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कर्नाटक की राजनीति - जाति, अस्मिता और सत्ता का खेल

 




नवंबर 1956 में भाषाई पुनर्गठन के फलस्वरूप अस्तित्व में आया मैसूर राज्य, जो वर्ष 1973 में 'कर्नाटक' के रूप में अपनी आधुनिक पहचान पाता है, भारतीय संघ में राजनीति शास्त्र के शोधार्थियों के लिए एक जीवंत प्रयोगशाला है। पांच अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयों - पुराना मैसूर, बंबई-कर्नाटक, मद्रास-कर्नाटक, हैदराबाद-कर्नाटक और कूर्ग के अनूठे समामेलन से उपजे इस राज्य की राजनीतिक यात्रा केवल सत्ता के हस्तांतरण का इतिहास नहीं है, बल्कि यह जटिल जनसांख्यिकीय बदलावों, गहन प्रशासनिक एकीकरण की चुनौतियों, प्रखर क्षेत्रीय अस्मिताओं और अनूठे सामाजिक गठजोड़ का एक कालजयी दस्तावेज है। स्वतंत्रता के आरंभिक काल में जहां पूरा देश कांग्रेस के एकछत्र प्रभुत्व को देख रहा था, वहीं तत्कालीन मैसूर राज्य इस अखिल भारतीय लहर से अछूता नहीं था, किंतु इस आंतरिक और बाहरी राजनीतिक संघर्ष की प्रकृति पूरी तरह से स्थानीय सामाजिक ताने-बाने से संचालित थी।

शुरुआती दौर में इस नवगठित सूबे के समक्ष सबसे विकट चुनौती विभिन्न क्षेत्रों के भिन्न-भिन्न भूमि सुधार कानूनों, कर प्रणालियों, न्यायिक नियमों और लोक सेवकों के वेतनमानों को एकरूपता प्रदान करने की थी। इस प्रशासनिक समरूपीकरण की प्रक्रिया के समानांतर ही राज्य में एक मूक जनसांख्यिकीय क्रांति आकार ले रही थी। एकीकरण से पूर्व जहां पुराने मैसूर क्षेत्र में वोक्कालिगा समुदाय का राजनैतिक और सामाजिक वर्चस्व स्थापित था, वहीं उत्तरी और हैदराबाद के कन्नड़ भाषी क्षेत्रों के जुड़ते ही राज्य के भीतर लिंगायत समुदाय एक बड़े और निर्णायक राजनीतिक ध्रुव के रूप में उभरा। राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री एस. निजलिङ्गप्पा के नेतृत्व में यह प्रारंभिक काल इस द्वि-जातीय शक्ति संतुलन को साधने और क्षेत्रीय असंतोष को शांत करने में व्यतीत हुआ।

वर्ष 1957 का प्रथम विधानसभा चुनाव इस लिहाज से मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने 208 सीटों वाली नई विधायिका में कांग्रेस को 150 सीटें और 52.08 प्रतिशत मतों के साथ प्रचंड बहुमत दिया, जबकि मुख्य विपक्षी दल प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (PSP) को 18 सीटें (14.06% मत), शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन को 2 सीटें (1.30% मत), कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) को 1 सीट और निर्दलीयों को 35 सीटें (28.74% मत) प्राप्त हुईं। इस चुनाव ने भविष्य की क्षेत्रीय और जातिगत राजनीति की सामाजिक रूपरेखा भी खींच दी, जिसमें बंबई और हैदराबाद-कर्नाटक के नए जुड़े क्षेत्रों के लिंगायत समुदाय ने एकजुट होकर कांग्रेस समर्थित एकीकरण की पैरोकारी करने वाले एस. निजलिङ्गप्पा का साथ दिया, जो मुख्यमंत्री बने। दूसरी ओर, पुराने मैसूर क्षेत्र के वोक्कालिगा समुदाय में इस बात का असंतोष और डर था कि नए राज्य में उनका दबदबा कम हो जाएगा, जिसके कारण वहां कई सीटों पर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और निर्दलीय उम्मीदवारों को मजबूत समर्थन मिला।

