विशेष साक्षात्कार: "राष्ट्र सुरक्षित है तो धर्म भी सुरक्षित है" - आचार्य श्री सूर्यसागर जी महाराज
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भारत की आध्यात्मिक परंपरा केवल उपासना तक सीमित नहीं रही है, बल्कि उसने सदैव राष्ट्र, समाज, संस्कृति और मानवीय मूल्यों का मार्गदर्शन किया है। वर्तमान समय में जब राष्ट्रवाद, सनातन संस्कृति, अहिंसा, आत्मरक्षा, शिक्षा और सामाजिक समरसता जैसे विषय व्यापक विमर्श के केंद्र में हैं, तब संत समाज की दृष्टि को समझना और भी आवश्यक हो जाता है।
इन्हीं महत्वपूर्ण विषयों पर क्रांतिदूत डॉट इन के संपादक दिवाकर शर्मा ने देश के चर्चित, लोकप्रिय एवं राष्ट्रवादी जैन संत आचार्य श्री सूर्यसागर जी महाराज से विशेष संवाद किया। प्रस्तुत हैं इस विस्तृत साक्षात्कार के प्रमुख अंश -
प्रश्न: गुरुदेव, आपके विचार में जैन धर्म, सनातन संस्कृति और भारतीय राष्ट्रवाद का आपसी संबंध क्या है?
आचार्य श्री सूर्यसागर जी: जैन धर्म और सनातन संस्कृति किसी विरोध के नहीं, बल्कि एक ही महान भारतीय आध्यात्मिक परिवार के दो सुदृढ़ स्तंभ हैं। दोनों ही अहिंसा, नैतिकता, लोककल्याण और वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना पर आधारित हैं। सच्चा भारतीय राष्ट्रवाद इन्हीं सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों से शक्ति प्राप्त करता है।
प्रश्न: जैन धर्म को अहिंसा का धर्म कहा जाता है। आपके अनुसार अहिंसा, आत्मरक्षा और राष्ट्रधर्म के बीच क्या संतुलन होना चाहिए?
उत्तर: अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना और राष्ट्र की रक्षा करना धर्म का अभिन्न अंग है। जैन धर्म में अहिंसा का अर्थ कायरता नहीं है। यदि उद्देश्य प्रतिशोध नहीं, बल्कि धर्म, समाज और राष्ट्र की रक्षा हो, तो न्याय के लिए दृढ़ता भी धर्म का ही स्वरूप है।
प्रश्न: आपके प्रवचनों में राष्ट्र, संस्कृति और सनातन मूल्यों की चर्चा प्रमुखता से होती है। इसकी प्रेरणा आपको कहाँ से मिली?
उत्तर: मैं स्वयं को केवल जैन संन्यासी के रूप में सीमित नहीं मानता। मैं राष्ट्र और सनातन संस्कृति के लिए आवाज़ उठाता हूँ, इसलिए मैं सभी का हूँ। राष्ट्र और संस्कृति की सेवा का संकल्प मुझे आध्यात्मिक चेतना तथा जैन दर्शन के लोककल्याण और वसुधैव कुटुम्बकम् के सिद्धांतों से मिला है। राष्ट्र और संस्कृति सुरक्षित रहेंगे, तभी धर्म और नैतिक मूल्य भी सुरक्षित रहेंगे। समाज में राष्ट्रबोध और संस्कारों का जागरण ही मेरा ध्येय है।
प्रश्न: आज सोशल मीडिया पर संतों के वक्तव्यों को संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया जाता है। समाज सत्य और भ्रम में अंतर कैसे करे?
उत्तर: आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और सोशल मीडिया के दौर में भ्रम फैलाना पहले से अधिक आसान हो गया है। किसी भी छोटी क्लिप पर विश्वास करने के बजाय पूरा वीडियो या पूरा भाषण देखना चाहिए। संबंधित व्यक्ति के आधिकारिक मंचों से पुष्टि करनी चाहिए। बिना सत्यापन के किसी सामग्री को साझा नहीं करना चाहिए। विवेक का प्रयोग करें और हर बात को तार्किक कसौटी पर परखें।
प्रश्न: आज की युवा पीढ़ी वैश्वीकरण और तकनीकी युग में जी रही है। उन्हें आपका क्या संदेश है?
