महाराष्ट्र - सत्ता के शिखर, बगावतें और बदलते राजनीतिक समीकरणों की 66 वर्ष की गाथा - दिवाकर शर्मा
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टिप्पणियाँ
स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में महाराष्ट्र की यात्रा केवल एक राज्य के निर्माण की कहानी नहीं है, बल्कि यह भाषाई अस्मिता, लोकतांत्रिक संघर्ष, सहकारी आंदोलन, ग्रामीण नेतृत्व, सामाजिक परिवर्तन और राष्ट्र निर्माण की एक दीर्घ प्रक्रिया का परिणाम है। 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता के समय वर्तमान महाराष्ट्र एक पृथक राज्य नहीं था, बल्कि तत्कालीन बंबई प्रांत और विभिन्न रियासतों के रूप में अस्तित्व में था। उस समय पश्चिमी भारत का विशाल भूभाग प्रशासनिक दृष्टि से बंबई राज्य के अंतर्गत आता था, जिसमें वर्तमान महाराष्ट्र और गुजरात के अतिरिक्त कुछ अन्य क्षेत्र भी सम्मिलित थे। स्वतंत्रता के बाद भारत में राज्यों के पुनर्गठन का प्रश्न धीरे-धीरे प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बन गया। भाषा के आधार पर राज्यों की मांग विभिन्न क्षेत्रों में उठने लगी। मराठी भाषी जनता की यह इच्छा थी कि सभी मराठी भाषी क्षेत्रों को एकीकृत करके एक अलग राज्य का निर्माण किया जाए। इसी उद्देश्य से संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन प्रारम्भ हुआ। इस आंदोलन में समाजवादी नेताओं, कांग्रेस नेताओं, साहित्यकारों, पत्रकारों और सांस्कृतिक संगठनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आचार्य प्रल्हाद केशव अत्रे, एस. एम. जोशी, प्रबोधनकार ठाकरे, सेनापति बापट और अनेक जननेताओं ने इस आंदोलन को जनांदोलन का स्वरूप दिया।
मुंबई को लेकर सबसे अधिक विवाद उत्पन्न हुआ। गुजराती नेतृत्व मुंबई को पृथक रखने अथवा गुजरात के साथ जोड़ने का पक्षधर था, जबकि मराठी समाज मुंबई को महाराष्ट्र का अभिन्न अंग मानता था। इस संघर्ष के दौरान अनेक प्रदर्शन हुए और पुलिस गोलीकांड में लगभग 105 आंदोलनकारियों की मृत्यु हुई। इन बलिदानों की स्मृति में आज भी "हुतात्मा चौक" महाराष्ट्र की राजनीतिक चेतना का प्रतीक माना जाता है।अंततः राज्य पुनर्गठन आयोग की अनुशंसाओं और व्यापक राजनीतिक दबाव के परिणामस्वरूप 1 मई 1960 को बंबई राज्य का विभाजन हुआ और महाराष्ट्र तथा गुजरात दो पृथक राज्यों के रूप में अस्तित्व में आए। मुंबई को महाराष्ट्र की राजधानी बनाया गया जबकि नागपुर को शीतकालीन राजधानी का विशेष दर्जा दिया गया। नागपुर में आज भी विधानसभा का शीतकालीन सत्र आयोजित किया जाता है, जो विदर्भ क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व का प्रतीक है।
नवगठित महाराष्ट्र राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री यशवंतराव बळवंतराव चव्हाण बने। उन्हें आधुनिक महाराष्ट्र का शिल्पकार कहा जाता है। उन्होंने प्रशासनिक ढांचे के निर्माण, औद्योगिक विकास, कृषि विस्तार और सहकारी आंदोलन को संस्थागत स्वरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके नेतृत्व में महाराष्ट्र ने एक संतुलित विकास मॉडल अपनाने का प्रयास किया, जिसमें ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के विकास पर बल दिया गया। राज्य गठन के समय महाराष्ट्र की राजनीति पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लगभग पूर्ण प्रभुत्व था। स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, संगठनात्मक शक्ति और राष्ट्रीय नेतृत्व की लोकप्रियता के कारण कांग्रेस के सामने कोई प्रभावी विपक्ष नहीं था। 1960 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में कांग्रेस ही राज्य की सबसे बड़ी और सर्वाधिक प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति थी। विपक्ष में प्रजा समाजवादी पार्टी, कम्युनिस्ट दल, भारतीय जनसंघ, किसान मजदूर पार्टी तथा कुछ स्वतंत्र उम्मीदवार सक्रिय थे, किंतु उनकी राजनीतिक शक्ति सीमित थी।
महाराष्ट्र की प्रारम्भिक राजनीति में सहकारी आंदोलन की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशेष रूप से पश्चिमी महाराष्ट्र में चीनी सहकारी कारखानों, दुग्ध संघों, सहकारी बैंकों और कृषि समितियों का विस्तार हुआ। इन संस्थाओं ने ग्रामीण समाज को आर्थिक शक्ति प्रदान की और यही संस्थाएँ बाद में राजनीतिक नेतृत्व का आधार बनीं। पश्चिमी महाराष्ट्र के पुणे, सतारा, सांगली, कोल्हापुर और अहमदनगर जैसे जिलों में सहकारी संस्थाओं के माध्यम से मराठा नेतृत्व अत्यंत प्रभावशाली बन गया। महाराष्ट्र की सामाजिक संरचना ने भी राजनीति को गहराई से प्रभावित किया। मराठा-कुनबी समुदाय राज्य का सबसे प्रभावशाली समुदाय बनकर उभरा। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार इस समुदाय की जनसंख्या लगभग 30 से 32 प्रतिशत के बीच मानी जाती है। स्वतंत्रता के बाद से लंबे समय तक यही समुदाय ग्रामीण अर्थव्यवस्था, सहकारी संस्थाओं और कांग्रेस संगठन की रीढ़ बना रहा। यशवंतराव चव्हाण, वसंतदादा पाटिल, वसंतराव नाइक और बाद के वर्षों में शरद पवार जैसे नेता इसी सामाजिक आधार से उभरे। राज्य की प्रशासनिक संरचना संसदीय लोकतंत्र पर आधारित बनाई गई। महाराष्ट्र में द्विसदनीय विधानमंडल की व्यवस्था अपनाई गई। विधानसभा को निचला सदन तथा विधान परिषद को उच्च सदन का दर्जा दिया गया। समय के साथ विधानसभा की कुल सीटें 288 और विधान परिषद की कुल सदस्य संख्या 78 निर्धारित हुई। अनुसूचित जातियों के लिए 25 तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए 29 सीटें आरक्षित की गईं। यह व्यवस्था सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम थी।
महाराष्ट्र भारत के क्षेत्रफल की दृष्टि से तीसरा सबसे बड़ा राज्य है। इसकी जनसंख्या वर्तमान समय में लगभग 12 करोड़ के आसपास मानी जाती है। मुंबई महानगर देश की आर्थिक राजधानी के रूप में विकसित हुआ, जबकि पुणे शिक्षा और उद्योग का केंद्र बना। नागपुर, नासिक, औरंगाबाद, कोल्हापुर, सोलापुर और अमरावती जैसे नगर क्षेत्रीय विकास के महत्वपूर्ण केंद्र बने। महाराष्ट्र से लोकसभा के लिए 48 सदस्य तथा राज्यसभा के लिए 19 सदस्य चुने जाते हैं। इस प्रकार राष्ट्रीय राजनीति में भी महाराष्ट्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। स्वतंत्र भारत के अनेक प्रमुख नेता यशवंतराव चव्हाण, शंकरराव चव्हाण, सुशील कुमार शिंदे, विलासराव देशमुख, शरद पवार, नितिन गडकरी और देवेंद्र फडणवीस राष्ट्रीय राजनीति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।