इसके बाद 1962 के द्वितीय चुनाव (208 सीटें) में कांग्रेस ने पुनः 138 सीटें (50.22% मत) जीतकर दबदबा कायम रखा और लिंगायत बहुल उत्तरी भागों तथा वोक्कालिगा बेल्ट के समर्थन से एस. आर. कांथी और फिर एस. निजलिङ्गप्पा दोबारा मुख्यमंत्री बने। 1967 के तृतीय चुनाव (216 सीटें) में भी अगड़ी जातियों के इसी प्रभुत्व के सहारे कांग्रेस ने 126 सीटें (48.43% मत) हासिल कीं और पहले निजलिङ्गप्पा तथा बाद में वीरेंद्र पाटिल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन हुए।

कर्नाटक के इस राजनैतिक विमर्श को सबसे गहरी वैचारिक और सामाजिक दिशा सत्तर के दशक में मिली। वर्ष 1972 के चतुर्थ चुनाव (216 सीटें) में इंदिरा गांधी की कांग्रेस (R) ने 165 सीटें (52.17% मत) जीतकर ऐतिहासिक सफलता पाई। दूरदर्शी मुख्यमंत्री डी. देवराज अर्स ने राज्य के इस पारंपरिक अगड़ी जातियों के प्रभुत्व को सीधी चुनौती देते हुए राजनीति शास्त्र को 'अहिंदा' (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग और दलित) का एक अत्यंत शक्तिशाली और अभेद्य सामाजिक सूत्र दिया। भूमि सुधारों के क्रांतिकारी क्रियान्वयन और हवानूर आयोग की सिफारिशों को लागू करके उन्होंने समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों को राजनैतिक रूप से सशक्त कर दिया। इस सोशल इंजीनियरिंग का असर 1978 के पंचम चुनाव (बढ़कर 224 सीटें) में भी दिखा, जहां आपातकाल के बाद भी कांग्रेस (I) ने पिछड़े वर्गों और गरीबों के एकतरफा समर्थन से 149 सीटें (44.3% मत) जीतीं और देवराज अर्स पुनः मुख्यमंत्री बने।

अस्सी का दशक आते-आते यह प्रयोग गैर-कांग्रेसवाद के राष्ट्रीय उभार के साथ टकराया। वर्ष 1983 के छठे चुनाव (224 सीटें) में जनता पार्टी ने वोक्कालिगा और लिंगायतों के संयुक्त असंतोष के सहारे 95 सीटें (33.1% मत) पाईं और भाजपा (18 सीटें) व वामदलों के बाहरी सहयोग से रामकृष्ण हेगड़े राज्य के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। 1985 के सातवें चुनाव में ग्रामीण कर्नाटक और मध्यम जातियों के समर्थन से जनता पार्टी ने 139 सीटें (43.6% मत) जीतकर स्पष्ट बहुमत पाया और हेगड़े दोबारा मुख्यमंत्री बने। जनता दल के बिखराव के कारण 1989 के आठवें चुनाव में कांग्रेस ने दिग्गज लिंगायत चेहरा वीरेंद्र पाटिल के नेतृत्व में रिकॉर्ड 178 सीटें (48.9% मत) जीतकर वापसी की और पाटिल मुख्यमंत्री बने। लेकिन 1990 में उन्हें अचानक हटाए जाने से लिंगायत समुदाय कांग्रेस से स्थायी रूप से छिटक गया। इसका परिणाम 1994 के नौवें चुनाव में दिखा, जब पुराने मैसूर में देवेगौड़ा के कारण वोक्कालिगा और उत्तरी कर्नाटक में हेगड़े के कारण लिंगायत वोट एकजुट होकर जनता दल के खाते में गए, जिससे जनता दल ने 115 सीटें (33.5% मत) जीतीं और एच.डी. देवेगौड़ा मुख्यमंत्री बने, जबकि भाजपा 40 सीटें जीतकर पहली बार मुख्य विपक्षी दल बनी।

