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ब्लैक होल : ब्रह्मांड की सबसे संपूर्ण घड़ी - अनिकेत सिंह

 

सुबह जल्दी-जल्दी कार्यालय जाने के लिए निकलते समय हम घड़ी पर एक नजर डालते हैं, समय पर पहुंचने की चिंता में। समय हमारे जीवन का इतना अभिन्न हिस्सा है कि उसके बिना एक क्षण की भी कल्पना नहीं की जा सकती। लेकिन यदि हम भौतिकी से पूछें कि समय वास्तव में बहता क्यों है? तो इसका उत्तर इतना सरल नहीं है।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की भौतिक विज्ञानी नतालिया एरेस कहती हैं कि समय विज्ञान के सबसे बड़े रहस्यों में से एक है। अल्बर्ट आइंस्टीन के सिद्धांतों ने समय को वक्र बना दिया, जबकि क्वांटम सिद्धांत समय की लगभग अनदेखी करता है। आधुनिक भौतिकी का कोई भी पक्ष समय को संतोषजनक ढंग से समझा नहीं पाता। जैसे कोई व्यक्ति घड़ी की सुइयां तो देखता है, लेकिन उसके पीछे के यंत्र को कभी नहीं समझ पाता, वैसे ही वैज्ञानिक समय के 'दिखावे' को देखते हैं, लेकिन उसके मूल स्वरूप को अभी तक पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं।

1980 के दशक में प्रस्तुत की गई एक साहसिक परिकल्पना फिर चर्चा में आई है। इस विचार के अनुसार समय एक भ्रम है, जो मूल रूप से समयरहित ब्रह्मांड से क्वांटम मैकेनिक्स की विचित्र कार्यप्रणाली के माध्यम से उत्पन्न होता है। इस सिद्धांत को पेज-वूटर्स मैकेनिज्म कहा जाता है।

अतीत में इस विचार ने अनेक वैज्ञानिकों को प्रभावित किया था, लेकिन इसे प्रयोगशाला में परखना असंभव माना जाता था। यह केवल गणित का एक सुंदर खेल समझा जाता था, जिसे प्रयोग द्वारा सिद्ध करने का कोई रास्ता नहीं था।

भौतिकी के समीकरण

चालीस वर्ष बाद घड़ियों की कार्यप्रणाली पर हो रहे नए वैज्ञानिक अनुसंधानों ने इस परिकल्पना को परखने का मार्ग खोल दिया है। क्वांटम प्रौद्योगिकी के विकास के साथ वैज्ञानिकों को यह समझने की आवश्यकता पड़ी कि घड़ी वास्तव में क्या है और वह कैसे काम करती है।

आश्चर्यजनक रूप से इस शोध में ब्लैक होल भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, ऐसे संकेत मिले हैं। यदि समय वास्तव में भ्रम है, तो हमारा दैनिक अनुभव तो घड़ी की सुइयों का घूमना, ऋतुओं का बदलना, वृद्ध होना, यह सब कहां से आता है? क्या ब्रह्मांड वास्तव में एक स्थिर, गतिहीन चित्र है और जिसे हम 'समय का बहना' कहते हैं, वह केवल क्वांटम एंटैंगलमेंट का एक चमत्कार है? अगर इस प्रश्न का उत्तर मिल जाए तो ब्रह्मांड के बारे में हमारी सबसे बुनियादी समझ ही बदल सकती है।

इन प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए वैज्ञानिकों को भौतिकी के इतिहास में गहराई तक उतरना पड़ता है, जहां समय की समझ की नींव रखी गई थी और जहां एंट्रॉपी, सापेक्षता (रिलेटिविटी) तथा क्वांटम सिद्धांत ने समय के रहस्य को और अधिक उलझा दिया था।।लेकिन समय के रहस्य को सुलझाने की यह यात्रा शुरू कहां से हुई?

अगर हम आधुनिक भौतिकी के सभी नियमों और समीकरणों का अध्ययन करें, तो समय केवल एक दिशा में बहता दिखाई देता है। इसका एकमात्र प्रमाण ऊष्मागतिकी (थर्मोडायनेमिक्स) के दूसरे नियम से मिलता है।

यह नियम कहता है कि एंट्रॉपी, अर्थात अव्यवस्था का माप, हमेशा बढ़ता रहता है। इसलिए दूध कॉफी में मिल जाने के बाद फिर अलग नहीं होता। पुराने किले धीरे-धीरे खंडहर बन जाते हैं, लेकिन खंडहर कभी स्वयं किला नहीं बन जाते।।लेकिन यह नियम भी पूरी व्याख्या नहीं देता। यह संकेत करता है कि ब्रह्मांड की शुरुआत अत्यंत व्यवस्थित अवस्था में हुई होगी, जिसका कारण विज्ञान आज तक नहीं समझ पाया है।

