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तमिलनाडु का राजनीतिक इतिहास - कांग्रेस से द्रविड़ दलों और नई राजनीति तक

 



स्वतंत्रता प्राप्ति के समय वर्तमान तमिलनाडु का क्षेत्र तत्कालीन मद्रास प्रांत का हिस्सा था, जिसमें आज के तमिलनाडु के अलावा आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक के कुछ भाग भी शामिल थे। स्वतंत्रता के बाद भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग तेज हुई। 1953 में आंध्र राज्य के गठन और 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम के बाद तमिल भाषी क्षेत्रों को मिलाकर मद्रास राज्य का नया स्वरूप निर्धारित किया गया। आगे चलकर 14 जनवरी 1969 को मद्रास राज्य का नाम आधिकारिक रूप से तमिलनाडु रखा गया। राज्य गठन के समय कांग्रेस का राजनीतिक प्रभुत्व था और सी. राजगोपालाचारी, कुमारस्वामी कामराज तथा एम. भक्तवत्सलम जैसे नेताओं ने शासन का नेतृत्व किया। इसी काल में द्रविड़ आंदोलन सामाजिक और राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरने लगा। पेरियार ई. वी. रामासामी के नेतृत्व में चलाए गए आत्मसम्मान आंदोलन तथा बाद में सी. एन. अन्नादुरै द्वारा स्थापित द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) ने हिंदी विरोध, सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय पहचान के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। 1960 के दशक में हिंदी थोपने के विरोध में हुए आंदोलनों ने राज्य की राजनीति की दिशा बदल दी और कांग्रेस के लंबे वर्चस्व को चुनौती मिलने लगी। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर तमिलनाडु में द्रविड़ दलों के उदय का आधार बनीं।


तमिलनाडु का प्रथम विधानसभा चुनाव वर्ष 1952 में हुआ, हालांकि उस समय राज्य का नाम मद्रास राज्य था और इसकी सीमाएँ वर्तमान तमिलनाडु से कहीं अधिक विस्तृत थीं। इस राज्य में आज के तमिलनाडु के अतिरिक्त आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक के कुछ क्षेत्र भी शामिल थे। कुल 375 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव आयोजित किए गए। यह स्वतंत्र भारत का पहला आम चुनाव था और इसमें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, समाजवादी दल, तमिलनाडु टॉयलर्स पार्टी, कॉमनवील पार्टी तथा बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच मुकाबला हुआ। चुनाव परिणामों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और उसे 152 सीटें प्राप्त हुईं। कांग्रेस का मत प्रतिशत लगभग 35 प्रतिशत रहा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 62 सीटें और लगभग 10 प्रतिशत मत मिले। किसान मजदूर प्रजा पार्टी को लगभग 35 सीटें, समाजवादी दल को 13 सीटें, तमिलनाडु टॉयलर्स पार्टी को 19 सीटें तथा कॉमनवील पार्टी को 6 सीटें प्राप्त हुईं। अनेक निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी उल्लेखनीय सफलता हासिल की और लगभग 60 से अधिक सीटें जीतीं। कांग्रेस पूर्ण बहुमत से दूर रही, किंतु सबसे बड़ा दल होने के कारण उसने अन्य छोटे दलों और निर्दलीयों के समर्थन से सरकार बनाई।


उस समय मद्रास राज्य की राजनीति में क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता स्पष्ट दिखाई देती थी। तमिल क्षेत्रों में कांग्रेस को परंपरागत उच्च जातियों, ब्राह्मणों, व्यापारिक वर्गों तथा अनेक ग्रामीण समुदायों का समर्थन मिला। दक्षिणी जिलों में मुक्कुलथोर, नादार और कुछ अन्य पिछड़े वर्गों के बीच भी कांग्रेस का प्रभाव था। तंजावुर और उत्तरी क्षेत्रों में कृषक तथा मजदूर वर्ग के एक हिस्से ने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का समर्थन किया। तेलुगु भाषी क्षेत्रों में स्थानीय दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रभाव दिखाई दिया। अनुसूचित जातियों तथा श्रमिक वर्ग के मतों का एक भाग वामपंथी दलों की ओर गया। चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर चर्चा हुई। अंततः स्वतंत्र भारत के वरिष्ठ नेता और पूर्व गवर्नर-जनरल सी. राजगोपालाचारी को मुख्यमंत्री बनाया गया। विशेष बात यह रही कि उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा था, बल्कि बाद में विधान परिषद के माध्यम से सदन के सदस्य बने। उनके अनुभव, राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठा और कांग्रेस संगठन की सहमति के कारण उन्हें यह दायित्व सौंपा गया। 1952 का चुनाव कई कारणों से ऐतिहासिक माना जाता है। यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की पहली बड़ी परीक्षा थी, जिसमें बहुदलीय प्रतिस्पर्धा दिखाई दी। कांग्रेस का प्रभुत्व स्थापित हुआ, किंतु कम्युनिस्टों और क्षेत्रीय शक्तियों के उभार ने भविष्य की राजनीतिक दिशा का संकेत भी दिया। इसी दौर में सामाजिक न्याय, भाषाई पहचान और गैर-कांग्रेसी राजनीति के बीज पड़े, जिनसे आगे चलकर द्रविड़ आंदोलन और क्षेत्रीय दलों के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ। 1952 का यह चुनाव दक्षिण भारतीय राजनीति के विकास की आधारशिला सिद्ध हुआ।