उत्तर: युवा तकनीक के स्वामी बनें, उसके गुलाम नहीं। वैश्वीकरण के बीच अपनी सांस्कृतिक पहचान और मौलिकता को बनाए रखें तथा अध्यात्म के माध्यम से मन को संतुलित रखें। ऐसा युवा ही एक सशक्त, चरित्रवान और राष्ट्रनिष्ठ भारत का निर्माण करेगा।
प्रश्न: वर्ष 2047 तक भारत को शक्तिशाली और नैतिक राष्ट्र बनाने में संत समाज, शिक्षा व्यवस्था और नागरिकों की क्या भूमिका होनी चाहिए?
उत्तर: 2047 का विकसित और सशक्त भारत तभी बनेगा जब संत समाज सही दिशा देगा, शिक्षा व्यवस्था योग्य और संस्कारित नागरिक तैयार करेगी तथा प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करेगा।
प्रश्न: जो लोग धर्म को केवल व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित मानते हैं, उन्हें आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर: राष्ट्र सुरक्षित रहेगा, तभी व्यक्ति और उसका धर्म भी सुरक्षित रहेगा। धर्म हमें केवल व्यक्तिगत मुक्ति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यनिष्ठा भी सिखाता है। "राष्ट्र प्रथम" की भावना ही सच्चे धर्म का विस्तार है।
प्रश्न: वर्तमान में नीट परीक्षा को लेकर देशभर में आंदोलन चल रहे हैं। कुछ लोग इसे "कॉकरोच जनता पार्टी" का आंदोलन बताते हैं, जबकि अन्य इसे छात्रों की वास्तविक चिंता मानते हैं। आपकी दृष्टि क्या है?
उत्तर: शिक्षा ही राष्ट्र निर्माण का आधार है। यदि परीक्षा प्रणाली से युवाओं का विश्वास उठने लगे तो यह पूरे राष्ट्र के लिए चिंता का विषय है। सरकार, छात्र और समाज—तीनों को मिलकर ऐसी पारदर्शी, निष्पक्ष और विश्वसनीय शिक्षा व्यवस्था बनानी चाहिए, जहाँ प्रत्येक युवा अपने भविष्य को सुरक्षित और सम्मानजनक महसूस करे।
प्रश्न: अंत में देशवासियों के लिए आपका संदेश?
उत्तर: मेरा सभी देशवासियों से केवल एक ही आग्रह है कि सामाजिक समरसता, भाईचारा, एकजुटता, सत्य, सेवा, सनातन मूल्य, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना तथा राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें। मैं दिवाकर शर्मा जी, क्रांतिदूत डॉट इन के सभी पाठकों और श्रोताओं को अपना आशीर्वाद देता हूँ तथा इस संवाद के लिए उनका हृदय से धन्यवाद करता हूँ।
जय श्रीराम। वंदे मातरम्। भारत माता की जय। जय हिंद।
संपादकीय टिप्पणी
इस विशेष संवाद में आचार्य श्री सूर्यसागर जी महाराज ने जैन दर्शन, राष्ट्रधर्म, अहिंसा, आत्मरक्षा, सनातन संस्कृति, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक समरसता जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर अपने स्पष्ट एवं विचारोत्तेजक दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। उनके विचार केवल जैन समाज तक सीमित नहीं हैं, बल्कि प्रत्येक भारतीय के लिए चिंतन और आत्ममंथन का विषय हैं।
क्रांतिदूत डॉट इन को आशा है कि यह विशेष साक्षात्कार राष्ट्र, समाज और संस्कृति से जुड़े विमर्श को नई दिशा प्रदान करेगा।
दिवाकर शर्मा
संपादक, क्रांतिदूत डॉट इन
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साक्षात्कार

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