डिजिटल गिरफ्तारी का डर: जब अपराधी मोबाइल की स्क्रीन पर पुलिस बनकर सामने आता है - अनिकेत सिंह
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हाथों में हथकड़ी नहीं है, सामने पुलिस नहीं है, सिर्फ एक स्क्रीन है, फिर भी इंसान अपना सब कुछ गंवा बैठता है। एक समय था, जब अपराधी घर के दरवाजे पर खड़ा होता था। आज अपराध दरवाजा खटखटाता नहीं, वह मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देता है। सामने पुलिस की वर्दी पहने एक व्यक्ति होता है। पीछे किसी सरकारी कार्यालय जैसा दृश्य होता है। कड़क आवाज में आपका नाम लिया जाता है। आपके आधार कार्ड, बैंक खाते या किसी अन्य व्यक्तिगत जानकारी का उल्लेख किया जाता है। इसके बाद एक-एक करके शब्द गोलियों की तरह बरसने लगते हैं, ‘मनी लॉन्ड्रिंग’, ‘ड्रग्स’, ‘गैरकानूनी लेन-देन’, ‘एफआईआर’, ‘गिरफ्तारी’, ‘कोर्ट’ और अंत में आता है एक ऐसा शब्द, जिसका कानून की दुनिया में कोई अस्तित्व ही नहीं है- ‘डिजिटल अरेस्ट’।
लेकिन तब तक पीड़ित का मन कानून के भय से इतना घिर चुका होता है कि उसे सही-गलत सोचने का अवसर भी नहीं मिलता। यही आज साइबर युग के सबसे भयावह अपराधों में से एक, डिजिटल अरेस्ट घोटाला है।
डिजिटल गिरफ्तारी के भय को लेकर सुप्रीम कोर्ट का 4 अगस्त का आदेश महत्वपूर्ण है, क्योंकि अदालत ने स्थिति पर कोई संतोष व्यक्त नहीं किया है। अंततः भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र की स्टेटस रिपोर्ट में सामने आया कि राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायतों की संख्या 2024 में 1,23,672 से घटकर 2025 में 58,249 और 2026 के पहले छह महीनों में 16,377 रह गई है। अदालत ने इन आंकड़ों को उत्साहजनक माना और भारतीय रिजर्व बैंक को म्यूल खातों में डेबिट को अस्थाई रूप से रोकने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को साइबर अपराध समन्वय केंद्र स्थापित करने और ई-जीरो एफआईआर दर्ज करने का निर्देश भी दिया है। इसके अलावा, पीड़ितों को मुआवजा देने की व्यवस्था की समीक्षा के लिए एक अंतर-विभागीय समिति गठित करने को भी कहा गया है।
बैंकों, दूरसंचार कंपनियों और पुलिस के साथ विचारविमर्श के बाद सरकार अब यह समझने लगी है कि बुजुर्गों सहित बड़ी संख्या में लोग इन घोटालों का शिकार हो रहे हैं। ये घोटाले इसलिए सफल होते हैं, क्योंकि बुजुर्ग पीड़ित सत्ता का सम्मान करते हैं, उससे डरते हैं और कानूनी परेशानी की कल्पना मात्र से घबरा जाते हैं। हालांकि ठग अब युवाओं, पेशेवरों और ऐसे लोगों को भी आसानी से निशाना बना रहे हैं, जो चेतावनियों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
असंख्य जांच के बावजूद डिजिटल अरेस्ट के मामलों में बहुत कम सजा हुई है। यह संकेत देता है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियां इन घोटालों से निपटने के लिए अभी तेजी से कार्रवाई करने की स्थिति में नहीं हैं या फिर सरकार का रवैया इस मामले में पर्याप्त गंभीर नहीं है।
डिजिटल ठगी करने वाले अपने तौरतरीकों में बेहद चतुर साबित हुए हैं। वे सिम बाक्स के जरिए कॉल के वास्तविक स्रोत को छिपाते हैं, जिससे कॉल भारतीय नंबरों से आती हुई दिखाई देती है। इसके बाद विभिन्न राज्यों में खोले गए कई म्यूल खातों के माध्यम से तेजी से धन का हस्तांतरण किया जाता है।
अब यह भी सामने आया है कि ठग पीड़ितों को विश्वास में लेने और जांचकर्ताओं से बचने के लिए वीडियो कॉल पर डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस तरह धोखेबाज हमेशा उनका पीछा करने वालों से एक कदम आगे रहने की कोशिश करते हैं।
अदालत का ध्यान फिलहाल धन की बरामदगी पर भी है। 36,290 मामलों में 18.05 करोड़ रुपए सुरक्षित रूप से वापस कराए गए हैं। साथ ही, ‘म्यूलहंटर’ जैसी खोज प्रणालियों के जरिए खाते फ्रीज करने और ऐसे मामलों के निपटारे की प्रक्रिया को तेज करने पर भी जोर दिया जा रहा है। अब तक 20 से अधिक बैंकों में इस्तेमाल हो रही यह प्रणाली अपराधियों को पकड़ा या दोषी ठहराया न जा सके, तब भी वित्तीय नुकसान को कम करने में मदद कर सकती है।
लेकिन अपराधियों को सजा दिलाना कठिन है, क्योंकि इस तरह के कई ठगी और जबरन वसूली के रैकेट म्यांमार, कंबोडिया और ‘गोल्डन’ कहे जाने वाले रहस्यमय क्षेत्रों में स्थित हैं। ये गिरोह अलग-अलग इलाकों में मौजूद विदेशी साइबर-ठगी केंद्रों से संचालित होते हैं।
म्यांमार में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सरकारी संरक्षण के कारण ऐसे साइबर ठगी केंद्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है। हाल की जांच और छापेमारी के बावजूद इन गिरोहों पर पूरी तरह लगाम लगाना मुश्किल रहा है, क्योंकि ये केंद्र संघर्षग्रस्त देश के नए-नए इलाकों में स्थानांतरित हो जाते हैं।
2023 में चीन ने चीनी नागरिकों को निशाना बनाने वाले साइबर ठगी केंद्रों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की तो ठगों ने अपना ध्यान दूसरे देशों के नागरिकों की ओर मोड़ दिया। अब भारतीयों को भी तस्करी और यातनाओं के जरिए मजबूर किया जा रहा है कि वे अपने ही देशवासियों के खिलाफ डिजिटल अपराध करें।
डिजिटल अरेस्ट का असली खतरा यही है कि इसमें अपराधी सामने दिखाई देता है, लेकिन वह पुलिस नहीं होता, आवाज सरकारी लगती है, लेकिन वह कानून नहीं होता, डर असली होता है, लेकिन गिरफ्तारी काल्पनिक। तकनीक ने अपराधी को घर के दरवाजे तक नहीं, बल्कि सीधे हमारी जेब में मौजूद मोबाइल फोन तक पहुंचा दिया है। ऐसे में जागरूकता, त्वरित बैंकिंग कार्रवाई और अंतरराष्ट्रीय सहयोग ही इस नए साइबर अपराध के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार बन सकते हैं।
अनिकेत सिंह
लवकुश कोचिंग क्लास,
शाॅप नंबर-12, प्रथम तल,
अभिषेक एलिसियम, एक्सिस बैंक लेन, समा-सालवी रोड, न्यू समा,
बड़ौदा-390008 (गुजरात)
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लेख
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