इक्कीसवीं सदी की शुरुआत के साथ जनता दल के दो गुटों (JDU और JDS) में विभाजन का लाभ उठाकर 1999 के दसवें चुनाव में एस.एम. कृष्णा के शहरी व तकनीकी विकास के नैरेटिव पर कांग्रेस ने 132 सीटें (40.8% मत) जीतकर सरकार बनाई और कृष्णा मुख्यमंत्री बने। लेकिन 2004 के ग्यारहवें चुनाव में बी.एस. येदियुरप्पा के कुशल नेतृत्व में लिंगायत समुदाय का एक बहुत बड़ा हिस्सा और तटीय कर्नाटक की पूरी बेल्ट स्थायी रूप से भाजपा के पाले में चली गई, जिससे भाजपा 79 सीटें (28.3% मत) जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। त्रिशंकु विधानसभा के कारण पहले कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन से धरम सिंह और बाद में दलबदल से जेडीएस के एच.डी. कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने। कुमारस्वामी द्वारा भाजपा को सत्ता न सौंपने के कारण उपजी सहानुभूति लहर के चलते 2008 के बारहवें चुनाव में मध्य और उत्तरी कर्नाटक के लिंगायतों के एकतरफा ध्रुवीकरण से भाजपा ने 110 सीटें (33.86% मत) जीतीं और बी.एस. येदियुरप्पा के नेतृत्व में दक्षिण भारत में पहली बार भाजपा की सरकार बनी।

वर्ष 2013 के तेरहवें चुनाव में येदियुरप्पा के भाजपा से अलग होने के कारण वोटों का बिखराव हुआ, जिसका फायदा उठाकर कांग्रेस ने सिद्धारमैया के पुराने 'अहिंदा' समीकरण के बल पर 122 सीटें (36.6% मत) जीतीं और सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने। 2018 के चौदहवें चुनाव में लिंगायत आधार की घर वापसी से भाजपा पुनः 104 सीटें (36.2% मत) पाकर सबसे बड़ी पार्टी बनी। गठबंधन और रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के लंबे दौर में पहले कुमारस्वामी और फिर येदियुरप्पा व बसराज बोम्मई मुख्यमंत्री बने। मई 2023 के पंद्रहवें विधानसभा चुनाव (224 सीटें) में कांग्रेस ने सत्ता विरोधी लहर और पांच बड़ी जनकल्याणकारी गारंटियों के सामाजिक प्रभाव के बूते 135 सीटें (42.88% मत) जीतकर ऐतिहासिक और स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया, जबकि भाजपा 66 सीटों (36% मत) और जेडीएस केवल 19 सीटों (13.3% मत) पर सिमट गई। कांग्रेस को यह जीत एंटी-इंकंबेंसी, जगदीश शेट्टार जैसे नेताओं के आने से लिंगायत मतों में सेंधमारी, डी.के. शिवकुमार के कारण वोक्कालिगा और सिद्धारमैया के कारण अहिंदा मतों के एकजुट होने से मिली और सिद्धारमैया मुख्यमंत्री बने।

मई 2023 के इस चुनाव के बाद से लेकर अब तक कर्नाटक की राजनीति में बेहद महत्वपूर्ण और अभूतपूर्व राजनैतिक घटनाक्रम घटित हुए हैं। सत्ता के शीर्ष पर ढाई-ढाई साल के आंतरिक समझौते के तहत निर्धारित समय सीमा पूरी होने पर सिद्धारमैया ने गरिमापूर्ण तरीके से अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद डी.के. शिवकुमार ने कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इस कैबिनेट में दलित नेता जी. परमेश्वर को उपमुख्यमंत्री की कमान सौंपना, कांग्रेस द्वारा अपने 'अहिंदा' आधार को सुरक्षित रखते हुए वोक्कालिगा समुदाय पर अपनी पकड़ मजबूत करने की एक सोची-समझी बिसात है। इसके प्रत्युत्तर में, विपक्षी खेमे में हुए भारी उलटफेर ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह से द्विध्रुवीय बना दिया है। कांग्रेस के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए धुर विरोधी रही भाजपा और जेडीएस ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के तहत एक मंच पर आकर आधिकारिक गठबंधन कर लिया है। भाजपा ने विधानसभा में आर. अशोक को विपक्ष का नेता नियुक्त किया है और येदियुरप्पा के बेटे बी.वाई. विजयेंद्र को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर अपने पारंपरिक लिंगायत वोट बैंक को साधे रखने की कोशिश की है।

