नींव से राष्ट्र-निर्माण तक: स्वतंत्रता के 80वें वर्ष में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, दक्षिण परिसर देहरा की नई यात्रा
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स्वतंत्रता दिवस केवल राष्ट्रीय ध्वज फहराने, राष्ट्रगान गाने और औपचारिक समारोहों तक सीमित अवसर नहीं है। यह वह ऐतिहासिक क्षण है जब एक राष्ट्र अपने अतीत के संघर्षों को स्मरण करता है, वर्तमान की उपलब्धियों का मूल्यांकन करता है और भविष्य के संकल्पों को नई ऊर्जा देता है। स्वतंत्रता के 80वें वर्ष की ओर बढ़ता भारत इसी आत्ममंथन और आत्मविश्वास के दौर से गुजर रहा है। इसी व्यापक राष्ट्रीय चेतना के बीच हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर, देहरा में स्वतंत्रता दिवस का आयोजन केवल एक विश्वविद्यालयीय कार्यक्रम नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के अर्थ को शिक्षा, शोध, चरित्र, राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र-निर्माण से जोड़ने वाला अवसर बन जाता है। विश्वविद्यालय की इस यात्रा को कुलगुरु प्रो. डॉ. सत प्रकाश बंसल जी के गतिशील और दूरदर्शी नेतृत्व के संदर्भ में देखना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि पिछले वर्षों में विश्वविद्यालय ने संस्थागत निर्माण से आगे बढ़कर अकादमिक गुणवत्ता, शोध, नवाचार, भारतीय ज्ञान परंपरा, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सामाजिक उत्तरदायित्व की दिशा में अपनी पहचान मजबूत की है। उपलब्ध विश्वविद्यालयीय सामग्री भी इस परिवर्तन को संस्थागत सुदृढ़ीकरण और अकादमिक उत्कृष्टता की यात्रा के रूप में रेखांकित करती है।
स्वतंत्रता की कीमत समझने के
लिए हमें उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात बलिदानों की ओर लौटना
होगा, जिनकी नींव पर आज का भारत खड़ा है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस की
आज़ाद हिंद फौज के फौजी बसंत सिंह जी की याद में नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद हिंद फ़ौज
का स्मरण इस अवसर पर विशेष अर्थ रखता है। नेताजी का आह्वान “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें
आज़ादी दूँगा”केवल स्वतंत्रता संग्राम का युद्धघोष नहीं था; वह युवाओं के भीतर राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करने
की चेतना जगाने वाला आह्वान था। स्वतंत्रता केवल अधिकार प्राप्त करने का नाम नहीं, बल्कि कर्तव्य स्वीकार करने का नाम भी है। आज जब हमारे
सामने स्वतंत्र भारत को विकसित, आत्मनिर्भर, ज्ञान-समृद्ध और विश्व-पटल पर अग्रणी बनाने का लक्ष्य है, तब नेताजी की
वह भावना नए अर्थों में हमारे सामने खड़ी होती है। प्रश्न आज भी वही है हम किस उद्देश्य से जन्मे हैं? केवल खाना, पीना और जीवन व्यतीत करना, या अपने ज्ञान, श्रम और प्रतिभा से राष्ट्र के
लिए कुछ सार्थक करना?
