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हनुमान नहीं, आपकी सोच कठघरे में है

 



आजकल कुछ लोग एक राजनीतिक जुलूस में बन्दर के वेश में प्रस्तुत एक कलाकार को "हनुमान जी" बताकर उस राजनीतिक दल, उससे जुड़े संगठनों और समर्थकों को कटघरे में खड़ा करने में लगे हैं। जब उन्हें समझाया जाता है कि शास्त्रों में हनुमान जी को साधारण बन्दर नहीं, बल्कि वानर कहा गया है, तब वे विषय से भागकर दूसरी दिशा में चर्चा मोड़ देते हैं। यह वही मानसिकता है जो तथ्य सामने आने पर तर्क नहीं, बल्कि भ्रम फैलाने का सहारा लेती है।


सबसे पहले वाल्मीकि रामायण पढ़िए। उसमें कहीं भी हनुमान जी को साधारण बन्दर नहीं कहा गया है। उन्हें वानर कहा गया है। वानर सेना, वानरराज सुग्रीव, महाबली बाली हर स्थान पर "वानर" शब्द का प्रयोग हुआ है। यदि आपको सचमुच भगवान राम और हनुमान जी से प्रेम है तो सोशल मीडिया की अफवाहों से नहीं, मूल ग्रंथों से ज्ञान लीजिए। वाल्मीकि रामायण पढ़िए, तब आपको स्वयं समझ में आ जाएगा कि शास्त्र क्या कहते हैं।


लेकिन विडंबना यह नहीं है कि कोई अज्ञानवश बन्दर और वानर का अंतर नहीं जानता। विडंबना यह है कि वही लोग, जो आज बन्दर के वेश को हनुमान जी बताकर धार्मिक भावनाओं की दुहाई दे रहे हैं, वे उस समय मौन थे या खुलकर बचाव कर रहे थे जब संसद परिसर के बाहर भगवान श्रीराम के चित्र के साथ ऐसा व्यवहार हुआ जिसे करोड़ों रामभक्त अपमानजनक मानते हैं। उस घटना की आलोचना करने वालों को ही कटघरे में खड़ा किया गया। तब इनकी धार्मिक संवेदनाएँ कहाँ चली गई थीं? तब भगवान राम का सम्मान याद क्यों नहीं आया?


यही दोहरा मापदंड प्रश्न खड़ा करता है। एक ओर बन्दर के वेश को हनुमान बताकर लोगों की भावनाएँ भड़काने का प्रयास, दूसरी ओर भगवान राम के चित्र के साथ हुए कथित अपमानजनक व्यवहार पर सफाई और समर्थन। आखिर यह कैसी नैतिकता है? कैसी वैचारिक ईमानदारी है? क्या भगवान राम और हनुमान जी का सम्मान भी अब राजनीतिक सुविधा देखकर तय किया जाएगा?


यदि किसी कलाकार ने बन्दर का वेश धारण किया है तो उसे हनुमान जी घोषित कर देना न तो शास्त्रसम्मत है और न ही बौद्धिक ईमानदारी। और यदि वास्तव में आपको भगवान राम और हनुमान जी के सम्मान की चिंता है, तो वह चिंता हर परिस्थिति में समान रूप से दिखाई देनी चाहिए, न कि केवल तब जब उससे राजनीतिक लाभ मिलने की संभावना हो।


मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं, लेकिन भगवानों का सम्मान दलों के हिसाब से बदलने लगे, यह किसी भी सभ्य समाज के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। जो लोग हर घटना में अपनी सुविधा के अनुसार धार्मिक भावनाओं का पैमाना बदल लेते हैं, उन्हें पहले अपने भीतर झाँकना चाहिए। वाल्मीकि रामायण पढ़िए। तथ्य जानिए। वानर और बन्दर का अंतर समझिए। फिर किसी पर उंगली उठाइए। क्योंकि ज्ञान के बिना किया गया आरोप केवल अज्ञान का प्रदर्शन होता है।



और अंत में उन सभी से केवल एक प्रश्न कि जब एक ही विषय पर आपकी संवेदनाएँ राजनीतिक दल देखकर बदल जाती हैं, जब भगवान राम के सम्मान पर भी आपका पक्ष सिद्धांत से नहीं बल्कि सुविधा से तय होता है, जब तथ्य सामने होने के बावजूद आप भ्रम फैलाने को ही अपना हथियार बनाए रखते हैं, तब रोज़ शीशे के सामने खड़े होकर आप स्वयं की आँखों में आँखें डालकर आखिर कैसे देख लेते हैं?

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