इसके बाद आया आइंस्टीन का सामान्य सापेक्षता सिद्धांत (जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी), जिसने समय और अंतरिक्ष को एक लचीले चार-आयामी ताने-बाने में जोड़ दिया। पर्वतों पर गुरुत्वाकर्षण कम होने के कारण वहां समय समुद्र तल की तुलना में थोड़ा तेज चलता है। यह तथ्य आज भी अनेक लोगों को आश्चर्यचकित करता है।

ब्लैक होल का रहस्य

दशकों तक पेज-वूटर्स मैकेनिज्म केवल सिद्धांत और विचार-प्रयोगों तक ही सीमित रहा। लेकिन अब वैज्ञानिक इसे प्रयोगशाला में परखा जा सकने वाला प्रश्न बना रहे हैं। इसका एक बड़ा कारण है, क्वांटम प्रौद्योगिकी का तीव्र विकास। क्वांटम कंप्यूटर और सेंसर जैसे उपकरणों को अधिक सटीकता से कार्य करने के लिए वैज्ञानिकों को पहले यह समझना पड़ा कि घड़ी वास्तव में क्या होती है।

2017 में एक शोध दल ने दिखाया कि समय मापना भी निशुल्क नहीं है। घड़ियां केवल निष्क्रिय माप उपकरण नहीं हैं, बल्कि इंजन की तरह हैं, जिन्हें काम करने के लिए ऊर्जा चाहिए। वे ऊष्मा उत्पन्न करती हैं। सामान्य जीवन में यह ऊष्मा नगण्य होती है, लेकिन क्वांटम स्तर पर इसका थोड़ा-सा प्रभाव भी घड़ी की सटीकता बिगाड़ सकता है।

सरल भाषा में कहें तो घड़ी वह है, जो किसी अपरिवर्तनीय घटना को उत्पन्न करे और उसका रिकार्ड रख सके, चाहे वह कॉफी का ठंडा होना हो या चेहरे पर झुर्रियों का पड़ना।

ह्यूबर स्वयं कहते हैं कि उनका उद्देश्य यह समझना है कि घड़ी वास्तव में क्या है, उसे चलाने के लिए किन संसाधनों की आवश्यकता होती है और उसकी सीमाएं कहां तक हैं।

2024 में इटली की राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद की पाओला वेरुक्की ने एक गणितीय माडल तैयार किया। इसमें उन्होंने छोटे-छोटे चुंबकों से बनी घड़ी को स्प्रिंग जैसी क्वांटम प्रणाली के साथ उलझाया। बाहर से देखने पर यह प्रणाली स्थिर दिखाई देती थी, लेकिन घड़ी के सापेक्ष उसकी स्प्रिंग फैलती और सिकुड़ती दिखाई देती थी, मानो समय वास्तव में बह रहा हो।

महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह प्रभाव बड़े पैमाने पर भी बना रहा। इससे संकेत मिला कि क्वांटम उलझाव से उत्पन्न समय का यह भ्रम सामान्य दैनिक भौतिकी में भी बना रह सकता है।

वेरुक्की ने अपने सहयोगी अलेस्सांद्रो कोप्पो के साथ मिलकर एक और साहसिक प्रस्ताव रखा, ब्लैक होल शायद प्रकृति की सबसे पूर्ण घड़ी है।।एक आदर्श घड़ी के लिए तीन बातें आवश्यक हैं, पर्याप्त ऊर्जा, बाहरी शोर से अलगाव और उलझाव (एंटैंगलमेंट) उत्पन्न करने की क्षमता। ब्लैक होल इन तीनों शर्तों को पूरा करता है।

गणित का अनोखा संगम

अलास्का के दूरस्थ गांवों में पला-बढ़ा एक लड़का, जिसने अपनी स्कूली शिक्षा भी पत्राचार के माध्यम से पूरी की थी। यह कल्पना करना कठिन है कि यही लड़का आगे चलकर ब्रह्मांड के सबसे गहरे रहस्यों में से एक को सुलझाने का प्रयास करेगा। उसका नाम था डॉन पेज। पेज ने पेन स्टेट विश्वविद्यालय में वर्षों तक अध्यापन किया और 1990 में कनाडा के यूनिवर्सिटी ऑफ अल्बर्टा में प्रोफेसर बने, जहां वे आज भी कार्यरत हैं।

ब्लैक होल ऊष्मागतिकी तथा उनकी प्रसिद्ध 'पेज कर्व' खोज के लिए वे विश्वभर में जाने जाते हैं, जो यह समझाती है कि ब्लैक होल से निकलने वाली सूचना किस प्रकार संरक्षित रहती है। रोचक बात यह है कि पेज एक श्रद्धालु ईसाई भी हैं। उन्हें क्वांटम मैकेनिक्स और चेतना के संबंध में भी गहरी रुचि है।

