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2027 में बीजेपी की चुनौतियां - डॉ.राधेश्याम द्विवेदी

 

भारत में भारतीय जनता पार्टी या उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता गठबंधन की सरकारें कुल मिलाकर लगभग 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हैं। बंगाल में जीत के बाद भारत की राजनीति में बीजेपी का दबदबा और मजबूत हो गया है। बीजेपी की अगुवाई में अब देश के 22 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में बीजेपी+ की सरकार है। अकेले भाजपा अपने दम पर या मुख्य सत्ताधारी दल के रूप में कई प्रमुख राज्यों में शासन कर रही है, जबकि अन्य राज्यों में वह एनडीए के सहयोगियों के साथ सत्ता में साझीदार है।


कॉकरोच जनता पार्टी' मई 2026 में अभिजीत दिपके द्वारा शुरू किया गया एक चर्चित ऑनलाइन व्यंग्यात्मक राजनीतिक और नागरिक आंदोलन को बीजेपी द्वारा अपने एक मंत्री से इस्तीफा दिलवाकर भ्रमित युवाओं का एक दबाव समूह जो शिक्षा, बेरोजगारी और व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर कुछ वाजिब और कुछ गैर वाजिब बात कर रहा था, उससे मजबूती से निपट लिया है। संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई 2026 से शुरू होकर 13 अगस्त 2026 तक 25 दिनों की अवधि में कुल 19 बैठकें हुईं, जिसके दौरान भारी हंगामे और गतिरोध के बावजूद सरकार ने दोनों सदनों से कुल 12 महत्वपूर्ण विधेयक पारित करा लिए हैं। विपक्ष संसद परिसर में नुक्कड़ नाटक करता कुछ भी हासिल नहीं कर सका।


2027 का चुनावी वर्ष की तैयारी -

भारत में 2027 का चुनावी वर्ष काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, इसमें कई बड़े संवैधानिक और राज्य स्तरीय चुनाव शामिल होने की उम्मीद है। इस वर्ष राज्यसभा के नियमित द्विवार्षिक चुनाव होंगे, जिनमें 4 सदस्यों का कार्यकाल समाप्त होने पर सीमित सीटों पर नए सदस्यों का चयन किया जाएगा। इसके साथ ही भारत के राष्ट्रपति का चुनाव भी जुलाई 2027 में होना निर्धारित है;वर्तमान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कार्यकाल 24 जुलाई 2027 को समाप्त होने जा रहा है। इसके अलावा, 2027 में सात राज्यों - उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश और गुजरात की विधानसभाओं के चुनाव भी संभावित हैं। इस प्रकार, 2027 भारतीय राजनीति के लिए एक उच्च महत्व वाला वर्ष होगा, जिसमें राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाएंगे।


उत्तर प्रदेश 2027 विधानसभा चुनाव की बिसातें बिछनी शुरू -

उत्तर प्रदेश जहां सर्वाधिक 80 संसद सीटें है। इसका  2027 का विधानसभा चुनाव यद्यपि अभी दूर है, लेकिन उसकी तैयारी अभी से ही शुरू हो गई है। 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों और 2026 के उप चुनाव से मिले झटके के बाद बीजेपी अभी से अलर्ट मोड में है। उत्तर प्रदेश में पिछले प्रमुख विधानसभा उपचुनाव 20 नवंबर 2024 को 13 सीटों पर हुए थे । जिनमें बीजेपी 9 और सपा 4 सीटें जीती थी।


भारत में अभी हाल में विधानसभा उपचुनाव 30 जुलाई 2026 को हुए थे और इसके नतीजे 3 अगस्त 2026 को घोषित किए गए थे, जिसमें बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात राज्यों की एक-एक विधानसभा सीट पर मतदान हुआ था। बांकीपुर बिहार से प्रशांत किशोर, दतिया मध्य प्रदेश में कांग्रेस और मांजलपुर गुजरात में बीजेपी ने जीत दर्ज की थी।