इन सभी घटनाक्रमों का आगामी विधानसभा चुनाव पर बहुत गहरा और निर्णायक असर देखने को मिलेगा। सबसे बड़ा प्रभाव मतों के ध्रुवीकरण के रूप में सामने आएगा। गणितीय दृष्टि से, यदि भाजपा और जेडीएस का यह जमीनी गठबंधन बिना किसी आंतरिक कलह के सीटों का सही तालमेल करने में सफल रहता है, तो उनका संयुक्त vote share (जो 2023 में सामूहिक रूप से 49% के करीब था) आगामी चुनाव में कांग्रेस के 43% के मुकाबले गणितीय रूप से भारी पड़ सकता है। यह गठबंधन पुराना मैसूर क्षेत्र में जेडीएस के वोक्कालिगा आधार और उत्तरी कर्नाटक में भाजपा के लिंगायत आधार को एक मंच पर लाकर कांग्रेस के सामाजिक समीकरण को कड़ी चुनौती देगा। वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस में हुआ यह नेतृत्व परिवर्तन भी एक परीक्षा साबित होगा; यदि सिद्धारमैया के हटने से उनका कुरुबा और 'अहिंदा' मतदाता खुद को उपेक्षित महसूस करता है, तो कांग्रेस को तगड़ा नुकसान हो सकता है, जिसकी भरपाई डी.के. शिवकुमार को अपने व्यक्तिगत वोक्कालिगा प्रभाव से करनी होगी।

इस निरंतर बदलते परिदृश्य के आलोक में, आगामी विधानसभा चुनाव नीति, नियति और अंकगणित का एक अद्भुत समागम होने जा रहा है, जिसमें मुकाबला बेहद कड़ा और 'नेक-टू-नेक' रहने की संभावना है। एक तरफ जहां सत्तारूढ़ दल कांग्रेस के सामने राज्य के उस साढ़े तीन दशक पुराने मिथक को तोड़ने की चुनौती होगी जिसके तहत कोई भी दल लगातार दूसरी बार सत्ता में वापस नहीं आता, वहीं दूसरी तरफ लोक-लुभावन कल्याणकारी योजनाओं के भारी-भरकम वित्तीय बोझ और राजकोषीय घाटे के बीच संतुलन साधने की प्रशासनिक परीक्षा होगी। यदि डी.के. शिवकुमार अपनी 5 गारंटियों को सुचारू रूप से जारी रखते हैं और संगठन को एकजुट रखते हैं, तो कांग्रेस इतिहास रच सकती है। दूसरी ओर, विपक्ष के लिए यह चुनाव अपनी संयुक्त सामाजिक ताकत और लिंगायत-वोक्कालिगा के महा-गठबंधन को जमीन पर वोटों में बदलने और सत्ता विरोधी लहर को भुनाने का सबसे सटीक अवसर होगा। राजनीति के चिंतकों, विचारकों और विश्लेषकों के लिए कर्नाटक की यह गाथा स्पष्ट करती है कि यहाँ की सत्ता केवल नारों से नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के सूक्ष्म ताने-बाने, मजबूत क्षेत्रीय अस्मिताओं और कुशल सांगठनिक प्रबंधन के त्रिकोण से ही हासिल की जा सकती है।

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