धर्मेंद्र प्रधान ही निशाने पर क्यों? - दिवाकर शर्मा
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भारत का इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन का प्रयास हुआ है, तब-तब सबसे तीखा प्रतिरोध भी उसी अनुपात में सामने आया है। शिक्षा भी इसका अपवाद नहीं है। आज यदि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान लगातार राजनीतिक हमलों के केंद्र में हैं, तो प्रश्न केवल इतना नहीं है कि पेपर लीक क्यों हुए बल्कि यह भी है कि आखिर निशाना सबसे अधिक उन्हीं पर क्यों साधा जा रहा है? क्या यह केवल छात्रों के भविष्य की चिंता है, या फिर भारत की शिक्षा व्यवस्था में चल रहे एक बड़े वैचारिक, आर्थिक और राजनीतिक संघर्ष का संकेत?
धर्मेंद्र प्रधान ने शिक्षा मंत्रालय संभालने के बाद राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के क्रियान्वयन को गति दी। भारतीय भाषाओं को महत्व, भारतीय ज्ञान परंपरा का समावेश, अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट (ABC), मल्टीपल एंट्री-एग्जिट व्यवस्था, राष्ट्रीय क्रेडिट फ्रेमवर्क, कौशल आधारित शिक्षा, उद्योगों से जुड़ाव, डिजिटल शिक्षा, PM SHRI विद्यालय, नई NCERT पुस्तकें, शोध एवं नवाचार पर बल तथा विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए नई नीति जैसे अनेक परिवर्तन शुरू हुए। समर्थकों की दृष्टि में यह केवल शिक्षा सुधार नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी शिक्षा क्रांति की शुरुआत है।
यदि वास्तव में यह परिवर्तन अपनी पूर्णता तक पहुँचते हैं, तो सबसे अधिक नुकसान किसका होगा? उन नेटवर्कों का, जिनकी कमाई भर्ती घोटालों, पेपर लीक, नकल उद्योग और परीक्षा आधारित भ्रष्टाचार पर निर्भर रही है। उन संस्थागत हितों का, जिनकी आर्थिक संरचना पुरानी परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था से जुड़ी रही है। उन लोगों का, जिनके लिए शिक्षा केवल डिग्री बेचने का माध्यम बन गई है और उन वैचारिक समूहों का भी, जो भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा में स्थान दिए जाने का विरोध करते रहे हैं। स्वाभाविक है कि इतने बड़े बदलाव का विरोध भी उतना ही व्यापक होगा।
पेपर लीक कोई नई बीमारी नहीं है। स्वतंत्रता के बाद दशकों तक इसका कोई राष्ट्रीय रिकॉर्ड ही नहीं रखा गया। 2002 से 2025 के बीच कम से कम 45 बड़े पेपर लीक प्रकरण सामने आए। करोड़ों अभ्यर्थी प्रभावित हुए। हजारों गिरफ्तारियाँ हुईं। सैकड़ों आरोपपत्र दायर हुए। लेकिन दोषसिद्धि अत्यंत कम रही। यह बताता है कि समस्या किसी एक सरकार या एक मंत्री की नहीं, बल्कि वर्षों से जड़ें जमा चुके संगठित अपराध की है। इतिहास पर दृष्टि डालें तो 2011 के AIEEE मामले में जांच हुई, गिरफ्तारियाँ हुईं, पर राष्ट्रीय राजनीतिक तूफान नहीं उठा। 2015 के AIPMT मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने परीक्षा रद्द कराई, CBI जांच हुई, पर शिक्षा मंत्री का इस्तीफा राष्ट्रीय मांग नहीं बना। 2018 के SSC-CGL मामले में हजारों छात्रों ने CBI जांच की मांग को लेकर आंदोलन किया, लेकिन तब भी राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं था। फिर 2024 और 2026 के NEET मामलों में अचानक पूरा राजनीतिक विमर्श केवल "शिक्षा मंत्री हटाओ" तक कैसे पहुँच गया? क्या इसका उत्तर केवल पेपर लीक है? या फिर इसके पीछे राजनीति की नई रणनीति भी काम कर रही है? यह प्रश्न पूछना लोकतंत्र में अनुचित नहीं है।
