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NEET संकट: सिस्टम के भीतर छिपे गद्दारों ने छीना छात्रों का भविष्य - डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर

 



हर वर्ष लगभग 18 से 22 लाख युवा भारतीय राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा (NEET) देते हैं। यह एकमात्र, अत्यंत महत्वपूर्ण परीक्षा है, जो तय करती है कि दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाले देश में कौन डॉक्टर बनेगा। इससे बड़ा दांव शायद ही कोई हो सकता है। अधिकांश परिवारों के लिए सरकारी मेडिकल कॉलेज में एक सीट दशकों की बचत, उम्मीदों और त्याग का प्रतीक होती है, जो अंततः कुछ घंटों की उस परीक्षा पर आ टिकती है, जिसमें कागज़ पर पेंसिल से उत्तर लिखे जाते हैं। जब उसी कागज़ की पवित्रता भंग होती है, तो चोट केवल प्रशासनिक नहीं रहती। वह व्यक्तिगत होती है, पीढ़ियों तक असर डालती है, और यदि उसे अनदेखा किया जाए, तो यह अपने युवाओं के साथ गणराज्य के रिश्ते को गहरी क्षति पहुँचा सकती है।



हाल में सामने आए राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा लीक प्रकरण ने उस घाव को फिर से और गहरा कर दिया है। इस पर सरकार, विपक्ष, सोशल मीडिया और सड़कों पर जो प्रतिक्रिया दिखाई दी, वह भारत की परीक्षा व्यवस्था के साथ-साथ उसकी राजनीतिक संस्कृति के बारे में भी बहुत कुछ बताती है। इस समय बहुत शोर है। उसमें कुछ बातें बिल्कुल उचित हैं, तो कुछ पूरी तरह अवसरवादी। चुनौती, हमेशा की तरह, इन दोनों के बीच अंतर समझने की है। हम क्या जानते हैं, और क्या जानने का दिखावा नहीं करना चाहिए अब तक जो तथ्य सामने आए हैं, वे यह हैं: 2026 की राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा से जुड़े प्रश्न पत्र परीक्षा की निर्धारित तिथि से पहले एक नेटवर्क के माध्यम से फैलाए गए थे।



जाँच कर्ताओं ने इस नेटवर्क के सूत्र छपाई और परिवहन व्यवस्था की कुछ विशेष कड़ियों तक जोड़े हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने अपेक्षाकृत तेज़ी से कदम उठाए राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा लीक सार्वजनिक होने के कुछ ही दिनों के भीतर प्रभावित परीक्षा सत्र रद्द कर दिया गया, 22 जून 2026 को पुनर्परीक्षा की तिथि घोषित की गई, और छात्रों को बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के अपने परीक्षा केंद्र बदलने की सुविधा देने वाले प्रावधानों का विस्तार किया गया। व्यापक नीतिगत वातावरण को लेकर किसी की भी जो राय हो, इतना तो स्पष्ट है कि ये कदम किसी ऐसी व्यवस्था के नहीं थे जो मामले को दबाने की कोशिश कर रही हो।



यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है, और आज की चर्चा में यही बात धीरे-धीरे खोती जा रही है। एक ओर संस्थागत विफलता है ऐसी व्यवस्था, जिसे उसके भीतर काम करने वाले लोगों ने ही कमजोर कर दिया है—और दूसरी ओर राजनीतिक दुर्भावना। इन दोनों में साफ़ और अर्थपूर्ण अंतर है। दोनों को एक जैसा बताने से शायद राजनीतिक दलों के हित पूरे हो जाएँ, लेकिन यह छात्रों के साथ अन्याय है। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि इससे वे वास्तविक सुधार ओझल हो जाते हैं, जिनकी सचमुच आवश्यकता है। व्यवस्था के भीतर छिपा गद्दार, व्यवस्था के बाहर खड़े नेता से अलग समस्या है। समस्या का समाधान जाँच और कड़ाई से पालन में है। लेकिन पहले उसे यह समझना होगा कि कौन-सी समस्या क्या है। लीक की बनावट: यह व्यवस्था की समस्या है भारत की परीक्षा व्यवस्था इतने विशाल स्तर पर काम करती है कि उसकी जटिलता को दुनिया के बहुत कम देश सही अर्थों में समझ सकते हैं।



