111 करोड़ की सीवरेज योजना फेल, शिवपुरी के पेयजल पर संकट; हाईकोर्ट सख्त
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शिवपुरी में करोड़ों रुपए खर्च कर बनाई गई सीवरेज परियोजना अब बड़े सवालों के घेरे में आ गई है। हाईकोर्ट द्वारा नियुक्त लोकल कमिश्नर टीम की रिपोर्ट ने ऐसे खुलासे किए हैं, जिन्होंने न केवल प्रशासनिक दावों की पोल खोल दी, बल्कि शहर के लाखों लोगों के स्वास्थ्य को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
रिपोर्ट के अनुसार, जिन नालों को सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से जोड़ने का दावा किया गया था, उनका गंदा पानी अब भी जाधव सागर, माधव झील और रामसर साइट साख्य सागर (चांदपाठा) में पहुंच रहा है। सबसे गंभीर बात यह है कि यही प्रदूषित पानी आगे सिंध नदी और मड़ीखेड़ा डैम में मिल रहा है, जो शिवपुरी शहर के पेयजल का प्रमुख स्रोत माना जाता है।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने बेहद कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि शिवपुरी की जनता सीवेज मिला पानी पीने को मजबूर हो सकती है और स्थानीय अधिकारियों के जवाबों पर अब भरोसा नहीं किया जा सकता। अदालत ने पूरे घटनाक्रम को बेहद निराशाजनक बताते हुए कहा कि कुछ अधिकारी ऐसे कार्यों में लिप्त दिखाई दे रहे हैं, जो किसी सरकारी अधिकारी को शोभा नहीं देते।
जनहित याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता आदित्य राज पांडेय ने शहर की तीन प्रमुख झीलों में फैल रही जलकुंभी और सीधे गिर रहे सीवेज का मुद्दा उठाया था। इसके बाद सामने आई लोकल कमिश्नर रिपोर्ट ने कई सरकारी दावों को कठघरे में खड़ा कर दिया।
सुनवाई के दौरान पीएचई के अधिकारियों द्वारा किए गए दावों और मौके की वास्तविक स्थिति में अंतर पाए जाने पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। जब यह तर्क दिया गया कि 111 करोड़ रुपए की परियोजना केवल मुख्य लाइन बिछाने तक सीमित थी और घरों को जोड़ने की कोई व्यवस्था नहीं थी, तब अदालत ने सवाल उठाया कि यदि जनता को सीधा लाभ ही नहीं मिलना था तो इतनी बड़ी राशि का भुगतान आखिर किस आधार पर किया गया।
माधव टाइगर रिजर्व के अधिकारियों द्वारा भी झीलों का दूषित पानी सिंध नदी में जाने की बात स्वीकार किए जाने के बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं होने पर अदालत ने नाराजगी जताई। नगर पालिका से भी पूछा गया कि अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाले बिना शहरवासियों को स्वच्छ पेयजल कैसे उपलब्ध कराया जाएगा।
इस बीच अदालत ने बिना किसी शुल्क और निजी खर्च पर मौके का निरीक्षण करने वाली वकीलों की लोकल कमिश्नर टीम की खुलकर सराहना की और कहा कि सरकारी अधिकारियों को सार्वजनिक दायित्व निभाने की सीख ऐसे प्रयासों से लेनी चाहिए।
अब मामले में पीएचई के प्रमुख अभियंता, नगरीय प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा गया है। मामले की अगली सुनवाई 23 जून को होगी।
शिवपुरी की जल सुरक्षा, करोड़ों की परियोजना और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा यह मामला अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक गंभीर चेतावनी बनकर सामने आया है।
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