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राजस्थान की राजनीति का सम्पूर्ण इतिहास

 



राजस्थान का राजनीतिक इतिहास केवल सरकारों के गठन और पतन का इतिहास नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र के विकास, राजशाही से जनतंत्र में संक्रमण, जातीय समीकरणों, किसान आंदोलनों, सामाजिक न्याय की राजनीति, संघ की संगठनात्मक शक्ति, जाट नेतृत्व, गुर्जर आंदोलनों, आदिवासी चेतना, कांग्रेस की आंतरिक गुटबाजी, भाजपा के विस्तार और बदलती चुनावी रणनीतियों की एक जीवंत राजनीतिक गाथा है। यदि उत्तर प्रदेश को भारतीय राजनीति की चुनावी प्रयोगशाला और मध्य प्रदेश को वैचारिक एवं संगठनात्मक राजनीति की प्रयोगशाला कहा जाता है, तो राजस्थान को सामाजिक समीकरणों, नेतृत्व संघर्षों और सत्ता परिवर्तन की प्रयोगशाला कहा जा सकता है।


स्वतंत्रता प्राप्ति के समय वर्तमान राजस्थान एक एकीकृत राज्य नहीं था। यहां जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, बीकानेर, जैसलमेर, कोटा, बूंदी, अलवर, भरतपुर, धौलपुर सहित अनेक रियासतें अस्तित्व में थीं। 1948 से 1956 के बीच विभिन्न चरणों में इन रियासतों का विलय हुआ और आधुनिक राजस्थान का निर्माण हुआ। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया में सरदार वल्लभभाई पटेल और वी.पी. मेनन की निर्णायक भूमिका रही। 1 नवम्बर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के बाद राजस्थान का वर्तमान स्वरूप स्थापित हुआ।


राजस्थान का राजनीतिक इतिहास शुरू से ही कांग्रेस के प्रभुत्व और आंतरिक संघर्षों से जुड़ा रहा। राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री हीरालाल शास्त्री 7 अप्रैल 1949 को बने। उन्हें पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल का समर्थन प्राप्त था, लेकिन कुछ ही समय में कांग्रेस के भीतर क्षेत्रीय और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का संघर्ष प्रारम्भ हो गया। जयपुर क्षेत्र के प्रभावशाली नेताओं का एक वर्ग उनके नेतृत्व से असंतुष्ट था। परिणामस्वरूप कांग्रेस दो गुटों में बंट गई और लगभग 21 महीने बाद ही हीरालाल शास्त्री को पद छोड़ना पड़ा। यह राजस्थान कांग्रेस के इतिहास की पहली बड़ी बगावत थी और इसने आने वाले दशकों की गुटीय राजनीति की नींव रखी।


1952 में स्वतंत्र भारत के पहले विधानसभा चुनाव हुए। कांग्रेस ने 82 सीटें जीतकर सरकार बनाई, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास स्वयं चुनाव हार गए। उन्हें जोधपुर के लोकप्रिय महाराजा हनवंत सिंह ने पराजित किया। यह राजस्थान की राजनीति की पहली बड़ी सनसनी थी। चुनाव परिणामों के कुछ ही समय बाद हनवंत सिंह की विमान दुर्घटना में मृत्यु हो गई, जो आज भी राजस्थान के राजनीतिक इतिहास की सबसे रहस्यमय और चर्चित घटनाओं में गिनी जाती है।


1954 में कांग्रेस के भीतर दूसरा बड़ा सत्ता संघर्ष हुआ। जयनारायण व्यास के नेतृत्व के खिलाफ मोहनलाल सुखाड़िया और माणिक्यलाल वर्मा के नेतृत्व में विधायकों का एक बड़ा समूह सक्रिय हो गया। पंडित नेहरू के हस्तक्षेप के बाद विधायक दल की बैठक हुई और बहुमत मोहनलाल सुखाड़िया के पक्ष में चला गया। परिणामस्वरूप 13 नवम्बर 1954 को सुखाड़िया मुख्यमंत्री बने। अगले लगभग सत्रह वर्षों तक राजस्थान की राजनीति पर उनका प्रभाव बना रहा। भूमि सुधार, सिंचाई परियोजनाएं, शिक्षा विस्तार, ग्रामीण विकास और प्रशासनिक आधुनिकीकरण के कारण उन्हें आधुनिक राजस्थान का निर्माता कहा जाता है।