अकेले राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा ही सैकड़ों शहरों और हजारों परीक्षा केंद्रों तक फैला होता है, और इसमें पूरे उपमहाद्वीप में सीलबंद भौतिक सामग्री की आवाजाही शामिल होती है। यह पूरी श्रृंखला छपाई प्रेस से लेकर परीक्षा कक्ष तक अनेक मानवीय हाथों से होकर गुजरती है, और हर पड़ाव पर समझौते की आशंका बनी रहती है। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की स्थापना इसी प्रक्रिया को केंद्रीकृत और एकरूप बनाने के लिए की गई थी, ताकि अलग-अलग संस्थानों की बिखरी हुई और असमान निगरानी वाली परीक्षा पद्धतियों की जगह एक व्यवस्थित ढाँचा खड़ा किया जा सके। विचार सही था, लेकिन उसका क्रियान्वयन कमजोर साबित हुआ है। लेकिन यहाँ एक बहुत ज़रूरी बात है, जो राजनीतिक बहस में अक्सर छूट जाती है: राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की कमजोरी इस कारण नहीं है कि केंद्रीकरण अपने आप में गलत विचार था।



असली समस्या यह है कि केंद्रीकरण ने जवाबदेही और सख्त पालन को साथ-साथ मज़बूत किए बिना जोखिम को एक ही जगह समेट दिया। पुराने और हालिया राष्ट्रीय पात्रता प्रवेश परीक्षा लीक नेटवर्क की जाँच में बार-बार एक ही ढर्रा सामने आता है न कोई जटिल बाहरी सेंधमारी, न कोई विशाल विदेशी साज़िश, बल्कि भीतर से विश्वासघात। कभी कोई केंद्र समन्वयक, कभी कोई छपाई ठेकेदार, तो कभी कोई मध्यम स्तर का अधिकारी, जिसने यह हिसाब लगा लिया कि कोचिंग उद्योग की पहले से प्रश्न पत्र पाने की लालसा, पकड़े जाने के जोखिम से कहीं अधिक है। मूल रूप से यह संचालन स्तर पर शासन और ईमानदारी का संकट है। और कोई भी डिजिटल ढाँचा इसे हल नहीं कर सकता, यदि उसे चलाने वाले लोग भ्रष्ट बने रहें और, सबसे अहम बात, पकड़े ही न जाएँ। कोचिंग गठजोड़: वह उद्योग, जिसकी जाँच कोई करना नहीं चाहता भारत की परीक्षा-व्यवस्था के संकट का कोई भी ईमानदार आकलन कोचिंग उद्योग की जाँच के बिना पूरा नहीं हो सकता, लेकिन इस बहस में बहुत कम लोग सचमुच इतनी ईमानदारी दिखाने को तैयार हैं। कोटा, पटना और दिल्ली जैसे शहरों ने प्रतियोगी प्रवेश परीक्षाओं की चिंता के इर्द-गिर्द पूरी शहरी अर्थव्यवस्था खड़ी कर ली है। कोचिंग संस्थान ऐसी फीस वसूलते हैं, जो कई बार उन परिवारों की सालाना आय से भी अधिक होती है, जिनकी वे सेवा करने का दावा करते हैं। वे ऐसे परिणामों का आश्वासन देते हैं, जिनकी गारंटी वे दे ही नहीं सकते। और कई आपराधिक जाँचों में दर्ज प्रमाण यह दिखाते हैं कि कभी-कभी उन्होंने वे परिणाम ऐसे तरीकों से दिलाने की कोशिश की, जिनका उनके विवरण-पत्रों में कभी उल्लेख तक नहीं था।



