कांग्रेस में दिग्गी की उलटी गिनती?
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मध्यप्रदेश कांग्रेस में पिछले कुछ दिनों से जिस तेजी से घटनाक्रम बदले हैं, उन्होंने केवल संगठन के भीतर ही नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक गलियारे में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। सवाल अब केवल दिग्विजय सिंह के एक बयान का नहीं रह गया है, बल्कि इस बात का है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व अब उनकी उस कार्यशैली से असहज होता जा रहा है, जो कई बार पार्टी के तय एजेंडे को पीछे धकेलकर भाजपा को राजनीतिक लाभ लेने का अवसर दे देती है? इसका कोई आधिकारिक उत्तर अभी नहीं है, लेकिन घटनाओं का क्रम कई संकेत अवश्य देता है।
विवाद की शुरुआत उज्जैन में ट्रस्ट को एक रुपये में लगभग 500 एकड़ जमीन दिए जाने के मुद्दे पर दिग्विजय सिंह के बयान से हुई। कांग्रेस का मूल अभियान मुख्यमंत्री मोहन यादव और उनके परिवार से जुड़े कथित भूमि मामलों पर केंद्रित था, लेकिन दिग्विजय सिंह के बयान के बाद राजनीतिक विमर्श का केंद्र बदल गया। भाजपा ने कांग्रेस के आरोपों की बजाय दिग्विजय सिंह के बयान को ही मुद्दा बना लिया और पार्टी की रणनीति कमजोर पड़ती दिखाई दी।
इसी बीच दिल्ली में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी की सक्रियता बढ़ी। इसके बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया कि कांग्रेस का एकमात्र लक्ष्य मुख्यमंत्री और उनके परिवार से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामलों को जनता के सामने लाना है। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस सभी शिकायतों की जांच कर रही है और अंतिम लड़ाई तक पीछे नहीं हटेगी। इसे केवल प्रेस वार्ता नहीं, बल्कि पार्टी की आधिकारिक लाइन माना गया।
इसके तुरंत बाद दिग्विजय सिंह का बदला हुआ अंदाज भी सबने देखा। जो नेता आमतौर पर बेहद आक्रामक शैली में बोलते हैं, वे इस बार संयमित दिखाई दिए। उन्होंने जीतू पटवारी को "पुत्र समान" बताया, किसी भी प्रकार के मतभेद से इनकार किया और अपने बयान को लेकर भी स्पष्टीकरण दिया। राजनीतिक हलकों में इसे सामान्य प्रतिक्रिया नहीं माना गया। चर्चा शुरू हो गई कि क्या उन्हें संगठन की ओर से संदेश मिला है कि अब पार्टी की तय रणनीति से अलग चलना स्वीकार्य नहीं होगा?
इन चर्चाओं को और बल उस समय मिला जब कांग्रेस की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी (पीएसी) की ऑनलाइन बैठक की अंदरूनी जानकारी सामने आई। खबरों के अनुसार बैठक में दिग्विजय सिंह के बयान को लेकर तीखी बहस हुई। विधायक आरिफ मसूद ने सवाल उठाया कि आखिर उज्जैन जाकर ऐसा बयान देने की जरूरत क्या थी। उन्होंने यहां तक कहा कि पार्टी के भीतर मौजूद "स्लीपर सेल" को पहचानने की जरूरत है। इस पर वरिष्ठ नेता सज्जन सिंह वर्मा ने कथित तौर पर कहा कि ऐसे लोगों की पहचान कर ली गई है और कार्रवाई होगी। वहीं पूर्व विधायक प्रवीण पाठक ने चिंता जताई कि कार्यकर्ताओं और जनता को आखिर क्या जवाब दिया जाए - दिग्विजय सिंह की बात सही मानी जाए या प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी की? यदि यही स्थिति रही तो सत्ता में वापसी और कठिन हो जाएगी।
यदि इन रिपोर्टों को घटनाक्रम की कड़ी के रूप में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि कांग्रेस के भीतर केवल मतभेद नहीं, बल्कि संदेश और रणनीति को लेकर गंभीर मंथन चल रहा है। हालांकि पार्टी ने सार्वजनिक रूप से किसी नेता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई या फटकार की पुष्टि नहीं की है, इसलिए यह कहना कि हाईकमान ने दिग्विजय सिंह को डांट लगाई है, तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि घटनाओं ने इस तरह की राजनीतिक अटकलों को जन्म दे दिया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि कांग्रेस अब उन परिस्थितियों से बचना चाहती है, जहां विपक्ष का हमला सरकार पर होने के बजाय उसके अपने नेताओं के बयानों पर केंद्रित हो जाए। यदि ऐसा है तो यह जीतू पटवारी के लिए संगठनात्मक मजबूती का संकेत भी माना जा सकता है। पहली बार ऐसा दिखाई दिया कि प्रदेश अध्यक्ष की सार्वजनिक लाइन के बाद पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में से एक दिग्विजय सिंह को भी उसी दिशा में सफाई और संतुलन बनाना पड़ा।
लेकिन कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।
दिग्विजय सिंह भारतीय राजनीति के उन नेताओं में हैं, जो अक्सर तब सबसे अधिक सक्रिय होते हैं जब उनके बारे में यह माना जाने लगता है कि वे शांत हो गए हैं। उनका राजनीतिक इतिहास अचानक बड़े खुलासों, अप्रत्याशित बयानों और नए राजनीतिक विमर्श खड़े करने से भरा पड़ा है। इसलिए यह मान लेना कि वे अब पूरी तरह चुप बैठ जाएंगे, शायद जल्दबाजी होगी।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या दिग्विजय सिंह संगठन की नई लक्ष्मण रेखा स्वीकार कर शांत रहेंगे? या फिर वे किसी ऐसे बड़े खुलासे, दस्तावेज या राजनीतिक दांव के साथ लौटेंगे, जो एक बार फिर मध्यप्रदेश की राजनीति की दिशा बदल देगा?
फिलहाल इतना तय है कि मध्यप्रदेश कांग्रेस एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। एक ओर जीतू पटवारी का उभरता संगठनात्मक नेतृत्व है, दूसरी ओर दिग्विजय सिंह जैसा अनुभवी और प्रभावशाली चेहरा। दोनों अभी सार्वजनिक रूप से एकजुटता का संदेश दे रहे हैं, लेकिन पार्टी के भीतर उठे सवाल, पीएसी बैठक की चर्चाएं और उसके बाद बदले राजनीतिक घटनाक्रम यह संकेत जरूर दे रहे हैं कि कांग्रेस के अंदर सब कुछ सामान्य नहीं है। आने वाले कुछ सप्ताह यह तय करेंगे कि यह केवल एक अस्थायी राजनीतिक झटका था या फिर मध्यप्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व और रणनीति के नए अध्याय की शुरुआत।
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राजनीति

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