मद्रास राज्य का द्वितीय विधानसभा चुनाव वर्ष 1957 में आयोजित किया गया। यह चुनाव 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम के बाद नए स्वरूप में बने मद्रास राज्य का पहला चुनाव था। आंध्र प्रदेश, केरल और मैसूर (वर्तमान कर्नाटक) के गठन के बाद राज्य मुख्यतः तमिल भाषी क्षेत्रों तक सीमित हो गया था। कुल 205 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव हुए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, नवोदित द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक), प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, फॉरवर्ड ब्लॉक तथा अनेक निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच मुकाबला हुआ। चुनाव परिणामों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और 151 सीटों पर विजय हासिल की। पार्टी का मत प्रतिशत लगभग 45 प्रतिशत रहा। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 4 सीटें और लगभग 8 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ रही द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) ने 15 सीटें जीतकर लगभग 13 प्रतिशत मत प्राप्त किए और स्वयं को एक उभरती क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित किया। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी तथा अन्य छोटे दलों और निर्दलीयों को शेष सीटें मिलीं। इस चुनाव में कांग्रेस का प्रभाव राज्य के अधिकांश ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बना रहा। कामराज के नेतृत्व में चल रही विकास योजनाओं, शिक्षा विस्तार और संगठनात्मक मजबूती के कारण किसानों, व्यापारियों, मध्यम वर्ग तथा अनेक पिछड़ी जातियों का बड़ा वर्ग कांग्रेस के साथ रहा। नादार समुदाय, जिनसे स्वयं के. कामराज आते थे, कांग्रेस का महत्वपूर्ण आधार बना। दक्षिण और पश्चिमी जिलों में गौंडर, वन्नियार तथा अन्य पिछड़े वर्गों के अनेक समूहों ने भी कांग्रेस का समर्थन किया। दूसरी ओर, द्रविड़ आंदोलन के प्रभाव से शहरी क्षेत्रों, विशेषकर चेन्नई, उत्तरी तमिल क्षेत्रों और युवाओं के बीच द्रमुक की लोकप्रियता बढ़ने लगी। गैर-ब्राह्मण समुदायों, छात्रों और तमिल सांस्कृतिक पहचान से जुड़े वर्गों में द्रमुक को उल्लेखनीय समर्थन मिला। मजदूर वर्ग और कुछ कृषक क्षेत्रों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सीमित प्रभाव बना रहा।

चुनाव के बाद कांग्रेस विधायक दल ने के. कामराज को पुनः अपना नेता चुना और वे दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। कामराज की सादगी, संगठन पर पकड़ और विकासोन्मुखी नीतियों के कारण उन्हें व्यापक स्वीकृति प्राप्त थी। उनके नेतृत्व में विद्यालयों की संख्या बढ़ाने, ग्रामीण सड़कों के निर्माण और सिंचाई परियोजनाओं पर विशेष ध्यान दिया गया, जिससे उनकी लोकप्रियता और मजबूत हुई। 1957 का चुनाव कई दृष्टियों से ऐतिहासिक था। यह पुनर्गठित तमिल भाषी मद्रास राज्य का पहला चुनाव था और इसी चुनाव से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने संसदीय राजनीति में औपचारिक प्रवेश किया। यद्यपि कांग्रेस ने भारी बहुमत प्राप्त किया, लेकिन द्रमुक के उभार ने भविष्य में होने वाले राजनीतिक परिवर्तन की स्पष्ट झलक दिखा दी। सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय अस्मिता और तमिल पहचान के मुद्दे धीरे-धीरे मुख्यधारा की राजनीति में स्थान बनाने लगे। यही प्रवृत्तियाँ आगे चलकर तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ दलों के प्रभुत्व का आधार बनीं।


मद्रास राज्य का तृतीय विधानसभा चुनाव वर्ष 1962 में आयोजित किया गया। यह चुनाव ऐसे समय में हुआ जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्ति थी, किंतु द्रविड़ आंदोलन के प्रभाव से द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) तेजी से लोकप्रिय हो रही थी। कुल 206 विधानसभा सीटों के लिए मतदान कराया गया। चुनावी मुकाबले में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, स्वातंत्र्य पार्टी, फॉरवर्ड ब्लॉक, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी तथा अनेक निर्दलीय उम्मीदवार शामिल थे। चुनाव परिणामों में कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और 139 सीटों पर विजय हासिल की। पार्टी का मत प्रतिशत लगभग 46 प्रतिशत रहा। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए 50 सीटें जीतीं और लगभग 27 प्रतिशत मत प्राप्त किए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 2 सीटें और लगभग 10 प्रतिशत मत मिले, जबकि स्वातंत्र्य पार्टी, फॉरवर्ड ब्लॉक तथा अन्य दलों और निर्दलीयों को शेष सीटें प्राप्त हुईं। यद्यपि कांग्रेस सत्ता में बनी रही, लेकिन द्रमुक ने स्वयं को राज्य की प्रमुख विपक्षी शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया। इस चुनाव में कांग्रेस को ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों, व्यापारिक वर्ग, नादार समुदाय तथा कई पिछड़ी जातियों का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ। मुख्यमंत्री के. कामराज की शिक्षा विस्तार, सिंचाई योजनाओं और औद्योगिक विकास की नीतियों ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाए रखा। पश्चिमी तमिलनाडु के गौंडर समुदाय और दक्षिणी जिलों के अनेक सामाजिक समूहों का समर्थन भी कांग्रेस के पक्ष में रहा। दूसरी ओर, द्रमुक को उत्तरी और शहरी क्षेत्रों, विशेषकर चेन्नई और उसके आसपास के जिलों में उल्लेखनीय सफलता मिली। गैर-ब्राह्मण समुदायों, युवाओं, छात्रों, निम्न मध्यम वर्ग तथा तमिल भाषा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मतदाताओं ने द्रमुक का समर्थन किया। वन्नियार समुदाय के कुछ क्षेत्रों तथा शहरी मजदूर वर्ग के बीच भी द्रमुक का प्रभाव बढ़ा।

