लेबल

कॉकरोच आंदोलन: संघ-भाजपा के लिए चेतावनी - दिवाकर शर्मा

 



लोकतांत्रिक राजनीति में किसी भी संगठन या दल की सबसे बड़ी शक्ति केवल उसका नेतृत्व नहीं होता, बल्कि उसका कार्यकर्ता, समाज से उसका जीवंत संवाद और समय के साथ स्वयं को बदलने की क्षमता होती है। जब कोई आंदोलन अचानक व्यापक चर्चा का विषय बन जाता है और उसके कारण वर्षों से स्थापित संगठन भी रक्षात्मक मुद्रा में दिखाई देने लगते हैं, तो यह केवल उस आंदोलन की सफलता नहीं बल्कि संबंधित संगठनों के लिए आत्ममंथन का अवसर भी होता है। यदि हाल के तथाकथित "कॉकरोच आंदोलन" ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के भीतर कुछ प्रश्नों को उभार दिया है, तो उन प्रश्नों को विरोध या समर्थन की दृष्टि से नहीं बल्कि संगठनात्मक सुधार के दृष्टिकोण से देखना अधिक उचित होगा।

संघ और भाजपा की सबसे बड़ी पहचान यह रही है कि उन्होंने दशकों तक वैचारिक प्रतिबद्धता, अनुशासन और समर्पित कार्यकर्ताओं के बल पर अपना विस्तार किया। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में अनेक कार्यकर्ताओं के बीच यह भावना बढ़ी है कि संगठन के भीतर समर्पण और वर्षों की तपस्या की अपेक्षा अवसरवाद, संपर्क और प्रभाव को अधिक महत्व मिलने लगा है। यदि किसी संगठन में बैक डोर एंट्री से आने वाले लोग अपेक्षाकृत कम समय में प्रभावशाली स्थान प्राप्त करने लगें और वर्षों तक निस्वार्थ कार्य करने वाले कार्यकर्ता स्वयं को उपेक्षित महसूस करें, तो इससे संगठन की आंतरिक ऊर्जा कमजोर होना स्वाभाविक है।

राजनीतिक दल चलाने और जनआंदोलनों का सामना करने में मूलभूत अंतर होता है। चुनावी राजनीति में संसाधन, प्रचार, संगठन और रणनीति महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि जनआंदोलनों का उत्तर केवल राजनीतिक भाषणों से नहीं दिया जा सकता। आंदोलनों के पीछे खड़ी भावनाओं, युवाओं की मानसिकता, सामाजिक मनोविज्ञान और बदलते संचार माध्यमों को समझना आवश्यक होता है। यदि किसी आंदोलन को प्रारंभिक स्तर पर ही समझने के बजाय केवल विरोधी राजनीति का परिणाम मान लिया जाए, तो कई बार वास्तविक परिस्थितियों का सही आकलन नहीं हो पाता।

एक महत्वपूर्ण चिंता सोशल मीडिया और डिजिटल संचार की भी है। वर्ष 2014 के आसपास जिस प्रकार सोशल मीडिया भाजपा की सबसे बड़ी ताकत माना जाता था, आज परिस्थितियाँ काफी बदल चुकी हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म केवल संदेश प्रसारित करने का माध्यम नहीं रहे, बल्कि वे विचारों के संघर्ष, तथ्य-जांच, त्वरित प्रतिक्रिया और जनभावनाओं को समझने का मंच बन चुके हैं। यदि सोशल मीडिया टीम केवल प्रचार सामग्री साझा करने तक सीमित रह जाए, बौद्धिक स्तर पर प्रभावी संवाद स्थापित न कर सके या केवल पीआर एजेंसियों के भरोसे काम करे, तो वह जनता के वास्तविक प्रश्नों का उत्तर देने में सफल नहीं हो सकती।

स्थानीय स्तर पर भी संवादहीनता एक गंभीर समस्या बनती दिखाई देती है। अनेक स्थानों पर यह शिकायत सुनाई देती है कि पदाधिकारी समाज के व्यापक वर्गों के बजाय केवल सीमित लोगों के बीच ही सक्रिय रहते हैं। इससे संगठन और समाज के बीच दूरी बढ़ती है। जब जमीनी स्तर की वास्तविक जानकारी के स्थान पर केवल कागजी रिपोर्टों पर विश्वास किया जाता है, तब शीर्ष नेतृत्व तक सही स्थिति पहुँच ही नहीं पाती। परिणामस्वरूप निर्णय भी अधूरी या गलत जानकारी के आधार पर लिए जाने लगते हैं।

