राज्यसभा कांड के बाद कांग्रेस में महाभूकंप!
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मध्यप्रदेश की राजनीति में इन दिनों जो कुछ घटित हो रहा है, उसने कांग्रेस के भीतर ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है जिसकी गूंज भोपाल से लेकर दिल्ली दरबार तक सुनाई दे रही है। राज्यसभा चुनाव की तीसरी सीट पर मतदान से पहले ही कांग्रेस का मैदान से बाहर हो जाना पार्टी के लिए केवल एक राजनीतिक हार नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा पर गहरा आघात माना जा रहा है।
सूत्रों की मानें तो कांग्रेस आलाकमान इस पूरे घटनाक्रम से बेहद नाराज है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का मानना है कि इतनी बड़ी संवैधानिक प्रक्रिया में इस प्रकार की चूक किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकती। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि जब भाजपा की रणनीतियों को लेकर लगातार आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं, तब कांग्रेस ने वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं की? आखिर किसी स्थानीय नेता से बैकअप के तौर पर डमी फॉर्म क्यों नहीं भरवाया गया?
दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि अब इस मामले की जवाबदेही तय किए बिना शीर्ष नेतृत्व शांत बैठने वाला नहीं है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार को जल्द ही दिल्ली बुलाकर पूरे मामले पर जवाब मांगा जा सकता है। सूत्रों का दावा है कि दोनों नेताओं से लिखित स्पष्टीकरण तक लिया जा सकता है।
दरअसल विधानसभा चुनाव 2023 से लेकर लोकसभा चुनाव 2024 और अब राज्यसभा चुनाव 2026 तक कांग्रेस लगातार राजनीतिक झटके झेलती रही है। संगठन के भीतर बढ़ती गुटबाजी, विधायकों की नाराजगी और समन्वय की कमी ने पार्टी नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। यही कारण है कि अब प्रदेश संगठन में बड़े बदलाव की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
भोपाल एयरपोर्ट पर कुछ विधायकों का खुलकर सामने आया असंतोष भी दिल्ली तक पहुंच चुका है। पार्टी के अंदर यह डर भी व्यक्त किया जा रहा है कि यदि समय रहते कठोर कदम नहीं उठाए गए तो शेष विधायकों में असंतोष और बढ़ सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस नेतृत्व अब केवल नुकसान की भरपाई नहीं, बल्कि संगठन को नए सिरे से खड़ा करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
इसी बीच प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए नए नामों की चर्चा भी शुरू हो चुकी है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, ऐसे चेहरे तलाशे जा रहे हैं जो अपेक्षाकृत कम विवादित हों और विभिन्न गुटों को साथ लेकर चल सकें। इन्हीं चर्चाओं के बीच पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के पुत्र और पूर्व मंत्री जयवर्धन सिंह का नाम भी तेजी से उभरकर सामने आ रहा है। हालांकि अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक संकेत सामने नहीं आया है, लेकिन कांग्रेस के भीतर चल रही फुसफुसाहटों ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है।
उधर कांग्रेस के अंदर एक अलग बहस भी जोर पकड़ती दिखाई दे रही है। सिरोंज-लटेरी क्षेत्र के किसान कांग्रेस नेता सुरेन्द्र रघुवंशी के एक बयान ने पूरे प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने खुलकर कहा है कि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सत्ता वापसी का यदि कोई एक चेहरा है तो वह पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह हैं।
रघुवंशी का दावा है कि दिग्विजय सिंह ही ऐसे नेता हैं जो संगठन को एकजुट कर सकते हैं और भाजपा की रणनीतियों का मुकाबला करने की क्षमता रखते हैं। उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं से अपील करते हुए कहा कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर यदि पार्टी को सत्ता में वापस लाना है तो दिग्विजय सिंह के नेतृत्व के साथ खड़ा होना होगा।
इतना ही नहीं, उन्होंने कांग्रेस के भीतर मौजूद कथित "स्लीपर सेल" पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वर्षों से पार्टी के भीतर ही कुछ लोग दिग्विजय सिंह की छवि को नुकसान पहुंचाने का काम करते रहे हैं। उनके अनुसार, भाजपा की सबसे बड़ी चिंता भी यही है कि यदि दिग्विजय सिंह की वास्तविक राजनीतिक छवि और कार्यों को जनता तक सही तरीके से पहुंचा दिया गया, तो सत्ता का समीकरण बदल सकता है।
राजनीतिक हलकों में इस बयान की चर्चा और भी इसलिए तेज हो गई क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने स्वयं इस समाचार को अपने सोशल मीडिया अकाउंट से साझा करते हुए सुरेन्द्र रघुवंशी का धन्यवाद किया। इसके बाद यह अटकलें और तेज हो गईं कि क्या कांग्रेस के भीतर फिर से दिग्विजय सिंह की भूमिका को केंद्र में लाने की कोशिश शुरू हो चुकी है?
फिलहाल कांग्रेस आधिकारिक तौर पर एकजुट दिखाई देने की कोशिश कर रही है, लेकिन अंदरखाने उबल रही नाराजगी, संभावित नेतृत्व परिवर्तन की चर्चाएं, नए समीकरणों की सुगबुगाहट और भविष्य की अनिश्चितता ने मध्यप्रदेश कांग्रेस को ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां आने वाले कुछ सप्ताह कई बड़े राजनीतिक चेहरों की किस्मत तय कर सकते हैं।
अब सबकी निगाहें दिल्ली पर टिकी हैं। क्या जीतू पटवारी और उमंग सिंघार अपनी कुर्सियां बचा पाएंगे? क्या जयवर्धन सिंह को संगठन की नई जिम्मेदारी मिलेगी? क्या दिग्विजय सिंह फिर से कांग्रेस की राजनीति के केंद्र में लौटेंगे? और सबसे बड़ा सवाल कि क्या कांग्रेस के भीतर असंतोष की यह आग आगे चलकर किसी बड़ी भगदड़ का रूप लेगी?
इन सवालों के जवाब आने वाला समय देगा, लेकिन इतना तय है कि मध्यप्रदेश कांग्रेस इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है और दिल्ली दरबार से निकलने वाला अगला फैसला प्रदेश की राजनीति की दिशा बदल सकता है।
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