़ियों के नेताओं ने राजनीति में प्रवेश किया। इस प्रकार बिहार में समाजवादी आंदोलन केवल एक राजनीतिक धारा नहीं रहा, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बन गया।
1967 का विधानसभा चुनाव बिहार के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। पहली बार कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी। महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने। यह स्वतंत्रता के बाद बिहार की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी। यद्यपि यह सरकार अधिक समय तक नहीं चल सकी, लेकिन इसने कांग्रेस के अजेय होने की धारणा को समाप्त कर दिया। 1967 के बाद बिहार में राजनीतिक अस्थिरता का दौर प्रारम्भ हुआ। अल्पकालिक सरकारें बनीं और गिरीं। कांग्रेस के भीतर गुटबाजी बढ़ती गई और विपक्षी दलों का प्रभाव लगातार बढ़ने लगा। समाजवादी दलों और वामपंथी संगठनों ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ मजबूत की। इसी अवधि में पिछड़े वर्गों के राजनीतिक सशक्तीकरण की प्रक्रिया तेज हुई। कर्पूरी ठाकुर इस दौर के सबसे महत्वपूर्ण नेताओं में उभरकर सामने आए। उनका जन्म अत्यंत साधारण परिवार में हुआ था और वे शिक्षक के रूप में कार्य कर चुके थे। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण वे जनता के बीच लोकप्रिय थे। उनकी सादगी, ईमानदारी और समाजवादी विचारधारा ने उन्हें व्यापक सम्मान दिलाया। बिहार की राजनीति में उन्हें सामाजिक न्याय का प्रारंभिक शिल्पकार माना जाता है।
1970 में कर्पूरी ठाकुर पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। हालांकि उनका पहला कार्यकाल अल्पकालिक था, लेकिन उन्होंने सामाजिक न्याय और गरीबों के हितों को राजनीति के केंद्र में लाने का प्रयास किया। उनके व्यक्तित्व ने यह संदेश दिया कि सत्ता केवल पारंपरिक अभिजात वर्ग की बपौती नहीं है। 1974 में बिहार की राजनीति ने एक ऐतिहासिक मोड़ लिया। उस समय राज्य में भ्रष्टाचार, महँगाई, बेरोजगारी और प्रशासनिक अक्षमता के विरुद्ध व्यापक असंतोष था। छात्रों ने आंदोलन प्रारम्भ किया और उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम के महान नेता जयप्रकाश नारायण से नेतृत्व स्वीकार करने का आग्रह किया। जेपी ने इस आंदोलन को समर्थन दिया और "सम्पूर्ण क्रांति" का आह्वान किया। जयप्रकाश नारायण, जिन्हें देश "लोकनायक" के नाम से जानता है, ने राजनीति को नैतिकता और जनभागीदारी से जोड़ने का प्रयास किया। उनका उद्देश्य केवल सरकार बदलना नहीं था, बल्कि समाज, शिक्षा, प्रशासन, राजनीति और अर्थव्यवस्था में व्यापक परिवर्तन लाना था। उन्होंने युवाओं को लोकतंत्र की रक्षा के लिए संगठित किया और शांतिपूर्ण जनसंघर्ष का मार्ग अपनाया। जेपी आंदोलन का केंद्र बिहार बना। पटना विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थानों के छात्र इस आंदोलन की मुख्य शक्ति बने। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी, रामविलास पासवान तथा अनेक भावी नेता इसी आंदोलन से उभरकर सामने आए। इस दृष्टि से देखा जाए तो जेपी आंदोलन केवल तत्कालीन सत्ता के विरुद्ध संघर्ष नहीं था, बल्कि उसने बिहार की भविष्य की राजनीतिक पीढ़ी तैयार की।
जेपी आंदोलन का प्रभाव पूरे देश में दिखाई दिया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के विरुद्ध जनमत तैयार हुआ और अंततः 1975 में देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। अनेक विपक्षी नेताओं के साथ जयप्रकाश नारायण के समर्थकों को भी गिरफ्तार किया गया। बिहार इस संघर्ष का सबसे सक्रिय केंद्र बना रहा। समाजवादी आंदोलन के कारण बिहार की राजनीति में जातीय चेतना और सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न को वैचारिक आधार मिला। पिछड़े वर्गों ने पहली बार स्वयं को केवल मतदाता नहीं, बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी के अधिकार वाले वर्ग के रूप में देखना प्रारम्भ किया। यादव, कुर्मी, कोइरी और अन्य पिछड़ी जातियों के बीच राजनीतिक जागरूकता तेजी से बढ़ी। इसी काल में वामपंथी आंदोलनों का भी विस्तार हुआ। भोजपुर, जहानाबाद, अरवल और कुछ अन्य क्षेत्रों में वर्ग संघर्ष की राजनीति उभरी। भूमिहीन किसानों, दलितों और मजदूरों के प्रश्नों ने ग्रामीण राजनीति को प्रभावित किया। हालांकि मुख्यधारा की राजनीति और वामपंथी आंदोलनों के रास्ते अलग-अलग रहे, फिर भी दोनों ने सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को गति प्रदान की।
1967 से 1975 के बीच बिहार की राजनीति का चरित्र पूरी तरह बदल चुका था। कांग्रेस का पारंपरिक प्रभुत्व कमजोर पड़ रहा था, समाजवादी विचारधारा मजबूत हो रही थी, पिछड़े वर्ग राजनीतिक रूप से संगठित हो रहे थे और नई नेतृत्व पीढ़ी उभर रही थी। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर जनता पार्टी के उदय, मंडल राजनीति और सामाजिक न्याय की स्थापना का आधार बनीं। राजनीतिक इतिहासकारों के अनुसार यदि 1947 से 1967 तक का काल "कांग्रेस युग" था, तो 1967 से 1975 तक का समय "समाजवादी चेतना और राजनीतिक संक्रमण का युग" कहा जा सकता है। इसी काल में बिहार ने सत्ता के पारंपरिक ढाँचे से बाहर निकलकर सामाजिक प्रतिनिधित्व आधारित राजनीति की दिशा में कदम बढ़ाया। यही कारण है कि डॉ. राममनोहर लोहिया, कर्पूरी ठाकुर और जयप्रकाश नारायण को बिहार की आधुनिक राजनीति के वैचारिक निर्माता माना जाता है। इन तीनों नेताओं की विचारधारा ने आने वाले दशकों में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और अनेक अन्य नेताओं के राजनीतिक जीवन को प्रभावित किया। इस प्रकार समाजवादी आंदोलन और जेपी आंदोलन ने बिहार की राजनीति को केवल बदला ही नहीं, बल्कि उसकी आत्मा और दिशा दोनों को पुनर्परिभाषित किया। आने वाले वर्षों में यही परिवर्तन मंडल आयोग, जनता पार्टी, सामाजिक न्याय और नई जातीय राजनीति के रूप में और अधिक स्पष्ट रूप से सामने आने वाला था।
आपातकाल से मंडल युग तक - जनता राजनीति और सामाजिक न्याय की स्थापना