चुनाव के बाद कांग्रेस विधायक दल ने के. कामराज को पुनः मुख्यमंत्री चुना। उनके नेतृत्व में राज्य में औद्योगिकीकरण, विद्यालयों के विस्तार और ग्रामीण विकास को प्राथमिकता दी गई। कामराज उस समय देश के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली कांग्रेस नेताओं में गिने जाते थे। बाद में 1963 में "कामराज योजना" के अंतर्गत उन्होंने स्वेच्छा से मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया और एम. भक्तवत्सलम राज्य के नए मुख्यमंत्री बने। 1962 का चुनाव तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इस चुनाव ने स्पष्ट कर दिया कि द्रविड़ आंदोलन अब केवल सामाजिक या सांस्कृतिक आंदोलन नहीं रह गया है, बल्कि वह एक मजबूत राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो चुका है। द्रमुक के बढ़ते जनाधार ने कांग्रेस के दीर्घकालिक प्रभुत्व को पहली बार गंभीर चुनौती दी। हिंदी विरोध, सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय पहचान और गैर-ब्राह्मण राजनीति के मुद्दे अधिक प्रभावी होकर उभरने लगे। यही परिस्थितियाँ आगे चलकर 1967 में तमिलनाडु की राजनीति में ऐतिहासिक परिवर्तन का आधार बनीं।

मद्रास राज्य का चतुर्थ विधानसभा चुनाव वर्ष 1967 में आयोजित हुआ और यह दक्षिण भारतीय राजनीति के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। कुल 234 विधानसभा सीटों के लिए मतदान कराया गया। यह चुनाव ऐसे समय में हुआ जब कांग्रेस लगभग दो दशकों से सत्ता में थी, लेकिन हिंदी थोपने के विरोध, बढ़ती महंगाई, खाद्यान्न संकट और द्रविड़ आंदोलन के विस्तार ने राजनीतिक परिस्थितियों को बदल दिया था। चुनावी मुकाबले में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक), स्वातंत्र्य पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, फॉरवर्ड ब्लॉक, मुस्लिम लीग तथा अन्य दलों और निर्दलीयों ने भाग लिया। द्रमुक ने कई विपक्षी दलों के साथ व्यापक गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा। चुनाव परिणामों में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त की और 138 सीटें जीतकर पहली बार सत्ता पर कब्जा कर लिया। पार्टी का मत प्रतिशत लगभग 41 प्रतिशत रहा। कांग्रेस को केवल 51 सीटें मिलीं और उसका मत प्रतिशत लगभग 41 प्रतिशत के आसपास रहा, किंतु विपक्षी दलों के संयुक्त मोर्चे के कारण उसे भारी नुकसान उठाना पड़ा। स्वातंत्र्य पार्टी, वामपंथी दलों और अन्य सहयोगी दलों ने भी उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। इस प्रकार लगभग बीस वर्षों से चला आ रहा कांग्रेस का प्रभुत्व समाप्त हो गया। इस चुनाव में द्रमुक को शहरी क्षेत्रों, उत्तरी तमिलनाडु, चेन्नई महानगर और युवाओं के बीच व्यापक समर्थन मिला। हिंदी विरोधी आंदोलनों के कारण छात्रों और तमिल भाषाई अस्मिता से जुड़े मतदाताओं का बड़ा वर्ग द्रमुक के पक्ष में गया। वन्नियार, मुदलियार, नादार, कुछ दलित समुदायों तथा अनेक पिछड़ी जातियों के बीच भी द्रमुक का प्रभाव बढ़ा। फिल्म जगत के लोकप्रिय कलाकारों, विशेषकर एम. जी. रामचंद्रन के प्रचार ने पार्टी की लोकप्रियता में महत्वपूर्ण योगदान दिया। दूसरी ओर, कांग्रेस को पारंपरिक ग्रामीण क्षेत्रों, कुछ उच्च जातियों, व्यापारिक वर्गों तथा अपने पुराने समर्थक समूहों का समर्थन प्राप्त रहा, लेकिन वह जनता की बदलती अपेक्षाओं को पूरी तरह समझने में सफल नहीं हो सकी।

चुनाव के बाद द्रमुक के संस्थापक नेता सी. एन. अन्नादुरै मुख्यमंत्री बने। वे द्रविड़ आंदोलन के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक थे और सामाजिक न्याय, क्षेत्रीय अधिकार तथा तमिल पहचान के प्रबल समर्थक माने जाते थे। जनता ने उन्हें कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्वीकार किया और उनके नेतृत्व में पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी दल की सरकार बनी। 1967 का चुनाव अनेक कारणों से ऐतिहासिक माना जाता है। इसी चुनाव ने तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ युग की शुरुआत की। कांग्रेस के लंबे शासन का अंत हुआ और क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व का नया अध्याय प्रारंभ हुआ। हिंदी विरोधी आंदोलन, सामाजिक न्याय और तमिल सांस्कृतिक अस्मिता पहली बार सत्ता के केंद्र में पहुँची। आगे चलकर 1969 में मद्रास राज्य का नाम बदलकर तमिलनाडु रखा गया। 1967 का चुनाव आज भी भारतीय संघीय राजनीति और क्षेत्रीय दलों के उदय का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।


तमिलनाडु (पूर्व मद्रास राज्य) के पाँचवें, छठे, सातवें और आठवें विधानसभा चुनाव क्रमशः 1971, 1977, 1980 और 1984 में आयोजित हुए। इन चार चुनावों ने राज्य की राजनीति को स्थायी रूप से द्रविड़ दलों के प्रभुत्व के अधीन स्थापित कर दिया। 1969 में मद्रास राज्य का नाम आधिकारिक रूप से तमिलनाडु रखे जाने के बाद 1971 का चुनाव नए नाम वाले राज्य का पहला विधानसभा चुनाव था। कुल 234 सीटों पर हुए इस चुनाव में मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) ने कांग्रेस (इंदिरा) और वामपंथी दलों के साथ गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा। द्रमुक ने लगभग 184 सीटें जीतकर भारी बहुमत प्राप्त किया, जबकि कांग्रेस (ओ), स्वातंत्र्य पार्टी और अन्य विपक्षी दलों को सीमित सफलता मिली। करुणानिधि पुनः मुख्यमंत्री बने। इस चुनाव में द्रमुक को पिछड़ी जातियों, शहरी मतदाताओं, छात्रों तथा तमिल पहचान से जुड़े वर्गों का व्यापक समर्थन मिला।

