दतिया का चुनावी एक्स-रे: आंकड़े बता रहे हैं किसकी बनेगी सरकार
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दतिया विधानसभा उपचुनाव 2026 का चुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं है, बल्कि पिछले लगभग दो दशकों की राजनीतिक यात्रा का परिणाम भी है। यदि 2008 से लेकर 2023 तक के सभी चुनावों को एक साथ रखकर देखा जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि दतिया में केवल दल नहीं जीतते, बल्कि प्रत्याशी, संगठन, सामाजिक समीकरण और तीसरे उम्मीदवार की भूमिका मिलकर परिणाम तय करते हैं। यही कारण है कि इस बार का चुनाव भी सामान्य नहीं बल्कि राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत रोचक माना जा रहा है।
यदि इतिहास के पन्ने पलटे जाएँ तो 2008 का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण दिखाई देता है। भाजपा के नरोत्तम मिश्रा को 34,489 मत (34.10%) मिले और उन्होंने 11,233 मतों से जीत दर्ज की। लेकिन उस चुनाव की सबसे बड़ी कहानी जीत नहीं, बल्कि वोटों का बिखराव था। बसपा के राजेन्द्र भारती ने 23,256 मत (22.99%) प्राप्त कर कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह को पीछे छोड़ दिया, जिन्हें मात्र 19,209 मत (18.99%) मिले। वहीं उमा भारती की भारतीय जनशक्ति पार्टी के प्रत्याशी अवधेश नायक ने 13,830 मत (13.67%) प्राप्त किए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना रहा कि अवधेश नायक ने भाजपा, विशेषकर लोधी एवं भाजपा समर्थक वोटों में सेंध लगाई थी। इसके बावजूद भाजपा जीत गई। यहीं से दतिया की राजनीति का पहला बड़ा संदेश मिलता है कि जब भी तीसरा प्रत्याशी मजबूत होता है, वह किसी न किसी प्रमुख दल का खेल बिगाड़ देता है।
2008 का चुनाव एक दूसरा महत्वपूर्ण संकेत भी देता है। यदि कांग्रेस ने उस समय घनश्याम सिंह के स्थान पर बसपा में रहे राजेन्द्र भारती जैसे प्रभावशाली स्थानीय चेहरे को उम्मीदवार बनाया होता, तो मुकाबला कहीं अधिक कठिन हो सकता था। राजेन्द्र भारती कांग्रेस प्रत्याशी से लगभग 4,000 अधिक वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे थे। बाद की राजनीति ने भी यह साबित किया कि राजेन्द्र भारती का जनाधार लगातार बढ़ा। यही नेता आगे चलकर कांग्रेस में आए और 2018 तथा 2023 में कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत बने।
2013 में परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल गईं। भाजपा सरकार, मजबूत संगठन और नरोत्तम मिश्रा की व्यक्तिगत पकड़ के कारण उन्हें 57,438 मत (44.16%) मिले। कांग्रेस के राजेन्द्र भारती को 45,357 मत (34.87%), जबकि बसपा के कालीचरण कुशवाह को 20,191 मत (15.52%) प्राप्त हुए। नरोत्तम मिश्रा ने लगातार दूसरी बार 12,081 मतों से जीत दर्ज की। यह भाजपा के संगठन और नरोत्तम मिश्रा की व्यक्तिगत लोकप्रियता का स्वर्णकाल माना गया।
2018 में कहानी फिर बदल गई। प्रदेशभर में भाजपा विरोधी माहौल था। दतिया में भी ब्राह्मण समाज, व्यापारी वर्ग, संघ के कुछ स्वयंसेवकों और पुराने भाजपा कार्यकर्ताओं की नाराजगी खुलकर सामने आने लगी। बसपा का बड़ा वोट कांग्रेस की ओर स्थानांतरित हुआ। इसके बावजूद नरोत्तम मिश्रा 72,209 मत (49.20%) प्राप्त कर चुनाव जीत गए, जबकि कांग्रेस के राजेन्द्र भारती 69,553 मत लेकर मात्र 2,656 मतों से हार गए। यह चुनाव बताता है कि भाजपा विरोधी माहौल होने के बावजूद नरोत्तम मिश्रा का व्यक्तिगत आधार तब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था।
2023 में वही असंतोष निर्णायक बन गया। कांग्रेस के राजेन्द्र भारती ने 88,977 मत (50.34%) प्राप्त किए, जबकि भाजपा के नरोत्तम मिश्रा 81,235 मत (45.96%) पर सिमट गए। कांग्रेस ने 7,742 मतों से जीत दर्ज की। राजनीतिक विश्लेषकों ने माना कि बसपा समर्थक मत, सहानुभूति और भाजपा के भीतर वर्षों से चली आ रही नाराजगी एक साथ कांग्रेस के पक्ष में चली गई। अब 2026 के उपचुनाव की तस्वीर पूरी तरह अलग दिखाई देती है।
भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा के स्थान पर युवा, सहज, सरल और मृदुभाषी आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार यह केवल प्रत्याशी परिवर्तन नहीं, बल्कि भाजपा की रणनीतिक पुनर्स्थापना थी। जिन ब्राह्मणों, व्यापारियों, पुराने कार्यकर्ताओं और संघ स्वयंसेवकों में वर्षों से नाराजगी थी, उन्हें वापस जोड़ने का प्रयास इसी बदलाव के माध्यम से किया गया। चुनाव प्रचार के दौरान नरोत्तम मिश्रा स्वयं भी उसी सक्रियता से मैदान में रहे जैसे वे स्वयं चुनाव लड़ रहे हों। उन्होंने अपने समर्थकों को एकजुट किया और भाजपा के भीतर की नाराजगी को काफी हद तक शांत करने का प्रयास किया। दूसरी ओर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित अनेक वरिष्ठ नेताओं ने चुनाव को प्रतिष्ठा का विषय बनाकर व्यापक प्रचार किया। आशुतोष तिवारी की उमा भारती से निकटता के कारण लोधी समाज में भी सकारात्मक संदेश जाने की चर्चा रही।
इसके विपरीत कांग्रेस ने घनश्याम सिंह को उम्मीदवार बनाया। यही घनश्याम सिंह 2008 में केवल 18.99 प्रतिशत मत लेकर तीसरे स्थान पर रहे थे। जबकि पिछले दो विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की पूरी चुनावी ताकत राजेन्द्र भारती के इर्द-गिर्द दिखाई दी थी। इसलिए यह माना जा रहा है कि कांग्रेस इस बार अपने सबसे प्रभावी चुनावी चेहरे के बिना मैदान में उतरी।
इस चुनाव का सबसे रोचक पहलू आजाद समाज पार्टी के दामोदर सिंह यादव हैं। यदि वे 10 से 15 प्रतिशत मत प्राप्त करते हैं तो इतिहास लगभग 18 वर्ष बाद स्वयं को दोहराता दिखाई देगा। फर्क केवल इतना होगा कि 2008 में भारतीय जनशक्ति पार्टी ने भाजपा का संभावित वोट काटा था, जबकि इस बार दामोदर सिंह यादव विपक्षी, विशेषकर कांग्रेस समर्थक ओबीसी और असंतुष्ट मतों में अधिक प्रभाव डाल सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो कांग्रेस का गणित सबसे अधिक प्रभावित होगा।
यही कारण है कि 2026 का चुनाव केवल भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं है, बल्कि 2008 की वोट कटवा राजनीति, 2018 की नाराजगी, 2023 की सहानुभूति और 2026 की संगठनात्मक वापसी इन चारों राजनीतिक अध्यायों का संगम है।
यदि उपलब्ध चुनावी आंकड़ों, पिछले मतदान पैटर्न, प्रत्याशियों की स्वीकार्यता, संगठन की सक्रियता और तीसरे उम्मीदवार के संभावित प्रभाव को एक साथ रखकर देखा जाए, तो इस बार भाजपा स्पष्ट बढ़त बनाती हुई दिखाई देती है। अनुमान है कि भाजपा 45 से 50 प्रतिशत, कांग्रेस 33 से 38 प्रतिशत तथा आजाद समाज पार्टी 10 से 15 प्रतिशत मत प्राप्त कर सकती है। यदि मतदान का रुझान इसी दिशा में गया तो भाजपा 8,000 से 15,000 मतों के अंतर से जीत दर्ज कर सकती है। यदि तीसरे प्रत्याशी का प्रभाव अपेक्षा से अधिक हुआ तो जीत का अंतर इससे भी अधिक हो सकता है।
राजनीति में अंतिम निर्णय हमेशा मतदाता करता है, इसलिए किसी भी विश्लेषण को अंतिम परिणाम नहीं माना जा सकता। लेकिन पिछले चार विधानसभा चुनावों के आंकड़े एक बात अवश्य बताते हैं कि दतिया में जब भाजपा का संगठन एकजुट रहा, तब उसने जीत दर्ज की, जब संगठन बिखरा, तब कांग्रेस को अवसर मिला और जब तीसरा प्रत्याशी मजबूत हुआ, तब उसने किसी न किसी बड़े दल का समीकरण अवश्य बिगाड़ा। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर 2026 का उपचुनाव इन तीनों सूत्रों का मेल दिखाई देता है और इसी कारण वर्तमान परिस्थितियों में भाजपा का पलड़ा अपेक्षाकृत भारी नजर आता है।
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