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मंच, माला, पद और फोटो… क्या यही है पत्रकारिता? - दिवाकर शर्मा




आज पत्रकारिता का सबसे बड़ा संकट संसाधनों का नहीं, बल्कि चरित्र का है। कलम की लड़ाई अब सत्य और असत्य के बीच कम, स्वार्थ और सिद्धांत के बीच अधिक दिखाई देती है। कुछ कथित पत्रकारों ने पत्रकारिता को राष्ट्रसेवा का माध्यम नहीं, बल्कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की सीढ़ी बना लिया है। ये वे लोग हैं जो जिस कंधे का उपयोग कर ऊपर चढ़ते हैं, अवसर मिलते ही उसी कंधे को छोड़कर दूसरा कंधा पकड़ लेते हैं। इनके लिए न संबंध स्थायी हैं, न विचार, न निष्ठा और न ही मूल्य। जहाँ लाभ दिखा, वहीं इनकी विचारधारा पहुँच गई। जहाँ कुर्सी दिखी, वहीं इनकी आत्मा पहुँच गई।



इनके लिए पत्रकारिता गौण है, जातिवाद प्रधान है। समाचारों से अधिक इन्हें सजातीय नेताओं की परिक्रमा में आनंद आता है। व्यापारी, अधिकारी, कर्मचारी, संगठन और सत्ता के गलियारों में चक्कर लगाना ही इन्हें पत्रकारिता का सर्वोच्च रूप प्रतीत होता है। किसी कार्यक्रम में मंच मिल जाए, कुर्सी आगे की मिल जाए, गले में माला पड़ जाए, किसी संगठन का पद मिल जाए और किसी बड़े व्यक्ति के साथ फोटो खिंच जाए बस इन्हें लगता है कि पत्रकारिता का शिखर प्राप्त हो गया। इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि समाचार नहीं, बल्कि सोशल मीडिया पर नेताओं के साथ अपनी तस्वीरें होती हैं। हर फोटो मानो यह घोषणा करती है कि "देखो, मैं कितना प्रभावशाली हूँ।" जबकि समाज जानता है कि तस्वीरों से प्रतिष्ठा नहीं बनती, चरित्र से बनती है।



ये लोग समानता, समरसता और समभाव की बातें बड़े मधुर स्वर में करते हैं, किन्तु व्यवहार में विषमता, पक्षपात और जातीय अहंकार टपकता रहता है। नाम "समता" का, काम "विषमता" का। मुख में शहद, मन में ज़हर। सामने प्रशंसा, पीछे चुगली। इसकी बात उससे, उसकी बात इससे। जहाँ विवाद हो, वहाँ अपनी दुकान चलाने का अवसर खोज लेना इनकी विशेष कला होती है। इनके पास विचार कम और बड़बड़ाहट अधिक होती है। जहाँ बैठेंगे, वहीं अपने कथित संघर्षों और उपलब्धियों का गुणगान प्रारंभ कर देंगे। मानो यदि स्वयं अपनी प्रशंसा नहीं करेंगे तो इतिहास अन्याय कर देगा। लेकिन इतिहास कभी आत्मप्रशंसा से नहीं लिखा जाता; वह त्याग, तप और सत्य से लिखा जाता है।



इनकी कलम विचारों से नहीं, अवसरों से चलती है। लेखन इनके लिए साधना नहीं, व्यापार है। समाचार इनके लिए जनहित का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि सौदेबाज़ी का साधन है। सिद्धांत इनकी जेब में रखे रुमाल की तरह होते हैं ज़रूरत पड़ने पर निकाल लिए, काम पूरा होने पर बदल दिए। विचारधारा इनके लिए वस्त्र की तरह होती है। सत्ता बदली तो नारे बदल गए, लाभ बदला तो विचार बदल गए, मंच बदला तो चेहरे बदल गए। जिनकी रीढ़ सिद्धांतों से नहीं, स्वार्थ से बनी हो, वे हर मौसम में रंग बदलने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। ऐसे लोग पुरस्कार चाहते हैं, पद चाहते हैं, सम्मान चाहते हैं, मंच चाहते हैं, कुर्सी चाहते हैं, मालाएँ चाहते हैं, कैमरे चाहते हैं, ताली चाहते हैं पर सत्य का संघर्ष नहीं चाहते। इन्हें राष्ट्र नहीं, अपनी प्रसिद्धि प्रिय होती है। इन्हें समाज नहीं, अपना प्रचार अधिक महत्वपूर्ण लगता है।



किन्तु राष्ट्रवादी पत्रकारिता का धर्म इससे बिल्कुल भिन्न है। वह सत्ता की चौखट पर सिर झुकाने नहीं, सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस रखती है। वह जाति का प्रवक्ता नहीं, राष्ट्र की चेतना का प्रहरी होती है। उसकी पहचान नेताओं के साथ खिंचवाई गई तस्वीरों से नहीं, बल्कि उन प्रश्नों से होती है जिन्हें पूछने का साहस बहुत कम लोग कर पाते हैं। समाज को ऐसे मुखौटों को पहचानना होगा। क्योंकि जब पत्रकारिता स्वार्थ, जातिवाद, अवसरवाद, चाटुकारिता और आत्मप्रचार की शिकार हो जाती है, तब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बाहर से नहीं, भीतर से ढहने लगता है।



याद रखिए कलम की प्रतिष्ठा मंच से नहीं बढ़ती, मंच की प्रतिष्ठा कलम से बढ़ती है। माला से व्यक्तित्व महान नहीं होता, महान व्यक्तित्व पर समाज स्वयं माला चढ़ाता है। पद माँगने से सम्मान नहीं मिलता, चरित्र से सम्मान अर्जित होता है। और राष्ट्रवादी पत्रकार वही है जिसकी निष्ठा किसी व्यक्ति, जाति, दल या कुर्सी से नहीं, केवल सत्य, समाज और राष्ट्र से होती है।