भाजपा और संघ दोनों की ऐतिहासिक शक्ति उनके मूल कार्यकर्ता रहे हैं। यही कार्यकर्ता कठिन परिस्थितियों में भी संगठन के साथ खड़े रहे। यदि वही कार्यकर्ता स्वयं को अनसुना और उपेक्षित महसूस करने लगें, जबकि अवसरवादी लोग तेजी से आगे बढ़ते दिखाई दें, तो इससे संगठनात्मक मनोबल प्रभावित होना स्वाभाविक है। किसी भी बड़े संगठन के लिए यह स्थिति दीर्घकाल में चुनौती बन सकती है।

नई पीढ़ी की सोच को समझना भी समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। आज का युवा केवल भाषण नहीं सुनता, वह प्रश्न पूछता है, तथ्य खोजता है और तुरंत प्रतिक्रिया देता है। उसे केवल पारंपरिक शैली में संबोधित करना पर्याप्त नहीं है। यदि संगठन नई पीढ़ी की अपेक्षाओं, भाषा, तकनीक और संवाद शैली को नहीं समझेगा, तो वैचारिक रूप से मजबूत होते हुए भी प्रभाव के स्तर पर पीछे रह सकता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न नेतृत्व की निर्णय प्रक्रिया से जुड़ा है। वास्तविक समर्पित कार्यकर्ता और केवल स्वार्थवश जुड़े व्यक्ति के बीच अंतर करना किसी भी संगठन की सबसे बड़ी प्रशासनिक क्षमता होती है। यदि इस पहचान में लगातार त्रुटियाँ होने लगें, तो योग्य लोग हाशिये पर चले जाते हैं और संगठन की निर्णय क्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होने लगती है। इसका प्रभाव चुनावी सफलता से कहीं अधिक संगठन की दीर्घकालिक विश्वसनीयता पर पड़ता है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी संगठन की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आत्मालोचना की क्षमता होती है। इतिहास गवाह है कि जो संगठन समय-समय पर स्वयं का मूल्यांकन करते रहे, उन्होंने लंबे समय तक समाज का विश्वास बनाए रखा। जबकि जो संगठन केवल प्रशंसा सुनने के आदी हो गए, वे धीरे-धीरे वास्तविकताओं से कटते चले गए। यदि संघ और भाजपा स्वयं को केवल चुनाव जीतने वाली संस्थाओं के रूप में नहीं बल्कि राष्ट्र जीवन में दीर्घकालिक भूमिका निभाने वाले वैचारिक संगठनों के रूप में देखते हैं, तो उन्हें जमीनी कार्यकर्ताओं का सम्मान, वास्तविक फीडबैक, बौद्धिक नेतृत्व का विकास, सोशल मीडिया की नई चुनौतियों के अनुरूप रणनीति, स्थानीय स्तर पर समाज से सतत संवाद तथा अवसरवाद पर नियंत्रण जैसे विषयों पर गंभीरता से कार्य करना होगा।

हर आंदोलन सही हो, यह आवश्यक नहीं और हर आलोचना अनुचित हो, यह भी सत्य नहीं। परंतु प्रत्येक बड़ा आंदोलन यह संकेत अवश्य देता है कि समाज के किसी वर्ग में कुछ प्रश्न, कुछ असंतोष या कुछ नई अपेक्षाएँ जन्म ले रही हैं। ऐसे संकेतों को समय रहते समझ लेना किसी भी बड़े संगठन की परिपक्वता का प्रमाण होता है। आज आवश्यकता आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि आत्ममंथन की है। यदि वर्षों की तपस्या से खड़े हुए संगठन अपने मूल सिद्धांतों, समर्पित कार्यकर्ताओं और समाज से जीवंत संवाद की परंपरा को पुनः केंद्र में रख सकें, तो वे न केवल वर्तमान चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर पाएँगे, बल्कि भविष्य में भी अपनी वैचारिक और संगठनात्मक प्रासंगिकता को और अधिक सुदृढ़ बना सकेंगे। स्वस्थ लोकतंत्र में रचनात्मक आलोचना विरोध नहीं, बल्कि सुधार का अवसर होती है और जो संगठन समय रहते ऐसी आलोचना को सुनकर स्वयं को बेहतर बनाते हैं, वही इतिहास में सबसे अधिक टिकाऊ सिद्ध होते हैं।

एक टिप्पणी भेजें

एक टिप्पणी भेजें