1983 में एक शोधपत्र प्रकाशित हुआ था-'Evolution Without Evolution: Dynamics Described by Stationary Observables.' इसी शोधपत्र में पेज-वूटर्स मैकेनिज्म की नींव रखी गई। इस शोधपत्र के सह-लेखक थे विलियम वूटर्स। उन्होंने वोज्शियेक ज़ुरेक के साथ मिलकर क्वांटम भौतिकी का एक मूलभूत सिद्धांत सिद्ध किया, जिसे नो-क्लोनिंग थ्योरम कहा जाता है। यह बताता है कि किसी भी अज्ञात क्वांटम अवस्था की पूर्ण प्रतिलिपि बनाना असंभव है।

दिलचस्प बात यह है कि 'क्यूबिट' शब्द, जो आज क्वांटम कंप्यूटिंग की दुनिया का सबसे परिचित शब्द है, उसकी रचना भी वूटर्स ने ही की थी। 1992 में उनकी और भौतिक विज्ञानी बेंजामिन शूमाकर के बीच हुई बातचीत से यह शब्द जन्मा। दूसरी ओर, पेज का कैरियर स्टीफन हॉकिंग से गहराई से जुड़ा रहा।

1976 में हॉकिंग ने दावा किया था कि ब्लैक होल में गिरने वाली जानकारी हमेशा के लिए नष्ट हो जाती है। यह विचार वर्षों तक विवाद का विषय बना रहा।

दो अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले ये वैज्ञानिक, एक ब्लैक होल का विशेषज्ञ और दूसरा क्वांटम सूचना का अग्रदूत, जब साथ आए, तो उन्होंने समय की प्रकृति के बारे में ऐसा प्रश्न उठाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

भविष्य की गर्भ में छिपा विज्ञान

अगर ह्यूबर और उनके जैसे वैज्ञानिक यह खोज सकें कि न्यूनतम एंट्रॉपी के साथ समय को कैसे मापा जा सकता है, तो इसका सीधा प्रभाव भविष्य की क्वांटम प्रौद्योगिकी पर पड़ेगा।

दिलचस्प बात यह है कि समय को भ्रम या चक्रीय घटना मानने का विचार भारतीय दर्शन में सदियों पुराना है। उपनिषदों और वेदांत परंपरा में समय को अनेक बार 'काल' के रूप में वर्णित किया गया है।

आधुनिक क्वांटम भौतिकी आज जो प्रश्न पूछ रही है कि क्या समय वास्तव में मूलभूत है या किसी गहरी वास्तविकता से उत्पन्न होता है, वही प्रश्न भारतीय चिंतकों ने हजारों वर्ष पहले अलग ढंग से पूछा था। अगर ब्लैक होल वास्तव में ब्रह्मांड की घड़ी सिद्ध हो जाए, तो गुरुत्वाकर्षण और क्वांटम सिद्धांत को एक करने की वैज्ञानिकों की सदियों पुरानी खोज में एक नया अध्याय जुड़ सकता है।

भौतिक विज्ञानी कार्लो रोवेल्ली ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक The Order of Time में भी यही विचार व्यक्त किया है कि समय शायद प्रकृति का मूलभूत गुण नहीं, बल्कि हमारी सीमित दृष्टि का परिणाम है।।इसी प्रकार A Brief History of Time ने भी सामान्य पाठकों में समय और ब्रह्मांड के प्रति जिज्ञासा जगाने में बड़ी भूमिका निभाई।

वैज्ञानिक स्वयं स्वीकार करते हैं कि ब्लैक होल को वास्तव में 'घड़ी' सिद्ध करने के लिए अभी बहुत काम बाकी है। वेरुक्की और कोप्पो का अगला कदम ब्लैक होल से निकलने वाले विकिरण की ऊष्मागतिकी का विश्लेषण करना है, ताकि उसकी तुलना प्रयोगशाला में बनाई गई क्वांटम घड़ियों के एंट्रॉपी पैटर्न से की जा सके।

यदि यह तुलना मेल खाती है, तो चार दशकों की प्रतीक्षा के बाद यह पेज-वूटर्स मैकेनिज्म का पहला ठोस प्रायोगिक प्रमाण हो सकता है। अगर समय वास्तव में केवल हमारी माप का रिकार्ड है, तो क्या ब्रह्मांड का अतीत और भविष्य भी वर्तमान की तरह कहीं पहले से मौजूद है? यदि हम सभी समय के निर्माता हैं, तो समयरहित मूलभूत ब्रह्मांड का वास्तविक स्वरूप आखिर कैसा होगा?

अनिकेत सिंह
लवकुश कोचिंग क्लास,
शाॅप नंबर-12, प्रथम तल,
अभिषेक एलिसियम, एक्सिस बैंक लेन, समा-सालवी रोड, न्यू समा,
बड़ौदा-390008 (गुजरात)

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