इसी संदर्भ में विश्वविद्यालय
परिसर में स्वतंत्रता दिवस का आयोजन स्मृति और संकल्प के बीच एक सेतु का निर्माण
करता है। बलिदानी परंपरा का स्मरण केवल अतीत को नमन करना नहीं है; यह वर्तमान पीढ़ी को यह बताना भी है कि राष्ट्र किसी एक
व्यक्ति, संस्था या सरकार से नहीं बनता। राष्ट्र करोड़ों नागरिकों के
छोटे-बड़े योगदान से निर्मित होता है। इस दृष्टि से बलिदानी
पंकज बड्याल, सीआरपीएफ, का स्मरण भी हमें यह एहसास
कराता है कि स्वतंत्र भारत की सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा के लिए आज भी हमारे
वीर अपने प्राणों का बलिदान दे रहे हैं। उपलब्ध सामग्री में 29 जुलाई 2010 को छत्तीसगढ़ में वामपंथी
उग्रवादी हिंसा के विरुद्ध संघर्ष में उनके बलिदान का उल्लेख है। ऐसे बलिदानों को
याद करना हमारी राष्ट्रीय स्मृति को जीवित रखना है। इसी प्रकार विभाजन विभीषिका
में अपने प्राण, घर, परिवार और अस्मिता खोने वाले
लाखों लोगों की पीड़ा को स्मरण करना हमें स्वतंत्रता की वास्तविक कीमत का बोध
कराता है।
आज स्वतंत्र भारत के सामने
चुनौती विदेशी शासन से मुक्ति प्राप्त करने की नहीं, बल्कि गुलामी की मानसिकता, जड़ सोच, असमान अवसरों और आत्मविश्वास की
कमी के अवशेषों से मुक्ति की है। इसी बिंदु पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का महत्व सामने आता है। NEP 2020 शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं मानती, बल्कि ज्ञान, कौशल, मूल्य, रचनात्मकता, अनुसंधान और जिम्मेदार नागरिकता
के निर्माण से जोड़ती है। हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय की वर्तमान
शैक्षणिक यात्रा इसी परिवर्तन को स्वीकार करने की दिशा में आगे बढ़ती दिखाई देती
है। बहुविषयक शिक्षा, कौशल-आधारित अधिगम, अनुभवात्मक शिक्षा, शोध, भारतीय ज्ञान परंपरा और छात्र-केंद्रित
दृष्टिकोण को संस्थागत स्वरूप देने का प्रयास इसी व्यापक राष्ट्रीय परिवर्तन का
हिस्सा है। विश्वविद्यालय की उपलब्ध सामग्री भी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020के
क्रियान्वयन को अकादमिक पुनर्संरचना और नवाचार से जोड़ती है।
कुलगुरु प्रो. डॉ. सत प्रकाश बंसल जी के नेतृत्व की विशेषता इसी परिवर्तनकारी दृष्टि में दिखाई
देती है। जुलाई 2021 में कुलगुरु का दायित्व संभालने के बाद उनकी प्राथमिकता
केवल विश्वविद्यालय के प्रशासनिक संचालन तक सीमित नहीं रही, बल्कि संस्थान को एक ऐसी अकादमिक संस्कृति की ओर ले जाने की
रही जिसमें अंतर्विषयकता, परिणामोन्मुखी कार्य, गुणवत्ता, शोध और संस्थागत अनुशासन एक-दूसरे के पूरक बनें। विश्वविद्यालयीय स्रोतों में उनके
नेतृत्व को प्रशासनिक दक्षता, अकादमिक सुदृढ़ीकरण और
सकारात्मक संस्थागत वातावरण के साथ जोड़ा गया है। यह दृष्टि इसलिए महत्वपूर्ण है
क्योंकि किसी विश्वविद्यालय का वास्तविक विकास केवल भवनों से नहीं होता; उसकी असली पहचान उसके शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी, शोध संस्कृति, प्रशासनिक पारदर्शिता और समाज के प्रति उसकी संवेदनशीलता से
निर्मित होती है।
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय
विश्वविद्यालय की यात्रा इस अर्थ में विशेष है कि संस्थान ने सीमित और संक्रमणशील
परिस्थितियों के बीच अपने स्थायी परिसरों और संस्थागत संरचनाओं को विकसित किया। धौलाधार परिसर, शाहपुर परिसर और सप्त सिंधु