1952 से 1972 तक राजस्थान कांग्रेस का अभेद्य गढ़ बना रहा। 1957 में कांग्रेस को 119 सीटें, 1962 में 89, 1967 में 103 और 1972 में 145 सीटें प्राप्त हुईं। किंतु इसी दौर में भारतीय जनसंघ ने जयपुर, जोधपुर, उदयपुर और कोटा जैसे शहरी क्षेत्रों में अपना आधार मजबूत करना प्रारंभ कर दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का संगठनात्मक नेटवर्क धीरे-धीरे कांग्रेस के विकल्प का आधार तैयार कर रहा था।


1975 के आपातकाल ने राजस्थान की राजनीति को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। 1977 में जनता पार्टी ने लगभग 150 सीटें जीतकर कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। इसी चुनाव ने भैरोंसिंह शेखावत को राज्यव्यापी नेता के रूप में स्थापित किया। राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में भैरोंसिंह शेखावत का स्थान वही माना जाता है जो मध्य प्रदेश में कुशाभाऊ ठाकरे और सुंदरलाल पटवा या उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह का रहा। वे तीन बार मुख्यमंत्री बने और बाद में देश के उपराष्ट्रपति भी बने।


1980 में जनता पार्टी के विघटन के बाद भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ। उस समय राजस्थान सहित देश के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस सत्ता में थी। भाजपा के पास भैरोंसिंह शेखावत जैसा लोकप्रिय चेहरा था, लेकिन संगठन अभी विस्तार की अवस्था में था। 1980 के चुनाव में भाजपा को 32 सीटें और 1985 में 39 सीटें मिलीं। गांव-गांव और ढाणी-ढाणी तक संघ और भाजपा के कार्यकर्ता पार्टी के लिए आधार तैयार कर रहे थे।


1990 राजस्थान की राजनीति का ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। राम मंदिर आंदोलन, मंडल-कमंडल की राजनीति और भैरोंसिंह शेखावत के नेतृत्व ने भाजपा को पहली बार सत्ता तक पहुंचाया। भाजपा-जनता दल गठबंधन ने 85 सीटें जीतकर सरकार बनाई। यह केवल राजस्थान ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी भाजपा के उभार का महत्वपूर्ण अध्याय था। 1992 में बाबरी विवाद के बाद केंद्र सरकार ने राजस्थान सहित भाजपा शासित राज्यों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया, लेकिन 1993 में भाजपा पुनः 95 सीटें जीतकर सत्ता में लौट आई।


इसके बाद राजस्थान की राजनीति स्थायी रूप से कांग्रेस बनाम भाजपा की द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा में बदल गई। 1998 में कांग्रेस ने 152 सीटें जीतकर ऐतिहासिक वापसी की और अशोक गहलोत पहली बार मुख्यमंत्री बने। 2003 में वसुंधरा राजे के नेतृत्व में भाजपा ने 120 से अधिक सीटें जीतकर सत्ता प्राप्त की। 2008 में कांग्रेस लौटी, 2013 में भाजपा ने रिकॉर्ड 163 सीटें जीतकर इतिहास रचा, 2018 में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी और 2023 में भाजपा ने 115 सीटें जीतकर फिर सत्ता हासिल की।


राजस्थान की राजनीति की एक विशेषता यह रही कि यहां कांग्रेस के भीतर सत्ता संघर्ष कभी समाप्त नहीं हुआ। 1998 में परसराम मदेरणा मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार थे, लेकिन आलाकमान ने अशोक गहलोत को चुना। मदेरणा ने अनुशासन बनाए रखा और संभावित विद्रोह को रोक दिया। 2008 में शीशराम ओला और गहलोत समर्थकों के बीच शक्ति प्रदर्शन हुआ। 2018 के बाद सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच संघर्ष ने 2020 में ऐसा संकट पैदा कर दिया कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। यह राजस्थान कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा राजनीतिक विद्रोह माना जाता है।