ग्रामीण स्वशासन महाराष्ट्र की विशेष पहचान रहा है। राज्य में जिला परिषद, पंचायत समिति और ग्राम पंचायत की त्रिस्तरीय व्यवस्था को मजबूत आधार प्रदान किया गया। बाद में नगर निगमों और नगर परिषदों के माध्यम से शहरी प्रशासन को भी सुदृढ़ किया गया। महिलाओं, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू होने के बाद स्थानीय राजनीति में नए सामाजिक वर्गों का प्रवेश हुआ। 1960 से लेकर 1970 के दशक के प्रारंभ तक महाराष्ट्र की राजनीति अपेक्षाकृत स्थिर रही। कांग्रेस का प्रभुत्व इतना मजबूत था कि विपक्ष सत्ता परिवर्तन की कल्पना भी नहीं कर सकता था। इस काल में वास्तविक प्रतिस्पर्धा कांग्रेस के भीतर ही दिखाई देती थी। क्षेत्रीय संतुलन, जातीय प्रतिनिधित्व और सहकारी संस्थाओं के नियंत्रण को लेकर कांग्रेस के विभिन्न नेताओं के बीच प्रतिस्पर्धा होती थी, किंतु पार्टी का जनाधार मजबूत बना रहा। 1962 में महाराष्ट्र में प्रथम विधानसभा चुनाव आयोजित हुए। उस समय विधानसभा की कुल 264 सीटें थीं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 215 सीटें जीतकर भारी बहुमत प्राप्त किया। विपक्षी दलों की स्थिति अत्यंत कमजोर रही। यह परिणाम इस बात का प्रमाण था कि स्वतंत्रता के बाद महाराष्ट्र की जनता कांग्रेस को स्थिरता और विकास का प्रतीक मानती थी। 1962 के बाद महाराष्ट्र में औद्योगिक विकास और कृषि विस्तार की नीति को गति मिली। मुंबई में वस्त्र उद्योग, पुणे में इंजीनियरिंग उद्योग तथा पश्चिमी महाराष्ट्र में चीनी उद्योग तेजी से विकसित हुए। इसी काल में राज्य ने भारत के सर्वाधिक औद्योगिक और आर्थिक रूप से सक्षम राज्यों में स्थान प्राप्त करना प्रारम्भ किया।
महाराष्ट्र के प्रारंभिक राजनीतिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह रही कि यहाँ लोकतंत्र के साथ-साथ संस्थागत विकास पर भी विशेष ध्यान दिया गया। सहकारी आंदोलन, पंचायत व्यवस्था, शिक्षा संस्थान, कृषि मंडियाँ और स्थानीय निकायों ने राज्य की राजनीतिक संस्कृति को स्थायित्व प्रदान किया। यही कारण है कि आगे चलकर महाराष्ट्र भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली प्रयोगशालाओं में से एक बन गया। 1960 से 1978 तक का काल आगे चलकर "कांग्रेस का स्वर्ण युग" कहलाया। इसी काल में आधुनिक महाराष्ट्र की प्रशासनिक, आर्थिक और राजनीतिक नींव रखी गई। आने वाले वर्षों में यही नींव राज्य की राजनीति में होने वाले बड़े परिवर्तनों जैसे शरद पवार के उदय, शिवसेना के विस्तार, भाजपा के विकास और गठबंधन युग का आधार बनने वाली थी। यही वह चरण था जिसने महाराष्ट्र को केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रयोगशालाओं में परिवर्तित करने की दिशा में अग्रसर किया।
1960 के दशक में अपनी मजबूत नींव स्थापित करने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति धीरे-धीरे ऐसे दौर में प्रवेश करने लगी जिसमें कांग्रेस का प्रभुत्व तो बना रहा, लेकिन उसके भीतर और बाहर नई राजनीतिक शक्तियों का उदय भी प्रारम्भ हो गया। 1962 के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की भारी विजय के बाद 1967 के चुनावों में भी कांग्रेस ने अपना दबदबा बनाए रखा। उस समय राज्य में कुल 270 सीटों पर चुनाव हुए और कांग्रेस ने दो-तिहाई से अधिक सीटें प्राप्त कर सत्ता बरकरार रखी। विपक्ष में प्रजा समाजवादी पार्टी, कम्युनिस्ट दल, किसान मजदूर पार्टी और भारतीय जनसंघ जैसे दल उपस्थित थे, परंतु उनकी शक्ति सीमित थी। 1967 के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में वसंतराव नाइक का प्रभाव अत्यधिक बढ़ा। वे 1963 से 1975 तक लगातार मुख्यमंत्री रहे और महाराष्ट्र के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड स्थापित किया। उनके कार्यकाल में हरित क्रांति, सिंचाई विस्तार, ग्रामीण विकास और कृषि उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों के विकास के लिए भी अनेक योजनाएँ प्रारम्भ की गईं। हालांकि इसी काल में क्षेत्रीय असंतुलन की चर्चा भी शुरू हुई और विदर्भ के लोगों के बीच यह भावना विकसित होने लगी कि पश्चिमी महाराष्ट्र की तुलना में उनके क्षेत्र को कम महत्व दिया जा रहा है।
1971 के लोकसभा चुनावों में इंदिरा गांधी के "गरीबी हटाओ" अभियान का प्रभाव महाराष्ट्र में भी दिखाई दिया। कांग्रेस की स्थिति और मजबूत हुई। इसके बाद 1972 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने पुनः भारी बहुमत प्राप्त किया। लगभग 270 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस ने 222 सीटें जीतकर अपना वर्चस्व कायम रखा। इस समय विपक्ष बिखरा हुआ था और राज्य की राजनीति पर कांग्रेस का लगभग एकाधिकार था। इसी दौरान महाराष्ट्र में सहकारी चीनी कारखानों का जाल तेजी से फैलने लगा। पश्चिमी महाराष्ट्र के मराठा नेताओं ने इन सहकारी संस्थाओं को केवल आर्थिक विकास का माध्यम ही नहीं बनाया, बल्कि इन्हें राजनीतिक शक्ति के केंद्र में भी परिवर्तित कर दिया। जिला सहकारी बैंक, कृषि मंडियाँ, शैक्षणिक संस्थान और चीनी मिलें धीरे-धीरे राजनीतिक नेतृत्व के निर्माण के प्रमुख साधन बन गए। यही कारण था कि पश्चिमी महाराष्ट्र के नेताओं का प्रभाव पूरे राज्य की राजनीति पर बढ़ने लगा।
1975 में देश में आपातकाल लागू हुआ। महाराष्ट्र में भी आपातकाल का प्रभाव पड़ा, यद्यपि उत्तर भारत की तुलना में यहाँ विरोध अपेक्षाकृत कम दिखाई दिया। फिर भी समाजवादी विचारधारा से जुड़े नेताओं और विपक्षी दलों ने कांग्रेस की नीतियों का विरोध किया। आपातकाल के बाद पूरे देश में कांग्रेस विरोधी लहर उत्पन्न हुई और महाराष्ट्र भी इससे अछूता नहीं रहा। 1977 के लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी ने कई क्षेत्रों में कांग्रेस को चुनौती दी। यद्यपि महाराष्ट्र में कांग्रेस का आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, लेकिन पहली बार उसके प्रभुत्व में कमी दिखाई देने लगी। यह वह समय था जब कांग्रेस के भीतर भी गुटबाजी तेज हो रही थी। 1978 महाराष्ट्र की राजनीति के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। इसी वर्ष युवा नेता शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर कांग्रेस (एस) का गठन किया और जनता पार्टी तथा अन्य दलों के सहयोग से प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) सरकार बनाई। मात्र 38 वर्ष की आयु में शरद पवार महाराष्ट्र के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। यह घटना इसलिए भी ऐतिहासिक थी क्योंकि पहली बार महाराष्ट्र में गठबंधन राजनीति का वास्तविक प्रारम्भ हुआ और कांग्रेस के एकाधिकार को गंभीर चुनौती मिली। हालाँकि यह सरकार लंबे समय तक नहीं चल सकी, लेकिन शरद पवार का उदय महाराष्ट्र की राजनीति की स्थायी वास्तविकता बन गया। आने वाले लगभग पाँच दशकों तक वे राज्य की राजनीति के सबसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों में गिने जाने लगे। पश्चिमी महाराष्ट्र के सहकारी नेटवर्क, मराठा नेतृत्व और संगठनात्मक क्षमता ने उन्हें अत्यंत शक्तिशाली बना दिया।
1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के साथ महाराष्ट्र में भी कांग्रेस ने पुनः अपनी स्थिति मजबूत कर ली। अब्दुल रहमान अंतुले मुख्यमंत्री बने और वे महाराष्ट्र के पहले मुस्लिम मुख्यमंत्री थे। उनके कार्यकाल में "सीमेंट घोटाले" के आरोप लगे, जिसके कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद बाबासाहेब भोसले और वसंतदादा पाटिल मुख्यमंत्री बने। 1980 के दशक में महाराष्ट्र की राजनीति में दो नई शक्तियाँ तेजी से उभर रही थीं। पहली शक्ति थी शरद पवार का बढ़ता प्रभाव और दूसरी शक्ति थी शिवसेना का विस्तार।बालासाहेब ठाकरे द्वारा 1966 में स्थापित शिवसेना प्रारम्भ में केवल मुंबई और ठाणे क्षेत्र तक सीमित थी। उसका मुख्य मुद्दा "मराठी मानुष" और स्थानीय लोगों को रोजगार में प्राथमिकता दिलाना था। पार्टी ने दक्षिण भारतीयों और बाद में उत्तर भारतीयों के बढ़ते प्रभाव का विरोध करते हुए अपनी राजनीतिक पहचान बनाई। मुंबई के मिल मजदूरों, निम्न मध्यम वर्ग और मराठी युवाओं के बीच शिवसेना का प्रभाव तेजी से बढ़ा। 1980 के दशक के मध्य तक शिवसेना मुंबई महानगरपालिका की राजनीति में प्रमुख शक्ति बन चुकी थी। इसी दौरान बालासाहेब ठाकरे ने हिंदुत्व को भी अपने राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाया।