बीजेपी की ताकत और खतरा-

 यह चुनाव सिर्फ विपक्ष की चुनौती नहीं, बल्कि बीजेपी के लिए अपनी ही जमीन को फिर से परखने का इम्तिहान भी है । इसी सियासी सरगर्मी के बीच बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन देश के विभिन्न भागों का दौरा करते देखे जा रहे हैं। इससे साफ संदेश यह है कि 2027 की यह ‘महाजंग’ के लिए बीजेपी कितनी गंभीर है। इस बार बीजेपी कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती है ।


उत्तर प्रदेश में बीजेपी को झटका लगा था -

लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी को बहुत बड़ा झटका लगा था। 2019 में 62 सीटें जीतने वाली पार्टी 2024 में 33 सीटों पर आ गई थी। दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी 37 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बन गई थी ।कांग्रेस भी 6 सीटें ले गई । वोट शेयर की बात करे तो बीजेपी का 41 फीसदी के आसपास वोट मिले थे, लेकिन सीट कम हो गई। जिसके बाद यह समझ में आ गया कि कुछ तो गड़बड़ है। यही वजह है कि 2024 के बाद बीजेपी ने यूपी को सिर्फ मजबूत राज्य की तरह नहीं, बल्कि फिर से कसने वाले राज्य की तरह देखना शुरू किया।


चुनाव परिणाम का निहितार्थ -

बीजेपी ने लोकसभा चुनाव 2024 के चुनाव नतीजों के बाद से ही बहुत कुछ संदेश समझ लिया था। जहां विधानसभा चुनाव की लड़ाई लोकसभा से अलग होता है।यह भी समझ आ गया कि बीजेपी के लिए लोकसभा में पीएम मोदी फैक्टर बहुत बड़ा रोल प्ले करता है। लेकिन विधानसभा में जाति, स्थानीय संगठन, उम्मीदवार, सरकारी योजनाओं को पाने वाले लोग, पार्टी, वोटर में नाराजगी और बूथ की ताकत ज्यादा मायने रखती है। इसलिए 2025 के बाद और खासकर 2026 में बीजेपी ने यूपी में दो काम साथ-साथ शुरू किए पहला संगठन में परिवर्तन और दूसरा सामाजिक समीकरण को साधना।


जुलाई 2026 में बीजेपी की गतिविधियां -

जुलाई के पहले हफ्ते में नितिन नवीन का लखनऊ दौरा इसी तैयारी का हिस्सा था। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों डिप्टी सीएम , नई प्रदेश टीम, क्षेत्रीय अध्यक्षों, पुराने प्रदेश अध्यक्षों और एनडीए सहयोगियों के साथ बैठकें कीं। फोकस साफ था- बूथ, शक्ति केंद्र, मंडल, जिला और प्रदेश स्तर तक संगठन को फिर से चुस्त-दुरूस्त करना है। पार्टी ने 2027 के लिए ग्राउंड लेवल तक मजबूत करने और लाभार्थियों और सभी जातियों तक सीधा संपर्क बढ़ाने पर जोर दिया गया है। यह सिर्फ नितिन नबीन काऔपचारिक दौरा नहीं था। इसके पीछे एक साफ राजनीतिक संदेश भी था। बीजेपी समझ चुकी है कि 2024 में जो ढील दिखी, उसे 2027 से पहले भरना होगा। कार्यकर्ता सक्रिय रहें, कमजोर सीटों की पहचान हो, समाज के सभी वर्गो और जातियों में संवाद बढ़े और उन्हें भरोसे में लिया जाए।


यूपी बीजेपी में कौन-कौन फैक्टर सक्रिय हैं -

अगर आज की तारीख में यूपी बीजेपी को समझना हो तो उसे सिर्फ एक पार्टी की तरह नहीं, बल्कि कई लेयर में समझना होगा।जिसमें ऊपर चेहरा है, नीचे संगठन है।बीच में जातीय-सामाजिक गणित है और उसके साथ सरकार का प्रदर्शन भी जुड़ा है।


