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1956 से 2026 तक - किसने गढ़ा मध्य प्रदेश, कौन लिखेगा 2028 की कहानी?

 



मध्य प्रदेश का राजनीतिक इतिहास केवल सरकारों के गठन और पतन की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक परिवर्तन, वैचारिक संघर्ष, जातीय पुनर्संरचना, आदिवासी प्रतिनिधित्व, राजघरानों के प्रभाव और संगठन आधारित राजनीति के विकास का एक जीवंत दस्तावेज है। यदि उत्तर प्रदेश को भारत की चुनावी प्रयोगशाला कहा जाता है, तो मध्य प्रदेश को भारतीय राजनीति की वैचारिक और संगठनात्मक प्रयोगशाला कहा जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी के संगठनात्मक विस्तार में मध्य प्रदेश की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद से लेकर वर्ष 2026 तक मध्य प्रदेश की राजनीति को समझना आधुनिक भारतीय राजनीति को समझने के लिए अनिवार्य माना जाता है।


वर्तमान स्वरूप वाला मध्य प्रदेश 1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम के अंतर्गत अस्तित्व में आया। इससे पूर्व मध्य भारत, विंध्य प्रदेश, भोपाल राज्य तथा महाकौशल क्षेत्र अलग-अलग प्रशासनिक इकाइयाँ थीं। पुनर्गठन के बाद बने मध्य प्रदेश को लंबे समय तक भारत का सबसे बड़ा राज्य होने का गौरव प्राप्त रहा। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ के गठन के बाद इसका आकार छोटा हुआ, लेकिन राजनीतिक महत्व बना रहा।


स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक चार दशकों तक कांग्रेस मध्य प्रदेश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शक्ति रही। 1952, 1957, 1962 और 1967 के चुनावों में कांग्रेस का प्रभुत्व स्पष्ट दिखाई देता है। स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, ग्रामीण क्षेत्रों में संगठनात्मक पकड़ और विपक्ष की कमजोरी इसके प्रमुख कारण थे। इस दौर में रविशंकर शुक्ल, कैलाशनाथ काटजू तथा द्वारका प्रसाद मिश्र जैसे नेताओं का प्रभाव रहा।


1957 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। 1962 में भी कांग्रेस सत्ता में रही, लेकिन इसी समय भारतीय जनसंघ का विस्तार प्रारंभ हो चुका था। जनसंघ ने विशेष रूप से मालवा, महाकौशल, ग्वालियर और शहरी क्षेत्रों में अपना आधार बनाना शुरू किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मजबूत नेटवर्क ने जनसंघ को वैचारिक और संगठनात्मक आधार प्रदान किया।


1967 का चुनाव मध्य प्रदेश की राजनीति का पहला बड़ा मोड़ माना जाता है। पूरे देश में कांग्रेस विरोधी राजनीति उभर रही थी और मध्य प्रदेश भी इससे अछूता नहीं रहा। कांग्रेस के भीतर गुटबाजी बढ़ी, क्षेत्रीय असंतोष उभरा और पहली बार गैर-कांग्रेसी दलों ने गंभीर चुनौती प्रस्तुत की। यहीं से कांग्रेस के एकछत्र प्रभुत्व के क्षरण की प्रक्रिया प्रारंभ हुई।


1975 में लगाए गए आपातकाल का प्रभाव मध्य प्रदेश में भी देखने को मिला। 1977 के चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस को पराजित कर सत्ता प्राप्त की। यह स्वतंत्रता के बाद पहली बार था जब प्रदेश में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई। राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि 1977 केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि यह भारतीय मतदाता की लोकतांत्रिक चेतना का प्रदर्शन था।


1980 में कांग्रेस पुनः सत्ता में लौटी। 1980 और 1985 के दशक में अर्जुन सिंह, मोतीलाल वोरा और श्यामाचरण शुक्ल जैसे नेताओं का प्रभाव रहा। अर्जुन सिंह विशेष रूप से आदिवासी और अल्पसंख्यक क्षेत्रों में लोकप्रिय माने जाते थे। इसी काल में भाजपा, जो जनसंघ का उत्तराधिकारी दल थी, लगातार अपना संगठन मजबूत कर रही थी।