1972 में एम. जी. रामचंद्रन (एमजीआर) ने द्रमुक से अलग होकर अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (अन्नाद्रमुक या एआईएडीएमके) की स्थापना की। इसके बाद 1977 का विधानसभा चुनाव राज्य की राजनीति में नए युग की शुरुआत लेकर आया। आपातकाल समाप्त होने के बाद हुए इस चुनाव में एआईएडीएमके ने 130 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। द्रमुक को 48 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस और जनता पार्टी को अपेक्षाकृत कम सफलता मिली। एमजीआर पहली बार मुख्यमंत्री बने। उनकी व्यक्तिगत लोकप्रियता, फिल्मी छवि और गरीब वर्गों के प्रति कल्याणकारी वादों ने उन्हें व्यापक जनसमर्थन दिलाया। ग्रामीण क्षेत्रों, महिलाओं, निम्न आय वर्ग और अनेक पिछड़ी जातियों ने एआईएडीएमके का समर्थन किया।

1980 का चुनाव केंद्र में इंदिरा गांधी की वापसी के बाद आयोजित हुआ। उस समय केंद्र सरकार ने कई राज्यों की सरकारें भंग कर दी थीं, जिनमें तमिलनाडु भी शामिल था। इस चुनाव में एआईएडीएमके ने कांग्रेस (इंदिरा) के साथ गठबंधन किया और 129 सीटों पर विजय प्राप्त की। द्रमुक को 37 सीटें मिलीं। एमजीआर दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। कांग्रेस के साथ गठबंधन के कारण एआईएडीएमके को राष्ट्रीय स्तर का समर्थन भी प्राप्त हुआ। इस चुनाव में महिलाओं, गरीबों और ग्रामीण मतदाताओं के बीच एमजीआर की लोकप्रियता और अधिक मजबूत हुई।

1984 का विधानसभा चुनाव उस समय हुआ जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पूरे देश में सहानुभूति की लहर थी। दूसरी ओर, एमजीआर गंभीर रूप से बीमार थे और अमेरिका में उपचार करा रहे थे, फिर भी उनकी लोकप्रियता बनी रही। एआईएडीएमके और कांग्रेस गठबंधन ने ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए 195 सीटों पर विजय प्राप्त की। द्रमुक को 24 सीटें मिलीं। एमजीआर लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। यह चुनाव दर्शाता था कि तमिलनाडु में व्यक्तित्व आधारित राजनीति और कल्याणकारी योजनाओं का प्रभाव अत्यंत गहरा हो चुका था।

इन चार चुनावों के दौरान राज्य की राजनीति पूरी तरह द्रविड़ दलों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई। कांग्रेस, जो कभी सबसे प्रभावशाली दल थी, धीरे-धीरे क्षेत्रीय दलों की सहयोगी बनकर रह गई। द्रमुक को मुख्यतः पिछड़ी जातियों, शहरी क्षेत्रों, छात्रों और तमिल सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़े वर्गों का समर्थन प्राप्त होता रहा, जबकि एआईएडीएमके ने महिलाओं, ग्रामीण गरीबों, मध्यम वर्ग और अनेक सामाजिक समूहों के बीच व्यापक आधार बनाया। वन्नियार, गौंडर, थेवर, नादार और दलित समुदायों के विभिन्न वर्ग समय-समय पर दोनों द्रविड़ दलों के साथ जुड़ते रहे। 1971 से 1984 के बीच के ये चार चुनाव तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति के सुदृढ़ीकरण, एम. करुणानिधि और एमजीआर जैसे करिश्माई नेताओं के उदय तथा कांग्रेस के पतन के प्रतीक माने जाते हैं। इसी काल में तमिलनाडु की राजनीति ने राष्ट्रीय दलों के बजाय क्षेत्रीय नेतृत्व और कल्याणकारी राजनीति को अपनी स्थायी पहचान बना लिया।

तमिलनाडु के नवें, दसवें, ग्यारहवें और बारहवें विधानसभा चुनाव क्रमशः 1989, 1991, 1996 और 2001 में आयोजित हुए। यह कालखंड राज्य की राजनीति में द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच तीव्र प्रतिस्पर्धा, राष्ट्रीय घटनाओं के प्रभाव तथा व्यक्तित्व आधारित नेतृत्व के सुदृढ़ होने का दौर माना जाता है। 1987 में मुख्यमंत्री एम. जी. रामचंद्रन के निधन के बाद अन्नाद्रमुक दो गुटों में विभाजित हो गई। इसी पृष्ठभूमि में 1989 का चुनाव 234 सीटों पर संपन्न हुआ। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेतृत्व में गठबंधन ने 150 सीटों पर विजय प्राप्त की। अन्नाद्रमुक के जयललिता और जानकी रामचंद्रन गुट अलग-अलग चुनाव लड़े, जिससे उनके मत विभाजित हो गए। कांग्रेस को भी सीमित सफलता मिली। द्रमुक प्रमुख एम. करुणानिधि तीसरी बार मुख्यमंत्री बने। इस चुनाव में शहरी क्षेत्रों, पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यकों तथा द्रविड़ विचारधारा से जुड़े मतदाताओं का बड़ा वर्ग द्रमुक के साथ रहा।


1991 का चुनाव राष्ट्रीय स्तर की असाधारण परिस्थितियों में हुआ। चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या ने पूरे राजनीतिक वातावरण को बदल दिया। कांग्रेस और जयललिता के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक के गठबंधन के पक्ष में व्यापक सहानुभूति लहर उत्पन्न हुई। परिणामस्वरूप गठबंधन ने लगभग सभी सीटों पर विजय प्राप्त की। अन्नाद्रमुक ने 164 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को भी बड़ी संख्या में सीटें मिलीं। द्रमुक को केवल 2 सीटों पर सफलता मिली। जयललिता पहली बार मुख्यमंत्री बनीं। महिलाओं, ग्रामीण मतदाताओं, पारंपरिक कांग्रेस समर्थकों तथा अनेक मध्यम वर्गीय परिवारों ने इस गठबंधन का समर्थन किया। राजीव गांधी की हत्या के कारण द्रमुक को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा क्योंकि उसके विरोधियों ने उस पर लिट्टे के प्रति नरम रुख रखने के आरोप लगाए।


