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सोशल मिडिया : जहरीले प्रचार कि माध्यम - स्नेहा सिंह

 

वर्तमान समय में फिल्म, राजनीति और व्यापार-उद्योग के क्षेत्र में सोशल मीडिया का प्रभाव बहुत बढ़ गया है और इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस नाम का दोधारी हथियार भी हमारे हाथ में आ गया है। अपने हित के लिए जनता को बहकाना और फुसलाना अब आसान हो गया है।

देश के नागरिकों से जुड़े डेटा का उपयोग करके कंपनियां कुछ ऐसा ही करती हैं। वे धीरे-धीरे और व्यवस्थित तरीके से जनता का ब्रेनवॉश करती हैं और अपने ग्राहक या पसंदीदा राजनीतिक दल को विजेता बनाने का प्रयास करती हैं। इसी तरह डेटा के आधार पर जनमानस को प्रभावित करके एक देश की सरकार दूसरे देश में अपने लिए लाभदायक राजनीतिक दल को सत्ता में ला सकती है। देश के नागरिकों का डेटा विदेशी सरकारों या कंपनियों तक पहुँच सकता है।

बहुत चर्चित छात्र आंदोलन के लिए भी ‘क्राॅक्रोच जनता पार्टी’ ने भीड़ जुटाने के लिए सोशल मीडिया और दूसरे प्लेटफार्म का चालाकी से इस्तेमाल किया था।

लोगों को सबसे अधिक आश्चर्य इस बात पर होता है कि केजरीवाल की पार्टी में कभी मीम बनाने का काम करने वाला अभिजीत दीपक रातोंरात पूरे भारत में प्रसिद्ध या यूं कहें कि कुख्यात कैसे हो गया। साधारण परिवार में जन्मा और महाराष्ट्र के एक गांव से सीधे अमेरिका चला गया अभिजीत अचानक भारत लौट आया। वह भी उस समय जब न्यायाधीश सूर्यकांत ने आज के उछृंखल युवाओं के लिए ‘क्राॅक्रोच’ शब्द का प्रयोग किया था और उसने इसी मुद्दे पर आंदोलन शुरू करने की तैयारी कर ली। यह कुछ हैरान करने वाली बात लगती है।

15 मई को न्यायाधीश सूर्यकांत ने ‘क्राॅक्रोच’ संबंधी टिप्पणी की और 16 मई को अमेरिका में बैठे अभिजीत ने सोशल मीडिया पर ‘क्राॅक्रोच जनता पार्टी’ की घोषणा कर दी। इसके बाद देखते ही देखते केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान, तुर्की, मलेशिया, बांग्लादेश और यूरोप-अमेरिका में उसके दो करोड़ से अधिक फालोअर्स हो गए। यानी सात दिनों में उसे इतने सारे समर्थक मिल गए!

महाराष्ट्र साइबर पुलिस के दावे के अनुसार 500 से अधिक संदिग्ध सोशल मीडिया अकाउंट की पहचान की गई। इनमें लगभग 100 अकाउंट पाकिस्तान, मलेशिया और पश्चिम एशिया के देशों से संचालित किए जा रहे थे। जाँच के दौरान 429 आपत्तिजनक पोस्ट और हैंडल की पहचान हुई। इनमें 140 से अधिक पोस्ट में एआई और डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल किया गया था।

बहुत बारीकी से की गई जांच में फेसबुक, इंस्टाग्राम, एक्स और यूट्यूब पर असंख्य जांच अकाउंट सामने आए। ये सभी अकाउंट नकली थे और एआई से तैयार सामग्री फैला रहे थे। इतना ही नहीं, वे छात्र आंदोलन को और भड़काने का काम भी कर रहे थे।

इसके अलावा जांच एजेंसी की फोरेंसिक लैब की जांच में भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। कुछ आपत्तिजनक पोस्ट में नकली भीड़ के दृश्य शामिल किए गए थे। राजनेताओं की कृत्रिम आवाजें और क्लोन किए गए आडियो प्रसारित किए गए थे। सार्वजनिक हस्तियों के वीडियो के साथ भी छेड़छाड़ की गई थी।

सावधानी के तौर पर पुलिस ने आम जनता से किसी भी समाचार को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करने की अपील की है। लोगों से यह भी कहा गया है कि किसी संदेश को सत्यापित किए बिना उसे आगे फारवर्ड न करें।

देखने वाली बात यह है कि पेपर लीक के मुद्दे पर नीट पेपर लीक मामले में आंदोलन चलाकर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेने में सफल रही ‘क्राॅक्रोच पार्टी’ (CJP) ने अब सोशल मीडिया के बल पर दूसरा मोर्चा खोल दिया है। उसका अगला निशाना केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी हैं। CJP की तरह ही यह नया राजनीतिक नाटक चलाने के लिए ‘ई-20 पार्टी’ बनाने की घोषणा भी हो चुकी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दस दिन पहले छात्रों के साथ सीधे संवाद करते हुए इंस्टाग्राम और फेसबुक पर अपना पहला सेल्फी वीडियो पोस्ट किया था। हालांकि फेसबुक ने भारत में ही प्रधानमंत्री मोदी के इस वीडियो को ब्लाक कर दिया, जिससे काफी हंगामा हुआ। यह वीडियो प्रधानमंत्री मोदी ने फेसबुक पर भी पोस्ट किया था। इंस्टाग्राम पर इस वीडियो को 24 घंटे में 30 करोड़ बार देखा गया। हालांकि तीन दिन बाद यह सेल्फी वीडियो फेसबुक से गायब हो गया।