1990 का विधानसभा चुनाव मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। भाजपा ने लगभग 220 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री बने। यह भाजपा की पहली बड़ी विजय थी। इसके पीछे राम जन्मभूमि आंदोलन, कांग्रेस विरोधी वातावरण और जनसंघ-भाजपा के दशकों के संगठनात्मक विस्तार की महत्वपूर्ण भूमिका थी।


1992 में बाबरी विवाद के बाद भाजपा सरकार बर्खास्त कर दी गई और राष्ट्रपति शासन लागू हुआ। 1993 के चुनाव में कांग्रेस ने वापसी की और दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने। 1993 से 2003 तक लगातार दस वर्षों तक उनकी सरकार रही। इस अवधि में पंचायती राज, विकेंद्रीकरण, ग्राम स्वराज और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रयास हुए। हालांकि सड़क, बिजली और सिंचाई की समस्याएँ विपक्ष के लिए बड़े राजनीतिक मुद्दे बनी रहीं।


वर्ष 2000 में मध्य प्रदेश का पुनर्गठन हुआ और छत्तीसगढ़ अलग राज्य बन गया। इससे प्रदेश की राजनीतिक और सामाजिक संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया। आदिवासी बहुल क्षेत्रों का बड़ा भाग नए राज्य में चला गया, जिससे शेष मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग की राजनीतिक भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो गई।


2003 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए ऐतिहासिक सिद्ध हुआ। "बिजली, सड़क और पानी" चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बना। उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा ने लगभग 173 सीटें जीतकर भारी बहुमत प्राप्त किया, जबकि कांग्रेस लगभग 38 सीटों तक सीमित रह गई। यह कांग्रेस के दस वर्षीय शासन के विरुद्ध जनादेश माना गया।


उमा भारती के बाद बाबूलाल गौर और फिर 2005 में शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री बने। 2005 से 2023 तक का कालखंड वस्तुतः शिवराज युग के रूप में जाना जाता है। उन्होंने किसान, महिला, ग्रामीण और गरीब वर्गों को केंद्र में रखकर अनेक योजनाएँ प्रारंभ कीं। लाड़ली लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री कन्यादान योजना और कृषि प्रोत्साहन कार्यक्रमों ने उन्हें व्यापक जनाधार प्रदान किया।


2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने लगभग 143 सीटें जीतीं। 2013 में भाजपा ने 165 सीटें प्राप्त कर अपनी सबसे बड़ी जीतों में से एक दर्ज की। इस समय तक मध्य प्रदेश भाजपा का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ बन चुका था।


2018 का चुनाव अत्यंत रोचक रहा। कांग्रेस ने 114 सीटें प्राप्त कीं जबकि भाजपा 109 सीटों पर सिमट गई। कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार बनी और कमलनाथ मुख्यमंत्री बने। लेकिन मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होने तथा समर्थक विधायकों के इस्तीफे के बाद सरकार गिर गई और भाजपा पुनः सत्ता में लौट आई।


2023 का विधानसभा चुनाव मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना जाता है। अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक कांटे की टक्कर का अनुमान लगा रहे थे, लेकिन भाजपा ने 163 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया जबकि कांग्रेस लगभग 66 सीटों तक सीमित रह गई। चुनाव के बाद भाजपा ने अपेक्षाकृत नए चेहरे मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया। यह निर्णय भाजपा की ओबीसी नेतृत्व रणनीति का महत्वपूर्ण संकेत माना गया।


यदि सामाजिक संरचना की बात करें तो मध्य प्रदेश की राजनीति को समझने के लिए जातीय और सामाजिक समीकरणों का अध्ययन आवश्यक है। विभिन्न सामाजिक अध्ययनों और राजनीतिक विश्लेषणों के अनुसार राज्य में अन्य पिछड़ा वर्ग लगभग 45 से 50 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति लगभग 21 प्रतिशत, अनुसूचित जाति लगभग 16 प्रतिशत, सवर्ण समुदाय लगभग 15 प्रतिशत तथा मुस्लिम आबादी लगभग 6 से 7 प्रतिशत मानी जाती है। भारत में नवीन जातिवार जनगणना उपलब्ध न होने के कारण ये अनुमान विभिन्न शोध अध्ययनों पर आधारित हैं।
राज्य की राजनीति में यादव, कुर्मी, लोधी, किरार, धाकड़, कुशवाहा, साहू, गुर्जर, जाट और पटेल समुदाय महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भाजपा ने पिछले दो दशकों में इन समुदायों में उल्लेखनीय विस्तार किया है। शिवराज सिंह चौहान किरार समुदाय से आते हैं जबकि मोहन यादव यादव समुदाय से हैं। इसे भाजपा की व्यापक ओबीसी सामाजिक रणनीति का हिस्सा माना जाता है।