1996 का चुनाव जयललिता सरकार के विरुद्ध बढ़ते असंतोष, भ्रष्टाचार के आरोपों और जनाक्रोश की पृष्ठभूमि में हुआ। द्रमुक ने तमिल मनीला कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा। जनता ने सत्ता परिवर्तन का स्पष्ट निर्णय दिया और द्रमुक गठबंधन ने 220 सीटों पर विजय प्राप्त की। स्वयं अन्नाद्रमुक को केवल 4 सीटें मिलीं। एम. करुणानिधि चौथी बार मुख्यमंत्री बने। इस चुनाव में शहरी मध्यम वर्ग, सरकारी कर्मचारी, अल्पसंख्यक समुदाय तथा भ्रष्टाचार विरोधी भावना रखने वाले मतदाताओं ने द्रमुक गठबंधन का समर्थन किया। अभिनेता रजनीकांत द्वारा अन्नाद्रमुक सरकार के विरुद्ध सार्वजनिक टिप्पणी भी उस समय चर्चा का विषय बनी थी।


2001 का चुनाव फिर से सत्ता परिवर्तन लेकर आया। द्रमुक सरकार के विरुद्ध बढ़ते राजनीतिक असंतोष और व्यापक गठबंधन की रणनीति के कारण जयललिता के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक ने कांग्रेस, वामपंथी दलों तथा अन्य सहयोगियों के साथ चुनाव लड़ा। गठबंधन ने 196 सीटों पर विजय प्राप्त की। द्रमुक गठबंधन को सीमित सफलता मिली। यद्यपि उस समय कानूनी कारणों से जयललिता चुनाव नहीं लड़ सकीं, फिर भी उन्हें विधायक दल का नेता चुना गया और वे मुख्यमंत्री बनीं। बाद में न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्होंने पुनः चुनाव लड़कर अपनी स्थिति मजबूत की।



इन चार चुनावों के दौरान तमिलनाडु की राजनीति पूरी तरह द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा में बदल गई। द्रमुक को प्रायः पिछड़ी जातियों, अल्पसंख्यकों, शहरी मतदाताओं और उत्तरी तमिलनाडु के क्षेत्रों में मजबूत समर्थन मिलता रहा, जबकि अन्नाद्रमुक ने महिलाओं, ग्रामीण गरीबों, दक्षिणी जिलों के अनेक समुदायों तथा कल्याणकारी योजनाओं से लाभान्वित वर्गों के बीच मजबूत आधार बनाया। थेवर, गौंडर, वन्नियार, नादार और दलित समुदायों के विभिन्न वर्ग समय-समय पर दोनों दलों के साथ जुड़ते रहे। 1989 से 2001 के बीच के ये चार चुनाव तमिलनाडु में करुणानिधि और जे. जयललिता के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के युग की स्थापना के प्रतीक बने। इस काल में सत्ता लगभग हर चुनाव में बदलती रही और गठबंधन राजनीति, व्यक्तित्व आधारित नेतृत्व तथा कल्याणकारी नीतियाँ राज्य की राजनीति की प्रमुख विशेषताएँ बन गईं।

तमिलनाडु के तेरहवें, चौदहवें, पंद्रहवें और सोलहवें विधानसभा चुनाव क्रमशः 2006, 2011, 2016 और 2021 में आयोजित हुए। यह कालखंड राज्य की राजनीति में द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच निरंतर प्रतिस्पर्धा, कल्याणकारी योजनाओं की राजनीति, क्षेत्रीय दलों के प्रभुत्व तथा अंततः करुणानिधि और जयललिता के बाद के नए नेतृत्व के उदय का साक्षी बना। इन चारों चुनावों में 234 विधानसभा सीटों के लिए मतदान हुआ और प्रत्येक चुनाव ने राज्य की राजनीतिक दिशा को प्रभावित किया।

2006 के विधानसभा चुनाव में एम. करुणानिधि के नेतृत्व वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम ने कांग्रेस, पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) और वामपंथी दलों के साथ गठबंधन बनाया। दूसरी ओर, जे. जयललिता के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में मैदान में थी। द्रमुक स्वयं केवल 96 सीटें जीत सकी, किंतु सहयोगी दलों के समर्थन से गठबंधन को बहुमत प्राप्त हो गया। करुणानिधि पाँचवीं बार मुख्यमंत्री बने। इस चुनाव में मुफ्त रंगीन टेलीविजन, सस्ते चावल और अन्य जनकल्याणकारी वादों ने मतदाताओं को प्रभावित किया। शहरी क्षेत्रों, अल्पसंख्यकों, पिछड़ी जातियों और गठबंधन सहयोगियों के पारंपरिक वोट बैंक ने द्रमुक को सत्ता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

2011 का विधानसभा चुनाव भ्रष्टाचार के आरोपों, विशेषकर 2जी स्पेक्ट्रम विवाद, तथा सत्ता विरोधी लहर की पृष्ठभूमि में हुआ। जयललिता के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक ने वाम दलों, डीएमडीके और अन्य सहयोगी दलों के साथ व्यापक गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा। गठबंधन ने 203 सीटों पर विजय प्राप्त की, जबकि द्रमुक गठबंधन को भारी पराजय का सामना करना पड़ा। अन्नाद्रमुक ने स्वयं 150 से अधिक सीटें जीतीं और जयललिता तीसरी बार मुख्यमंत्री बनीं। महिलाओं, ग्रामीण गरीबों, दक्षिणी जिलों के मतदाताओं तथा सत्ता परिवर्तन चाहने वाले वर्गों का व्यापक समर्थन अन्नाद्रमुक के पक्ष में गया।