1975 से लेकर 1990 के दशक के प्रारंभ तक का कालखंड बिहार की राजनीति में सबसे निर्णायक परिवर्तनों का युग माना जाता है। यदि 1947 से 1967 तक का समय कांग्रेस के प्रभुत्व का काल था और 1967 से 1974 तक का समय समाजवादी चेतना के उदय का, तो 1975 के बाद का दौर सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी और सत्ता संरचना के व्यापक पुनर्गठन का युग बनकर सामने आया। इसी काल में बिहार की राजनीति में वे परिवर्तन हुए जिन्होंने आगे चलकर लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार और समूची मंडल राजनीति की नींव रखी। 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश में आपातकाल घोषित किया गया। नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लागू हुई और हजारों विपक्षी नेताओं तथा कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। बिहार, जो पहले से ही जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन का केंद्र बन चुका था, आपातकाल के विरुद्ध सबसे मजबूत प्रतिरोध का क्षेत्र बनकर उभरा।
जेपी आंदोलन से जुड़े अनेक युवा नेताओं को गिरफ्तार किया गया। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुशील कुमार मोदी, रामविलास पासवान और अनेक समाजवादी कार्यकर्ताओं ने जेल यात्राएँ कीं। यही कारण है कि बाद में इन नेताओं ने अपने राजनीतिक जीवन में लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को प्रमुख मुद्दों के रूप में प्रस्तुत किया। 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव हुए। जनता पार्टी का गठन कांग्रेस विरोधी दलों भारतीय लोकदल, भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), सोशलिस्ट धारा और अन्य समूहों को मिलाकर किया गया। बिहार में जनता पार्टी को भारी जनसमर्थन प्राप्त हुआ और कांग्रेस की ऐतिहासिक पराजय हुई। बिहार में जनता पार्टी की सरकार बनी और कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने। यह घटना केवल सत्ता परिवर्तन नहीं थी, बल्कि सामाजिक नेतृत्व के परिवर्तन का भी प्रतीक थी। पहली बार पिछड़े वर्ग से आने वाला एक नेता राज्य की राजनीति के केंद्र में पहुँचा। कर्पूरी ठाकुर ने सत्ता को सामाजिक न्याय के उपकरण के रूप में उपयोग करने का प्रयास किया।
1978 में कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण लागू किया, जिसे बाद में "कर्पूरी फार्मूला" के नाम से प्रसिद्धि मिली। इस व्यवस्था में पिछड़े वर्गों को दो भागों अति पिछड़ा वर्ग और अन्य पिछड़ा वर्ग में विभाजित करके आरक्षण का लाभ देने का प्रयास किया गया। महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए भी विशेष प्रावधान किए गए। कर्पूरी फार्मूला बिहार की राजनीति में एक क्रांतिकारी कदम सिद्ध हुआ। इससे पहली बार पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों और प्रशासन में भागीदारी का अवसर मिला। हालांकि उच्च जातियों के कुछ वर्गों ने इसका विरोध किया, लेकिन सामाजिक न्याय की राजनीति को स्थायी आधार प्राप्त हो गया। कर्पूरी ठाकुर के इस निर्णय ने बिहार की राजनीति की दिशा बदल दी। यादव, कुर्मी, कुशवाहा, नाई, तेली, बनिया, धानुक, मल्लाह, लोहार, पासी और अन्य पिछड़े समुदायों के बीच राजनीतिक चेतना तेजी से बढ़ी। आने वाले वर्षों में यही समूह बिहार की सत्ता संरचना को बदलने वाले थे। हालांकि जनता पार्टी के भीतर वैचारिक और संगठनात्मक मतभेद बढ़ने लगे। भारतीय जनसंघ से आए नेताओं और समाजवादी धारा के नेताओं के बीच विवाद उत्पन्न हुए। परिणामस्वरूप जनता पार्टी धीरे-धीरे विघटित हो गई और 1980 में कांग्रेस पुनः सत्ता में लौट आई।
1980 और 1985 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने जीत हासिल की। डॉ. जगन्नाथ मिश्र जैसे नेता इस दौर में प्रमुखता से उभरे। मिथिलांचल में उनका विशेष प्रभाव था। लेकिन कांग्रेस की वापसी के बावजूद समाजवादी विचारधारा समाप्त नहीं हुई। पिछड़े वर्गों की नई पीढ़ी राजनीतिक रूप से अधिक संगठित हो चुकी थी। 1980 के दशक में बिहार में एक नई पीढ़ी तैयार हो रही थी, जो जेपी आंदोलन की उपज थी। लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान, शिवानंद तिवारी, सुशील कुमार मोदी और अन्य नेता धीरे-धीरे राज्य की राजनीति में अपनी पहचान बना रहे थे। इन नेताओं की राजनीतिक सोच पर समाजवादी विचारधारा और कर्पूरी ठाकुर का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता था। इसी काल में राष्ट्रीय स्तर पर मंडल आयोग की चर्चा प्रारम्भ हुई। 1979 में मोरारजी देसाई सरकार ने बी. पी. मंडल की अध्यक्षता में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था। आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की गई। यद्यपि तत्कालीन सरकारों ने इस रिपोर्ट को लागू नहीं किया, लेकिन बिहार में यह विषय लगातार चर्चा का केंद्र बना रहा।
1989 में राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर परिवर्तन आया। विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में जनता दल का गठन हुआ और कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। बिहार में जनता दल ने समाजवादी और पिछड़े वर्ग की राजनीति को एक नई दिशा दी। 1990 के विधानसभा चुनाव बिहार के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण चुनावों में गिने जाते हैं। जनता दल को सफलता मिली और लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने। उनके मुख्यमंत्री बनने के साथ ही बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति का नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। पहली बार यादव समुदाय के एक नेता ने राज्य की सत्ता संभाली और पिछड़े वर्गों को यह विश्वास मिला कि वे केवल मतदाता नहीं, बल्कि शासन के वास्तविक भागीदार भी बन सकते हैं।लालू प्रसाद यादव का उदय अचानक नहीं हुआ था। उसके पीछे लोहिया की विचारधारा, कर्पूरी ठाकुर की नीतियाँ, जेपी आंदोलन की विरासत और मंडल राजनीति की पृष्ठभूमि कार्य कर रही थी। इस प्रकार 1990 का परिवर्तन वास्तव में 1960 और 1970 के दशकों में प्रारम्भ हुई सामाजिक चेतना का परिणाम था।
1990 में प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा ने बिहार की राजनीति को और अधिक प्रभावित किया। पिछड़े वर्गों में इसका व्यापक स्वागत हुआ, जबकि कुछ वर्गों में विरोध भी देखने को मिला। लेकिन इसके बाद सामाजिक न्याय बिहार की राजनीति का स्थायी आधार बन गया। इस दौर में उच्च जातियों का एक बड़ा वर्ग कांग्रेस से हटकर भारतीय जनता पार्टी की ओर आकर्षित होने लगा। दूसरी ओर यादव, मुस्लिम और अन्य पिछड़े वर्ग जनता दल और बाद में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व के साथ जुड़ते चले गए। इस प्रकार बिहार की राजनीति में जातीय ध्रुवीकरण और सामाजिक पुनर्संरचना की प्रक्रिया तेज हो गई। राजनीतिक इतिहासकारों के अनुसार 1975 से 1990 तक का समय बिहार में लोकतंत्र के पुनर्जन्म, सामाजिक प्रतिनिधित्व और सत्ता के विकेंद्रीकरण का युग था। इसी काल में पारंपरिक अभिजात राजनीति की जगह जनाधारित राजनीति ने लेनी प्रारम्भ की। समाजवादी आंदोलन अब केवल वैचारिक धारा नहीं रहा, बल्कि सत्ता परिवर्तन का वास्तविक माध्यम बन चुका था।