विडंबना यह भी है कि सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व की राजनीति करने वाली कांग्रेस ने 1948 से 2026 तक किसी दलित, अनुसूचित जनजाति अथवा मुस्लिम नेता को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनाया। गोकुलभाई भट्ट पहले प्रदेशाध्यक्ष बने, जबकि अशोक गहलोत सबसे लंबे समय तक इस पद पर रहे। सचिन पायलट लगातार सबसे लंबे कार्यकाल वाले प्रदेशाध्यक्षों में शामिल हैं। गोविंद सिंह डोटासरा भी लगातार पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने वाले चुनिंदा नेताओं में शामिल हो चुके हैं। आज तक केवल दो महिलाएं - लक्ष्मी कुमारी चूंडावत और गिरिजा व्यास - राजस्थान कांग्रेस की प्रदेशाध्यक्ष बनी हैं।


राजस्थान भाजपा का इतिहास भी उतना ही रोचक है। जनसंघ से भाजपा तक का सफर संघ के संगठन, भैरोंसिंह शेखावत की राजनीतिक कुशलता, वसुंधरा राजे के नेतृत्व, अटल बिहारी वाजपेयी की सामाजिक विस्तार नीति और नरेंद्र मोदी-अमित शाह के संगठनात्मक मॉडल से होकर गुजरता है। 2002 में जाट समुदाय को ओबीसी आरक्षण दिए जाने के निर्णय ने राजस्थान की राजनीति में बड़ा परिवर्तन किया। इससे शेखावाटी और मारवाड़ के जाट बहुल क्षेत्रों में भाजपा का आधार मजबूत हुआ और 2003 में भाजपा पहली बार 100 सीटों का आंकड़ा पार कर सकी।


राजस्थान की राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसके सामाजिक समीकरण हैं। जाट, राजपूत, गुर्जर, मीणा, ब्राह्मण, वैश्य, दलित, आदिवासी और मुस्लिम समुदाय चुनावी राजनीति को प्रभावित करते हैं। नागौर, सीकर, झुंझुनूं और चूरू में जाट राजनीति प्रभावी है। पूर्वी राजस्थान में गुर्जर और मीणा समीकरण सत्ता का रास्ता तय करते हैं। दक्षिणी राजस्थान में आदिवासी राजनीति तेजी से उभर रही है, जिसका प्रमाण भारत आदिवासी पार्टी (BAP) का उदय है। मुस्लिम मतदाता लगभग 9-10 प्रतिशत हैं और अनेक सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं।


2014 के बाद राजस्थान की राजनीति में मोदी-शाह मॉडल का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। पहले राजनीति क्षेत्रीय क्षत्रपों के इर्द-गिर्द घूमती थी, लेकिन अब संगठन और केंद्रीय नेतृत्व का प्रभाव बढ़ा है। 2023 में भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाना इसी परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। वर्तमान समय में भाजपा में भजनलाल शर्मा, ओम बिरला, गजेन्द्र सिंह शेखावत, भूपेन्द्र यादव, अर्जुनराम मेघवाल, दिया कुमारी और किरोड़ी लाल मीणा प्रमुख शक्ति केंद्र हैं, जबकि कांग्रेस में अशोक गहलोत, सचिन पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा और टीकाराम जूली भविष्य की राजनीति के महत्वपूर्ण चेहरे माने जाते हैं।


आज राजस्थान की राजनीति बेरोजगारी, जल संकट, पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP), किसान आय, आरक्षण, महिला सशक्तिकरण, आदिवासी प्रतिनिधित्व, शहरीकरण, डिजिटल प्रचार और युवा नेतृत्व जैसे नए मुद्दों के इर्द-गिर्द विकसित हो रही है। इसलिए 1947 से 2026 तक राजस्थान की राजनीतिक यात्रा केवल सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, सामाजिक परिवर्तन, संगठनात्मक शक्ति, नेतृत्व निर्माण और चुनावी व्यवहार का एक व्यापक राजनीतिक दस्तावेज है। राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों, शोधार्थियों, पत्रकारों, सिविल सेवा अभ्यर्थियों और राजनीतिक विश्लेषकों के लिए राजस्थान भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रयोगशालाओं में से एक बना हुआ है।

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