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कॉकरोच और क्रांति का भ्रम

 



प्रकृति का अपना विज्ञान है और राजनीति का अपना। विज्ञान हमें बताता है कि कॉकरोच करोड़ों वर्षों से पृथ्वी पर मौजूद हैं। वे सड़े-गले पदार्थों का अपघटन करते हैं, खाद्य श्रृंखला का हिस्सा हैं और प्रकृति के संतुलन में उनकी एक भूमिका है। अर्थात् वास्तविक कॉकरोच कम से कम अपना काम तो ईमानदारी से करते हैं। वे स्वयं को शेर घोषित करके जंगल का राजा बनने का दावा नहीं करते, न ही हर सप्ताह कोई नई क्रांति का पोस्टर जारी करते हैं।


लेकिन भारत में इन दिनों एक नया प्रयोग देखने को मिल रहा है। कुछ लोगों ने युवाओं के असंतोष, सोशल मीडिया की सनसनी और अंग्रेजी नामों के आकर्षण को मिलाकर एक ऐसा आंदोलन खड़ा करने का प्रयास किया है, जिसका नाम सुनकर विज्ञान के विद्यार्थी भी असमंजस में पड़ जाएँ और राजनीति के विद्यार्थी भी।


विडंबना देखिए कि वास्तविक कॉकरोच पर्यावरण को साफ करने में योगदान देते हैं, जबकि राजनीतिक कॉकरोचों की यह नई प्रजाति सोशल मीडिया पर भ्रम, उत्तेजना और विभाजन के अपशिष्ट को बढ़ाने में अधिक सक्रिय दिखाई देती है। वास्तविक कॉकरोच अंधेरे में रहते हैं, लेकिन ये डिजिटल कॉकरोच कैमरे की रोशनी और ट्रेंडिंग हैशटैग के बिना जीवित नहीं रह सकते।


दुनिया के कई देशों में पिछले कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति देखी गई है कि जेन-जी की ऊर्जा और भावनाओं को एक विशेष दिशा देकर सत्ता परिवर्तन के बड़े-बड़े प्रयोग किए जाएँ। कभी मानवाधिकार के नाम पर, कभी पर्यावरण के नाम पर, कभी शिक्षा के नाम पर और कभी बेरोजगारी के नाम पर। हर बार एक नया नारा, नया प्रतीक और नई डिजिटल सेना तैयार कर दी जाती है। यह भी संयोग ही होगा कि ऐसे अभियानों में सोशल मीडिया की भूमिका अचानक अत्यधिक बढ़ जाती है और कुछ अंतरराष्ट्रीय शक्तियाँ भी बड़ी रुचि लेने लगती हैं।


किन्तु शायद इस प्रयोगशाला के रणनीतिकार भारत को अभी तक पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं।


भारत का युवा केवल मोबाइल चलाना नहीं जानता, वह अपने इतिहास को भी जानता है। वह यह भी जानता है कि जिन पूर्वजों ने हजार वर्षों के आक्रमण झेले, जिन्होंने विभाजन का दर्द सहा, जिन्होंने आतंकवाद का सामना किया और जिन्होंने देश को विश्व मंच पर प्रतिष्ठित होते देखा, उनकी संतानों को केवल कुछ वायरल वीडियो दिखाकर राष्ट्र से विमुख नहीं किया जा सकता।


भारत का जेन-जी पश्चिम की नकल करने वाला जेन-जी नहीं है। यह वही पीढ़ी है जो एक ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता सीखती है तो दूसरी ओर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर गर्व भी करती है। यह वही पीढ़ी है जो स्टार्टअप भी बनाती है और सेना में भर्ती होकर सीमा पर बलिदान देने का संकल्प भी रखती है। यह वही पीढ़ी है जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है, लेकिन राष्ट्रविरोध और राष्ट्रहित के बीच का अंतर भी समझती है।


यही कारण है कि जब कोई आंदोलन युवाओं के वास्तविक मुद्दों के बजाय प्रतीकों, सनसनी और नाटकीयता के सहारे आगे बढ़ने का प्रयास करता है, तब भारत का युवा स्वयं उससे प्रश्न पूछना प्रारंभ कर देता है। वह पूछता है कि समाधान क्या है? वैकल्पिक दृष्टि क्या है? उद्देश्य राष्ट्र निर्माण है या केवल व्यवस्था के प्रति क्षणिक आक्रोश को भुनाना?


जो लोग यह मान बैठे हैं कि भारत की युवा शक्ति को केवल कुछ विदेशी शब्दों, आक्रामक नारों और डिजिटल भीड़ के सहारे अपनी दिशा में मोड़ा जा सकता है, उन्हें भारत के चरित्र को फिर से पढ़ने की आवश्यकता है। यह देश आंदोलनों से नहीं डरता, लेकिन एजेंडों को पहचानना भी जानता है। यहाँ असहमति का सम्मान होता है, परंतु राष्ट्रहित सर्वोपरि रहता है।


और अंत में, वास्तविक कॉकरोचों से क्षमा याचना आवश्यक है। क्योंकि उन्होंने कभी स्वयं को राष्ट्र का उद्धारक घोषित नहीं किया। उन्होंने कभी युवाओं के नाम पर भ्रम का व्यापार नहीं किया। उन्होंने कभी स्वयं को क्रांति का ठेकेदार नहीं बताया।

कम से कम वे प्रकृति के लिए उपयोगी तो हैं।

भारत का युवा आज भी राष्ट्रवादी है, भारत प्रथम की भावना से प्रेरित है और उसे यह भली-भाँति ज्ञात है कि परिवर्तन का मार्ग अराजकता, भ्रम और डिजिटल नाटकों से नहीं, बल्कि परिश्रम, लोकतांत्रिक सहभागिता और राष्ट्र निर्माण के संकल्प से होकर गुजरता है। जो लोग भारत की आत्मा को केवल एक ट्रेंडिंग हैशटैग समझने की भूल कर रहे हैं, वे संभवतः इस देश की सबसे बड़ी शक्ति उसके राष्ट्रनिष्ठ युवा को अभी पहचान नहीं पाए हैं।

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