भारतीय जनता पार्टी, जो जनसंघ की उत्तराधिकारी पार्टी थी, महाराष्ट्र में प्रारम्भिक वर्षों में अपेक्षाकृत कमजोर थी। उसका आधार मुख्यतः शहरी ब्राह्मण, व्यापारी वर्ग, गुजराती समुदाय और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कार्यकर्ता थे। लेकिन धीरे-धीरे भाजपा और शिवसेना के बीच निकटता बढ़ने लगी। 1985 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने पुनः जीत हासिल की, लेकिन शरद पवार के नेतृत्व वाले समूह तथा विपक्ष की शक्ति पहले की तुलना में अधिक दिखाई देने लगी। इसी काल में शरद पवार पुनः कांग्रेस में लौट आए और धीरे-धीरे राज्य की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में महाराष्ट्र में औद्योगीकरण तेजी से बढ़ा। मुंबई, पुणे और नासिक में नए उद्योग स्थापित हुए। पुणे शिक्षा और इंजीनियरिंग उद्योग का केंद्र बन गया। लेकिन दूसरी ओर विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में अपेक्षाकृत पिछड़ापन बना रहा। इससे क्षेत्रीय असंतोष बढ़ने लगा।
1990 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस सत्ता में तो रही, लेकिन शिवसेना और भाजपा गठबंधन ने पहली बार मजबूत चुनौती प्रस्तुत की। शिवसेना ने मुंबई, ठाणे और कोंकण क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी, जबकि भाजपा विदर्भ और शहरी क्षेत्रों में धीरे-धीरे अपना आधार बढ़ा रही थी। कांग्रेस का पारंपरिक मराठा समर्थन अभी भी उसके साथ था, लेकिन शहरी मतदाताओं में उसका प्रभाव कम होने लगा था। 1990 के दशक की शुरुआत में मंडल आयोग की राजनीति, हिंदुत्व आंदोलन और राम जन्मभूमि आंदोलन का प्रभाव महाराष्ट्र में भी दिखाई दिया। भाजपा और शिवसेना का गठबंधन हिंदुत्व के मुद्दे पर एकजुट हुआ। 1992 में बाबरी ढाँचा विध्वंस के बाद मुंबई में सांप्रदायिक दंगे हुए और 1993 में श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोटों ने राज्य को झकझोर दिया। इन घटनाओं ने महाराष्ट्र की राजनीति में सुरक्षा, राष्ट्रवाद और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को प्रमुख मुद्दा बना दिया। 1993 के बाद कांग्रेस के सामने भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता और नेतृत्व संकट जैसी चुनौतियाँ बढ़ने लगीं। दूसरी ओर शिवसेना-भाजपा गठबंधन एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में उभर चुका था। बालासाहेब ठाकरे का करिश्माई नेतृत्व और भाजपा का संगठनात्मक विस्तार दोनों मिलकर कांग्रेस के लिए गंभीर चुनौती बन रहे थे। 1995 का विधानसभा चुनाव महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा परिवर्तन सिद्ध हुआ। शिवसेना और भाजपा गठबंधन ने कांग्रेस के लगभग तीन दशक पुराने प्रभुत्व को समाप्त कर दिया। शिवसेना ने 73 और भाजपा ने 65 सीटें जीतकर संयुक्त रूप से बहुमत प्राप्त किया। कांग्रेस पहली बार सत्ता से बाहर हो गई। मनोहर जोशी महाराष्ट्र के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने और बाद में नारायण राणे मुख्यमंत्री बने। यही वह काल था जब बंबई का आधिकारिक नाम बदलकर मुंबई किया गया। शिवसेना ने "मराठी अस्मिता" और हिंदुत्व दोनों को अपनी राजनीति का आधार बनाया। भाजपा और शिवसेना का यह गठबंधन महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे स्थायी गठबंधन सिद्ध हुआ, जो आगे चलकर लगभग पच्चीस वर्षों तक विभिन्न रूपों में बना रहा। 1995 के चुनाव ने एक युग का अंत और दूसरे युग की शुरुआत की। कांग्रेस का स्वर्ण युग समाप्त हो चुका था और महाराष्ट्र अब स्थायी गठबंधन राजनीति के दौर में प्रवेश कर चुका था। शरद पवार, बालासाहेब ठाकरे और भाजपा के उभरते नेतृत्व के बीच आने वाले वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति नए समीकरणों, नए गठबंधनों और नए शक्ति संतुलनों की दिशा में बढ़ने वाली थी। यही परिवर्तन आगे चलकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठन, कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन और अंततः भाजपा के उदय की पृष्ठभूमि तैयार करने वाला था। 1995 में शिवसेना-भाजपा गठबंधन की ऐतिहासिक विजय ने महाराष्ट्र की राजनीति में कांग्रेस के लगभग तीन दशक लंबे प्रभुत्व का अंत कर दिया था। मनोहर जोशी के मुख्यमंत्री बनने के साथ राज्य में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। बालासाहेब ठाकरे भले ही किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे, लेकिन उन्हें सरकार का वास्तविक शक्ति केंद्र माना जाता था। मनोहर जोशी के बाद 1999 में नारायण राणे मुख्यमंत्री बने। इस काल में मुंबई का नाम आधिकारिक रूप से बंबई से बदलकर मुंबई किया गया। हिंदुत्व, मराठी अस्मिता और प्रशासनिक परिवर्तन इस सरकार की पहचान बने। हालाँकि 1995 से 1999 के बीच सत्ता में रहने के बावजूद शिवसेना-भाजपा गठबंधन कई चुनौतियों से जूझता रहा। आर्थिक सुधारों के प्रभाव, किसानों की समस्याओं, बिजली संकट, बेरोजगारी और आंतरिक मतभेदों ने सरकार की लोकप्रियता को प्रभावित किया। दूसरी ओर कांग्रेस, जो पराजय के बाद पुनर्गठन की प्रक्रिया में थी, फिर से सत्ता में लौटने की तैयारी कर रही थी।
इसी बीच 1999 में महाराष्ट्र की राजनीति में एक और ऐतिहासिक घटना घटी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर पार्टी नेतृत्व का विरोध किया और पी. ए. संगमा तथा तारिक अनवर के साथ मिलकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की स्थापना की। महाराष्ट्र में इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ा क्योंकि शरद पवार का सबसे मजबूत आधार यहीं था। पश्चिमी महाराष्ट्र के सहकारी क्षेत्र, मराठा नेतृत्व और ग्रामीण संगठन का बड़ा भाग उनके साथ चला गया। 1999 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और नवगठित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरीं। किसी भी दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। भाजपा-शिवसेना गठबंधन सबसे बड़ा विपक्षी समूह बनकर उभरा, लेकिन चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने राजनीतिक समझौता कर संयुक्त सरकार बनाने का निर्णय लिया। इस प्रकार महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन का युग प्रारम्भ हुआ, जो अगले पंद्रह वर्षों तक चलता रहा।
