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शिवपुरी में नाबालिग आदिवासी युवती मामला बना चर्चा का केंद्र

 

शिवपुरी में आदिवासी परिवारों के शोषण और कथित धर्मांतरण नेटवर्क पर उठे गंभीर सवाल, पीड़ित परिवारों ने मांगी निष्पक्ष जांच

शिवपुरी जिले से सामने आया एक मामला स्थानीय स्तर पर गंभीर चर्चा का विषय बन गया है। एक ओर एक विवाहित मुस्लिम महिला अपने पति पर प्रताड़ना, परित्याग और दूसरी नाबालिग आदिवासी युवती के साथ कथित अवैध संबंधों के आरोप लगा रही है, वहीं दूसरी ओर उस नाबालिग युवती की मां भी अपनी बेटी के शोषण और बहला-फुसलाकर अपने प्रभाव में लेने के आरोपों के साथ न्याय की गुहार लगा रही है। दोनों पक्षों द्वारा लगाए गए आरोपों ने न केवल कानून-व्यवस्था बल्कि आदिवासी समाज की सुरक्षा, महिलाओं के अधिकारों और कथित धर्मांतरण गतिविधियों को लेकर भी अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार नरवर तिराहा, सतनबाड़ा कला निवासी मिशा (निशा) बानो पत्नी अकरम खान ने आरोप लगाया है कि उसके पति के एक नाबालिग आदिवासी युवती से संबंध हैं और वह बिना विधिक रूप से वैवाहिक संबंध समाप्त किए उक्त युवती को पत्नी की तरह अपने साथ रखे हुए है। पीड़िता का आरोप है कि पुत्र की इच्छा पूरी न होने के कारण उसे तथा उसकी तीन पुत्रियों को घर से निकाल दिया गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि उसके साथ मारपीट की गई, जान से मारने की धमकी दी गई तथा बीमारी और जीवन-यापन के लिए कोई आर्थिक सहायता या गुजारा भत्ता नहीं दिया जा रहा।

मिशा बानो द्वारा 11 मई 2024 को सतनबाड़ा थाने में भारतीय दंड संहिता, 1860 की धाराओं 294, 323 और 506 के अंतर्गत शिकायत दर्ज कराई गई थी। इसके अतिरिक्त 15 मई 2026 को शिवपुरी महिला थाना में भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 85 के अंतर्गत भी कार्रवाई कराई गई।

इसी मामले का दूसरा पक्ष तब सामने आया जब नाबालिग आदिवासी युवती की मां विमला आदिवासी ने 19 मई 2026 को शिवपुरी पुलिस अधीक्षक को आवेदन देकर आरोप लगाया कि उसकी नाबालिग बेटी को अकरम शाह पिछले लगभग एक वर्ष से बहला-फुसलाकर अपने प्रभाव में रखे हुए है तथा उसका शोषण कर रहा है। आवेदन में यह भी आरोप लगाया गया है कि युवती से उसकी अपनी मां के विरुद्ध जबरन बेचने, मारपीट और मानसिक प्रताड़ना जैसे आरोप लगवाए गए। पीड़िता की मां का कहना है कि उसकी बेटी को परिवार से अलग कर उसके मन में अविश्वास पैदा किया गया है।

विमला आदिवासी ने अपने आवेदन में यह भी दावा किया है कि आरोपी द्वारा अन्य लड़कियों को भी अपने जाल में फंसाने का प्रयास किया गया है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी शेष है और इनकी जांच संबंधित एजेंसियों द्वारा किया जाना आवश्यक है।

वर्तमान स्थिति में एक ओर आरोपी की पत्नी तथा दूसरी ओर नाबालिग युवती की मां न्याय के लिए प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर काटने को मजबूर हैं, जबकि उनके अनुसार मुख्य आरोपी अब भी खुलेआम घूम रहा है। इससे स्थानीय लोगों में भी असंतोष और चिंता का वातावरण बनता दिखाई दे रहा है।

इस पूरे प्रकरण पर वरिष्ठ पत्रकार एवं "सहरिया क्रांति" के संरक्षक संजय बेचैन ने चिंता व्यक्त करते हुए दावा किया कि शिवपुरी जिले के विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासी समुदाय को निशाना बनाकर कथित धर्मांतरण और प्रेम संबंधों के माध्यम से शोषण के अनेक मामले सामने आते रहे हैं, लेकिन अधिकांश घटनाएं सामाजिक भय, आर्थिक कमजोरी और जागरूकता के अभाव के कारण सार्वजनिक नहीं हो पातीं। उनका आरोप है कि आदिवासी समाज की सरलता और कमजोर आर्थिक स्थिति का लाभ उठाने वाले तत्व सक्रिय हैं और इन गतिविधियों की व्यापक एवं निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है।

हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि किसी भी कथित "लव जिहाद" अथवा संगठित गिरोह की मौजूदगी संबंधी दावे अभी आरोपों और बयानों के स्तर पर हैं। इनकी पुष्टि केवल सक्षम जांच एजेंसियों की निष्पक्ष जांच के बाद ही हो सकेगी। किसी व्यक्ति या समुदाय को सामूहिक रूप से दोषी ठहराना न तो उचित है और न ही कानून इसकी अनुमति देता है।

फिलहाल यह मामला महिलाओं के अधिकारों, नाबालिगों की सुरक्षा, आदिवासी परिवारों की संवेदनशील स्थिति तथा प्रशासनिक तत्परता की एक बड़ी परीक्षा बनकर सामने आया है। स्थानीय नागरिकों की मांग है कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए, नाबालिग युवती की आयु और परिस्थितियों की विधिवत जांच हो, पीड़ित पत्नी और उसकी बच्चियों को कानूनी संरक्षण एवं आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए तथा यदि किसी प्रकार का संगठित शोषण या अवैध गतिविधि सामने आती है तो उसके विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

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