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यूट्यूबर या समाज के नए भड़काऊ चेहरे?

 

कैमरा हाथ में आ गया, मोबाइल में इंटरनेट चलने लगा, दो-चार वीडियो वायरल हो गए और कुछ लोगों ने खुद को समाज का सबसे बड़ा पत्रकार, सबसे बड़ा न्यायाधीश और सबसे बड़ा समाज सुधारक समझ लिया। यह केवल भ्रम नहीं, बल्कि समाज के लिए एक खतरनाक स्थिति बनती जा रही है। आज कुछ गैर-जिम्मेदार यूट्यूबरों ने सच को पीछे धकेलकर सनसनी को अपना धर्म बना लिया है। उन्हें न समाज की चिंता है, न देश की, न किसी की प्रतिष्ठा की। उन्हें चिंता है तो केवल व्यूज़, लाइक्स और कमाई की।

आज हालत यह है कि किसी घटना का सच सामने आने से पहले ही कुछ यूट्यूबर कैमरे के सामने फैसला सुना देते हैं। किसी को अपराधी घोषित कर देना, किसी को भ्रष्ट बता देना, किसी जाति को कटघरे में खड़ा कर देना और किसी समुदाय के खिलाफ लोगों का गुस्सा भड़काना इनके लिए महज एक वीडियो का विषय है। जितना बड़ा विवाद, उतनी बड़ी कमाई। जितनी ज्यादा नफरत, उतनी ज्यादा लोकप्रियता। यही इनका नया कारोबार बन गया है। सबसे दुखद बात यह है कि जातिवाद जैसी गंभीर सामाजिक बीमारी को भी कुछ लोगों ने अपने चैनलों की ऑक्सीजन बना लिया है। जहाँ समाज को जोड़ने की जरूरत है, वहाँ ये लोग जाति के नाम पर खाइयाँ खोद रहे हैं। छोटी-सी घटना को पूरे समाज का संघर्ष बताकर लोगों के मन में जहर घोलने का काम किया जाता है। सच कम, उकसावा ज्यादा परोसा जाता है। सवाल यह है कि क्या समाज को जागरूक किया जा रहा है, या जानबूझकर भड़काया जा रहा है?

और इससे भी बड़ा दोष समाज का है। हमने हर माइक पकड़ने वाले को पत्रकार मान लिया। हमने पत्रकारिता के सिद्धांतों, मर्यादाओं और जिम्मेदारियों को छोड़कर वायरल वीडियो को ही विश्वसनीयता का पैमाना बना दिया। जिसने सबसे तेज आवाज में चिल्लाया, उसे सबसे बड़ा सच बोलने वाला समझ लिया। जिसने सबसे तीखी भाषा बोली, उसे सबसे निर्भीक मान लिया। यह भूल गए कि पत्रकारिता का आधार शोर नहीं, बल्कि सत्य, प्रमाण, निष्पक्षता और समाज के प्रति जवाबदेही है। विडंबना यह भी है कि कुछ जिम्मेदार अधिकारी और कर्मचारी भी ऐसे लोगों को या तो पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं या फिर उनके वायरल वीडियो के दबाव में आकर काम करने लगते हैं। दोनों स्थितियाँ गलत हैं। किसी वीडियो को इसलिए महत्व नहीं मिलना चाहिए कि उसके लाखों व्यूज़ हैं और न ही इसलिए खारिज कर देना चाहिए कि उसे किसी यूट्यूबर ने बनाया है। निर्णय केवल तथ्यों, साक्ष्यों और कानून के आधार पर होना चाहिए।

आज जरूरत इस बात की है कि समाज यह तय करे कि उसे सूचना चाहिए या तमाशा। जो व्यक्ति हर दिन किसी नए विवाद की तलाश में रहता है, हर मुद्दे को जाति और नफरत के चश्मे से दिखाता है, बिना पुष्टि के आरोप लगाता है और लोगों की भावनाओं से खेलकर पैसा कमाता है, उसे समाज का पथप्रदर्शक नहीं माना जा सकता। ऐसे लोगों की सबसे बड़ी ताकत हमारा अंधविश्वास और हमारी बिना सोचे-समझे शेयर करने की आदत है। यदि वास्तव में इस बीमारी का इलाज करना है तो सबसे पहले दर्शकों को बदलना होगा। हर वायरल वीडियो को सच मानना बंद करना होगा। हर दावे की तथ्य-जांच करनी होगी। सोशल मीडिया मंचों को भ्रामक और उकसाने वाली सामग्री पर सख्ती करनी होगी। कानून को भी निष्पक्ष होकर उन लोगों पर कार्रवाई करनी होगी जो झूठ, नफरत और सामाजिक वैमनस्य फैलाकर समाज को नुकसान पहुँचा रहे हैं। साथ ही, जो जिम्मेदार और तथ्यपरक डिजिटल पत्रकार हैं, उन्हें भी उचित सम्मान मिलना चाहिए ताकि विश्वसनीय पत्रकारिता और सनसनी फैलाने वाली सामग्री के बीच स्पष्ट अंतर बना रहे।

समाज को यह समझना होगा कि कैमरा चरित्र का प्रमाणपत्र नहीं होता, लाखों सब्सक्राइबर सत्य का प्रमाण नहीं होते और वायरल होना ईमानदारी की पहचान नहीं है। यदि आज भी हमने सच और तमाशे में फर्क करना नहीं सीखा, तो आने वाला समय अदालतों से पहले यूट्यूब की अदालत का होगा, तथ्यों से पहले अफवाहों का होगा और समाज को जोड़ने वालों से ज्यादा उसे बाँटने वालों का होगा। यह केवल डिजिटल अव्यवस्था नहीं होगी, बल्कि सामाजिक विश्वास का सबसे बड़ा संकट होगा।

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