कर्पूरी ठाकुर को बिहार में सामाजिक न्याय का अग्रदूत माना जाता है। उनके द्वारा प्रारम्भ की गई नीतियों ने आने वाले दशकों की राजनीति को प्रभावित किया। वहीं जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति ने नई नेतृत्व पीढ़ी तैयार की और आपातकाल विरोधी संघर्ष ने लोकतांत्रिक चेतना को मजबूत किया। इस प्रकार 1975 से 1990 तक का काल बिहार के राजनीतिक इतिहास का वह संक्रमणकाल था जिसने राज्य को कांग्रेस युग से निकालकर मंडल और सामाजिक न्याय की राजनीति की ओर अग्रसर किया। आगे चलकर यही परिवर्तन लालू प्रसाद यादव के लंबे राजनीतिक प्रभुत्व, एम-वाई समीकरण, राष्ट्रीय जनता दल के गठन और क्षेत्रीय दलों के विस्तार का आधार बनने वाला था।
लालू युग और एम-वाई समीकरण से क्षेत्रीय राजनीति के विस्तार तक की यात्रा
1990 का दशक बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत लेकर आया। यदि 1975 से 1990 तक का काल सामाजिक न्याय की वैचारिक तैयारी का दौर था, तो 1990 के बाद का समय उस विचारधारा के वास्तविक राजनीतिक प्रभुत्व का काल बन गया। इसी अवधि में लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति के केंद्र में आए और लगभग डेढ़ दशक तक राज्य की राजनीतिक दिशा, सामाजिक संरचना और चुनावी समीकरणों को प्रभावित करते रहे। इस कालखंड ने न केवल बिहार की राजनीति को बदल दिया, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी सामाजिक न्याय की धारा को मजबूत किया। 1990 के विधानसभा चुनाव जनता दल के लिए ऐतिहासिक सिद्ध हुए। जनता दल को बहुमत प्राप्त हुआ और मुख्यमंत्री पद के लिए कई दावेदार सामने आए। अंततः लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विरासत से निकले युवा नेता लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री चुना गया। लालू प्रसाद यादव का उदय केवल एक व्यक्ति का सत्ता तक पहुँचना नहीं था, बल्कि यह उन सामाजिक वर्गों के राजनीतिक उभार का प्रतीक था जो दशकों तक सत्ता संरचना से दूर रहे थे।
लालू प्रसाद यादव स्वयं एक यादव परिवार से आते थे और छात्र राजनीति के दौरान पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके थे। जेपी आंदोलन ने उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को आकार दिया था। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने स्वयं को गरीबों, पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया। उनकी शैली पारंपरिक राजनीतिक नेताओं से अलग थी। वे जनसभाओं में सरल भाषा का प्रयोग करते थे और आम जनता से सीधे संवाद स्थापित करते थे। 1990 में प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह द्वारा मंडल आयोग की सिफारिशें लागू किए जाने के बाद पूरे देश में पिछड़ा वर्ग राजनीति को नई ऊर्जा मिली। बिहार में इसका सबसे अधिक लाभ लालू प्रसाद यादव को मिला। उन्होंने सामाजिक न्याय को अपनी राजनीति का केंद्रीय आधार बनाया और यह संदेश दिया कि अब सत्ता पर केवल परंपरागत उच्च जातियों का अधिकार नहीं रहेगा।
इसी दौर में बिहार की राजनीति में प्रसिद्ध "एमवाई समीकरण" अर्थात मुस्लिम-यादव गठबंधन का जन्म हुआ। लालू प्रसाद यादव ने यादव समुदाय और मुस्लिम मतदाताओं को एक मजबूत राजनीतिक आधार में परिवर्तित कर दिया। यादव बिहार की सबसे प्रभावशाली पिछड़ी जातियों में से एक थे, जबकि मुस्लिम मतदाता लगभग सभी क्षेत्रों में निर्णायक संख्या में मौजूद थे। इन दोनों वर्गों के संगठित समर्थन ने लालू प्रसाद यादव को अत्यंत मजबूत राजनीतिक आधार प्रदान किया। 1990 के दशक में बाबरी मस्जिद विध्वंस और उसके बाद देश में उत्पन्न सांप्रदायिक तनाव के समय लालू प्रसाद यादव ने स्वयं को धर्मनिरपेक्ष राजनीति के सबसे बड़े रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया। 1990 में उन्होंने अयोध्या आंदोलन के दौरान लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को समस्तीपुर में रुकवाकर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाई। इस घटना के बाद मुस्लिम समुदाय का बड़ा वर्ग उनके साथ मजबूती से जुड़ गया।
1995 के विधानसभा चुनावों में जनता दल के नेतृत्व में लालू प्रसाद यादव ने पुनः शानदार विजय प्राप्त की। यह चुनाव सामाजिक न्याय बनाम पारंपरिक राजनीति के रूप में देखा गया। यादव, मुसलमान और अनेक पिछड़ी जातियाँ उनके साथ रहीं, जबकि उच्च जातियों का बड़ा वर्ग भाजपा और कांग्रेस की ओर झुकने लगा। इस प्रकार बिहार की राजनीति में जातीय ध्रुवीकरण और अधिक स्पष्ट हो गया। हालाँकि लालू प्रसाद यादव के शासनकाल में सामाजिक प्रतिनिधित्व का विस्तार हुआ, लेकिन इसी अवधि में बिहार पर "जंगलराज" के आरोप भी लगने लगे। विपक्ष ने कानून-व्यवस्था की स्थिति, अपराध, अपहरण उद्योग, प्रशासनिक अक्षमता और विकास की धीमी गति को लेकर सरकार की आलोचना की। समर्थकों का तर्क था कि पहली बार गरीब और वंचित वर्गों को सम्मान और राजनीतिक भागीदारी मिली, जबकि आलोचक मानते थे कि शासन व्यवस्था कमजोर हो गई थी।
1997 में बिहार की राजनीति में एक बड़ा संकट उत्पन्न हुआ। पशुपालन विभाग में हुए बहुचर्चित चारा घोटाले में लालू प्रसाद यादव का नाम सामने आया। केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) की जाँच के बाद उन पर आरोप तय होने लगे। बढ़ते दबाव के बीच लालू प्रसाद यादव ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) का गठन किया। यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था। राष्ट्रीय जनता दल के गठन के साथ ही बिहार की राजनीति में एक नए क्षेत्रीय दल का उदय हुआ। लालू प्रसाद यादव ने अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता और सामाजिक आधार के बल पर बड़ी संख्या में विधायकों को अपने साथ बनाए रखा। परिणामस्वरूप वे सत्ता पर नियंत्रण बनाए रखने में सफल रहे। चारा घोटाले के कारण जब लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा, तब उन्होंने अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया। 1997 में राबड़ी देवी का मुख्यमंत्री बनना भारतीय राजनीति की सबसे असाधारण घटनाओं में गिना जाता है। एक साधारण गृहिणी से सीधे मुख्यमंत्री बनने तक की उनकी यात्रा ने देशभर का ध्यान आकर्षित किया। विपक्ष ने इसे परिवारवाद और सत्ता के निजीकरण का उदाहरण बताया, जबकि समर्थकों ने इसे सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक माना। राबड़ी देवी के नेतृत्व में सरकार चलती रही, लेकिन राजनीतिक रूप से लालू प्रसाद यादव ही वास्तविक शक्ति केंद्र बने रहे। 2000 के विधानसभा चुनावों में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। कुछ समय के लिए नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, लेकिन बहुमत सिद्ध न कर पाने के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद राबड़ी देवी पुनः मुख्यमंत्री बनीं।