1999 में विलासराव देशमुख मुख्यमंत्री बने। वे मराठवाड़ा क्षेत्र से आने वाले प्रभावशाली मराठा नेता थे। उनके नेतृत्व में कांग्रेस और एनसीपी के बीच शक्ति संतुलन की राजनीति शुरू हुई। मुख्यमंत्री का पद कांग्रेस के पास रहा जबकि उपमुख्यमंत्री का पद प्रायः एनसीपी के पास रहा। शरद पवार स्वयं राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे, लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति पर उनका प्रभाव निरंतर बना रहा। 2004 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने पुनः सत्ता प्राप्त की। इस चुनाव में भाजपा और शिवसेना ने गठबंधन के रूप में चुनाव लड़ा, लेकिन सत्ता परिवर्तन नहीं कर सके। इस समय तक महाराष्ट्र की राजनीति में दो स्थायी गठबंधन स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे थे - एक ओर कांग्रेस-एनसीपी और दूसरी ओर शिवसेना-भाजपा। लगभग प्रत्येक चुनाव इन्हीं दो गठबंधनों के बीच लड़ा जाने लगा। 2004 के बाद महाराष्ट्र में शहरीकरण और औद्योगीकरण की गति तेज हुई। पुणे ऑटोमोबाइल उद्योग का केंद्र बन गया, नासिक और औरंगाबाद में औद्योगिक निवेश बढ़ा, जबकि मुंबई देश की आर्थिक राजधानी के रूप में और अधिक सशक्त हुई। लेकिन दूसरी ओर विदर्भ क्षेत्र में किसानों की आत्महत्याएँ एक गंभीर सामाजिक और राजनीतिक समस्या बनकर उभरीं। कपास उत्पादक किसानों की आर्थिक बदहाली ने राष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता उत्पन्न की।
2006 में महाराष्ट्र की राजनीति में एक और महत्वपूर्ण घटना हुई। बालासाहेब ठाकरे द्वारा अपने पुत्र उद्धव ठाकरे को उत्तराधिकारी के रूप में आगे बढ़ाने से असंतुष्ट राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ दी और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) की स्थापना की। राज ठाकरे ने भी मराठी अस्मिता और स्थानीय युवाओं के अधिकारों को अपना प्रमुख मुद्दा बनाया। हालांकि एमएनएस कभी शिवसेना जितनी बड़ी शक्ति नहीं बन सकी, लेकिन उसने मुंबई, ठाणे, नासिक और पुणे क्षेत्रों में शिवसेना के मतों में सेंध लगाई। 2008 में मुंबई पर हुए 26/11 आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस घटना में अनेक निर्दोष नागरिकों, पुलिस अधिकारियों और सुरक्षा कर्मियों ने अपने प्राण गंवाए। इस हमले के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार की आलोचना हुई और मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को पद छोड़ना पड़ा। उनके स्थान पर अशोक चव्हाण मुख्यमंत्री बने। अशोक चव्हाण के कार्यकाल में आदर्श हाउसिंग सोसाइटी घोटाला सामने आया। इस विवाद के कारण उन्हें इस्तीफा देना पड़ा और 2010 में पृथ्वीराज चव्हाण मुख्यमंत्री बने। पृथ्वीराज चव्हाण को अपेक्षाकृत स्वच्छ छवि वाला नेता माना जाता था। उन्होंने प्रशासनिक सुधारों और पारदर्शिता पर बल दिया, लेकिन गठबंधन राजनीति के कारण उनकी कार्यशैली कई बार सीमित दिखाई दी। इस पूरे काल में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर अजित पवार का प्रभाव तेजी से बढ़ता गया। वे राज्य के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाने लगे। पश्चिमी महाराष्ट्र के सहकारी नेटवर्क और संगठन पर उनकी मजबूत पकड़ थी। उपमुख्यमंत्री के रूप में वे प्रशासन और वित्तीय मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।
1999 से 2014 तक का समय महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन का युग माना जाता है। इस दौरान चार मुख्यमंत्री - विलासराव देशमुख, सुशील कुमार शिंदे, अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चव्हाण कांग्रेस से बने, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी सत्ता में बराबर की भागीदार बनी रही। शरद पवार राष्ट्रीय स्तर पर कृषि मंत्री के रूप में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे और महाराष्ट्र की राजनीति में उनका महत्व बना रहा। इस अवधि में जातीय समीकरण भी अपेक्षाकृत स्थिर रहे। मराठा-कुनबी समुदाय का बड़ा भाग कांग्रेस और एनसीपी के साथ था। मुस्लिम मतदाता भी मुख्यतः कांग्रेस के समर्थन में रहे। दलित मतदाता विभिन्न गुटों में विभाजित थे, लेकिन कांग्रेस को उनका पर्याप्त समर्थन प्राप्त था। शहरी उच्च वर्ग, व्यापारिक समुदाय और ब्राह्मण समाज का बड़ा हिस्सा भाजपा के साथ जुड़ता गया। शिवसेना का मुख्य आधार मुंबई, ठाणे, कोंकण और मराठी मध्यम वर्ग बना रहा। भौगोलिक दृष्टि से पश्चिमी महाराष्ट्र कांग्रेस और एनसीपी का सबसे मजबूत क्षेत्र था। मुंबई और कोंकण में शिवसेना का प्रभाव था। विदर्भ में भाजपा धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत कर रही थी। मराठवाड़ा क्षेत्र मिश्रित राजनीतिक क्षेत्र बना रहा, जहाँ कभी कांग्रेस-एनसीपी तो कभी शिवसेना-भाजपा को सफलता मिलती रही।
2009 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन ने लगातार तीसरी बार सत्ता प्राप्त की। यह महाराष्ट्र के इतिहास में गठबंधन राजनीति की सबसे बड़ी सफलता मानी गई। लेकिन इसी समय भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता, किसान संकट, बिजली की समस्या और नेतृत्व की कमी जैसे मुद्दे धीरे-धीरे जनता के बीच असंतोष पैदा कर रहे थे। 2011 के बाद देश में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, अन्ना हज़ारे का प्रभाव, केंद्र की यूपीए सरकार के विरुद्ध बढ़ता असंतोष और नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय स्तर पर उभरते नेतृत्व का असर महाराष्ट्र पर भी पड़ने लगा। भाजपा ने राज्य में स्वयं को केवल शिवसेना की सहयोगी पार्टी तक सीमित न रखकर स्वतंत्र शक्ति के रूप में विकसित करना शुरू कर दिया। विदर्भ में नितिन गडकरी और देवेंद्र फडणवीस जैसे नेताओं का प्रभाव बढ़ रहा था। 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को देशभर में अभूतपूर्व सफलता मिली और महाराष्ट्र भी इससे प्रभावित हुआ। यही वह समय था जब राज्य की राजनीति एक बार फिर बड़े परिवर्तन की ओर बढ़ रही थी। कांग्रेस-एनसीपी के पंद्रह वर्षों के शासन के बाद जनता परिवर्तन चाहती थी। भाजपा अब केवल सहयोगी दल नहीं, बल्कि सत्ता के केंद्र में आने की तैयारी कर चुकी थी। इस प्रकार 1999 से 2014 तक का काल महाराष्ट्र की राजनीति में कांग्रेस-एनसीपी युग के रूप में स्थापित हुआ। यह वह दौर था जिसमें गठबंधन राजनीति स्थिर हुई, शरद पवार का प्रभाव चरम पर पहुँचा, शिवसेना और भाजपा विपक्ष के रूप में संगठित रहीं और अंततः भाजपा के नेतृत्व वाले नए राजनीतिक युग की पृष्ठभूमि तैयार हुई। 2014 के बाद महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर ऐसे परिवर्तन की साक्षी बनने वाली थी, जिसने राज्य की पारंपरिक सत्ता संरचना को पूरी तरह बदल दिया।