2016 का चुनाव तमिलनाडु की राजनीति में एक महत्वपूर्ण अपवाद माना जाता है, क्योंकि 1984 के बाद पहली बार किसी सत्तारूढ़ दल ने लगातार दूसरी बार सत्ता बरकरार रखी। जयललिता के नेतृत्व वाली अन्नाद्रमुक ने अकेले चुनाव लड़ते हुए 134 सीटों पर विजय प्राप्त की, जबकि करुणानिधि के नेतृत्व वाले द्रमुक गठबंधन को 98 सीटें मिलीं। जयललिता चौथी बार मुख्यमंत्री बनीं। उनकी "अम्मा" ब्रांड की कल्याणकारी योजनाएँ, जैसे अम्मा कैंटीन, सस्ती दवाइयाँ और महिला हितैषी कार्यक्रम, मतदाताओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय रहे। ग्रामीण क्षेत्रों, महिलाओं और निम्न आय वर्गों में अन्नाद्रमुक का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दिया।

दिसंबर 2016 में जयललिता के निधन के बाद राज्य की राजनीति में नया दौर प्रारंभ हुआ। 2021 का विधानसभा चुनाव करुणानिधि और जयललिता दोनों के निधन के बाद पहला चुनाव था। द्रमुक का नेतृत्व एम. के. स्टालिन के हाथों में था, जबकि अन्नाद्रमुक का नेतृत्व एडप्पाडी के. पलानीस्वामी और ओ. पन्नीरसेल्वम कर रहे थे। द्रमुक ने कांग्रेस, वाम दलों, विदुथलाई चिरुथैगल काची और अन्य सहयोगियों के साथ गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा। गठबंधन ने 159 सीटों पर विजय प्राप्त की, जिनमें से द्रमुक ने 133 सीटें जीतीं। अन्नाद्रमुक गठबंधन को 75 सीटें मिलीं। एम. के. स्टालिन पहली बार मुख्यमंत्री बने। रोजगार, सामाजिक कल्याण, कोविड-19 महामारी के बाद आर्थिक पुनर्निर्माण और द्रविड़ मॉडल की अवधारणा इस चुनाव के प्रमुख मुद्दे रहे।

इन चार चुनावों के दौरान द्रमुक और अन्नाद्रमुक का सामाजिक आधार व्यापक बना रहा। द्रमुक को अल्पसंख्यकों, शहरी मतदाताओं, पिछड़ी जातियों, दलित समुदायों और उत्तरी तमिलनाडु के क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक समर्थन मिलता रहा, जबकि अन्नाद्रमुक ने महिलाओं, ग्रामीण गरीबों, दक्षिणी और पश्चिमी जिलों के अनेक समुदायों तथा कल्याणकारी योजनाओं से लाभान्वित वर्गों के बीच मजबूत आधार बनाए रखा। वन्नियार, थेवर, गौंडर, नादार तथा विभिन्न दलित समुदाय समय और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार दोनों दलों के बीच विभाजित रहे। 2006 से 2021 के बीच के ये चार चुनाव तमिलनाडु की राजनीति में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा, क्षेत्रीय दलों के स्थायी प्रभुत्व और करुणानिधि-जयललिता युग से स्टालिन तथा नई पीढ़ी के नेतृत्व की ओर संक्रमण के प्रतीक माने जाते हैं। इसी अवधि ने यह भी सिद्ध किया कि तमिलनाडु में राष्ट्रीय दलों की तुलना में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव कहीं अधिक मजबूत बना हुआ है।

तमिलनाडु के सोलहवें विधानसभा चुनाव के बाद राज्य की राजनीति में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले, जिनका चरम 2026 के विधानसभा चुनाव में दिखाई दिया। 2021 में हुए सोलहवें विधानसभा चुनाव में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 234 सीटों में से 159 सीटें जीतकर सत्ता प्राप्त की थी और एम. के. स्टालिन पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। द्रमुक ने अकेले 133 सीटें जीती थीं, जबकि अन्नाद्रमुक गठबंधन को 75 सीटें प्राप्त हुई थीं। करुणानिधि और जयललिता के निधन के बाद यह पहला चुनाव था और इसे नई पीढ़ी के नेतृत्व के उदय का प्रतीक माना गया।

2021 से 2026 के बीच स्टालिन सरकार ने सामाजिक कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सहायता योजनाओं और तथाकथित "द्रविड़ मॉडल" को प्रमुखता दी। इसी अवधि में अभिनेता विजय द्वारा स्थापित तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) राज्य की राजनीति में एक नई शक्ति के रूप में उभरी। इससे लगभग छह दशक से चले आ रहे द्रमुक-अन्नाद्रमुक के पारंपरिक द्विध्रुवीय राजनीतिक समीकरण को चुनौती मिली।

2026 में सत्रहवें विधानसभा चुनाव के लिए 234 सीटों पर मतदान कराया गया। चुनाव में द्रमुक के नेतृत्व वाला गठबंधन, अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन तथा अभिनेता विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में मैदान में उतरे। परिणामों में टीवीके ने अपने पहले ही विधानसभा चुनाव में 108 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरकर राजनीतिक इतिहास रच दिया, जबकि द्रमुक गठबंधन 73 सीटों और अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन 53 सीटों तक सीमित रह गया। किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति उत्पन्न हुई। द्रमुक को भारी नुकसान उठाना पड़ा और पार्टी केवल 59 सीटों तक सिमट गई, जबकि अन्नाद्रमुक को 47 सीटें प्राप्त हुईं। कांग्रेस, वाम दलों, वीसीके तथा अन्य छोटे दलों को सीमित सफलता मिली। चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया कि तमिलनाडु की राजनीति में पहली बार 1967 के बाद द्रविड़ दलों का एकाधिकार गंभीर रूप से चुनौती के सामने खड़ा हो गया है। चुनाव के बाद विभिन्न दलों के समर्थन से टीवीके प्रमुख सी. जोसेफ विजय सरकार बनाने की स्थिति में पहुँचे और मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की। इस प्रकार लगभग 59 वर्षों से चली आ रही द्रमुक और अन्नाद्रमुक की सत्ता-प्रधान राजनीति के बीच पहली बार किसी नए क्षेत्रीय दल ने सरकार का नेतृत्व संभाला। 2026 के चुनाव में युवाओं, शहरी मतदाताओं, प्रथम बार मतदान करने वाले नागरिकों तथा पारंपरिक द्रविड़ दलों से असंतुष्ट वर्गों का एक बड़ा हिस्सा टीवीके की ओर आकर्षित हुआ। वहीं द्रमुक को अल्पसंख्यकों, उसके पारंपरिक समर्थक वर्गों और कुछ शहरी क्षेत्रों में समर्थन मिलता रहा। अन्नाद्रमुक का प्रभाव पश्चिमी और दक्षिणी जिलों के कुछ हिस्सों में बना रहा।