हाल के वर्षों में जांच एजेंसियों ने कई मामलों में कोचिंग नेटवर्क, बिचौलियों और संगठित अपराध से जुड़े लोगों की भूमिका की भी जांच की है। राजस्थान REET से लेकर NEET तक अनेक मामलों में निजी नेटवर्क जांच के दायरे में आए। इससे यह संकेत अवश्य मिलता है कि शिक्षा क्षेत्र में केवल सरकारी तंत्र ही नहीं, बल्कि बाहरी आर्थिक हित भी सक्रिय हो सकते हैं। इसी बीच सोशल मीडिया पर दिल्ली में 20 जुलाई को हुए एक कथित छात्र प्रदर्शन का वीडियो भी व्यापक चर्चा का विषय बना। वीडियो में यह दावा किया गया कि कुछ कोचिंग संस्थान अपने छात्रों को विरोध प्रदर्शनों में भेजने के लिए दबाव या आर्थिक प्रोत्साहन देते हैं। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी आवश्यक है, इसलिए इन्हें अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। लेकिन यदि ऐसे आरोपों में सत्य का अंश भी है, तो यह केवल शिक्षा का नहीं, लोकतंत्र का भी गंभीर प्रश्न है। यदि छात्र आंदोलनों का उपयोग किसी भी प्रकार के व्यावसायिक या राजनीतिक हित के लिए किया जाता है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
आज शिक्षा देश का सबसे बड़ा कारोबार बन चुकी है। लाखों परिवार अपनी आय का बड़ा हिस्सा कोचिंग, प्रवेश परीक्षाओं और निजी संस्थानों पर खर्च करते हैं। शिक्षा सेवा कम और उद्योग अधिक दिखाई देने लगी है। ऐसे में यह मान लेना कि इस विशाल आर्थिक व्यवस्था के कोई संगठित हित नहीं होंगे, शायद यथार्थ से आँखें मूँद लेना होगा। धर्मेंद्र प्रधान के समर्थक उन्हें "शिक्षा क्रांति का दूत" इसलिए कहते हैं क्योंकि उनका घोषित लक्ष्य रटने की संस्कृति से हटकर कौशल, शोध, नवाचार और रोजगारोन्मुख शिक्षा की ओर बढ़ना है। यदि यह मॉडल सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय शिक्षा की दिशा बदल सकती है। यही कारण है कि समर्थकों का मानना है कि उनके हर कदम का विरोध केवल नीतिगत असहमति नहीं, बल्कि स्थापित हितों की प्रतिक्रिया भी हो सकता है।
लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि सरकार आलोचना से ऊपर है। यदि पेपर लीक हुए हैं, तो उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। यदि परीक्षा प्रणाली में कमियाँ हैं, तो उन्हें दूर करना सरकार का दायित्व है। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही है, तो कार्रवाई होनी चाहिए। लोकतंत्र में जवाबदेही आवश्यक है। उतना ही आवश्यक यह भी है कि किसी अपराध का राजनीतिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति पर भी प्रश्न पूछे जाएँ। क्या हर पेपर लीक केवल सरकार की विफलता है, या उसके पीछे वर्षों से सक्रिय संगठित अपराध भी है? क्या छात्र आंदोलन पूरी तरह स्वतःस्फूर्त हैं, या कहीं-कहीं राजनीतिक और आर्थिक हित भी उन्हें दिशा देने का प्रयास करते हैं? क्या शिक्षा सुधारों का विरोध केवल छात्रों का है, या उन वर्गों का भी है जिन्हें परिवर्तन से नुकसान होने की आशंका है?
इन प्रश्नों के उत्तर केवल टीवी बहसों, सोशल मीडिया अभियानों या राजनीतिक नारों से नहीं मिलेंगे। इनके लिए निष्पक्ष जांच, पारदर्शी व्यवस्था और तथ्यों पर आधारित विमर्श की आवश्यकता है।
भारत को तय करना होगा कि वह शिक्षा को राजनीतिक अखाड़ा बनाएगा या राष्ट्रीय निर्माण का आधार। यदि सुधार ईमानदारी से लागू होते हैं, यदि पेपर लीक माफिया पर निर्णायक प्रहार होता है, यदि कोचिंग उद्योग और भर्ती भ्रष्टाचार के गठजोड़ पर कठोर कार्रवाई होती है और यदि विद्यार्थियों का भविष्य किसी भी प्रकार के अपराध या राजनीति से ऊपर रखा जाता है, तभी वास्तविक शिक्षा क्रांति संभव होगी।
इतिहास में परिवर्तन के वाहक अक्सर सबसे अधिक विरोध झेलते हैं। समय ही बताएगा कि धर्मेंद्र प्रधान का नाम भारत के शिक्षा इतिहास में एक साधारण मंत्री के रूप में दर्ज होगा या उस व्यक्ति के रूप में जिसने व्यवस्था बदलने का प्रयास किया। परंतु इतना निश्चित है कि शिक्षा का भविष्य नारों से नहीं, नीतियों, पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदार क्रियान्वयन से तय होगा।
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दिवाकर की दुनाली से

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