1. योगी फैक्टर: बेदाग चेहरा, सख्त बुलडोजर वाली छवि -


यूपी में बीजेपी के लिए सबसे बड़ा चेहरा योगी आदित्यनाथ हैं।‌योगी के साथ कानून-व्यवस्था, हिंदुत्व, बुलडोजर वाली सख्त छवि, प्रशासनिक पकड़ है । 

यही वजह रही कि 2024 के झटके के बाद भी बीजेपी के भीतर नेतृत्व को लेकर कोई खुला टकराव नहीं दिखा। 2027 की तरफ जाते हुए पार्टी की पहली पूंजी यही है कि उसके पास बेदाग चेहरा बरकरार है।


2. दोनों डिप्टी सीएम का अलग-अलग रूप में संतुलन कर रहे -

दोनों डिप्टी सीएम श्री केशव प्रसाद मौर्य और श्री ब्रजेश पाठक दोनों की भूमिका अलग है और दोनों बीजेपी के सामाजिक- सियासी बैलेंस में काम आते हैं। जहां एक तरफ केशव मौर्य ओबीसी राजनीति, संगठन और कार्यकर्ता संदेश के लिहाज से अहम हैं। तो दूसरी तरफ ब्रजेश पाठक ब्राह्मण चेहरे के तौर पर उपयोगी हैं और शहरी- प्रशासनिक राजनीति में भी उनकी मुख्य भूमिका है।


3. नई प्रदेश टीम और संगठन -

अभी से 2027 की असली तैयारी शुरू हो चुकी है । बीजेपी ने नई प्रदेश टीम बनाई है और क्षेत्रीय स्तर पर बदलाव किए हैं ।

इसका राजनीतिक मतलब सीधा है कि पार्टी मान रही है कि 2024 के बाद यूपी संगठन को रीसेट करने की जरूरत थी। बूथ से लेकर क्षेत्र तक नए सिरे से बीजेपी ऊर्जा भर रही है । सामाजिक प्रतिनिधित्व से लेकर हर क्षेत्र में पार्टी सजगता बरत रही है।अन्य पार्टियों से आए हुए सदस्य मूल कार्यकर्ताओं पर भारी पड़ रहे हैं , उनका संतुलन बनाना एक एक बड़ी समस्या है।


4. दिल्ली-लखनऊ तालमेल जरूरी -

यूपी बीजेपी को सिर्फ लखनऊ से नहीं समझा जा सकता है । इसमें कई और भी जोड़ हैं,‌ जिसमें आर एस एस की विहंगम दृष्टि, दिल्ली का केंद्रीय नेतृत्व, केंद्रीय संगठन, राज्य सरकार, सहयोगी दल और प्रदेश इकाई सबका तालमेल भी बैठाना है। इसलिए नितिन नवीन का दौरा बहुत अहम है। यह सिर्फ एक मीटिंग नहीं, बल्कि यह संकेत है कि 2027 की तैयारी अब दिल्ली की सीधी निगरानी में भी तेज हो चुकी है।


बीजेपी की अब तक की ताकत-

 

 1. योगी + हिंदुत्व + प्रशासन की संयुक्त छवि -

बीजेपी का सबसे बड़ा सहारा यह है कि उसके पास अभी भी यूपी में सबसे स्पष्ट राजनीतिक चेहरा है। राम मंदिर, काशी, कानून-व्यवस्था, माफिया पर कार्रवाई, सख्त प्रशासन इन सबको जोड़कर बीजेपी अपने समर्थक वोटर को यह बताती है कि “मजबूत सरकार” अभी भी उसी के पास है।