2021 से 2026 का कालखंड तमिलनाडु की राजनीति में एक ऐतिहासिक संक्रमण का दौर माना जा रहा है। यदि 1967 का चुनाव द्रविड़ युग की शुरुआत का प्रतीक था, तो 2026 का चुनाव उस लंबे राजनीतिक अध्याय में परिवर्तन और नई राजनीतिक शक्तियों के उदय का संकेत देने वाला माना जा रहा है। इस चुनाव ने यह सिद्ध कर दिया कि तमिलनाडु की राजनीति निरंतर परिवर्तनशील है और मतदाता समय-समय पर नई राजनीतिक संभावनाओं को स्वीकार करने की क्षमता रखते हैं। 2026 में तमिलनाडु की राजनीति में आया परिवर्तन केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि मतदाताओं की मनोवृत्ति में आए बदलाव का परिणाम माना गया। लगभग छह दशकों तक द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच घूमती रही राजनीति के प्रति मतदाताओं, विशेषकर युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले वर्ग में बदलाव की इच्छा दिखाई दी। अभिनेता विजय की तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) ने स्वयं को पारंपरिक द्रविड़ दलों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया और इसी रणनीति ने उसे अप्रत्याशित सफलता दिलाई। द्रमुक सरकार के कार्यकाल में अनेक कल्याणकारी योजनाएँ लागू होने के बावजूद सत्ता विरोधी भावना, कुछ स्थानीय मुद्दों और लंबे समय से एक ही राजनीतिक ढाँचे के बने रहने से उत्पन्न थकान का प्रभाव भी देखा गया। दूसरी ओर, अन्नाद्रमुक जयललिता के निधन के बाद पहले जैसी जनस्वीकार्यता और करिश्माई नेतृत्व पुनः स्थापित नहीं कर सकी, जिसके कारण वह मुख्य विकल्प बनने में असफल रही। टीवीके ने युवाओं, शहरी मतदाताओं और पारंपरिक दलों से निराश वर्गों के बीच नई उम्मीद पैदा की। विजय की लोकप्रिय छवि, भ्रष्टाचार विरोधी संदेश और परिवर्तन के वादे ने पार्टी को व्यापक समर्थन दिलाया। परिणामस्वरूप राज्य में पहली बार लंबे समय से चले आ रहे द्रमुक-अन्नाद्रमुक के द्विध्रुवीय प्रभुत्व को गंभीर चुनौती मिली और त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बनी। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार 2026 का जनादेश किसी एक विचारधारा के विरुद्ध नहीं, बल्कि "नए विकल्प" की तलाश का संकेत था। यदि 1967 का चुनाव कांग्रेस युग के अंत का प्रतीक था, तो 2026 का चुनाव पारंपरिक द्रविड़ द्विध्रुवीय व्यवस्था में परिवर्तन और तमिलनाडु की राजनीति के नए अध्याय की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।



2026 के विधानसभा चुनाव के बाद तमिलनाडु की राजनीति में अभूतपूर्व परिवर्तन देखने को मिला। अभिनेता विजय के नेतृत्व वाली तमिलगा वेत्री कड़गम (टीवीके) 108 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और विभिन्न सहयोगी दलों एवं निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनाने में सफल रही। मुख्यमंत्री के रूप में सी. जोसेफ विजय ने शपथ ली और लगभग 59 वर्षों से चली आ रही द्रमुक-अन्नाद्रमुक की सत्ता प्रधान व्यवस्था में नया अध्याय शुरू हुआ। द्रमुक, जो 2021 से सत्ता में थी, 2026 में विपक्ष की भूमिका में पहुँच गई। एम. के. स्टालिन ने नई सरकार की स्थिरता पर प्रश्न उठाए और लगातार सरकार की नीतियों की आलोचना करते रहे। दूसरी ओर, अन्नाद्रमुक भी सत्ता से बाहर रही और एडप्पाडी के. पलानीस्वामी के नेतृत्व में पार्टी ने बिजली संकट तथा अन्य प्रशासनिक मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने का प्रयास किया। सरकार गठन के समय त्रिशंकु विधानसभा के कारण राजनीतिक अनिश्चितता का वातावरण बना रहा। विभिन्न दलों के बीच समर्थन और विरोध को लेकर कई तरह की अटकलें लगीं, किंतु अंततः विजय बहुमत साबित करने में सफल रहे। बाद में इस विश्वास मत को लेकर दायर सीबीआई जांच की मांग को सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। नई सरकार ने पूर्ववर्ती द्रमुक सरकार की कुछ नीतियों की समीक्षा शुरू की। 500 इलेक्ट्रिक बसों की खरीद संबंधी एक निविदा को रद्द किया गया तथा कानून-व्यवस्था और नशे की समस्या को प्रमुख मुद्दा बनाया गया। साथ ही, विजय सरकार ने स्पष्ट किया कि तमिलनाडु की पारंपरिक द्विभाषा नीति तमिल और अंग्रेजी यथावत जारी रहेगी। इस अवधि में राजनीतिक पुनर्संरेखण भी देखने को मिला। कुछ नेताओं ने दल बदले और अन्नाद्रमुक के पूर्व मंत्री एवं विधायक एसाक्की सुबैया ने इस्तीफा देकर टीवीके का दामन थाम लिया। कांग्रेस, जो नई सरकार की सहयोगी बनी, ने राज्यसभा प्रतिनिधित्व सहित सत्ता में अधिक भागीदारी की मांग भी उठाई। इस प्रकार 2026 के बाद तमिलनाडु की राजनीति द्रमुक बनाम अन्नाद्रमुक की पारंपरिक प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़कर बहुध्रुवीय स्वरूप की ओर बढ़ती दिखाई दी, जिसमें टीवीके एक नई केंद्रीय शक्ति के रूप में स्थापित होती नजर आई।