परिसर, देहरा में शैक्षणिक गतिविधियों का
विस्तार इस बात का प्रतीक है कि विश्वविद्यालय ने भौगोलिक सीमाओं को अपनी कमजोरी
नहीं, बल्कि संभावनाओं में बदलने का प्रयास किया है। दक्षिण परिसर
देहरा इसी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। देहरा का यह परिसर केवल एक भौतिक
परिसर नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश में उच्च शिक्षा, शोध, नवाचार और स्थानीय विकास के नए
अवसरों का द्वार बन सकता है। विश्वविद्यालय के लिए यह अवसर है कि वह अपने अकादमिक
संसाधनों को स्थानीय समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और युवाओं की आकांक्षाओं से और अधिक गहराई से
जोड़े।
पिछले वर्षों में विश्वविद्यालय
की उपलब्धियों में NAAC द्वारा 3.42 CGPA के साथ A+ ग्रेड प्राप्त करना संस्थागत
गुणवत्ता की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आया है। इसी प्रकार
शोध परियोजनाओं, प्रभावशाली शोध प्रकाशनों, नवाचार, पेटेंट, अंतरराष्ट्रीय अकादमिक आदान-प्रदान और शोध साझेदारियों को बढ़ावा देने की दिशा में किए
गए प्रयास विश्वविद्यालय को केवल शिक्षण संस्थान से आगे बढ़ाकर ज्ञान-उत्पादन के केंद्र के रूप में स्थापित करने की संभावना पैदा
करते हैं। यह वही परिवर्तन है जिसकी आज भारत को आवश्यकता है—ऐसे विश्वविद्यालय जो केवल डिग्री न दें, बल्कि समस्याओं के समाधान खोजें; केवल ज्ञान न
पढ़ाएँ, बल्कि नया ज्ञान उत्पन्न करें।
भारतीय ज्ञान परंपरा इस
परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण आयाम है। भारत की हजारों वर्षों की ज्ञान-संपदा को आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, पर्यावरण, स्वास्थ्य, दर्शन और सामाजिक चिंतन के साथ
जोड़ना आज केवल सांस्कृतिक आग्रह नहीं, बल्कि ज्ञान-आधारित भविष्य की आवश्यकता है। विश्वविद्यालय में भारतीय
ज्ञान परंपरा, भारतीय वाङ्मय और भारतीय संस्कृति के अध्ययन एवं प्रसार की
दिशा में किए गए प्रयास इसी व्यापक सोच का हिस्सा हैं। जब आधुनिक शिक्षा और भारतीय
ज्ञान परंपरा का संवाद स्थापित होता है, तब विद्यार्थी केवल वैश्विक
नागरिक नहीं बनता, बल्कि अपनी सभ्यता की बौद्धिक जड़ों से जुड़ा हुआ वैश्विक नागरिक
बनता है।
इसी प्रकार एक भारत श्रेष्ठ भारत, फिटइंडियामूवमेंट, और युवा संगम जैसी पहलें शिक्षा को सांस्कृतिक संवाद का माध्यम बनाती
हैं। हिमाचल प्रदेश और ओडिशा के बीच युवा सहभागिता, संस्कृति, प्रौद्योगिकी, परंपरा, पर्यटन और
पारस्परिक समन्वय को बढ़ावा देने में विश्वविद्यालय की भूमिका इस बात का उदाहरण है
कि विश्वविद्यालय राष्ट्रीय एकता को केवल पाठ्यक्रम में नहीं, बल्कि अनुभव में भी बदल सकते हैं। यही वह भारत है जिसमें
विविधता विभाजन का कारण नहीं, बल्कि संवाद और शक्ति का आधार
बनती है।
आज विकसित भारत @2047 का लक्ष्य हमारे सामने है। यह लक्ष्य केवल सकल घरेलू
उत्पाद बढ़ाने का लक्ष्य नहीं है। विकसित भारत का अर्थ विकसित मानव, विकसित संस्थान, विकसित ज्ञान व्यवस्था, विकसित सामाजिक चेतना और विकसित राष्ट्रीय चरित्र भी है। इस
लक्ष्य को साकार करने के लिए मैं विश्वविद्यालय के संदर्भ में “5-C” को एक उपयोगी मार्गदर्शक मानता हूँ चरित्र, योग्यता, रचनात्मकता, सहयोग,
योगदान। चरित्र हमें राष्ट्र से जोड़ता है, दक्षता हमें प्रतिस्पर्धी बनाती है, सृजनात्मकता