कोचिंग उद्योग को किसी आसान अर्थ में खलनायक नहीं कहा जा सकता। लाखों छात्रों को सही ढंग से तैयारी करने में सचमुच मदद मिलती है, और इस क्षेत्र में कई शिक्षक बेहद समर्पित, कुशल और मेहनती पेशेवर हैं। लेकिन इस उद्योग का आर्थिक फैलाव जिसका अनुमान 58 हज़ार करोड़ रुपये से भी अधिक है ऐसे प्रोत्साहन खड़े करता है, जो अच्छे नतीजों को हर हाल में पुरस्कृत करते हैं। किसी भी कीमत पर। इसकी अपारदर्शी प्रकृति, और बड़े पैमाने पर बिना ठोस नियमन और निगरानी के चलना, यह स्थिति पैदा करती है कि जब इसके भीतर के खराब तत्व परीक्षा तंत्र के समझौता कर चुके अधिकारियों से मिल जाते हैं, तो ऐसे जाल बनते हैं जो बहुत बड़े हो जाते हैं और जिन्हें तोड़ना बेहद कठिन हो जाता है। परीक्षा-पत्र लीक के लिए केवल सरकार को दोष देना और कोचिंग अर्थव्यवस्था को पूरी तरह जाँच से बाहर छोड़ देना विश्लेषण नहीं है। यह साफ़ तौर पर टालमटोल है। और छात्र उन लोगों से इससे कहीं बेहतर के हकदार हैं, जो उनके पक्ष में बोलने का दावा करते हैं।



निष्पक्ष जवाबदेही वास्तव में कैसी दिखती है हर परीक्षा-गड़बड़ी के बाद मंत्री के इस्तीफे की मांग भारतीय राजनीति में लगभग एक रस्म बन गई है। यह बात शांत मन से पूछी जानी चाहिए कि यह मांग आखिर जवाबदेही की किस समझ पर टिकी है। अगर किसी मंत्री ने प्रश्न पत्र लीक करवाने का आदेश दिया हो, या उसे इसकी जानकारी होने के बावजूद उसने उसे दबाने की कोशिश की हो, तो इस्तीफा और मुकदमा न केवल उचित होगा, बल्कि आवश्यक भी होगा। लेकिन अगर किसी मंत्री को पहले से ही एक कमजोर व्यवस्था विरासत में मिली हो, और सेंध का पता चलते ही उसने नुकसान सीमित करने के लिए तेज़ी से कदम उठाए हों, साथ ही ऐसी जांच शुरू कराई हो जिनसे गिरफ्तारियाँ भी हुई हों, तो इस्तीफा मुख्य रूप से एक प्रतीकात्मक तमाशा बनकर रह जाता है।



इससे मंत्रालय से केवल एक चेहरा हटता है, जबकि वह कामकाजी ढाँचा जस का तस बना रहता है, जो वास्तव में विफल हुआ था। यह किसी एक राजनीतिक व्यक्ति का बचाव नहीं है। यह संस्थागत जवाबदेही का एक बुनियादी सिद्धांत है, जो इस बात से परे लागू होता है कि सत्ता में कौन-सी पार्टी है: सुधार का निशाना वह व्यवस्था होनी चाहिए जो टूटी है, न कि केवल वह व्यक्ति जिसकी तस्वीर सुर्खियों के साथ लगाई जा सके। जब जांच कर्ताओं ने लीक के सूत्रों को मंत्रालय तक नहीं, बल्कि उस कामकाजी श्रृंखला के खास बिंदुओं तक पहुँचाया उन लोगों तक जो सचमुच प्रश्न पत्र और सामग्री को हाथों-हाथ संभाल रहे थे तब मंत्रिमंडल में बदलाव की मांग कुछ और कठिन लेकिन ज़रूरी काम की जगह लेती हुई दिखने लगी: वह धैर्यपूर्ण, बिना चमक-दमक वाला और राजनीतिक लाभ से लगभग खाली काम, जिसमें यह ठीक किया जाए कि भारत में परीक्षा-पत्र छपाई से लेकर परीक्षा कक्ष तक आखिर पहुँचते कैसे हैं।



