छात्रों के लिए संघर्ष कर रहे देशराज नरोलिया को क्यों बनाया जा रहा निशाना?
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खनियाधाना के सीएम राइज स्कूल में कक्षा 12वीं के प्रैक्टिकल अंकों को लेकर उत्पन्न विवाद ने अनेक विद्यार्थियों और अभिभावकों की चिंताओं को सामने ला दिया है। छात्रों का आरोप है कि उन्हें अपेक्षित अंक नहीं मिले और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग लंबे समय से लंबित है। इसी विषय को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता प्रशासन का ध्यान आकर्षित करने के लिए आंदोलन और धरना-प्रदर्शन कर रहे थे।
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एबीवीपी से जुड़े देशराज नरोलिया का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित किया गया। समर्थकों का कहना है कि वीडियो के कुछ हिस्सों को संदर्भ से अलग कर प्रस्तुत किया गया, जिससे ऐसा वातावरण बनाने का प्रयास हुआ मानो छात्र आंदोलन का उद्देश्य केवल टकराव पैदा करना हो, जबकि वास्तविक मुद्दा विद्यार्थियों के भविष्य और लंबित जांच से जुड़ा था।
एबीवीपी कार्यकर्ताओं का कहना है कि देशराज नरोलिया को केवल "नेता" बताकर उनकी संगठनात्मक भूमिका को सीमित रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जबकि वे संगठन मंत्री के रूप में छात्र हितों के विभिन्न विषयों को लगातार उठाते रहे हैं। उनके समर्थकों के अनुसार, आंदोलन के दौरान व्यक्त की गई तीखी प्रतिक्रियाओं को छात्रों के प्रति चिंता और प्रशासनिक उदासीनता के विरुद्ध आक्रोश के रूप में देखा जाना चाहिए।
इस प्रकरण ने पत्रकारिता के स्वरूप को लेकर भी कई प्रश्न खड़े किए हैं। एबीवीपी समर्थकों और कुछ स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि समाज के कुछ स्वयंभू या तथाकथित पत्रकार गंभीर जनसरोकारों की अपेक्षा सनसनी, विवाद और सोशल मीडिया व्यूज को प्राथमिकता देते दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि जब शासकीय जनसंपर्क कार्यालय जैसे संस्थानों की गरिमा से जुड़े विवादास्पद आचरण या सोशल मीडिया रीलों पर चर्चा होती है, तब वही वर्ग प्रायः मौन दिखाई देता है, लेकिन छात्र हितों से जुड़े आंदोलनों के दौरान किसी बयान के छोटे अंशों को उभारकर विवाद खड़ा करने का प्रयास करता है।
समर्थकों का यह भी मानना है कि पत्रकारिता का उद्देश्य केवल सनसनी फैलाना नहीं, बल्कि समाज के समक्ष संपूर्ण तथ्य रखना होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के वक्तव्य या वीडियो को उसके पूरे संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया जाता है, तो इससे न केवल संबंधित व्यक्ति की छवि प्रभावित होती है, बल्कि वास्तविक मुद्दा भी पीछे छूट जाता है। इस मामले में भी मूल प्रश्न विद्यार्थियों के भविष्य, प्रैक्टिकल अंकों की जांच और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता का है।
लोकतंत्र में छात्र शक्ति को परिवर्तन की ऊर्जा माना गया है। जब विद्यार्थी और उनके संगठन शिक्षा व्यवस्था में न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करते हैं, तब आवश्यक है कि उनके मुद्दों पर गंभीरता से विचार किया जाए। साथ ही मीडिया और सोशल मीडिया से जुड़े सभी पक्षों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे प्रतिस्पर्धा और लोकप्रियता से ऊपर उठकर तथ्यों, संतुलन और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, ताकि समाज में अनावश्यक भ्रम के स्थान पर स्वस्थ विमर्श को बढ़ावा मिल सके।
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दिवाकर की दुनाली से

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