2014 का वर्ष महाराष्ट्र की राजनीति में एक युगांतकारी परिवर्तन का प्रतीक सिद्ध हुआ। लगभग पंद्रह वर्षों तक सत्ता में रहने के बाद कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी गठबंधन के विरुद्ध जनमत तैयार हो चुका था। भ्रष्टाचार के आरोप, प्रशासनिक शिथिलता, किसान संकट, बढ़ती बेरोजगारी, आदर्श घोटाले जैसे विवाद और केंद्र की तत्कालीन यूपीए सरकार के प्रति जनता की नाराज़गी का प्रभाव महाराष्ट्र पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा था। दूसरी ओर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी थी और "मोदी लहर" का प्रभाव महाराष्ट्र तक पहुँच चुका था। 2014 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले महाराष्ट्र की राजनीति में एक अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न हुई। लगभग पच्चीस वर्षों से साथ चल रहे शिवसेना और भाजपा के बीच सीट बँटवारे को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया और दोनों दल अलग-अलग चुनाव मैदान में उतर गए। इसी प्रकार कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठबंधन भी टूट गया। परिणामस्वरूप राज्य के चार प्रमुख दल - भाजपा, शिवसेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़े। चुनाव परिणामों में भारतीय जनता पार्टी 122 सीटें जीतकर पहली बार महाराष्ट्र की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। शिवसेना को 63 सीटें प्राप्त हुईं, जबकि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को भारी नुकसान हुआ। पूर्ण बहुमत किसी दल को प्राप्त नहीं हुआ, लेकिन भाजपा ने सबसे बड़े दल के रूप में सरकार बनाई। नागपुर के युवा नेता देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। यह घटना कई दृष्टियों से ऐतिहासिक थी, क्योंकि लंबे समय बाद महाराष्ट्र को एक गैर-मराठा मुख्यमंत्री मिला। देवेंद्र फडणवीस ब्राह्मण समाज से आते हैं और उनका उदय इस बात का संकेत था कि महाराष्ट्र की राजनीति अब केवल पारंपरिक मराठा नेतृत्व तक सीमित नहीं रह गई है।
कुछ समय बाद शिवसेना पुनः सरकार में शामिल हो गई और भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने स्थिर सरकार प्रदान की। इस काल में भाजपा ने अपने संगठन का अभूतपूर्व विस्तार किया। विदर्भ में उसका प्रभाव पहले से ही मजबूत था, लेकिन अब उसने पश्चिमी महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र में भी अपनी स्थिति मजबूत करना प्रारम्भ किया। नितिन गडकरी, देवेंद्र फडणवीस, चंद्रकांत पाटिल, पंकजा मुंडे और अन्य नेताओं के माध्यम से भाजपा ने नए सामाजिक वर्गों में अपनी पैठ बढ़ाई। 2014 के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में जातीय समीकरणों में भी परिवर्तन प्रारम्भ हुआ। परंपरागत रूप से कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ रहने वाला मराठा समाज धीरे-धीरे विभाजित होने लगा। गैर-मराठा ओबीसी समुदायों जैसे माली, तेली, लोहार, धनगर, वंजारी और अन्य पिछड़ा वर्गों में भाजपा का प्रभाव बढ़ा। शहरी मध्यम वर्ग, व्यापारिक समुदाय और उच्च जातियों का समर्थन पहले से ही भाजपा के साथ था। इसी अवधि में मराठा आरक्षण आंदोलन महाराष्ट्र का प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बन गया। राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में विशाल रैलियाँ आयोजित की गईं। सरकार पर दबाव बढ़ा और मराठा समुदाय को आरक्षण देने के लिए कई प्रयास किए गए। इस आंदोलन ने राज्य की राजनीति में जातीय समीकरणों को नए रूप में परिभाषित किया।
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और शिवसेना ने पुनः गठबंधन किया और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन के रूप में चुनाव लड़ा। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के कारण महाराष्ट्र में एनडीए को बड़ी सफलता प्राप्त हुई। इसके बाद अक्टूबर 2019 में विधानसभा चुनाव हुए। भाजपा ने 105 और शिवसेना ने 56 सीटें प्राप्त कीं। दोनों दलों को मिलाकर स्पष्ट बहुमत था और ऐसा माना जा रहा था कि पुनः भाजपा-शिवसेना सरकार बनेगी। लेकिन यहीं से महाराष्ट्र की राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र के सबसे नाटकीय अध्यायों में प्रवेश किया। मुख्यमंत्री पद को लेकर भाजपा और शिवसेना के बीच विवाद उत्पन्न हुआ। उद्धव ठाकरे का दावा था कि मुख्यमंत्री पद को लेकर ढाई-ढाई वर्ष का समझौता हुआ था, जबकि भाजपा ने ऐसे किसी समझौते से इनकार किया। परिणामस्वरूप दशकों पुराना भाजपा-शिवसेना गठबंधन टूट गया। स्थिति इतनी जटिल हो गई कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। इसी बीच 23 नवंबर 2019 की सुबह एक अप्रत्याशित घटनाक्रम सामने आया। देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता अजित पवार ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। यह घटनाक्रम भारतीय राजनीति के सबसे आश्चर्यजनक राजनीतिक घटनाक्रमों में गिना गया। लेकिन शरद पवार के हस्तक्षेप और विधायकों के पुनः एकजुट होने के कारण यह सरकार केवल तीन दिन ही चल सकी। इसके बाद एक और अभूतपूर्व राजनीतिक समीकरण सामने आया। शिवसेना, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने मिलकर महाविकास अघाड़ी (एमवीए) का गठन किया। विचारधारात्मक दृष्टि से एक-दूसरे के विरोधी माने जाने वाले इन दलों का गठबंधन भारतीय राजनीति का एक अनोखा प्रयोग माना गया। 28 नवंबर 2019 को उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। उद्धव ठाकरे सरकार के गठन के कुछ ही महीनों बाद कोविड-19 महामारी ने पूरे देश को प्रभावित किया। मुंबई और पुणे जैसे महानगर महामारी के प्रमुख केंद्र बने। इस अवधि में सरकार को स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। महामारी प्रबंधन को लेकर सरकार की प्रशंसा और आलोचना दोनों हुईं।
2022 में महाराष्ट्र की राजनीति ने एक और बड़ा मोड़ लिया। शिवसेना के वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे ने बड़ी संख्या में विधायकों के साथ विद्रोह कर दिया। उनका आरोप था कि शिवसेना ने अपने मूल हिंदुत्ववादी मार्ग से विचलन कर लिया है। अंततः उद्धव ठाकरे सरकार अल्पमत में आ गई और उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद भाजपा के समर्थन से एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बने और देवेंद्र फडणवीस उपमुख्यमंत्री बनाए गए। शिवसेना के इस विभाजन ने महाराष्ट्र की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया। निर्वाचन आयोग ने बाद में एकनाथ शिंदे गुट को वास्तविक शिवसेना के रूप में मान्यता प्रदान की और पार्टी का चुनाव चिन्ह भी उन्हें दे दिया। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नाम से नई पहचान मिली। अभी यह राजनीतिक भूचाल शांत भी नहीं हुआ था कि 2023 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में भी विभाजन हो गया। अजित पवार अपने समर्थक विधायकों के साथ महायुति सरकार में शामिल हो गए और उपमुख्यमंत्री बने। शरद पवार ने इस कदम का विरोध किया और पार्टी के भीतर संघर्ष प्रारम्भ हो गया। बाद में निर्वाचन आयोग ने अजित पवार गुट को मूल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह प्रदान किया, जबकि शरद पवार के नेतृत्व वाले गुट को "राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार)" के रूप में मान्यता मिली। इस प्रकार महाराष्ट्र में दो प्रमुख क्षेत्रीय दल - शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, दो-दो गुटों में विभाजित हो गए। राज्य की राजनीति अब छह बड़े दलों के बीच प्रतिस्पर्धा का मैदान बन चुकी थी - भाजपा, शिवसेना (शिंदे), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार), कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार)।