यह बात भी याद रखने योग्य है और अक्सर इसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है कि भारतीय सार्वजनिक परीक्षाओं में प्रश्न पत्र लीक की समस्या मौजूदा सरकार से बहुत पहले से मौजूद है। राज्य बोर्ड परीक्षाएँ, शिक्षक भर्ती, पुलिस भर्ती, मेडिकल प्रवेश यह समस्या अलग-अलग रूपों में हर राजनीतिक सोच और हर प्रशासन के समय सामने आती रही है। इससे वर्तमान पदाधिकारियों को पूरी तरह निर्दोष नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इससे इतना ज़रूर साफ़ होता है कि समस्या का समाधान भी व्यवस्थागत होना चाहिए, न कि केवल किसी एक कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को बदल देने भर से। सुधार सचमुच कैसा दिखना चाहिए आगे बढ़ने के लिए ठोस बातों की ज़रूरत है। “व्यवस्था को मज़बूत करना” जैसी सामान्य बातें सुनने में भले अच्छी लगें, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। भारत को जिन चीज़ों की आवश्यकता है और जिनके लिए नीति-निर्माताओं पर समय-सीमा और जवाबदेही के साथ सार्वजनिक दबाव बनाया जाना चाहिए वे हैं स्पष्ट और संरचनात्मक बदलाव।



जहाँ तक तकनीकी रूप से संभव हो, परीक्षा केंद्रों तक प्रश्न पत्रों की शुरुआत से अंत तक कूटबद्ध डिजिटल आपूर्ति का परीक्षण और विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि कागज़ी प्रश्न पत्रों के भौतिक परिवहन को धीरे-धीरे समाप्त किया जा सके। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की कामकाजी श्रृंखला का स्वतंत्र परीक्षण, ऐसे पक्षों से कराया जाना चाहिए जिनका परिणाम से कोई संस्थागत हित न जुड़ा हो; और यह किसी घोटाले के बाद की कार्रवाई नहीं, बल्कि परीक्षा से पहले की एक सामान्य और अनिवार्य व्यवस्था बननी चाहिए। अनिवार्य बायोमेट्रिक सत्यापन केवल अभ्यर्थियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि परीक्षा-प्रशासन से जुड़े हर व्यक्ति पर लागू होना चाहिए — छपाई से लेकर ढुलाई और वितरण तक। और सबसे बढ़कर, ऐसी अभियोजन-व्यवस्था आवश्यक है जो इतनी तेज़ हो कि वास्तव में डर पैदा कर सके। ऐसे मामले जो वर्षों नहीं, बल्कि महीनों में निपटें, वही एकमात्र उपाय हैं जो पूरी प्रक्रिया से समझौता करने वालों के लिए जोखिम का हिसाब सचमुच बदल सकते हैं।



परीक्षा तंत्र से आगे की बात सिर्फ़ परीक्षा चलाने वाली व्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था पर भी गंभीरता से ध्यान देने की ज़रूरत है। चुनिंदा संस्थानों में बहुत कम सीटों के लिए जो बेहद तीखी होड़ दिखती है, वह अपने आप में कमी की निशानी है अच्छे मेडिकल कॉलेज कम हैं, सीटें कम हैं, और सरकारी स्कूली शिक्षा की हालत ऐसी रही है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के बहुत-से छात्र बराबरी की तैयारी के साथ इस दौड़ में उतर ही नहीं पाते। क्षमता बढ़ाना और बुनियादी शिक्षा को सुधारना, परीक्षा-सुधार का विकल्प नहीं है। ये दोनों उसके लंबे समय के ज़रूरी सहारे हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा उपाय ही रहेगा। छात्रों के बारे में एक ज़रूरी बात इस पूरे शोर-शराबे के बीच राजनीतिक माँगें, सोशल मीडिया अभियान, देर रात तक चलने वाली टीवी बहसें, अख़बारों में लिखे जाने वाले विचार लेख राजस्थान, बिहार या तमिलनाडु में कहीं एक मेज़ पर बैठा वह छात्र, जिसने इस परीक्षा की तैयारी में अपने तीन साल और अपने परिवार की जमा-पूँजी लगा दी है, वही सबसे ज़्यादा सुने जाने का हकदार है, और अफ़सोस यही है कि उसी की आवाज़ सबसे कम सुनी जाती है।



