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भाजपा में गुटबाजी या कुछ महत्वाकांक्षी चेहरों की बेचैनी? सवाल कई हैं, जवाब अभी बाकी हैं

 


लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल के भीतर संवाद होना, कार्यकर्ताओं का अपनी बात रखना और संगठनात्मक विषयों पर चर्चा करना कोई असामान्य बात नहीं है। लेकिन जब ऐसी चर्चाओं को चुनिंदा शब्दों और विशेष कोण से प्रस्तुत किया जाने लगे, तब यह देखना आवश्यक हो जाता है कि वास्तविकता क्या है और उसे किस रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।

हाल ही में वरिष्ठ भाजपा नेता, पूर्व जिला महामंत्री एवं पूर्व मीसाबंदी ओमप्रकाश शर्मा "ओमी गुरु" के निवास पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के "मन की बात" कार्यक्रम के श्रवण तथा वर्तमान एवं पूर्व पार्षदों के सम्मान समारोह का आयोजन हुआ। कार्यक्रम के बाद कुछ समाचार और सोशल मीडिया पोस्ट सामने आए, जिनमें इसे भाजपा की "अंतरकलह", "गुटबाजी" और "बगावत" के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास दिखाई दिया। यदि समाचारों में प्रकाशित तथ्यों को ही आधार माना जाए तो वहां कुछ पार्षदों और कार्यकर्ताओं ने अपनी पीड़ा और नाराजगी व्यक्त की। स्वयं ओमी गुरु ने भी स्पष्ट कहा कि कार्यकर्ता की पीड़ा को सुनना और उसे संगठन के उचित मंच तक पहुंचाना ही उनका उद्देश्य था। भाजपा के वरिष्ठ नेता सोनू प्रमेंद्र बिरथरे ने भी कहा कि यदि किसी कार्यकर्ता के मन में कोई बात है तो उसे सुनकर शांत करना संगठन की जिम्मेदारी है। अर्थात कार्यक्रम का घोषित उद्देश्य संवाद और सम्मान था, न कि विद्रोह। 

लेकिन यहां कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिन पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। जो लोग आज स्वयं को "मूल भाजपाई" बताते हुए अपनी पीड़ा व्यक्त कर रहे हैं, उनमें से कई ऐसे चेहरे भी हैं जिन्होंने अतीत में पार्टी के निर्णयों का विरोध करते हुए निर्दलीय चुनाव लड़ा और भाजपा समर्थित प्रत्याशियों के विरुद्ध मैदान में उतरकर जीत हासिल की। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या वे स्वयं को भाजपा अनुशासन का आदर्श उदाहरण मान सकते हैं? कुछ ऐसे चेहरे भी हैं जिन्हें वर्षों तक पार्टी ने अवसर दिए, टिकट दिए, पद दिए और स्थानीय राजनीति में पहचान दी। लेकिन आज जब संगठन की कार्यप्रणाली पहले की तुलना में अधिक संस्थागत और व्यापक हो रही है, तब कुछ लोगों को यह महसूस हो रहा है कि उनकी व्यक्तिगत पकड़ और प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा। क्या वर्तमान असंतोष का एक कारण यह भी हो सकता है?

राजनीति में यह स्वाभाविक है कि हर नेता आगे बढ़ना चाहता है। लेकिन अपनी राजनीतिक लकीर बड़ी करने के लिए स्वयं को मजबूत बनाना और संगठन में सकारात्मक योगदान देना एक रास्ता है, जबकि किसी दूसरे की लकीर छोटी दिखाकर स्वयं को बड़ा साबित करने का प्रयास दूसरा रास्ता है। दुर्भाग्य से वर्तमान घटनाक्रम में कुछ चेहरे दूसरे रास्ते पर चलते दिखाई दे रहे हैं। और भी गंभीर बात यह है कि पिछले कुछ समय से यही कुछ लोग सार्वजनिक मंचों और सोशल मीडिया पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के लिए अमर्यादित भाषा का प्रयोग करते हुए भी देखे गए हैं। संगठनात्मक असहमति और व्यक्तिगत अपमान में अंतर होता है। लोकतांत्रिक दलों में मतभेद स्वीकार्य हो सकते हैं, लेकिन अनुशासनहीनता और सार्वजनिक अवमानना को लोकतांत्रिक अधिकार नहीं कहा जा सकता।