इसी वर्ष बिहार के इतिहास में एक और महत्वपूर्ण घटना घटी। वर्ष 2000 में झारखंड राज्य का गठन हुआ और दक्षिणी बिहार के खनिज संपन्न क्षेत्र अलग होकर नए राज्य का हिस्सा बन गए। इसके बाद बिहार की आर्थिक संरचना और राजनीतिक भूगोल दोनों बदल गए। विधानसभा की कुल सीटें घटकर 243 रह गईं और राज्य को नई परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को पुनर्गठित करना पड़ा। 1990 से 2005 तक का कालखंड लालू-राबड़ी युग के रूप में जाना जाता है। इस दौरान यादव समुदाय राष्ट्रीय जनता दल का सबसे मजबूत आधार बना रहा। मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा वर्ग भी आरजेडी के साथ रहा। कुछ दलित और अत्यंत पिछड़े वर्गों का समर्थन भी समय-समय पर पार्टी को मिलता रहा। दूसरी ओर भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ और शहरी मध्यम वर्ग का बड़ा हिस्सा भाजपा और समता पार्टी की ओर आकर्षित होने लगा। इसी अवधि में नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस के नेतृत्व में समता पार्टी का विस्तार हुआ। रामविलास पासवान ने दलित राजनीति को नई दिशा देने का प्रयास किया। भाजपा ने उच्च जातियों और शहरी वर्गों में अपना प्रभाव बढ़ाया। इस प्रकार बिहार में बहुध्रुवीय राजनीति का विकास प्रारम्भ हुआ।
लालू प्रसाद यादव के शासनकाल का मूल्यांकन आज भी दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से किया जाता है। एक वर्ग उन्हें सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों की आवाज़ मानता है, जिसने सदियों से सत्ता से दूर रहे समुदायों को सम्मान और राजनीतिक भागीदारी प्रदान की। दूसरा वर्ग उन्हें प्रशासनिक विफलताओं, आर्थिक पिछड़ेपन और कानून-व्यवस्था की समस्याओं के लिए उत्तरदायी मानता है। इतिहासकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, दोनों दृष्टिकोणों में आंशिक सत्य मौजूद है। लालू प्रसाद यादव ने बिहार की सामाजिक संरचना को बदल दिया, लेकिन विकास और प्रशासन के क्षेत्र में अपेक्षित उपलब्धियाँ प्राप्त नहीं हो सकीं। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर बिहार की राजनीति में एक नए नेतृत्व नीतीश कुमार के उदय का कारण बनीं। इस प्रकार 1990 से 2005 तक का काल बिहार की राजनीति में सामाजिक न्याय की स्थापना, क्षेत्रीय दलों के विस्तार, परिवारवाद के उदय, जातीय ध्रुवीकरण और नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश का युग था। इसी काल में राष्ट्रीय जनता दल, लोक जनशक्ति पार्टी और समता पार्टी जैसी शक्तियाँ मजबूत हुईं, जिन्होंने आने वाले वर्षों में बिहार की सत्ता संरचना को पूरी तरह बदल दिया।
नीतीश युग और 2026 तक बिहार की बदलती सत्ता संरचना
2005 से प्रारम्भ हुआ कालखंड बिहार की राजनीति में एक नए युग का प्रतीक माना जाता है। यदि 1990 से 2005 तक का समय सामाजिक न्याय और लालू प्रसाद यादव के प्रभुत्व का काल था, तो 2005 के बाद का दौर विकास, प्रशासनिक सुधार, गठबंधन राजनीति और बदलते सामाजिक समीकरणों का युग बनकर सामने आया। इसी अवधि में नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेता के रूप में उभरे और लगभग दो दशकों तक राज्य की सत्ता और राजनीतिक विमर्श को दिशा देते रहे। 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में समता पार्टी के नेता नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस ने राष्ट्रीय जनता दल के विरुद्ध एक वैकल्पिक राजनीतिक धारा तैयार करनी प्रारम्भ कर दी थी। भाजपा के साथ गठबंधन बनाकर उन्होंने उन मतदाताओं को संगठित करना शुरू किया जो लालू-राबड़ी शासन से असंतुष्ट थे। उच्च जातियाँ, शहरी मध्यम वर्ग, कुर्मी और कुशवाहा समुदायों का एक बड़ा वर्ग धीरे-धीरे इस नए राजनीतिक गठबंधन के साथ जुड़ने लगा। फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। राजनीतिक अस्थिरता के कारण पुनः अक्टूबर-नवंबर 2005 में चुनाव कराए गए। इस बार जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी के गठबंधन को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने।
नीतीश कुमार के सत्ता में आने के साथ ही बिहार की राजनीति में "सुशासन" शब्द प्रमुख राजनीतिक नारा बन गया। उन्होंने स्वयं को लालू युग के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया और प्रशासनिक सुधार, सड़क निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण और कानून-व्यवस्था को अपनी प्राथमिकता बनाया। उनके कार्यकाल में राज्य में सड़क नेटवर्क का विस्तार हुआ, विद्यालयों में छात्राओं को साइकिल योजना और पोशाक योजना का लाभ मिला तथा पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को व्यापक आरक्षण दिया गया।महिलाओं को स्थानीय निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करना बिहार की राजनीति का एक ऐतिहासिक निर्णय माना गया। इसके कारण हजारों महिलाएँ पहली बार सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुईं। इसी प्रकार अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) और महादलित समुदायों के लिए विशेष योजनाओं ने नीतीश कुमार को नए सामाजिक आधार प्रदान किए। 2005 से 2010 के बीच बिहार की कानून-व्यवस्था में सुधार के दावों ने व्यापक जनसमर्थन प्राप्त किया। यही कारण था कि 2010 के विधानसभा चुनाव में जदयू-भाजपा गठबंधन ने भारी बहुमत प्राप्त किया। 243 सदस्यीय विधानसभा में गठबंधन को लगभग तीन-चौथाई बहुमत मिला। यह नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है। इस अवधि में बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह हुआ कि पारंपरिक एमवाई समीकरण के अतिरिक्त "महादलित + अति पिछड़ा + महिला मतदाता" का नया समीकरण उभरने लगा। नीतीश कुमार ने इन वर्गों को योजनाओं और सामाजिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से अपने साथ जोड़ने का प्रयास किया।
