नरोत्तम को चुनौती या सियासी स्टंट? दतिया BJP में टिकट पर हलचल
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दतिया विधानसभा उपचुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी में सियासी हलचल अब खुलकर सामने आने लगी है। जिस सीट पर अब तक यह माना जा रहा था कि पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की दावेदारी लगभग तय है, वहीं अब पार्टी के एक पुराने कार्यकर्ता ने खुलेआम टिकट की मांग कर राजनीतिक चर्चा को नया मोड़ दे दिया है। भारतीय जनता युवा मोर्चा के पूर्व जिला अध्यक्ष मुकेश मुड़ोतिया ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पत्र लिखकर स्वयं को उम्मीदवार बनाने की मांग की है। इस कदम ने दतिया की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 2008 के बाद पहली बार दतिया में किसी भाजपा नेता ने सार्वजनिक रूप से ऐसी दावेदारी पेश की है, जबकि यह क्षेत्र लंबे समय तक डॉ. नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव का केंद्र माना जाता रहा है। यही कारण है कि मुड़ोतिया का यह पत्र केवल एक आवेदन नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति में एक साहसिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
बताया जा रहा है कि मुकेश मुड़ोतिया ने अपना पत्र भाजपा के शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचाया है। पत्र में उन्होंने "स्थानीय बनाम बाहरी" का मुद्दा प्रमुखता से उठाते हुए लिखा कि जिस चेहरे को टिकट दिए जाने की चर्चा है, वह दतिया का स्थायी निवासी नहीं है। उन्होंने आग्रह किया कि इस बार किसी स्थानीय, सक्रिय और वर्षों से संगठन के लिए कार्य कर रहे कार्यकर्ता को अवसर दिया जाए ताकि जमीनी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़े और जनता के बीच सकारात्मक संदेश जाए।
अपने दावे को मजबूत करने के लिए मुड़ोतिया ने संगठन में चार दशक की सक्रियता, वर्ष 2000 से 2005 तक लगातार दो कार्यकाल तक भारतीय जनता युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष रहने, उत्तर प्रदेश और हरियाणा विधानसभा चुनावों में प्रवासी सह प्रभारी के रूप में जिम्मेदारी निभाने तथा विभिन्न सामाजिक कार्यों का भी विस्तार से उल्लेख किया है। उनका प्रयास यह बताने का है कि उन्होंने संगठन के लिए वर्षों तक मेहनत की है और अब उन्हें भी अवसर मिलना चाहिए।
हालांकि भाजपा के भीतर से जो संकेत मिल रहे हैं, वे अब भी डॉ. नरोत्तम मिश्रा के पक्ष में ही दिखाई देते हैं। पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष रणवीर सिंह रावत ने स्पष्ट कहा कि टिकट मांगना हर कार्यकर्ता का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन अंतिम निर्णय पार्टी हाईकमान जीत की संभावना, संगठनात्मक समीकरण और उम्मीदवार की स्वीकार्यता को ध्यान में रखकर करता है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि डॉ. नरोत्तम मिश्रा एक मजबूत दावेदार हैं और उनकी जीत की संभावना भी काफी अधिक मानी जाती है।
दतिया भाजपा के जिलाध्यक्ष रघुवीर कुशवाहा ने भी मुड़ोतिया की दावेदारी पर किसी प्रकार की आपत्ति नहीं जताई। उनका कहना था कि प्रत्येक कार्यकर्ता को अपनी बात संगठन के सामने रखने का पूरा अधिकार है और अंतिम निर्णय पार्टी नेतृत्व ही करेगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुकेश मुड़ोतिया का यह कदम चर्चा जरूर बटोर रहा है, लेकिन इससे भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की रणनीति बदलती हुई फिलहाल दिखाई नहीं देती। डॉ. नरोत्तम मिश्रा केवल एक पूर्व मंत्री नहीं, बल्कि दतिया की राजनीति का ऐसा स्थापित चेहरा हैं जिन्होंने 1990, 1998 और 2003 में डबरा से जीत दर्ज की। डबरा सीट आरक्षित होने के बाद उन्होंने दतिया का रुख किया और 2008, 2013 तथा 2018 में लगातार तीन बार विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ साबित की। वर्ष 2023 में उन्हें कांग्रेस उम्मीदवार राजेंद्र भारती से हार का सामना जरूर करना पड़ा, लेकिन संगठन में उनका कद आज भी कम नहीं माना जाता।
यही वजह है कि भाजपा के अंदर चाहे कुछ स्वर स्थानीय चेहरे की मांग उठाते दिखाई दें, लेकिन अधिकांश राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजरें अब भी उसी नाम पर टिकी हैं जिसने वर्षों तक दतिया की राजनीति को दिशा दी है। माना जा रहा है कि यदि भाजपा उपचुनाव को प्रतिष्ठा का चुनाव मानती है, तो संगठन अनुभव, जनाधार और जीत की क्षमता जैसे तीनों पैमानों पर सबसे मजबूत दावेदार के रूप में डॉ. नरोत्तम मिश्रा पर ही दांव लगा सकता है।
अब सबकी निगाहें भाजपा हाईकमान के अंतिम फैसले पर हैं। मुकेश मुड़ोतिया की दावेदारी ने राजनीतिक माहौल जरूर गर्मा दिया है, लेकिन असली सवाल अभी भी वही है कि क्या भाजपा इस उपचुनाव में नए चेहरे पर प्रयोग करेगी, या फिर दतिया का सबसे चर्चित और सबसे अनुभवी चेहरा एक बार फिर कमल का चुनावी सेनापति बनेगा? फिलहाल सियासी गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा इसी सवाल की है।
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मध्यप्रदेश

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