यह भी किसी से छिपा नहीं है कि कुछ लोगों द्वारा समय-समय पर नए राजनीतिक विकल्पों और नए राजनीतिक दलों की चर्चाएं भी सार्वजनिक रूप से की जाती रही हैं। ऐसे में जब वही लोग भाजपा मंचों पर आकर "मूल भाजपाई" होने का प्रमाणपत्र बांटते दिखाई दें, तो सामान्य कार्यकर्ता के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि यदि यह एक संगठनात्मक कार्यक्रम था, जिसमें भाजपा के कार्यकर्ता, पूर्व और वर्तमान पार्षद तथा वरिष्ठ नेता शामिल थे, तो वहां हुई बातचीत इतनी विस्तार से उसी दिन मीडिया और सोशल मीडिया तक किस प्रकार पहुंच गई? किसने पहुंचाई? और किस उद्देश्य से पहुंचाई? यदि कार्यक्रम का उद्देश्य संवाद था तो अगले ही दिन उसे "भाजपा में गुटबाजी", "अंतरकलह" और "बगावत" जैसे शब्दों के साथ प्रचारित करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? क्या वास्तव में संगठन को मजबूत करना उद्देश्य था या फिर संगठन की छवि को नुकसान पहुंचाना?

यहां एक और तथ्य उल्लेखनीय है। ओमी गुरु जैसे वरिष्ठ नेता, जिन्होंने संघर्ष के कठिन दौर देखे हैं, उन्हें कार्यक्रम का आयोजक बनाकर उसी कार्यक्रम को भाजपा के भीतर विद्रोह का केंद्र बताने का प्रयास किया गया। जबकि उपलब्ध बयानों में कहीं भी उन्होंने पार्टी विरोधी रुख नहीं अपनाया। उल्टा उन्होंने स्पष्ट कहा कि कार्यकर्ताओं की बात संगठन के उचित मंच तक पहुंचाई जाएगी। फिर भी कुछ लोगों ने पूरे कार्यक्रम को एक अलग रंग देने का प्रयास किया। संभव है कि कुछ कार्यकर्ताओं की शिकायतें वास्तविक हों। संभव है कि कुछ लोगों को संगठनात्मक स्तर पर उपेक्षा महसूस होती हो। यह किसी भी बड़े राजनीतिक दल में हो सकता है। लेकिन यह भी उतना ही संभव है कि कुछ महत्वाकांक्षी चेहरे अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए असंतोष को हवा देने का प्रयास कर रहे हों।

जनता और कार्यकर्ताओं को अब यह समझना होगा कि हर असहमति गुटबाजी नहीं होती और हर नाराजगी विद्रोह नहीं होती। लेकिन यदि कोई व्यक्ति बार-बार संगठन की छवि को नुकसान पहुंचाने वाले बयान देता है, मीडिया में विवाद खड़े करता है, वरिष्ठ नेताओं को निशाना बनाता है और फिर स्वयं को सबसे बड़ा संगठनवादी घोषित करता है, तो उसके इरादों पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।आज आवश्यकता संगठन के भीतर संवाद बढ़ाने की है, न कि संवाद को सनसनी बनाकर प्रस्तुत करने की। आवश्यकता कार्यकर्ताओं की पीड़ा सुनने की है, न कि पीड़ा को राजनीतिक हथियार बनाने की। और सबसे बढ़कर आवश्यकता यह समझने की है कि भाजपा जैसी विचारधारा आधारित पार्टी केवल पदों और टिकटों से नहीं चलती, बल्कि कार्यकर्ता और संगठन के सामूहिक अनुशासन से चलती है।

इसलिए असली प्रश्न यह नहीं है कि ओमी गुरु के घर क्या कहा गया। असली प्रश्न यह है कि वहां कही गई बातों को किसने, क्यों और किस उद्देश्य से "गुटबाजी" का नाम देकर बाहर पहुंचाया। जब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता, तब तक इस पूरे घटनाक्रम को केवल असंतोष नहीं, बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक संदेश के रूप में भी देखा जाएगा।

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