हालाँकि 2013 में राष्ट्रीय राजनीति के बदलते परिदृश्य ने बिहार के सत्ता समीकरणों को प्रभावित किया। नरेंद्र मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का प्रमुख चेहरा बनाए जाने के बाद जनता दल (यूनाइटेड) और भाजपा का लगभग सत्रह वर्षों पुराना गठबंधन टूट गया। नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होकर स्वतंत्र रूप से राजनीति करने का निर्णय लिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में जदयू को भारी नुकसान उठाना पड़ा, जबकि भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बड़ी सफलता मिली। इस पराजय की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया और जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। पहली बार महादलित समुदाय से आने वाले नेता राज्य के सर्वोच्च पद पर पहुँचे। यह निर्णय सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया। कुछ समय बाद नीतीश कुमार और जीतनराम मांझी के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। 2015 में नीतीश कुमार पुनः मुख्यमंत्री बने और राष्ट्रीय जनता दल तथा कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन का निर्माण किया। यह गठबंधन राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत रोचक था क्योंकि कभी एक-दूसरे के विरोधी रहे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार अब भाजपा के विरुद्ध एक साथ खड़े थे।
2015 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन को बड़ी सफलता मिली। राष्ट्रीय जनता दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन पूर्व सहमति के अनुसार मुख्यमंत्री पद नीतीश कुमार के पास रहा। यह चुनाव जातीय समीकरणों के पुनर्गठन का उदाहरण माना गया। यादव, मुस्लिम, कुर्मी, कुशवाहा, महादलित और कई पिछड़े वर्गों का व्यापक समर्थन महागठबंधन को प्राप्त हुआ। किन्तु यह गठबंधन अधिक समय तक नहीं चल सका। 2017 में भ्रष्टाचार के आरोपों और राजनीतिक मतभेदों के कारण नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होकर पुनः भाजपा के साथ सरकार बना ली। इस घटना ने बिहार की राजनीति में गठबंधन परिवर्तन की नई परंपरा को जन्म दिया। विपक्ष ने इसे अवसरवादी राजनीति कहा, जबकि समर्थकों ने इसे सुशासन और स्थिरता की आवश्यकता बताया। 2020 के विधानसभा चुनाव कोविड-19 महामारी की पृष्ठभूमि में सम्पन्न हुए। भाजपा और जदयू के नेतृत्व वाले एनडीए को बहुमत प्राप्त हुआ, लेकिन इस बार भाजपा पहली बार जदयू से बड़ी पार्टी बनकर उभरी। राष्ट्रीय जनता दल सबसे बड़ी एकल पार्टी बनी, जबकि तेजस्वी यादव ने बेरोजगारी और युवाओं के मुद्दे को प्रमुखता से उठाकर अपनी अलग पहचान बनाई। 2022 में बिहार की राजनीति ने फिर अप्रत्याशित मोड़ लिया। नीतीश कुमार ने भाजपा से गठबंधन तोड़ दिया और राष्ट्रीय जनता दल, कांग्रेस तथा वाम दलों के साथ मिलकर नई महागठबंधन सरकार बनाई। तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने। यह घटना एक बार फिर यह दर्शाती थी कि बिहार की राजनीति में स्थायी मित्र और स्थायी शत्रु की अवधारणा कमजोर पड़ चुकी है। 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले नीतीश कुमार ने पुनः राजनीतिक दिशा बदली और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में लौट आए। इससे स्पष्ट हुआ कि बिहार की राजनीति में गठबंधन परिवर्तन अब एक सामान्य प्रक्रिया बन चुकी है। जदयू और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा, जबकि आरजेडी और कांग्रेस विपक्ष में रहे।
2025 के विधानसभा चुनावों के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने पुनः सरकार बनाई। इसके पश्चात 2026 में राजनीतिक परिस्थितियों के बदलने और नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया के अंतर्गत भाजपा के वरिष्ठ नेता सम्राट चौधरी राज्य के मुख्यमंत्री बने। उनके नेतृत्व में बिहार में पहली बार भाजपा का नेतृत्व अधिक प्रत्यक्ष रूप से स्थापित हुआ, जबकि जनता दल (यूनाइटेड) गठबंधन सहयोगी के रूप में सरकार में बनी रही। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के पीछे कई कारण माने जाते हैं। पहला, भाजपा पिछले एक दशक से बिहार में अपना स्वतंत्र जनाधार लगातार बढ़ा रही थी। दूसरा, उच्च जातियों के अतिरिक्त उसने अति पिछड़े वर्गों, गैर-यादव ओबीसी समुदायों और युवा मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाई। तीसरा, लंबे समय तक नीतीश कुमार के नेतृत्व के बाद सत्ता में नई पीढ़ी को अवसर देने की राजनीतिक आवश्यकता भी महसूस की जा रही थी।
वर्तमान समय में बिहार की राजनीति चार प्रमुख ध्रुवों में विभाजित दिखाई देती है। पहला ध्रुव भाजपा और उसके सहयोगी दलों का है। दूसरा ध्रुव राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का है। तीसरा ध्रुव विभिन्न लोक जनशक्ति पार्टी गुटों तथा क्षेत्रीय दलों का है। चौथा ध्रुव वामपंथी दलों का है, जिनका कुछ क्षेत्रों में अभी भी प्रभाव बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आने वाले वर्षों में भाजपा का प्रभाव शहरी क्षेत्रों, उच्च जातियों, गैर-यादव पिछड़े वर्गों और युवा मतदाताओं के बीच और बढ़ सकता है। वहीं राष्ट्रीय जनता दल अभी भी यादव और मुस्लिम समुदायों में मजबूत आधार बनाए हुए है। जनता दल (यूनाइटेड) का भविष्य काफी हद तक उसके संगठनात्मक पुनर्गठन और नए नेतृत्व के विकास पर निर्भर करेगा। इस प्रकार 2005 से 2026 तक का काल बिहार की राजनीति में विकास बनाम सामाजिक न्याय, गठबंधन परिवर्तन, नए नेतृत्व के उदय, महिलाओं और अति पिछड़े वर्गों की बढ़ती भागीदारी तथा बहुध्रुवीय राजनीति के विस्तार का युग सिद्ध हुआ। यदि लालू प्रसाद यादव ने बिहार की सामाजिक संरचना को बदला था, तो नीतीश कुमार ने प्रशासनिक और विकासात्मक विमर्श को राजनीति के केंद्र में स्थापित किया। वहीं 2026 के बाद का बिहार एक ऐसे संक्रमणकाल में प्रवेश करता दिखाई देता है जहाँ पुरानी जातीय राजनीति, विकास की अपेक्षाएँ और नई पीढ़ी की आकांक्षाएँ एक साथ सक्रिय हैं।
बिहार की जातीय संरचना और क्षेत्रीय राजनीतिक प्रवृत्तियों का विस्तृत अध्ययन
