शिवपुरी भाजपा की जमीन पर ‘गुप्त खेल’!
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शिवपुरी में भाजपा के पुराने जिला कार्यालय की जमीन को लेकर सामने आया विवाद अब केवल जमीन की कीमत तक सीमित नहीं रह गया है। सरकूलर रोड स्थित करीब 6,300 वर्गफीट जमीन के कथित सौदे को लेकर पार्टी के भीतर से ही अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। एक ओर यह कहा जा रहा है कि जमीन 2 करोड़ 25 लाख 11 हजार रुपए में बेची गई है, वहीं दूसरी ओर पार्टी के एक पार्षद का दावा है कि उनके पास इससे कहीं अधिक कीमत पर जमीन खरीदने वाला ग्राहक मौजूद था। इन दावों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर वास्तविक स्थिति क्या है?
भाजपा जैसी अनुशासित और संगठनात्मक रूप से मजबूत पार्टी के भीतर की जानकारी लगातार सार्वजनिक होकर स्थानीय समाचार पत्रों की सुर्खियां कैसे बन रही है, यह अपने आप में विचारणीय विषय है। जमीन के सौदे से जुड़े दावे, पार्टी पदाधिकारियों के बीच हुई बातचीत और अंदरूनी निर्णयों की जानकारी यदि बाहर आ रही है, तो यह केवल जमीन के विवाद का विषय नहीं रह जाता, बल्कि संगठन के भीतर सूचनाओं के प्रवाह और आपसी विश्वास पर भी सवाल खड़े करता है।
जनता के बीच सबसे पहला प्रश्न यही है कि आखिर जमीन बिकी है या अभी केवल सौदा हुआ है? यदि रजिस्ट्री नहीं हुई है तो क्या अंतिम निर्णय हो चुका है, या अभी प्रक्रिया बाकी है? यदि सौदा हो चुका है तो क्या वास्तव में 2 करोड़ 25 लाख 11 हजार रुपए ही तय हुए हैं? और यदि इससे अधिक कीमत का खरीदार उपलब्ध था, जैसा कि दावा किया जा रहा है, तो उस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया गया?
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न जमीन की वास्तविक कीमत को लेकर है। यदि बाजार में जमीन की कीमत लगभग 4,500 रुपए प्रति वर्गफीट बताई जा रही है, तो 6,300 वर्गफीट जमीन की संभावित कीमत करीब 2.83 करोड़ रुपए बैठती है। ऐसे में 2.25 करोड़ रुपए के सौदे और कथित बाजार मूल्य के बीच अंतर को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन केवल किसी व्यक्ति के यह कह देने से कि उसके पास अधिक कीमत का खरीदार था, यह स्वतः प्रमाणित नहीं हो जाता कि जमीन वास्तव में उतनी ही कीमत में बिक सकती थी। इसके लिए खरीदार की गंभीरता, लिखित प्रस्ताव, भुगतान की क्षमता और सौदे की वास्तविक शर्तें भी सामने आना जरूरी हैं।
यहीं से तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल पैदा होता है। यदि जमीन अभी बिकी ही नहीं है, तो क्या अधिक कीमत पर अपने ग्राहक से सौदा करवाने के लिए यह पूरा विवाद खड़ा किया जा रहा है? क्या पार्टी के भीतर अलग-अलग लोग अपने-अपने खरीदार सामने रखकर संगठन पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं? या वास्तव में पार्टी को कम कीमत पर संपत्ति बेचने से नुकसान होने की आशंका है? इन दोनों संभावनाओं के बीच अंतर केवल दस्तावेजों और आधिकारिक प्रक्रिया से ही स्पष्ट हो सकता है।
एक और गंभीर सवाल यह है कि भाजपा की संपत्ति को बेचने का अधिकार आखिर किसके पास है? क्या जिला संगठन स्वयं ऐसा निर्णय ले सकता है? क्या इसके लिए जिला कोर कमेटी की अनुमति आवश्यक है? क्या प्रदेश संगठन की स्वीकृति जरूरी है? या संपत्ति बेचने का अंतिम अधिकार प्रदेश अथवा केंद्रीय स्तर पर निर्धारित किसी प्राधिकरण के पास है? यदि जिलाध्यक्ष स्वयं कह रहे हैं कि वे केवल माध्यम हैं और निर्णय प्रदेश नेतृत्व का है, तो पार्टी को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित निर्णय किस स्तर पर लिया गया और किस प्रक्रिया के तहत लिया गया।
इस पूरे मामले में भाजपा के कोर कमेटी सदस्यों में से कुछ का इससे अनभिज्ञ होना भी चर्चा का विषय बन गया है। यदि पार्टी की महत्वपूर्ण संपत्ति बेचने का निर्णय हुआ है, तो संगठन के प्रमुख स्थानीय पदाधिकारियों और कोर कमेटी के सदस्यों को इसकी जानकारी किस स्तर तक थी, यह स्पष्ट होना चाहिए। यदि सभी को जानकारी थी तो कुछ जिम्मेदार लोग इससे अनभिज्ञ क्यों हैं और यदि जानकारी नहीं थी तो निर्णय किस प्रक्रिया से हुआ?
यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा ने पुराने कार्यालय की जमीन के बदले नए जिला कार्यालय के लिए बड़ी जमीन हासिल की है और उसके लिए पार्टी द्वारा प्रीमियम भी जमा कराया गया है। ऐसे में पुरानी संपत्ति बेचने का निर्णय संगठन की संपत्ति प्रबंधन से जुड़ा स्वाभाविक कदम भी हो सकता है। लेकिन जब कीमत, खरीदार और निर्णय प्रक्रिया को लेकर पार्टी के भीतर से ही सवाल उठें, तब पारदर्शिता की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा ध्यान खींचने वाली बात यह है कि पार्टी की अंदरूनी बातें बार-बार सार्वजनिक कैसे हो रही हैं। इससे पहले भी संगठन से जुड़ी कुछ ऐसी जानकारियां सार्वजनिक हुई हैं, जिन्हें सामान्यतः पार्टी की आंतरिक चर्चाओं का हिस्सा माना जाता है। यदि पार्टी के भीतर चल रही बैठकों, संदेशों, प्रस्तावों और संभावित निर्णयों की जानकारी लगातार बाहर पहुंच रही है, तो यह केवल किसी एक जमीन के विवाद का मामला नहीं है। यह संगठन के भीतर मौजूद मतभेदों, गुटबाजी या सूचनाओं के जानबूझकर लीक किए जाने की संभावना की ओर भी संकेत कर सकता है।
यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि क्या ये जानकारियां निष्पक्ष रूप से सामने आ रही हैं या किसी विशेष पक्ष को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से चुनिंदा तरीके से बाहर भेजी जा रही हैं। यदि किसी व्यक्ति के पास अधिक कीमत का खरीदार है, तो उसका प्रस्ताव पार्टी के सक्षम स्तर पर औपचारिक रूप से रखा जा सकता है। इसके लिए मीडिया के माध्यम से दबाव बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ रही है? दूसरी ओर, यदि वास्तव में जमीन कम कीमत पर बेची जा रही है, तो पार्टी को दस्तावेजों और अधिकृत मूल्यांकन के साथ स्थिति स्पष्ट करने में संकोच क्यों होना चाहिए?
जनता को आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि साफ जवाब चाहिए। जमीन का वर्तमान स्वामित्व किसके नाम है? बिक्री का निर्णय किसने लिया? क्या बिक्री की अनुमति संबंधित संगठनात्मक स्तर से मिली है? क्या रजिस्ट्री हो चुकी है? यदि नहीं हुई तो वर्तमान स्थिति क्या है? जमीन का स्वतंत्र मूल्यांकन किस आधार पर हुआ? कितने खरीदारों से प्रस्ताव लिए गए? क्या किसी अन्य खरीदार ने इससे अधिक कीमत की लिखित पेशकश की थी? और यदि की थी तो उसे स्वीकार क्यों नहीं किया गया?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही यह तय हो सकेगा कि मामला वास्तव में पार्टी की संपत्ति को कम कीमत पर बेचने का है, संगठन के भीतर निर्णय प्रक्रिया को लेकर भ्रम का है, या फिर आपसी खींचतान के चलते एक सामान्य संपत्ति बिक्री को विवाद का रूप दिया जा रहा है।
भाजपा को भी इस मामले में चुप रहने के बजाय तथ्य सार्वजनिक करने चाहिए। क्योंकि जब पार्टी की संपत्ति, उसकी कीमत और उसके निर्णय की प्रक्रिया पर सवाल उठते हैं, तो जवाब केवल पार्टी के कार्यकर्ताओं को नहीं, बल्कि उस जनता को भी चाहिए जिसके बीच पार्टी पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करती है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल जमीन की कीमत से भी बड़ा है कि भाजपा की यह जमीन वास्तव में बिकी है या नहीं, और यदि बिकी है तो किस प्रक्रिया और किस कीमत पर? इसके साथ ही यह जानना भी जरूरी है कि पार्टी के भीतर की संवेदनशील जानकारियां लगातार बाहर पहुंचाने वाला कौन है और आखिर उसके पीछे उद्देश्य क्या है। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो दस्तावेज सामने रखकर विवाद समाप्त किया जा सकता है। और यदि प्रक्रिया में कोई कमी है, तो उसे सुधारना पार्टी के हित में होगा। लेकिन जब तक इन सवालों के स्पष्ट उत्तर नहीं मिलते, तब तक संदेह और सवाल दोनों बने रहेंगे।
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