शिवपुरी में शिलान्यास के बाद 'विज्ञापन खेल' का रहस्य!
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5 जुलाई को शिवपुरी में ₹2500 करोड़ की लागत से विकसित किए जा रहे मिसाइल इकोसिस्टम परियोजना के शिलान्यास समारोह ने विकास, निवेश और रोजगार की संभावनाओं के साथ-साथ एक ऐसे प्रश्न को भी जन्म दे दिया है, जिसकी चर्चा अब पत्रकारों के बीच सबसे अधिक हो रही है। चर्चा किसी परियोजना की नहीं, बल्कि कथित विज्ञापन वितरण व्यवस्था की है।
समारोह समाप्त होने के कुछ ही समय बाद जिले के अनेक पत्रकारों के बीच यह चर्चा तेजी से फैलने लगी कि कार्यक्रम के प्रचार-प्रसार के लिए विज्ञापन की व्यवस्था की गई थी, लेकिन उसका लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंचा। इस चर्चा ने तब और अधिक जोर पकड़ा, जब अलग-अलग लोगों द्वारा अलग-अलग दावे किए जाने लगे। किसी ने कहा कि विज्ञापन अडानी समूह की ओर से दिए गए, किसी ने दावा किया कि यह मध्य प्रदेश शासन की ओर से जारी हुए, तो कुछ लोगों का कहना था कि कुछ जनप्रतिनिधियों अथवा समर्थकों ने अपने स्तर पर विज्ञापन प्रकाशित कराए। वहीं कई पत्रकारों ने स्पष्ट कहा कि उन्हें इस संबंध में कोई जानकारी तक नहीं दी गई।
यहीं से यह पूरा घटनाक्रम एक सामान्य चर्चा से आगे बढ़कर कई गंभीर सवालों में बदल जाता है। यदि किसी कार्यक्रम के पहले पत्रकारों से फोन पर उनके नाम, संस्थान और अन्य जानकारियां जुटाई गई थीं, तो आखिर वह व्यक्ति कौन था? वह किसके निर्देश पर यह जानकारी एकत्र कर रहा था? यदि जानकारी केवल रिकॉर्ड के लिए थी, तो उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया गया? और यदि विज्ञापन वितरण की कोई प्रक्रिया थी, तो उसका आधार क्या था?
सबसे बड़ा प्रश्न उस स्थिति को लेकर उठ रहा है, जिसमें एक ही समाचार पत्र में एक ही दिन कई पूरे पृष्ठों के विज्ञापन प्रकाशित दिखाई देते हैं। यदि इनमें से कुछ विज्ञापन वास्तव में शासकीय विभागों द्वारा जारी किए गए थे, तो यह जानना स्वाभाविक है कि क्या अन्य समाचार पत्रों और पत्रकारों को भी समान अवसर मिला? यदि नहीं मिला, तो उसके पीछे क्या कारण था? दूसरी ओर, यदि वे विज्ञापन निजी अथवा व्यक्तिगत स्तर पर प्रकाशित कराए गए थे, तो संबंधित पक्षों द्वारा स्थिति स्पष्ट कर देना भी आवश्यक प्रतीत होता है, ताकि अनावश्यक भ्रम समाप्त हो सके।
यहां यह भी स्पष्ट रहना चाहिए कि निजी व्यक्ति या संस्था अपने संसाधनों से जहां चाहे विज्ञापन दे सकती है। यह उनका अधिकार है। किंतु यदि कहीं शासकीय धन या सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग का प्रश्न जुड़ता है, तब पारदर्शिता की अपेक्षा स्वतः बढ़ जाती है। ऐसे में यह जानना किसी भी पत्रकार का अधिकार है कि प्रक्रिया क्या थी और उसका पालन किस प्रकार किया गया।
एक और संभावना भी चर्चा का विषय बनी हुई है। क्या ऐसा तो नहीं कि वास्तविक व्यवस्था कुछ और रही हो, लेकिन बीच में किसी स्तर पर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न कर दी गई हों, जिनसे पत्रकारों में असंतोष फैले और उसकी सीधी राजनीतिक कीमत मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव तथा केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुकानी पड़े? यह केवल एक संभावित प्रश्न है, जिसका उत्तर तथ्यों और आधिकारिक स्पष्टीकरण से ही मिल सकता है। लेकिन यदि ऐसा कोई प्रयास हुआ हो, तो वह केवल पत्रकारों के साथ अन्याय नहीं बल्कि सरकार और जनप्रतिनिधियों की छवि को भी प्रभावित करने वाला विषय होगा।
पत्रकार लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ माने जाते हैं। यदि उनके बीच यह भावना पैदा हो जाए कि सूचना, संवाद या विज्ञापन वितरण में समानता नहीं बरती जा रही, तो इससे अविश्वास का वातावरण बनना स्वाभाविक है। इसी कारण यह आवश्यक है कि पूरे घटनाक्रम पर संबंधित विभाग, आयोजन से जुड़े पक्ष और जिम्मेदार अधिकारी तथ्यात्मक स्थिति सार्वजनिक करें।
यह लेख किसी व्यक्ति, संस्था या विभाग पर आरोप लगाने का प्रयास नहीं है। बल्कि उन प्रश्नों को सामने रखने का प्रयास है, जिनका उत्तर स्वयं पत्रकार समाज जानना चाहता है। यदि वास्तव में सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ है, तो पारदर्शी जानकारी सामने आने से भ्रम समाप्त होगा। और यदि कहीं किसी स्तर पर चूक, पक्षपात या किसी व्यक्ति विशेष की मनमानी हुई है, तो उसकी पहचान होना भी उतना ही आवश्यक है।
क्योंकि सबसे बड़ा सवाल विज्ञापन का नहीं है। सबसे बड़ा सवाल विश्वास का है। और जब विश्वास पर प्रश्नचिह्न लगते हैं, तब मौन सबसे अधिक संदेह पैदा करता है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि इस रहस्य से पर्दा कौन उठाएगा ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह केवल अव्यवस्था थी, किसी स्तर की भूल थी, या फिर वास्तव में किसी ने सुनियोजित तरीके से ऐसी परिस्थितियां निर्मित कीं, जिनसे पत्रकारों के असंतोष की आड़ में सरकार और उसके प्रमुख चेहरों की छवि को नुकसान पहुंचे।
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दिवाकर की दुनाली से

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