बिहार की राजनीति को समझने के लिए केवल चुनाव परिणामों या सरकारों का अध्ययन पर्याप्त नहीं माना जाता। वास्तव में बिहार की राजनीतिक संरचना का सबसे महत्वपूर्ण आधार उसकी सामाजिक और जातीय संरचना रही है। स्वतंत्रता के बाद से लेकर वर्तमान 2026 तक राज्य की लगभग प्रत्येक राजनीतिक घटना, सत्ता परिवर्तन, नेतृत्व का उदय और दलों की सफलता या असफलता किसी न किसी रूप में सामाजिक समीकरणों से प्रभावित रही है। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक बिहार को भारत की सबसे अधिक "सामाजिक रूप से संचालित राजनीति" वाला राज्य मानते हैं। 2023 में प्रकाशित जातीय सर्वेक्षण के अनुसार बिहार की कुल आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) की संयुक्त हिस्सेदारी लगभग 63 प्रतिशत से अधिक है। अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी लगभग 19.65 प्रतिशत, अनुसूचित जनजातियों की लगभग 1.68 प्रतिशत तथा मुसलमानों की लगभग 17 प्रतिशत है। सवर्ण समुदाय जिसमें भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ प्रमुख हैं जिनकी कुल आबादी लगभग 15 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है। यही सामाजिक संरचना बिहार की राजनीति की वास्तविक पृष्ठभूमि तैयार करती है। यादव समुदाय बिहार की राजनीति का सबसे प्रभावशाली पिछड़ा वर्ग माना जाता है। विभिन्न अध्ययनों और जातीय सर्वेक्षणों के अनुसार इनकी आबादी लगभग 14 प्रतिशत के आसपास है। स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक दशकों में यादव मतदाता कांग्रेस के साथ थे, लेकिन डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवादी आंदोलन और बाद में कर्पूरी ठाकुर की नीतियों के कारण उनमें राजनीतिक चेतना बढ़ी। 1990 में लालू प्रसाद यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद यादव समुदाय लगभग पूरी तरह राष्ट्रीय जनता दल का मुख्य आधार बन गया। आज भी यह समुदाय आरजेडी की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति माना जाता है और तेजस्वी यादव के नेतृत्व में उसका बड़ा भाग पार्टी के साथ बना हुआ है।
कुर्मी समुदाय की आबादी लगभग 3 प्रतिशत मानी जाती है, लेकिन संख्या कम होने के बावजूद राजनीतिक प्रभाव अत्यधिक है। स्वतंत्रता के बाद यह वर्ग कांग्रेस के साथ था, परंतु समाजवादी आंदोलन के बाद इस समुदाय का झुकाव जनता दल और बाद में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जनता दल (यूनाइटेड) की ओर हुआ। नीतीश कुमार स्वयं कुर्मी समुदाय से आते हैं, इसलिए 2005 के बाद इस वर्ग का बड़ा भाग जदयू का आधार बना। वर्तमान समय में भाजपा भी इस वर्ग में अपना प्रभाव बढ़ाने में सफल हुई है। कुशवाहा अथवा कोइरी समुदाय की आबादी लगभग 4 से 5 प्रतिशत मानी जाती है। इस समुदाय का संबंध मुख्यतः कृषि और सब्जी उत्पादन से रहा है। पहले यह कांग्रेस और समाजवादी दलों के साथ रहा, बाद में समता पार्टी, जनता दल (यूनाइटेड), राष्ट्रीय जनता दल और विभिन्न समयों में उपेन्द्र कुशवाहा के नेतृत्व वाले दलों के बीच इसका समर्थन विभाजित होता रहा। वर्तमान समय में भाजपा और जदयू दोनों इस समुदाय में प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) बिहार की राजनीति का सबसे निर्णायक समूह बन चुका है। इसमें नाई, मल्लाह, निषाद, तेली, लोहार, बढ़ई, धोबी, कहार, कुम्हार, धानुक, केवट, चौरसिया और अनेक छोटी जातियाँ सम्मिलित हैं। इनकी संयुक्त आबादी लगभग 36 प्रतिशत से अधिक है। लंबे समय तक यह वर्ग राजनीतिक रूप से बिखरा हुआ रहा, लेकिन नीतीश कुमार ने इन्हें संगठित कर अपनी राजनीति का प्रमुख आधार बनाया। वर्तमान समय में भाजपा और जदयू दोनों इस वर्ग में मजबूत उपस्थिति रखते हैं।
मुस्लिम समुदाय बिहार की कुल आबादी का लगभग 17 प्रतिशत है। सीमांचल, किशनगंज, कटिहार, अररिया, पूर्णिया, दरभंगा और मधुबनी जैसे क्षेत्रों में इनकी महत्वपूर्ण उपस्थिति है। स्वतंत्रता के बाद मुसलमान कांग्रेस के मुख्य समर्थक रहे, लेकिन 1990 के बाद बाबरी मस्जिद प्रकरण और लालू प्रसाद यादव की धर्मनिरपेक्ष राजनीति के कारण उनका बड़ा हिस्सा राष्ट्रीय जनता दल के साथ चला गया। वर्तमान समय में मुस्लिम मतदाता मुख्यतः आरजेडी और कांग्रेस के साथ दिखाई देते हैं, हालांकि सीमांचल क्षेत्र में एआईएमआईएम जैसे दलों ने भी कुछ प्रभाव स्थापित किया है। दलित समुदाय की आबादी लगभग 19 से 20 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। इनमें पासवान, रविदास, चमार, मुसहर, भुइयाँ और अन्य अनेक जातियाँ शामिल हैं। रामविलास पासवान के उदय के बाद दलित राजनीति को नई दिशा मिली। लोक जनशक्ति पार्टी ने दलित मतदाताओं, विशेषकर पासवान समुदाय के बीच मजबूत आधार बनाया। बाद में चिराग पासवान ने इस विरासत को आगे बढ़ाया। दूसरी ओर महादलित वर्गों के लिए विशेष योजनाओं के माध्यम से नीतीश कुमार ने भी इस वर्ग में प्रभाव स्थापित किया। महादलित श्रेणी का निर्माण बिहार की राजनीति की एक महत्वपूर्ण घटना थी। मुसहर, भुइयाँ और अन्य अत्यंत वंचित दलित जातियों को विशेष योजनाओं का लाभ देकर नीतीश कुमार ने उन्हें अलग राजनीतिक पहचान प्रदान की। परिणामस्वरूप महादलित वर्ग का बड़ा भाग जदयू और एनडीए के साथ जुड़ने लगा।
सवर्ण समुदाय - भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और कायस्थ स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक कांग्रेस का आधार रहा। 1990 के बाद मंडल राजनीति और सामाजिक न्याय के उभार के परिणामस्वरूप इन समुदायों का बड़ा भाग भारतीय जनता पार्टी की ओर स्थानांतरित हो गया। वर्तमान समय में भाजपा का सबसे मजबूत सामाजिक आधार इन्हीं वर्गों में माना जाता है। भूमिहार समुदाय की आबादी लगभग 2 से 3 प्रतिशत मानी जाती है, लेकिन शिक्षा, प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व में इनकी भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है। श्रीकृष्ण सिंह, जगन्नाथ मिश्र और अनेक अन्य प्रभावशाली नेता इसी सामाजिक समूह से जुड़े रहे हैं। वर्तमान में भूमिहार समुदाय का बड़ा भाग भाजपा के साथ माना जाता है। राजपूत समुदाय भी बिहार की राजनीति में प्रभावशाली रहा है। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस और बाद में जनता दल तथा भाजपा के बीच इसका समर्थन विभाजित रहा। वर्तमान समय में राजपूत मतदाताओं का बड़ा वर्ग भाजपा का समर्थक माना जाता है। ब्राह्मण समुदाय की संख्या अपेक्षाकृत कम होने के बावजूद प्रशासन, शिक्षा और राजनीति में उसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है। स्वतंत्रता के बाद यह समुदाय कांग्रेस के साथ था, लेकिन 1990 के बाद इसका अधिकांश समर्थन भाजपा की ओर चला गया। कायस्थ समुदाय, जो शिक्षा और प्रशासनिक सेवाओं में परंपरागत रूप से सक्रिय रहा है, वर्तमान में मुख्यतः भाजपा और कुछ हद तक जदयू का समर्थक माना जाता है।