हमें नए समाधान देती है, सहयोग हमें सामूहिक शक्ति
प्रदान करता है और योगदान हमें यह याद दिलाता है कि हमारी शिक्षा का अंतिम
उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय
उपयोगिता भी है।
यहाँ कर्म सिद्धांत भी अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है। हमारी भारतीय परंपरा
हमें बताती है कि कर्म ही मनुष्य की पहचान और उसके भविष्य का आधार है।
विश्वविद्यालय के संदर्भ में इसका अर्थ सरल है हमारी आज की कक्षा, आज का शोध, आज का नवाचार, आज की ईमानदार प्रशासनिक प्रक्रिया और आज की छात्र-सेवा ही कल के भारत का निर्माण करेगी। यदि प्रत्येक शिक्षक
अपने ज्ञान को राष्ट्र को समर्पित करे, प्रत्येक विद्यार्थी अपनी
प्रतिभा को समाज के लिए उपयोगी बनाए और प्रत्येक कर्मचारी अपने दायित्व को निष्ठा
से निभाए, तो विश्वविद्यालय स्वयं राष्ट्र-निर्माण की
प्रयोगशाला बन जाता है।
स्वतंत्रता दिवस के इस अवसर पर
इसलिए सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि हमने कितनी उपलब्धियाँ अर्जित कीं, बल्कि यह होना चाहिए कि हमने उन उपलब्धियों को राष्ट्र के भविष्य से कितना जोड़ा है। हमें
अपने स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों को केवल स्मारकों और समारोहों में नहीं, बल्कि प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, कक्षाओं, शोध परियोजनाओं, नवाचार केंद्रों और समाज के बीच जीवित रखना होगा। हमें ऐसा
भारत बनाना होगा जिसमें शिक्षा अवसर का माध्यम हो, शोध समाधान
का माध्यम हो, संस्कृति संवाद का माध्यम हो और विश्वविद्यालय राष्ट्र की
प्रगति का इंजन बने।
स्वतंत्रता के 80वें वर्ष के इस राष्ट्रीय पर्व पर हिमाचल प्रदेश केंद्रीय
विश्वविद्यालय, विशेषकर दक्षिण
परिसर देहरा, एक नई यात्रा का संकल्प ले सकता है संस्था-निर्माता से राष्ट्र-परिवर्तनकारी संस्था तक की
यात्रा। यह यात्रा केवल भवनों और परिसरों की यात्रा नहीं होगी; यह विचारों, प्रतिभाओं, शोध, नवाचार और राष्ट्रीय चरित्र की
यात्रा होगी। कुलगुरु प्रो. डॉ. सत प्रकाश
बंसल जी के नेतृत्व में पिछले वर्षों में विकसित संस्थागत आधार इस नई यात्रा के
लिए एक महत्वपूर्ण पाथेय प्रदान करता है। विश्वविद्यालय की उपलब्ध सामग्री भी उनके
कार्यकाल को अकादमिक उत्कृष्टता, शोध, अंतरराष्ट्रीय
सहयोग, गुणवत्ता और संस्थागत विकास के साथ जोड़ती है।हमारे
स्वतंत्रता सेनानियों के सपने और नई पीढ़ी के भारत की आकांक्षाएँ एक साथ दिखाई दें।
उस तिरंगे के नीचे खड़ा प्रत्येक विद्यार्थी स्वयं से एक प्रश्न पूछे“मैं भारत के लिए क्या कर सकता हूँ?”
यही प्रश्न स्वतंत्रता को उत्सव
से संकल्प में बदलता है। यही प्रश्न शिक्षा को डिग्री से दायित्व में बदलता है। और
यही प्रश्न हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय को एक ऐसे संस्थान में रूपांतरित
कर सकता है जो हिमालय की धरती से ज्ञान की ऐसी ज्योति प्रज्वलित करे जिसकी रोशनी
भारत के विकास और विश्व के कल्याण तक पहुँचे।स्वतंत्रता
हमें विरासत में मिली है; विकसित भारत हमें अपने कर्म से
बनाना है।और शायद स्वतंत्रता के 80वें वर्ष का
सबसे सार्थक संदेश यही है बलिदान को स्मरण
करें, वर्तमान को कर्म से सार्थक करें और भविष्य को अपने योगदान
से गढ़ें।
जय हिंद।
जय भारत।
Tags :
अमरीक विचार

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