घर के भेदी ने खोली कांग्रेस की पोल!
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मध्यप्रदेश कांग्रेस इन दिनों विपक्ष से कम और आत्मघाती गोलों से ज्यादा चर्चा में है। भाजपा के हमलों से पहले ही कांग्रेस के अपने विधायक अब पार्टी की रणनीतियों की ऐसी धज्जियां उड़ा रहे हैं कि विरोधियों को अलग से मेहनत करने की जरूरत ही नहीं पड़ रही।
राज्यसभा चुनाव के लिए मीनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने के बाद कांग्रेस जिस राजनीतिक झटके से उबरने की कोशिश कर रही थी, उसी बीच पार्टी के वरिष्ठ विधायक डॉ. आरके दोगने ने ऐसा "सच का बम" फोड़ा कि कांग्रेस की अंदरूनी अव्यवस्था खुली किताब बन गई।
डॉ. दोगने ने साफ शब्दों में स्वीकार किया कि पार्टी से भारी चूक हुई। डमी उम्मीदवार तक नहीं बनाया गया, जबकि इंदौर लोकसभा चुनाव का ताजा अनुभव सामने था। यानी कांग्रेस ने इतिहास से कोई सबक नहीं लिया और एक बार फिर वही पुरानी गलती दोहरा दी।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। विधायक महोदय का सबसे बड़ा दर्द चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि एयरपोर्ट पर पांच घंटे की "वनवास यात्रा" रही। उनका कहना था कि विधायक परिवार और बच्चों सहित धूप में बैग लेकर बैठे रहे, लेकिन व्यवस्था नाम की कोई चीज दिखाई नहीं दी। कांग्रेस की अंदरूनी प्लानिंग ऐसी निकली कि वीआईपी कहलाने वाले जनप्रतिनिधि यात्रियों की तरह इधर-उधर भटकते रहे।
दिलचस्प बात यह रही कि दोगने ने अपनी ही पार्टी के नेताओं को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि गलती केवल सरकार की नहीं, कांग्रेस नेतृत्व की भी है। यानी विपक्ष पर हमला करने से पहले कांग्रेस को अपने घर की सफाई करने की जरूरत है।
बात जब बाड़ेबंदी की आई तो विधायक ने सीधे-सीधे इस पूरी व्यवस्था को लोकतंत्र का अपमान बता दिया। उनका कहना था कि यदि जनता ने विधायक चुन लिया है तो फिर उन्हें रिसॉर्टों और होटलों में कैद करने की जरूरत ही क्यों पड़ती है? यह विधायकों और जनता दोनों का अपमान है।
सबसे मजेदार बात तब सामने आई जब उनसे पूछा गया कि क्या मीनाक्षी नटराजन को कांग्रेस के भीतर ही स्वीकार नहीं किया जा रहा था? हालांकि उन्होंने किसी साजिश से इनकार किया, लेकिन इतना जरूर स्वीकार कर लिया कि पार्टी की प्लानिंग पूरी तरह फेल रही।
कुल मिलाकर, कांग्रेस के लिए यह स्थिति उस कहावत जैसी बन गई है कि "घर का भेदी लंका ढाए।" विपक्ष के आरोपों से ज्यादा असर अब कांग्रेस के अपने नेताओं के बयानों का दिखाई देने लगा है।
एक तरफ भाजपा कांग्रेस की कमजोरियों पर निशाना साध रही है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के विधायक खुद माइक संभालकर अपनी पार्टी की व्यवस्थाओं का पोस्टमार्टम कर रहे हैं।
राजनीति के जानकारों का कहना है कि अगर कांग्रेस का यही हाल रहा तो विरोधियों से लड़ने से पहले उसे अपने ही नेताओं के बयानों से बचाव की रणनीति बनानी पड़ेगी। फिलहाल मध्यप्रदेश कांग्रेस में संदेश साफ दिखाई दे रहा है कि "संकट बाहर से कम, भीतर से ज्यादा है।
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