बिहार की राजनीति को समझने के लिए उसके क्षेत्रीय विभाजनों का अध्ययन भी आवश्यक है। मिथिलांचल क्षेत्र - दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर और आसपास के जिलों में ब्राह्मण, यादव और मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र कभी कांग्रेस और बाद में आरजेडी तथा जदयू के बीच प्रतिस्पर्धा का केंद्र रहा। सीमांचल - किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया मुस्लिम बहुल क्षेत्र माना जाता है। यहाँ आरजेडी, कांग्रेस और हाल के वर्षों में एआईएमआईएम ने प्रभाव स्थापित करने का प्रयास किया है। यह क्षेत्र बिहार की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने लगा है। मगध क्षेत्र - गया, जहानाबाद, औरंगाबाद और नवादा में पिछड़े वर्गों, दलितों और सवर्ण समुदायों का मिश्रित प्रभाव है। यहाँ भाजपा, जदयू और आरजेडी तीनों की प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है। भोजपुर और शाहाबाद क्षेत्र सामाजिक आंदोलनों और वामपंथी राजनीति के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। आरा, बक्सर, रोहतास और कैमूर जैसे जिलों में भूमिहार और राजपूत समुदाय का प्रभाव उल्लेखनीय है। भाजपा और वाम दलों की उपस्थिति यहाँ महत्वपूर्ण रही है। तिरहुत और चंपारण क्षेत्र में कुशवाहा, यादव, ब्राह्मण और मुस्लिम समुदायों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह क्षेत्र विभिन्न चुनावों में बदलते राजनीतिक रुझानों का उदाहरण प्रस्तुत करता है। कोसी क्षेत्र - सहरसा, सुपौल और मधेपुरा को सामाजिक न्याय की राजनीति का गढ़ माना जाता है। शरद यादव और लालू प्रसाद यादव की राजनीति को इस क्षेत्र से विशेष समर्थन प्राप्त हुआ था। वर्तमान समय में यहाँ जदयू और आरजेडी दोनों का प्रभाव दिखाई देता है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 1990 के दशक तक बिहार की राजनीति मुख्यतः "सामाजिक न्याय बनाम परंपरागत सत्ता" के आधार पर चलती थी, जबकि 2005 के बाद इसमें "विकास बनाम सामाजिक प्रतिनिधित्व" का नया तत्व जुड़ गया। अब 2026 के बाद तीसरा चरण उभरता दिखाई दे रहा है, जिसमें युवा मतदाता, रोजगार, शिक्षा, पलायन, औद्योगिक विकास और डिजिटल अवसर जैसे मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। इसी कारण भविष्य की राजनीति केवल जातीय गणित पर आधारित नहीं रहेगी, बल्कि जाति और विकास के मिश्रित समीकरण पर आधारित होगी। भाजपा गैर-यादव पिछड़ों, सवर्णों और युवाओं के बीच अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रही है। राष्ट्रीय जनता दल यादव-मुस्लिम आधार को बनाए रखते हुए अति पिछड़े वर्गों में विस्तार की रणनीति अपना रहा है। जनता दल (यूनाइटेड) का भविष्य नए नेतृत्व और संगठनात्मक पुनर्निर्माण पर निर्भर करेगा। लोक जनशक्ति पार्टी और अन्य छोटे दल विशेष सामाजिक समूहों के माध्यम से अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने का प्रयास करते रहेंगे। इस प्रकार बिहार की राजनीति का वास्तविक आधार उसकी सामाजिक संरचना, जातीय समीकरण और क्षेत्रीय विविधता में निहित है। यही तत्व राज्य की राजनीतिक दिशा निर्धारित करते रहे हैं और भविष्य में भी करते रहेंगे।
1952 से 2025 तक के सभी विधानसभा चुनावों का विस्तृत विश्लेषण तथा आगामी संभावित राजनीतिक दिशा
1952 से 2025 तक बिहार के विधानसभा चुनावों का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक परिवर्तन, जातीय पुनर्संरचना, वैचारिक संघर्ष और नेतृत्व परिवर्तन की एक जीवंत गाथा भी है। स्वतंत्रता के बाद से बिहार की राजनीति कई चरणों से गुजरी है - कांग्रेस प्रभुत्व, समाजवादी उभार, मंडल राजनीति, सामाजिक न्याय का युग, विकास की राजनीति और अंततः बहुध्रुवीय गठबंधन राजनीति का वर्तमान दौर।
1952 में स्वतंत्र भारत का पहला विधानसभा चुनाव हुआ। उस समय बिहार विधानसभा में 330 सीटें थीं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 239 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। श्रीकृष्ण सिंह मुख्यमंत्री बने। उस समय स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, कांग्रेस का संगठन और राष्ट्रीय नेतृत्व का प्रभाव चुनाव के मुख्य आधार थे। भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ तथा बड़ी संख्या में दलित और मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के साथ थे। 1957 के चुनाव में कांग्रेस ने पुनः भारी विजय प्राप्त की और 210 सीटें हासिल कीं। श्रीकृष्ण सिंह लगातार मुख्यमंत्री बने रहे। इस दौर में विपक्ष कमजोर था और समाजवादी दल अभी संगठित रूप से चुनौती देने की स्थिति में नहीं थे। 1962 के चुनाव में कांग्रेस को 185 सीटें प्राप्त हुईं। यद्यपि उसका वर्चस्व बना रहा, लेकिन समाजवादी दलों, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और जनसंघ ने अपनी उपस्थिति दर्ज करानी प्रारम्भ कर दी। ग्रामीण क्षेत्रों में पिछड़े वर्गों में राजनीतिक चेतना का विस्तार होने लगा था। 1967 का चुनाव बिहार की राजनीति में पहली बड़ी क्रांति माना जाता है। कांग्रेस बहुमत से दूर हो गई और संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी। महामाया प्रसाद सिन्हा मुख्यमंत्री बने। यह पहली बार था जब गैर-कांग्रेसी दलों ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया। डॉ. राममनोहर लोहिया की "गैर-कांग्रेसवाद" की रणनीति का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दिया। 1969 और 1972 के चुनावों में राजनीतिक अस्थिरता बनी रही। कांग्रेस पुनः सत्ता में लौटी, लेकिन उसका पुराना वर्चस्व समाप्त हो चुका था। इस काल में जगन्नाथ मिश्र जैसे नेता उभरे और ब्राह्मण तथा सवर्ण समुदायों में कांग्रेस का प्रभाव अभी भी बना रहा। 1974 के जेपी आंदोलन और 1975 के आपातकाल ने बिहार की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्रों, युवाओं और समाजवादियों का व्यापक आंदोलन खड़ा हुआ। आपातकाल के विरोध ने कांग्रेस विरोधी मतदाताओं को एकजुट कर दिया। 1977 के चुनाव में जनता पार्टी को भारी सफलता मिली। कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने। यह पिछड़े वर्गों की राजनीति के उभार की शुरुआत थी। पहली बार यादव, कुर्मी, कोइरी तथा अन्य पिछड़े वर्ग बड़ी संख्या में कांग्रेस से दूर हुए। 1980 में कांग्रेस पुनः सत्ता में लौटी। डॉ. जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री बने। इंदिरा गांधी की वापसी का प्रभाव बिहार में भी दिखाई दिया। फिर भी समाजवादी राजनीति की जड़ें अब मजबूत हो चुकी थीं। 1985 के चुनाव में कांग्रेस ने अंतिम बार स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। बिंदेश्वरी दुबे और बाद में भागवत झा आजाद तथा जगन्नाथ मिश्र मुख्यमंत्री बने। इसी काल में लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और सुशील मोदी जैसे नए नेता छात्र राजनीति से उभर रहे थे। 1990 का चुनाव बिहार के इतिहास का निर्णायक मोड़ था। जनता दल ने 122 सीटें जीतकर सत्ता प्राप्त की और लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री बने। मंडल आयोग की राजनीति, पिछड़ा वर्ग जागरण और सामाजिक न्याय का मुद्दा चुनाव का केंद्र था। यादव, मुसलमान और अनेक पिछड़ी जातियाँ जनता दल के साथ आ गईं। यही बाद में MY (मुस्लिम-यादव) समीकरण के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