 2. बूथ वाला संगठन -

यही बीजेपी की असली चुनावी मशीन है। पार्टी सिर्फ मंच से चुनाव नहीं लड़ती है । बूथ कमेटी, शक्ति केंद्र, सरकारी याेजनाओं को पाने वालों से संपर्क, कमजोर सीटों की पहचान आदि, यह सब उसकी ताकत है।नितिन नवीन के दौरे और लखनऊ बैठकों में बूथ और शक्ति केंद्र पर जोर इसी वजह से दिखा।पार्टी चाहती है कि 2024 के बाद जो ढील दिखी, वह विधानसभा चुनाव से पहले पूरी तरह खत्म हो जाए।


 3.लाभार्थी वोट -

मुफ्त राशन, उज्ज्वला, पीएम आवास, किसान सम्मान निधि, आयुष्मान जैसी योजनाओं ने बीजेपी को एक ऐसा वोटर दिया है जो सिर्फ जातीय पहचान से वोट नहीं करता है। वह यह भी देखता है कि सरकार से उसे मिला क्या? यही “लाभार्थी वोट” बीजेपी की बड़ी ढाल बना रहा है।


 4. सवर्ण + गैर-यादव ओबीसी + गैर-जाटव दलित का सामाजिक तालमेल -

2014 के बाद बीजेपी की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि उसने अपने वोट को सिर्फ सवर्णों तक सीमित नहीं रखा। उसने गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित समूहों में भी पैठ बनाई है । 2017, 2019 और 2022 की जीत में यही गठजोड़ उसकी रीढ़ बना हुआ है।2024 में इसमें कुछ ढील के संकेत जरूर मिले, लेकिन बीजेपी की पूरी कोशिश है कि यह ढील 2027 तक गहरी न होने पाए।


बीजेपी की लड़ाई विपक्ष से भी 

और अपनी जमीन बचाने की भी -

बीजेपी की असली चुनौती क्या है? इसका कोई एक लाइन में जवाब नहीं है। बीजेपी को उन सभी वोटरों को साधे रखना है जो उनके सबसे कोर वोटर है।जो पिछले एक दशक में उसके साथ जुड़े हैं। अगर उसका कुछ हिस्सा खिसकता है, तो पार्टी की मुश्किल बढ़ेगी।2024 ने यही संकेत दिया था।


 1. पीडीए की राजनीति -

समाजवादी पार्टी की पीडीए का गठजोड़  जिसमें पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक अब सिर्फ नारा नहीं रह गया है। 2024 में सपा ने इसका फायदा उठाया।उसने ओबीसी, दलित, संविधान, आरक्षण और स्थानीय असंतोष को एक फ्रेम में रखने की कोशिश की है ।यही बीजेपी के लिए सबसे बड़ा खतरा है। अगर गैर-यादव ओबीसी और कुछ दलित समूहों में बीजेपी की पकड़ ढीली पड़ती है, तो 2027 की लड़ाई कठिन हो सकती है।


2. लंबे शासन की एंटी इनकंबेंसी-

बीजेपी 2017 से यूपी की सत्ता में है. 2027 तक यह लंबा शासनकाल हो जाएगा. ऐसे में नाराजगी होना स्वाभाविक है. भर्ती, बेरोजगारी, पेपर लीक, स्थानीय नेताओं की अनदेखी, टिकट बंटवारा, पुलिस-प्रशासन, महंगाई ये ऐसे मुद्दे होंगे जो विधानसभा चुनाव में असर डाल सकते हैं. लोकसभा में वोटर राष्ट्रीय चेहरा देखकर वोट दे सकता है, लेकिन विधान सभा में वह अपने जिले, अपने विधायक और अपने समाज की हिस्सेदारी भी देखता है.


