लेबल

जिले में सक्रिय ‘माइक गैंग’ का सच

 


पत्रकारिता कभी समाज की आंख, कान और अंतरात्मा मानी जाती थी। एक पत्रकार के हाथ में कलम होती थी, दिमाग में तथ्य होते थे और हृदय में जनहित का भाव। लेकिन आज कुछ स्थानों पर ऐसा दृश्य दिखाई देने लगा है कि पत्रकारिता का नाम सुनकर सम्मान से अधिक संदेह पैदा होने लगता है। इसका कारण वे कथित लोग हैं जिन्होंने पत्रकारिता को मिशन नहीं, बल्कि अवसर मान लिया है।


शिवपुरी जिले में भी लंबे समय से ऐसी चर्चाएं सुनाई देती रही हैं कि कुछ लोग स्वयं को पत्रकार बताकर विभिन्न विभागों, कार्यालयों और सार्वजनिक गतिविधियों के इर्द-गिर्द सक्रिय रहते हैं। इनके पास माइक आईडी, कैमरे और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तो दिखाई देते हैं, लेकिन कई बार इनके व्यवहार को देखकर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक हो जाता है कि इनका उद्देश्य समाचार संकलन है या कुछ और?


ऐसा प्रतीत होता है मानो कुछ लोगों ने पत्रकारिता को एक संगठित नेटवर्क में बदल दिया हो, जहां खबर से अधिक महत्व दबाव बनाने की कला को दिया जाता है। सरकारी कार्यालयों के नियमित चक्कर, हर आयोजन में अनिवार्य उपस्थिति, विज्ञापन के नाम पर अनवरत संपर्क, और सूचना के अधिकार कानून को जनहित के बजाय व्यक्तिगत हथियार की तरह उपयोग करने की शिकायतें समय-समय पर सुनाई देती रहती हैं।


सबसे विचित्र दृश्य तब दिखाई देता है जब कुछ तथाकथित पत्रकार अपने हाथ में माइक आईडी इस प्रकार लेकर घूमते हैं मानो किसी युद्ध अभियान पर निकले हों। माइक आईडी को उन्होंने पत्रकारिता का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रभाव और भय का प्रतीक बना दिया है। हालत यह है कि सोशल मीडिया पर कुछ लोगों की सक्रियता देखकर लगता है कि खबरें कम और गुटबंदी अधिक संचालित हो रही है।


तकनीक के इस युग में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक लेख लिख रही है, तब भी पत्रकारिता का मूल आधार अध्ययन, भाषा, तथ्य और विश्लेषण ही है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि कुछ ऐसे चेहरे भी दिखाई देने लगे हैं जिनसे यदि किसी सामान्य विषय पर दो पृष्ठ का मौलिक लेख लिखने को कहा जाए तो शायद विद्यालय का एक साधारण छात्र भी उनसे बेहतर कार्य कर दे। इसके बावजूद वे स्वयं को समाज का सबसे बड़ा सूचना प्रहरी घोषित करने में कोई संकोच नहीं करते।


जिले में यह धारणा भी तेजी से फैल रही है कि यदि कोई व्यापारी, किसान, अधिकारी, कर्मचारी या सामान्य नागरिक किसी कारणवश कुछ लोगों के निशाने पर आ जाए तो उसके विरुद्ध एक सुनियोजित सोशल मीडिया अभियान प्रारम्भ हो जाता है। पोस्ट, कमेंट, वीडियो और प्रतिक्रियाओं का ऐसा क्रम चलता है कि देखने वाले को लगता है मानो कोई संगठित तंत्र सक्रिय हो गया हो। दूसरी ओर यदि उन्हीं लोगों में से किसी एक पर सार्वजनिक आलोचना हो जाए तो पूरा समूह अचानक एकजुट होकर सामने आ जाता है। यह व्यवहार स्वतंत्र पत्रकारिता से अधिक किसी गिरोहबद्ध व्यवस्था का आभास देता है।


यह लेख किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति के विरुद्ध है जो पत्रकारिता की प्रतिष्ठा को लगातार क्षति पहुंचा रही है। जिले में आज भी अनेक ईमानदार, संघर्षशील और जनहित के लिए समर्पित पत्रकार कार्य कर रहे हैं। वे कठिन परिस्थितियों में भी सत्य के पक्ष में खड़े हैं। लेकिन कुछ कथित तत्वों की गतिविधियां पूरी पत्रकार बिरादरी की छवि को धूमिल कर रही हैं।


अब समय आ गया है कि प्रशासन, पुलिस और संबंधित सक्षम संस्थाएं पत्रकारिता के नाम पर चल रही प्रत्येक संदिग्ध गतिविधि पर निष्पक्ष दृष्टि डालें। यदि कहीं अवैध वसूली, दबाव निर्माण, ब्लैकमेलिंग, फर्जी पहचान या किसी प्रकार का संगठित दुरुपयोग हो रहा है तो उसकी विधिसम्मत जांच होनी चाहिए। यदि आरोप निराधार हैं तो सत्य सामने आना चाहिए, और यदि आरोपों में तथ्य हैं तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई भी होनी चाहिए।


पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, लेकिन कोई भी स्तंभ तब तक मजबूत नहीं रह सकता जब तक उसके भीतर छिपी दीमकों की पहचान न की जाए। कलम की ताकत जनता ने दी है, उसे भय, दबाव और निजी स्वार्थ का औजार बनाने वालों को यह समझ लेना चाहिए कि समाज सब देख रहा है, समय सब दर्ज कर रहा है और कानून सबके लिए समान है।


सच्चे पत्रकारों को इस लड़ाई में आगे आना होगा, क्योंकि पत्रकारिता की रक्षा पत्रकार ही कर सकते हैं। और जो लोग पत्रकारिता की आड़ में अपनी अलग दुकान चला रहे हैं, उन्हें यह चेतावनी पर्याप्त है कि हर माइक पत्रकार नहीं होता, हर कैमरा सच का प्रहरी नहीं होता और हर आईडी कार्ड सम्मान का पात्र नहीं होता। जनता अब खबर और कारोबार, पत्रकार और दलाल, जनहित और स्वार्थ के बीच का अंतर समझने लगी है।

एक टिप्पणी भेजें

एक टिप्पणी भेजें