1995 के चुनाव में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में जनता दल ने पुनः विजय प्राप्त की। सामाजिक न्याय का नारा और पिछड़े वर्गों का व्यापक समर्थन उनके पक्ष में रहा। इस समय भाजपा और समता पार्टी विपक्ष में मजबूत हो रही थीं। 1997 में चारा घोटाले के कारण लालू प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं। भारतीय राजनीति में यह एक असाधारण घटना थी जब बिना पूर्व प्रशासनिक अनुभव के कोई महिला मुख्यमंत्री बनी। 2000 के चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा बनी। अंततः राबड़ी देवी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल की सरकार बनी, लेकिन यह स्पष्ट हो चुका था कि लालू युग चुनौती के दौर में प्रवेश कर चुका है। फरवरी 2005 के चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिला। विधानसभा भंग कर दी गई। अक्टूबर-नवंबर 2005 में पुनः चुनाव हुए, जिनमें जदयू-भाजपा गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिला। नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने। विकास, कानून व्यवस्था और सुशासन चुनाव के मुख्य मुद्दे थे। 2010 का चुनाव नीतीश कुमार के राजनीतिक जीवन का स्वर्णकाल माना जाता है। जदयू-भाजपा गठबंधन ने 206 सीटें जीत लीं। महिला सशक्तीकरण, सड़क निर्माण, शिक्षा योजनाएँ और कानून व्यवस्था में सुधार प्रमुख कारण बने। अति पिछड़ा वर्ग और महादलित समुदाय बड़े पैमाने पर एनडीए के साथ जुड़ गए। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी लहर का प्रभाव बिहार में भी दिखाई दिया। इसके बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले। नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद छोड़ा और जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया। बाद में वे स्वयं पुनः सत्ता में लौटे। 2015 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन - राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और कांग्रेस ने भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को पराजित किया। महागठबंधन को 178 सीटें मिलीं। लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने। यादव, मुस्लिम, कुर्मी और अनेक पिछड़े वर्ग इस गठबंधन के साथ रहे।
2017 में नीतीश कुमार ने महागठबंधन छोड़कर भाजपा के साथ सरकार बना ली। यह बिहार की गठबंधन राजनीति का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। 2020 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने पुनः बहुमत प्राप्त किया। भाजपा 74 सीटों के साथ गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी बनी जबकि जदयू को अपेक्षाकृत कम सीटें मिलीं। राष्ट्रीय जनता दल 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी एकल पार्टी बनकर उभरी। तेजस्वी यादव ने बेरोजगारी और युवाओं के मुद्दे पर व्यापक समर्थन प्राप्त किया। 2022 में नीतीश कुमार ने भाजपा से अलग होकर पुनः महागठबंधन का गठन किया और तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले वे पुनः एनडीए में लौट आए। इससे यह स्पष्ट हुआ कि बिहार की राजनीति में गठबंधन परिवर्तन अब सामान्य प्रक्रिया बन चुका है। 2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने फिर सरकार बनाई। इसके बाद 2026 में नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया के अंतर्गत भाजपा के वरिष्ठ नेता सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने। इस प्रकार पहली बार बिहार में भाजपा का नेतृत्व अधिक प्रत्यक्ष रूप से स्थापित हुआ जबकि जनता दल (यूनाइटेड) सहयोगी दल के रूप में सरकार में बनी रही। 2026 तक बिहार की राजनीति में चार प्रमुख शक्ति केंद्र दिखाई देते हैं - भाजपा, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड) और लोक जनशक्ति पार्टी के विभिन्न गुट। वामपंथी दल भी कुछ क्षेत्रों में प्रभाव बनाए हुए हैं।
यदि सामाजिक आधार का विश्लेषण किया जाए तो यादव समुदाय आज भी मुख्यतः आरजेडी के साथ जुड़ा हुआ है। मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा भाग आरजेडी और कांग्रेस के साथ है। सवर्ण समुदायों - ब्राह्मण, भूमिहार, राजपूत और कायस्थ का अधिकांश समर्थन भाजपा को प्राप्त है। कुर्मी मतदाता परंपरागत रूप से जदयू के साथ रहे, जबकि अत्यंत पिछड़े वर्गों में भाजपा और जदयू दोनों का प्रभाव बढ़ा है। पासवान समुदाय में चिराग पासवान का प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है।
भौगोलिक दृष्टि से सीमांचल क्षेत्र में मुस्लिम मतदाताओं के कारण आरजेडी और कांग्रेस मजबूत रहती हैं। मिथिलांचल और कोसी क्षेत्र में जदयू, आरजेडी और भाजपा के बीच प्रतिस्पर्धा रहती है। भोजपुर और शाहाबाद क्षेत्र में भाजपा और वामपंथी दलों की ऐतिहासिक उपस्थिति रही है। मगध क्षेत्र मिश्रित राजनीतिक रुझानों वाला क्षेत्र माना जाता है।
भविष्य की राजनीति के संबंध में अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि बिहार अब केवल जातीय राजनीति तक सीमित नहीं रहेगा। रोजगार, औद्योगिक विकास, शिक्षा, पलायन, कृषि संकट और युवाओं की आकांक्षाएँ आने वाले चुनावों के प्रमुख मुद्दे बन सकती हैं। भाजपा गैर-यादव पिछड़ों और युवाओं के बीच अपना आधार मजबूत करने का प्रयास कर रही है। आरजेडी यादव-मुस्लिम आधार के साथ अति पिछड़े वर्गों में विस्तार चाहती है। जनता दल (यूनाइटेड) का भविष्य उसके संगठनात्मक पुनर्गठन और नए नेतृत्व के विकास पर निर्भर करेगा।
इसी कारण बिहार की राजनीति का आगामी चरण "जाति + विकास + युवा आकांक्षाओं" के संयुक्त मॉडल पर आधारित दिखाई देता है। स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस प्रभुत्व से प्रारम्भ हुई यह यात्रा समाजवाद, मंडल, सामाजिक न्याय, सुशासन और गठबंधन राजनीति से गुजरते हुए अब एक नए युग की ओर बढ़ रही है, जहाँ पारंपरिक सामाजिक समीकरणों के साथ नई पीढ़ी की अपेक्षाएँ भी राजनीतिक दिशा निर्धारित करेंगी।
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