2024 के लोकसभा चुनावों में इंडिया गठबंधन ने महाराष्ट्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और शरद पवार गुट ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि भाजपा और उसके सहयोगियों को अपेक्षाकृत नुकसान उठाना पड़ा। इससे यह धारणा बनी कि महाविकास अघाड़ी पुनः मजबूत हो रही है। किन्तु उसी वर्ष नवंबर 2024 में हुए विधानसभा चुनावों में परिणाम पूरी तरह विपरीत रहे। भाजपा, शिवसेना (शिंदे) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार) के महायुति गठबंधन ने भारी बहुमत प्राप्त किया। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और दिसंबर 2024 में देवेंद्र फडणवीस तीसरी बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। एकनाथ शिंदे और अजित पवार उपमुख्यमंत्री बनाए गए। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार महायुति की इस विजय के पीछे कई कारण थे। महिला मतदाताओं के लिए चलाई गई "लाड़की बहिन योजना" अत्यंत प्रभावी सिद्ध हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सक्रियता, नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, हिंदू एकता का संदेश और मजबूत संगठनात्मक संरचना ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
28 जनवरी 2026 को महाराष्ट्र की राजनीति को एक बड़ा झटका लगा जब उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख नेता अजित पवार का निधन हो गया। अजित पवार के निधन के बाद उनकी पार्टी में नेतृत्व का प्रश्न प्रमुख विषय बन गया। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने संगठन को एकजुट रखने का प्रयास किया। बारामती क्षेत्र में पवार परिवार का प्रभाव बना रहा, लेकिन शरद पवार के नेतृत्व वाले राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) गुट और भाजपा दोनों ने इस परिस्थिति को अपने-अपने राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा। विश्लेषकों का मत था कि यदि संगठनात्मक एकता बनाए नहीं रखी गई तो अजित पवार गुट के अनेक नेता भविष्य में भाजपा अथवा अन्य दलों में जा सकते हैं।अजित पवार के पश्चात उनके परिवार और निकट सहयोगियों ने संगठन को संभालने का प्रयास किया। पार्टी के भीतर सुनेत्रा पवार और अन्य वरिष्ठ नेताओं की भूमिका बढ़ी, जबकि भाजपा के साथ गठबंधन बनाए रखने की नीति जारी रही।
2026 तक आते-आते महाराष्ट्र की राजनीति पूर्णतः बहुध्रुवीय स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी। कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो चुका था, शिवसेना दो भागों में विभाजित थी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी दो गुटों में बँट चुकी थी, और भारतीय जनता पार्टी राज्य की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो चुकी थी। महाराष्ट्र की राजनीति अब स्थायी वैचारिक संघर्ष से अधिक गठबंधन, नेतृत्व, सामाजिक समीकरण और क्षेत्रीय हितों के जटिल संतुलन का उदाहरण बन चुकी थी। 2014 से 2026 तक का यह काल महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास का सबसे गतिशील और सबसे नाटकीय चरण माना जाता है। इस अवधि में गठबंधन बने, टूटे, दल विभाजित हुए, नई राजनीतिक पहचानें उभरीं और सत्ता के समीकरण बार-बार बदले। यही कारण है कि इस दौर को महाराष्ट्र की राजनीति का "पुनर्संरचना काल" कहा जाता है, जिसने राज्य की पारंपरिक राजनीति को पूरी तरह नई दिशा प्रदान की। 2026 तक महाराष्ट्र की राजनीति में तीन बड़े गठबंधन स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे थे। पहला गठबंधन महायुति था, जिसमें भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना (एकनाथ शिंदे) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार परंपरा) शामिल थे। भाजपा इस गठबंधन की सबसे बड़ी शक्ति बन चुकी थी और निर्णय प्रक्रिया में उसकी भूमिका प्रमुख थी। दूसरा गठबंधन महाविकास अघाड़ी था, जिसमें कांग्रेस, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) सम्मिलित थे। यह गठबंधन वैचारिक विविधता के बावजूद भाजपा के विरुद्ध मुख्य विपक्षी धुरी बना हुआ था। तीसरी श्रेणी में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, बहुजन समाज पार्टी, एआईएमआईएम, किसान मजदूर पार्टी, वंचित बहुजन आघाड़ी, रिपब्लिकन पार्टियों के विभिन्न गुट तथा छोटे क्षेत्रीय दल उपस्थित थे, जिनका प्रभाव सीमित क्षेत्रों तक केंद्रित था।
2026 तक राज्य के प्रमुख नेताओं में भाजपा की ओर से देवेंद्र फडणवीस, नितिन गडकरी, चंद्रशेखर बावनकुले, पंकजा मुंडे और सुधीर मुनगंटीवार प्रमुख थे। शिवसेना (शिंदे) में एकनाथ शिंदे सबसे महत्वपूर्ण नेता बने हुए थे। शिवसेना (यूबीटी) का नेतृत्व उद्धव ठाकरे तथा आदित्य ठाकरे के हाथों में था। कांग्रेस में पृथ्वीराज चव्हाण, बालासाहेब थोराट, विजय वडेट्टीवार, नाना पटोले और अशोक चव्हाण के बाद उभरे नए नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही थी। शरद पवार गुट में स्वयं शरद पवार, सुप्रिया सुले और जयंत पाटिल प्रमुख चेहरे थे।
महाराष्ट्र की राजनीति में जातीय समीकरण भी समय के साथ बदल चुके थे। राज्य की कुल आबादी में मराठा-कुनबी समुदाय लगभग 30 से 32 प्रतिशत माना जाता है और यही समुदाय आज भी सबसे प्रभावशाली राजनीतिक समूह है। स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक दशकों में यह वर्ग लगभग पूरी तरह कांग्रेस के साथ था। बाद में इसका एक बड़ा भाग राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ चला गया। 2014 के बाद इस समुदाय का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भाजपा और शिवसेना की ओर भी आकर्षित हुआ। परिणामस्वरूप मराठा मतदाता अब किसी एक दल के साथ स्थायी रूप से नहीं जुड़े हैं। अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), जिनकी संयुक्त संख्या लगभग 25 से 30 प्रतिशत मानी जाती है, 1990 के दशक तक विभिन्न दलों में विभाजित थे। 2014 के बाद इनमें भाजपा का प्रभाव अत्यधिक बढ़ा। वंजारी, तेली, माली, लोहार, धनगर तथा अन्य अनेक समुदायों में भाजपा का आधार मजबूत हुआ। अनुसूचित जातियों की संख्या लगभग 11 से 12 प्रतिशत तथा अनुसूचित जनजातियों की संख्या लगभग 9 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है। दलित मतदाताओं में परंपरागत रूप से कांग्रेस और रिपब्लिकन पार्टियों का प्रभाव था, लेकिन समय के साथ भाजपा ने भी इन वर्गों में अपनी उपस्थिति बढ़ाई। नवबौद्ध समुदाय अभी भी अनेक क्षेत्रों में कांग्रेस और आंबेडकरवादी दलों के साथ जुड़ा हुआ है। मुस्लिम मतदाता, जिनकी संख्या लगभग 11 प्रतिशत के आसपास है, सामान्यतः कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तथा कुछ क्षेत्रों में एआईएमआईएम की ओर झुकाव रखते हैं। मुंबई, मालेगाँव, औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर), भिवंडी और मराठवाड़ा के कुछ क्षेत्रों में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण रहती है। भौगोलिक दृष्टि से भी महाराष्ट्र के राजनीतिक रुझान अलग-अलग हैं। पश्चिमी महाराष्ट्र में सहकारी राजनीति और मराठा नेतृत्व का प्रभाव सबसे अधिक है। विदर्भ भाजपा का सबसे मजबूत क्षेत्र बन चुका है। कोंकण में शिवसेना की परंपरागत पकड़ रही है, जबकि मुंबई महानगर क्षेत्र में भाजपा और शिवसेना के बीच प्रतिस्पर्धा रहती है। मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र मिश्रित राजनीतिक क्षेत्र माने जाते हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष वंशवाद भी रहा है। पवार परिवार, ठाकरे परिवार, मुंडे परिवार, चव्हाण परिवार, राणे परिवार, विखे-पाटिल परिवार, मोहिते-पाटिल परिवार और अनेक अन्य राजनीतिक परिवारों ने दशकों तक अपने-अपने क्षेत्रों में प्रभाव बनाए रखा है। यही कारण है कि महाराष्ट्र को राजनीतिक परिवारों की प्रयोगशाला भी कहा जाता है।