आगे की स्थिति को लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अन्नामलाई 2031 के विधानसभा चुनाव को लक्ष्य बनाकर एक नए क्षेत्रीय राजनीतिक विकल्प के निर्माण का प्रयास कर सकते हैं। वहीं भाजपा तमिलनाडु में अपने संगठन को पुनर्गठित कर नई रणनीति के साथ आगे बढ़ने की कोशिश करेगी। यदि अन्नामलाई अपनी लोकप्रियता को मजबूत संगठन में बदलने में सफल होते हैं, तो भविष्य में तमिलनाडु की राजनीति विजय, द्रमुक और अन्नामलाई जैसे नए शक्ति केंद्रों के बीच त्रिकोणीय या बहुध्रुवीय प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ सकती है। दूसरी ओर, यदि भाजपा और अन्नामलाई के बीच भविष्य में पुनः राजनीतिक समझ बनती है, तो दोनों पक्ष एक बार फिर साथ भी आ सकते हैं। इसलिए 2026 के बाद की यह दूरी तमिलनाडु की राजनीति में एक स्थायी विभाजन भी सिद्ध हो सकती है और भविष्य के किसी नए समीकरण की भूमिका भी। यदि विजय के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार अपने वादों को प्रभावी ढंग से लागू करने, प्रशासनिक स्थिरता बनाए रखने और जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में सफल रहती है, तो पार्टी 2031 के विधानसभा चुनाव में भी मजबूत स्थिति में रह सकती है। पहली बार सत्ता में आई किसी पार्टी के लिए शासन क्षमता ही उसकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी। यदि सरकार के प्रदर्शन से जनता संतुष्ट रही, तो टीवीके स्थायी राजनीतिक शक्ति के रूप में स्थापित हो सकती है। दूसरी ओर, द्रमुक अभी भी तमिलनाडु का सबसे मजबूत संगठनात्मक ढांचा रखने वाली पार्टी मानी जाती है। एम. के. स्टालिन के नेतृत्व में पार्टी विपक्ष में रहते हुए सरकार की कमियों को मुद्दा बनाकर पुनः सत्ता में लौटने का प्रयास करेगी। अन्नाद्रमुक के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने पारंपरिक जनाधार को बनाए रखने और मजबूत नेतृत्व प्रस्तुत करने की होगी। यदि पार्टी आंतरिक एकता स्थापित करने में सफल होती है, तो वह फिर से निर्णायक भूमिका निभा सकती है। वहीं राष्ट्रीय दल कांग्रेस और वामपंथी दल संभवतः गठबंधन की राजनीति तक ही सीमित रहेंगे।


तमिलनाडु का राजनीतिक इतिहास भारतीय लोकतंत्र, क्षेत्रीय अस्मिता और सामाजिक परिवर्तन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्ययन विषय है। मद्रास राज्य के रूप में प्रारंभ हुई इसकी राजनीतिक यात्रा ने कांग्रेस के प्रभुत्व, द्रविड़ आंदोलन के उदय, क्षेत्रीय दलों की स्थापना और अंततः बहुध्रुवीय राजनीति तक का लंबा सफर तय किया है। 1952 से 1967 तक कांग्रेस का वर्चस्व रहा, किंतु हिंदी विरोधी आंदोलनों, सामाजिक न्याय की मांगों और गैर-ब्राह्मण राजनीति के उभार ने द्रविड़ मुनेत्र कड़गम को सत्ता तक पहुँचाया। इसके बाद लगभग छह दशकों तक द्रमुक और अन्नाद्रमुक तमिलनाडु की राजनीति के दो प्रमुख स्तंभ बने रहे।

एम. करुणानिधि, एम. जी. रामचंद्रन, जे. जयललिता और एम. के. स्टालिन जैसे नेताओं ने विभिन्न कालखंडों में राज्य की राजनीति को दिशा दी। इस दौरान कल्याणकारी योजनाएँ, क्षेत्रीय पहचान, भाषाई अस्मिता और व्यक्तित्व आधारित नेतृत्व तमिलनाडु की राजनीति की प्रमुख विशेषताएँ बन गईं। राष्ट्रीय दलों की तुलना में क्षेत्रीय दलों की शक्ति यहाँ लगातार अधिक प्रभावशाली रही।

2026 का चुनाव इस लंबे राजनीतिक इतिहास में एक नए मोड़ के रूप में देखा जा रहा है। यदि 1967 का चुनाव कांग्रेस युग के अंत का प्रतीक था, तो 2026 का जनादेश पारंपरिक द्रविड़ द्विध्रुवीय व्यवस्था को चुनौती देने वाला माना जा सकता है। इसके बाद उत्पन्न राजनीतिक हलचलों, नए दलों के उदय और बदलते गठबंधन समीकरणों ने यह संकेत दिया है कि तमिलनाडु की राजनीति अब एक नए संक्रमण काल से गुजर रही है।

प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थियों, राजनीति विज्ञान के छात्रों और राजनीतिक विषयों में रुचि रखने वालों के लिए तमिलनाडु का अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय संघवाद, क्षेत्रीय दलों की भूमिका, सामाजिक न्याय, चुनावी व्यवहार, गठबंधन राजनीति और नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रियाओं को समझने का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। तमिलनाडु का राजनीतिक इतिहास यह भी सिद्ध करता है कि लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक व्यवस्था स्थायी नहीं होती और समय के साथ मतदाता नई परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन को स्वीकार करने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि तमिलनाडु भारतीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण और अध्ययनयोग्य राजनीतिक प्रयोगशालाओं में से एक माना जाता है।

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