एक स्पष्ट संदेश भी है कि अब जिम्मेदारी केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि शीर्ष स्तर पर बैठे लोग भी अपने दायित्वों से बच नहीं पाएँगे। इस पूरे घटनाक्रम को यदि व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो यह संकेत देता है कि शिक्षा मंत्रालय के नेतृत्व में, विशेष रूप से शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के मार्गदर्शन में, व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की दिशा में गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। उनकी कार्यशैली में जवाबदेही और सुधार की स्पष्ट झलक दिखाई देती है। यह भी स्पष्ट है कि नीतियाँ और निर्णय अपने आप में सही हो सकते हैं, लेकिन जब तक उन्हें लागू करने वाली व्यवस्था मजबूत और ईमानदार न हो, तब तक उनका प्रभाव जमीन पर पूरी तरह दिखाई नहीं देता। यही वह जगह है जहाँ वर्षों से जमी हुई कमजोरियाँ या कहें ‘दीमक’ व्यवस्था को भीतर से खोखला करती रही हैं। ऐसे में शीर्ष स्तर से सख्त और निर्णायक कार्रवाई ही वास्तविक परिवर्तन का रास्ता खोलती है।



किसी भी बड़ी व्यवस्था में बदलाव एक दिन में नहीं आता। वर्षों से चली आ रही कार्यशैली और सोच को बदलने में समय लगता है। लेकिन जब शीर्ष स्तर पर इस तरह की स्पष्ट और कठोर कार्रवाई होती है, तो यह न केवल एक उदाहरण स्थापित करती है, बल्कि पूरे तंत्र में एक सशक्त संदेश भी भेजती है कि अब लापरवाही और अनियमितताओं के लिए कोई जगह नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसी कार्रवाई आम नागरिकों, विशेषकर छात्रों और अभिभावकों के बीच विश्वास को पुनः स्थापित करने का काम करती है। शिक्षा जैसी संवेदनशील व्यवस्था में पारदर्शिता और निष्पक्षता सर्वोपरि होती है, और जब उस पर सवाल उठते हैं, तो उसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ता है।



वह छात्र एक ऐसे तंत्र का हकदार है जो निष्पक्ष हो। वह एक ऐसी सरकार का हकदार है कोई भी सरकार हो जो अपनी विफलताओं को ढकने के बजाय उन्हें गंभीरता से ले। वह ऐसे विपक्ष का हकदार है जो केवल सत्ता पर चोट करने के लिए नहीं, बल्कि असली सुधार के लिए दबाव बनाए। और वह ऐसे मीडिया और सार्वजनिक विमर्श का भी हकदार है, जो बात की जटिलता को बिना बिगाड़े समझ सके: कि व्यवस्था विफल हुई, कि मंत्री ने प्रतिक्रिया दी, कि कामकाजी स्तर पर दोषी लोगों पर मुकदमा चलना चाहिए और इन बातों में से कोई भी दूसरी बात को झुठलाती नहीं है। भारत के युवा अपने अनुभव से, भीतर तक यह जानते हैं कि परीक्षा व्यवस्था बहुत समय से टूटी हुई है। वे भोले नहीं हैं। वे किसी एक बलि के बकरे की माँग नहीं कर रहे। वे धैर्य और दृढ़ता के साथ बस एक ही बात कह रहे हैं इस व्यवस्था को सचमुच ठीक किया जाए। हालांकि अभी भी बहुत कुछ सुधारना बाकी है, लेकिन जिस प्रकार से त्वरित और निर्णायक कदम उठाए जा रहे हैं, उससे यह आशा अवश्य जगती है कि आने वाले समय में हमारी व्यवस्था अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और मजबूत बनेगी। यदि इसी तरह निरंतरता बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब व्यवस्था पर उठने वाले प्रश्नों की जगह उस पर भरोसा करने वाली आवाजें अधिक सुनाई देंगी।


डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर

सहायक प्रोफेसर

हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय।

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