राज्य की राजनीति में सहकारी चीनी मिलों, जिला सहकारी बैंकों, शैक्षणिक संस्थानों और स्थानीय निकायों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। विशेषकर पश्चिमी महाराष्ट्र में राजनीतिक शक्ति का निर्माण केवल चुनावी राजनीति से नहीं, बल्कि सहकारी संस्थाओं के माध्यम से भी होता रहा है। 2026 तक महाराष्ट्र की सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आर्थिक दृष्टि से देश के सबसे समृद्ध राज्यों में शामिल होने के बावजूद क्षेत्रीय असमानताएँ समाप्त नहीं हो सकी थीं। मुंबई, पुणे और नागपुर जैसे शहर तेजी से विकसित हुए, जबकि विदर्भ और मराठवाड़ा के कई जिले अपेक्षाकृत पिछड़े बने रहे। यही असंतुलन भविष्य की राजनीति को भी प्रभावित करने वाला प्रमुख कारक माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार आगामी वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति तीन प्रमुख विषयों के इर्द-गिर्द घूम सकती है - मराठा आरक्षण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और शहरी विकास। इसके अतिरिक्त भाजपा के बढ़ते प्रभाव के सामने विपक्ष की एकता, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विभाजित स्वरूप का भविष्य तथा नए नेतृत्व का उदय आने वाले समय की राजनीति को दिशा प्रदान करेगा। इस प्रकार 2026 तक महाराष्ट्र की राजनीति अनेक उतार-चढ़ाव, विभाजनों, गठबंधनों और नेतृत्व परिवर्तनों से गुजरते हुए एक ऐसे चरण में पहुँच चुकी थी जहाँ पारंपरिक कांग्रेस युग समाप्त हो चुका था और उसकी जगह बहुध्रुवीय तथा गठबंधन आधारित राजनीति ने ले ली थी। राज्य की राजनीतिक यात्रा अब केवल विचारधाराओं का संघर्ष नहीं रह गई थी, बल्कि सामाजिक समीकरणों, क्षेत्रीय आकांक्षाओं, नेतृत्व क्षमता और संगठनात्मक शक्ति का जटिल संतुलन बन चुकी थी। इसी पृष्ठभूमि में महाराष्ट्र की भावी राजनीति का निर्धारण होने वाला था, जहाँ इतिहास, समाज, जातीय संरचना, आर्थिक विकास और बदलती जन आकांक्षाएँ मिलकर नए राजनीतिक अध्यायों का निर्माण करेंगी। 2026 तक पहुँचते-पहुँचते महाराष्ट्र की राजनीति अपने गठनकाल से बिल्कुल भिन्न स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी। 1960 में जिस राज्य की राजनीति एकदलीय प्रभुत्व, सहकारी आंदोलन और मराठा नेतृत्व के इर्द-गिर्द घूमती थी, वही महाराष्ट्र अब बहुध्रुवीय गठबंधन राजनीति, क्षेत्रीय दलों के विभाजन, जातीय पुनर्संरचना और व्यक्तित्व आधारित नेतृत्व का केंद्र बन चुका था। पिछले लगभग छियासठ वर्षों की राजनीतिक यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया था कि महाराष्ट्र भारतीय लोकतंत्र की सबसे जटिल और सबसे गतिशील राजनीतिक प्रयोगशालाओं में से एक है।
1 मई 1960 को जब संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन की सफलता के बाद राज्य का गठन हुआ, तब महाराष्ट्र की राजनीति पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का पूर्ण वर्चस्व था। यशवंतराव चव्हाण, वसंतराव नाईक, वसंतदादा पाटिल और शंकरराव चव्हाण जैसे नेताओं ने केवल प्रशासनिक ढाँचे की स्थापना ही नहीं की, बल्कि सहकारी चीनी उद्योग, जिला सहकारी बैंक, ग्रामीण शिक्षा संस्थानों और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव रखी। इसी कारण 1960 से 1978 तक का काल कांग्रेस के स्वर्ण युग के रूप में जाना गया। लेकिन 1978 में शरद पवार के विद्रोह ने यह सिद्ध कर दिया कि महाराष्ट्र की राजनीति अब केवल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहने वाली है। इसके बाद गठबंधन राजनीति का जो दौर प्रारम्भ हुआ, उसने आगे चलकर राज्य की राजनीतिक संरचना को स्थायी रूप से बदल दिया। 1980 के दशक में शिवसेना का विस्तार, बालासाहेब ठाकरे का उदय और मुंबई महानगर की राजनीति में मराठी अस्मिता का प्रश्न अत्यंत प्रभावशाली विषय बन गया। 1995 में पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और शिवसेना-भाजपा गठबंधन ने गैर-कांग्रेसी सरकार बनाई। यह घटना केवल सत्ता परिवर्तन नहीं थी, बल्कि महाराष्ट्र की सामाजिक और राजनीतिक चेतना में आए परिवर्तन का प्रतीक थी। हिंदुत्व, क्षेत्रीय पहचान और वैकल्पिक नेतृत्व ने पहली बार कांग्रेस के प्रभुत्व को चुनौती दी। 1999 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के गठन ने मराठा राजनीति को दो भागों में विभाजित कर दिया। अगले पंद्रह वर्षों तक कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठबंधन सत्ता में रहा। इसी दौरान महाराष्ट्र में उद्योग, सूचना प्रौद्योगिकी, ऑटोमोबाइल क्षेत्र और शहरीकरण का तेजी से विस्तार हुआ। पुणे देश का प्रमुख ऑटोमोबाइल और शिक्षा केंद्र बना, जबकि मुंबई वित्तीय राजधानी के रूप में और अधिक मजबूत हुई। 2014 में भारतीय जनता पार्टी का उदय महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा संरचनात्मक परिवर्तन सिद्ध हुआ। पहली बार भाजपा राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई और देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने। इस घटना ने पारंपरिक मराठा प्रभुत्व को चुनौती दी और गैर-मराठा ओबीसी, उच्च जातियों तथा शहरी वर्गों को एक नए राजनीतिक मंच पर संगठित किया। 2019 के बाद महाराष्ट्र की राजनीति ने भारतीय लोकतंत्र के सबसे नाटकीय घटनाक्रम देखे। भाजपा और शिवसेना का पच्चीस वर्ष पुराना गठबंधन टूट गया। शिवसेना ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी सरकार बनाई। इसके बाद 2022 में शिवसेना विभाजित हुई और 2023 में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी भी दो भागों में बँट गई। इन घटनाओं ने सिद्ध कर दिया कि महाराष्ट्र में विचारधारा की तुलना में सत्ता समीकरण और नेतृत्व संघर्ष अधिक प्रभावशाली हो चुके हैं। 2024 के विधानसभा चुनावों में महायुति गठबंधन की प्रचंड विजय ने भारतीय जनता पार्टी को राज्य की केंद्रीय शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया। देवेंद्र फडणवीस पुनः मुख्यमंत्री बने और महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा का प्रभाव अपने ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुँच गया। 