क्षेत्रीय राजनीति भी मध्य प्रदेश में अत्यंत महत्वपूर्ण है। मालवा-निमाड़ क्षेत्र लंबे समय से भाजपा का मजबूत आधार रहा है। ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में सिंधिया परिवार का प्रभाव ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है। बुंदेलखंड क्षेत्र में लोधी, कुर्मी और अनुसूचित जाति मतदाताओं का प्रभाव देखा जाता है। महाकौशल क्षेत्र में ब्राह्मण, कुर्मी और आदिवासी समुदाय प्रभावशाली हैं जबकि विंध्य क्षेत्र में ब्राह्मण, ठाकुर और अन्य पिछड़ा वर्ग राजनीति को प्रभावित करते हैं।


मध्य प्रदेश की राजनीति की सबसे रोचक कहानियों में राजघरानों की भूमिका भी शामिल है। विजया राजे सिंधिया ने जनसंघ और बाद में भाजपा के विस्तार में अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया। ग्वालियर राजघराने का प्रभाव आज भी प्रदेश की राजनीति में दिखाई देता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाना प्रदेश की राजनीति की सबसे चर्चित घटनाओं में गिना जाता है।


बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी ने विशेष रूप से ग्वालियर-चंबल और बुंदेलखंड क्षेत्रों में समय-समय पर प्रभाव दिखाया, लेकिन वे कभी प्रदेशव्यापी विकल्प नहीं बन सकीं। परिणामस्वरूप मध्य प्रदेश की राजनीति धीरे-धीरे कांग्रेस और भाजपा के बीच द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा में बदल गई।


वर्ष 2026 में मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार है और मोहन यादव मुख्यमंत्री हैं। भाजपा संगठन, संसाधन, नेतृत्व, वैचारिक नेटवर्क और बूथ प्रबंधन के स्तर पर मजबूत स्थिति में दिखाई देती है। दूसरी ओर कांग्रेस के पास कमलनाथ, जीतू पटवारी और दिग्विजय सिंह जैसे नेता हैं, लेकिन संगठनात्मक एकजुटता उसके लिए चुनौती बनी हुई है।


यदि आगामी विधानसभा चुनावों को प्रभावित करने वाले मुद्दों की बात करें तो रोजगार, कृषि आय, सिंचाई, आदिवासी कल्याण, महिला कल्याण योजनाएँ, शिक्षा, स्वास्थ्य, औद्योगिक निवेश, भ्रष्टाचार के आरोप, स्थानीय नेतृत्व, ओबीसी प्रतिनिधित्व तथा ग्रामीण विकास प्रमुख मुद्दे हो सकते हैं। हालांकि चुनाव अभी दूर हैं, इसलिए किसी निश्चित परिणाम का दावा करना उचित नहीं होगा। वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में भाजपा अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई देती है, जबकि कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए आदिवासी, ओबीसी और युवा मतदाताओं के बीच नया सामाजिक गठबंधन विकसित करना होगा।


राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए मध्य प्रदेश का अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ कांग्रेस प्रभुत्व, जनसंघ का उदय, भाजपा का संगठनात्मक विस्तार, आदिवासी राजनीति, राजघरानों का प्रभाव और ओबीसी नेतृत्व, सभी तत्व एक साथ दिखाई देते हैं। यदि 1956 से 2026 तक की इस यात्रा को एक वाक्य में समेटना हो तो कहा जा सकता है कि मध्य प्रदेश का राजनीतिक इतिहास कांग्रेस के प्रभुत्व से भाजपा के वर्चस्व तक, राजपरिवारों से जनाधारित नेतृत्व तक और सवर्ण नेतृत्व से ओबीसी केंद्रित राजनीति तक के संक्रमण की कहानी है। यह भारतीय लोकतंत्र के बदलते स्वरूप को समझने के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र है।

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