 3. राम मंदिर चढ़ावा विवाद 

अयोध्या राम मंदिर बीजेपी की सबसे बड़ी वैचारिक और राजनीतिक उपलब्धियों में से एक है। ऐसे में चढ़ावे में कथित गड़बड़ी या चोरी का मामला सिर्फ एक प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है, वह राजनीतिक मुद्दा है। हाल के दिनों में इस मुद्दे पर विपक्ष ने जिस तरह बीजेपी को घेरने की कोशिश की है उसे चुनावी हथियार बनाने की कोशिश की उससे यही लगता है कि आने वाले दिनों में विपक्ष इसे एक टूल की तरह यूज कर सकता है।लेकिन दूसरी तरफ बीजेपी और सरकार की कोशिश यह लगातार बनी हुई है कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करके एक साफ संदेश दिया जाए। जिससे किसी बड़े नैरेटिव के नुकसान से आगे बचा जा सके।


4.आरक्षण हटाओ आंदोलन’से निपटना -

‘आरक्षण हटाओ आंदोलन' भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक समीकरणों और चुनावी खेल को गंभीर रूप से बिगाड़ सकता है। भारत की राजनीति में आरक्षण एक बेहद संवेदनशील और निर्णायक मुद्दा है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत में जाति- आधारित आरक्षण व्यवस्था को समाप्त करना है। इसके समर्थकों का तर्क है कि इससे योग्यता (मेरिट) प्रभावित होती है और सामाजिक समानता के लिए इसका हटना जरूरी है। इस तरह के आंदोलन से बीजेपी के सामने 'कमंडल' (हिंदू एकता) और 'मंडल' (पिछड़ा वर्ग राजनीति) के बीच संतुलन बनाने की एक बड़ी दुविधा खड़ी हो जाती है।यदि 'आरक्षण हटाओ आंदोलन' देश में हिंसक या बड़ा रूप लेता है, तो बीजेपी के लिए अपने सवर्ण और ओबीसी-दलित मतदाताओं को एक साथ जोड़े रखना लगभग असंभव हो जाएगा, जिसका सीधा चुनावी नुकसान पार्टी को उठाना पड़ सकता है।


2027 के लिए बीजेपी का नया फॉर्मूला- 

अगर जुलाई 2026 बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के लखनऊ के दौरे औ यूपी टीम में बदलाव के संकेत जोड़ें, तो बीजेपी का फॉर्मूला चार हिस्सों में दिखता है-


1. योगी को केंद्र में रखा जाय -

कानून-व्यवस्था, हिंदुत्व और मजबूत प्रशासन का चेहरा बनाकर प्रदेश व देश में एक अलग ही छवि दिखाई देनी चाहिए। इसके लिए योगी जी को भावी प्रधान मंत्री के रूप में भी प्रोजक्ट किया जाना लाभदायक हो सकता है।


2. संगठन को बूथ तक पहुंचे -

नितिन नवीन का दौरा और लगातार बैठकें इसी लाइन का हिस्सा हैं। इसमें आर एस एस के कार्यकर्ताओं का सहयोग और सक्रियता वांछित लक्ष्य दिला सकता है।


3. ओबीसी-दलित सामाजिक गठजोड़ 

नई टीम, क्षेत्रीय फेरबदल और सामाजिक प्रतिनिधित्व इसी कोशिश की तरफ इशारा करते हैं। कुछ जातीय नेता इस इशू को साधने में लगे हैं।


4. लाभार्थी + नैरेटिव दोनों साथ साथ चलाएं -

इसके लिए इस योजना का लाभ भी दिखे, और विपक्ष के आरोपों का जवाब भी तैयार रहना चाहिए। यह पूरी तैयारी के साथ जनता को निरन्तर ब्रीफ किया जाना चाहिए।


कुल मिलाकर बीजेपी की लड़ाई इस बार विपक्ष से जितनी है, उतनी अपनी जमीन बचाने की भी है। ऊपर जो भी बातें हैं इसका असली परिणाम क्या होगा यह तो समय बताएगा। यह किसी की विदाई भी करा सकता है और किसी का स्वागत भी करा सकता है।



लेखक:

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी ,

पूर्व पुस्तकालय सूचनाधिकारी,

मकान नम्बर 2785, वार्ड नंबर 8

निकट : लिटिल फ्लावर स्कूल,

आनन्द नगर,कटरा, बस्ती,

Pin 2720901,उत्तर प्रदेश INDIA 

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