28 जनवरी 2026 को अजित पवार के निधन ने पश्चिमी महाराष्ट्र की राजनीति में एक शून्य उत्पन्न कर दिया। लगभग तीन दशकों तक प्रशासन, सहकारी संस्थाओं और वित्तीय प्रबंधन के क्षेत्र में प्रभावशाली भूमिका निभाने वाले अजित पवार का जाना केवल एक नेता की मृत्यु नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के एक महत्वपूर्ण अध्याय का समापन माना गया। उनके निधन के बाद पार्टी का नेतृत्व उनके परिवार तथा वरिष्ठ सहयोगियों के हाथों में जाने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। सुनेत्रा पवार और बारामती क्षेत्र के अन्य प्रभावशाली नेताओं की भूमिका बढ़ी, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि अजित पवार जैसी संगठनात्मक क्षमता और प्रशासनिक पकड़ विकसित करना किसी भी उत्तराधिकारी के लिए आसान नहीं होगा। दूसरी ओर शरद पवार के नेतृत्व वाला राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) गुट अभी भी पश्चिमी महाराष्ट्र में प्रभाव बनाए हुए था। सुप्रिया सुले राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का प्रमुख चेहरा बनकर उभरीं। यदि भविष्य में दोनों पवार गुटों के बीच पुनः किसी प्रकार की राजनीतिक समझ बनती है, तो महाराष्ट्र की राजनीति में एक नया समीकरण उत्पन्न हो सकता है; किंतु यदि विभाजन स्थायी रहता है, तो भाजपा को पश्चिमी महाराष्ट्र में और अधिक लाभ मिलने की संभावना मानी जाती है।
2026 तक महाराष्ट्र की सामाजिक संरचना में मराठा-कुनबी समुदाय लगभग 30 से 32 प्रतिशत के साथ सबसे बड़ा राजनीतिक समूह बना हुआ था। अन्य पिछड़ा वर्ग लगभग 27 से 30 प्रतिशत, अनुसूचित जातियाँ लगभग 11 से 12 प्रतिशत, अनुसूचित जनजातियाँ लगभग 9 प्रतिशत तथा मुस्लिम समुदाय लगभग 11 प्रतिशत माना जाता है। स्वतंत्रता के बाद प्रारम्भिक दशकों में मराठा समाज का लगभग पूर्ण समर्थन कांग्रेस को प्राप्त था, जबकि वर्तमान समय में यह मतदाता कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस, भाजपा और शिवसेना के बीच विभाजित हो चुका है। ब्राह्मण, बनिया, जैन, गुजराती और शहरी उच्च वर्ग प्रारम्भ से जनसंघ और बाद में भाजपा के साथ जुड़े रहे। गैर-मराठा ओबीसी वर्ग, जो पहले विभिन्न दलों में बँटा हुआ था, 2014 के बाद बड़ी संख्या में भाजपा की ओर आकर्षित हुआ। दलित मतदाता अभी भी पूर्णतः एकजुट नहीं हैं और कांग्रेस, भाजपा, रिपब्लिकन गुटों तथा आंबेडकरवादी दलों के बीच विभाजित हैं। मुस्लिम मतदाता मुख्यतः कांग्रेस और महाविकास अघाड़ी के साथ बने हुए हैं। भौगोलिक दृष्टि से विदर्भ भाजपा का सबसे मजबूत क्षेत्र बन चुका है। पश्चिमी महाराष्ट्र में अभी भी पवार परिवार और सहकारी राजनीति का प्रभाव बना हुआ है। कोंकण क्षेत्र में ठाकरे परिवार की ऐतिहासिक पकड़ रही है, जबकि मुंबई महानगर क्षेत्र बहुकोणीय प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र बन चुका है। मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र राजनीतिक रूप से अत्यंत परिवर्तनशील क्षेत्र माने जाते हैं। राज्य की प्रमुख समस्याओं में किसानों की आत्महत्या, सिंचाई असंतुलन, मराठवाड़ा का जल संकट, विदर्भ का विकास प्रश्न, शहरी बेरोजगारी, मुंबई का आवास संकट, आरक्षण विवाद, पर्यावरणीय चुनौतियाँ और बढ़ती क्षेत्रीय असमानताएँ शामिल हैं। आर्थिक दृष्टि से समृद्ध होने के बावजूद महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों के बीच विकास का अंतर भविष्य की राजनीति को प्रभावित करता रहेगा।
भविष्य की संभावनाओं का विश्लेषण करते समय अधिकांश राजनीतिक विशेषज्ञ यह मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी निकट भविष्य में भी महाराष्ट्र की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बनी रह सकती है, क्योंकि उसके पास मजबूत संगठन, राष्ट्रीय नेतृत्व, संसाधन और व्यापक सामाजिक आधार उपलब्ध है। हालाँकि यदि कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) अपनी एकता बनाए रखने में सफल रहते हैं, तो महाविकास अघाड़ी भविष्य में प्रभावी चुनौती प्रस्तुत कर सकती है। शिवसेना के दोनों गुटों का भविष्य उनके नेतृत्व की क्षमता पर निर्भर करेगा। एकनाथ शिंदे का गुट सत्ता के कारण मजबूत बना हुआ है, जबकि उद्धव ठाकरे का गुट भावनात्मक और पारंपरिक शिवसैनिक आधार पर अपनी पहचान बनाए रखने का प्रयास कर रहा है। इसी प्रकार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का भविष्य भी इस बात पर निर्भर करेगा कि पवार परिवार के विभिन्न गुट भविष्य में सहयोग का मार्ग अपनाते हैं या प्रतिस्पर्धा का।राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि आने वाले वर्षों में आदित्य ठाकरे, रोहित पवार, सुप्रिया सुले, पंकजा मुंडे, अमित देशमुख, जयंत पाटिल, धनंजय मुंडे, आदित्य शिरोले तथा अन्य युवा नेता महाराष्ट्र की राजनीति में नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। महाराष्ट्र में वंशवाद की परंपरा होने के बावजूद मतदाता अब केवल पारिवारिक विरासत के आधार पर निर्णय नहीं लेते, बल्कि नेतृत्व क्षमता, संगठनात्मक शक्ति और विकास के मुद्दों को भी महत्व देते हैं।
यदि 1960 से 2026 तक की सम्पूर्ण यात्रा का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि महाराष्ट्र की राजनीति ने कांग्रेस के एकदलीय प्रभुत्व से गठबंधन युग, क्षेत्रीय दलों के उदय, हिंदुत्व की राजनीति, सामाजिक पुनर्संरचना और बहुध्रुवीय प्रतिस्पर्धा तक का लंबा सफर तय किया है। यशवंतराव चव्हाण से लेकर देवेंद्र फडणवीस तक, बालासाहेब ठाकरे से लेकर उद्धव ठाकरे तक और शरद पवार से लेकर नई पीढ़ी के नेताओं तक महाराष्ट्र की राजनीति निरंतर परिवर्तनशील रही है। संभवतः यही महाराष्ट्र की सबसे बड़ी विशेषता है - यह राज्य किसी एक विचार, एक दल या एक नेता के स्थायी प्रभुत्व को स्वीकार नहीं करता। यहाँ राजनीति निरंतर बदलती है, नए समीकरण बनते हैं, पुराने गठबंधन टूटते हैं और समय-समय पर जनता सत्ता के स्वरूप को पुनर्परिभाषित करती रहती है। इसलिए महाराष्ट्र का राजनीतिक इतिहास केवल चुनावी आँकड़ों का इतिहास नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन, आर्थिक विकास, क्षेत्रीय आकांक्षाओं और लोकतांत्रिक चेतना की एक सतत चलने वाली यात्रा का इतिहास है।
महाराष्ट्र की राजनीतिक यात्रा का अध्ययन केवल सरकारों के गठन और पतन तक सीमित नहीं है। यदि राज्य के गहरे राजनीतिक चरित्र को समझना हो तो उसके सामाजिक ढाँचे, जातीय संरचना, सहकारी संस्थाओं, राजनीतिक परिवारों, क्षेत्रीय असंतुलन, आर्थिक विकास और चुनावी व्यवहार का विस्तृत अध्ययन आवश्यक हो जाता है। यही वे तत्व हैं जिन्होंने पिछले छह दशकों में महाराष्ट्र की राजनीति को आकार दिया है और भविष्य की दिशा भी निर्धारित करेंगे। 1960 से 2026 तक की यात्रा का निष्कर्ष यही है कि महाराष्ट्र की राजनीति निरंतर परिवर्तन का इतिहास है। यहाँ कोई भी राजनीतिक व्यवस्था स्थायी नहीं रही। कांग्रेस का प्रभुत्व समाप्त हुआ, क्षेत्रीय दल उभरे, गठबंधन बने और टूटे, परिवारों का प्रभाव बढ़ा, सामाजिक समीकरण बदले और नई पीढ़ी का नेतृत्व सामने आया। यही परिवर्तनशीलता महाराष्ट्र की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता है और यही इसे भारतीय लोकतंत्र का सबसे रोचक तथा अध्ययन योग्य अध्याय बनाती है।
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राजनीति
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