प्रधानमंत्री के वीडियो को प्रतिबंधित किए जाने को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना होने के बाद मेटा ने इस वीडियो को भारत में फिर से रिस्टोर कर दिया। मेटा के प्रवक्ता ने यह कहकर बचाव किया कि सामग्री गलती से हटा दी गई थी। लेकिन इस घटना के पीछे किसी तरह का गलत खेल होने की आशंका भी जताई गई।

भारतीय राजनीति में विदेशी एजेंसियों का हस्तक्षेप भी बढ़ता जा रहा है। कैंब्रिज एनालिटिका नाम कुछ समय पहले काफी चर्चा में आया था। यह कंपनी पिछले डेढ़ दशक से भारतीय राजनीति में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से काम करती रही है।

2010 में आयोजित बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान उसने व्यापक चुनावी विश्लेषण किया। उसने पाया कि 15 वर्षों तक एक ही सरकार रहने के बावजूद राज्य की स्थिति खराब थी। रिसर्च के अलावा कैंब्रिज एनालिटिका को ग्रामीण स्तर पर पार्टी संगठन को मजबूत करने का काम भी दिया गया था, ताकि मतदाताओं से संवाद स्थापित किया जा सके और उनके साथ संपर्क बढ़ाया जा सके।

परिणामस्वरूप, जिन सीटों पर पार्टी ने उसकी सेवाएं ली थीं, उनमें से लगभग 90 प्रतिशत सीटों पर उसे जीत मिली। भाजपा और जेडीयू ने इन सेवाओं का इस्तेमाल किया था। इसका मतलब यह हुआ कि सरकार ने किस तरह काम किया, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया कि उसने किस तरह प्रचार किया। संक्षेप में कहें तो विश्लेषण और प्रचार करने वाली कंपनियां भारतीय चुनावों को प्रभावित करने लगी हैं।
चुनाव के समय व्यस्त जनता के पास यह देखने का समय नहीं होता कि सरकार ने कितना काम किया, कितनी कामचोरी की और कितना भ्रष्टाचार किया। वह जितना अधिक प्रचार जनता तक पहुंचा सकती है, उतना ही उसे फायदा होता है।

जिस तरह मोबाइल कंपनी के सेल्समैन के लिए सिम कार्ड बेचना एक लक्ष्य होता है, उसी तरह राजनीतिक दलों के लिए अधिक से अधिक वोट हासिल करना लक्ष्य होता है। राजनीतिक दलों के पास कारपोरेट कंपनियों जैसा हर स्तर पर व्यवस्थित ढांचा नहीं होता। इसलिए वे यह काम राजनीतिक कंसल्टिंग कंपनियों को सौंप देते हैं।

ये कंपनियां किस तरह मतदाता के मन को प्रभावित करती हैं, इसे समझने से पहले सोशल साइटों पर उपलब्ध डेटा की प्रकृति को समझना जरूरी है।

आपने अनुभव किया होगा कि आपने एक बार ऑनलाइन जूते मंगाए और उसके बाद फेसबुक पर कुछ दिनों के अंतराल में उसी कंपनी के नए जूते और उसके द्वारा बेची जाने वाली दूसरी वस्तुएं दिखाई देने लगती हैं। आप तीन-चार बार अलग-अलग किताबों को सर्च करें या उनकी खरीदारी करें, तो सोशल मीडिया आपकी पसंद का अनुमान लगा लेता है और उसी प्रकार की किताबें आपको फेसबुक पर लगातार दिखाई देने लगती हैं।

एल्गोरिद्म की मदद से फेसबुक आपकी लाइक और कमेंट का विश्लेषण करके यह जानने की कोशिश करता है कि आपको क्या पसंद है, आप किस तरह के व्यक्ति हैं और आपको क्या पसंद नहीं है। आपको जिस प्रकार की सामग्री पसंद आती है, उसी तरह का कंटेंट आपके फेसबुक अकाउंट पर दिखाई दे, इसके लिए भी एल्गोरिद्म काम करता है।

आपकी लाइक, कमेंट और पोस्ट का विश्लेषण करके फेसबुक जो डेटा तैयार करता है, उसे साइकोग्राफिक डेटा कहा जाता है।

कुछ समय पहले अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल के चुनाव प्रचार में काम करने वाली कंपनी कैंब्रिज एनालिटिका द्वारा फेसबुक के लगभग पांच करोड़ उपयोगकर्ताओं का डेटा उनकी जानकारी के बिना हासिल किए जाने का मामला सामने आया था। इससे पूरी दुनिया में सनसनी फैल गई थी। अमेरिका से शुरू हुआ फेसबुक डेटा चोरी का विवाद भारत तक भी पहुंचा।

अब तक यह माना जाता था कि भारत में अन्य देशों की तुलना में सोशल मीडिया का विस्तार कम है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर तरह-तरह के संदेशों की बाढ़ के कारण भारतीय मतदाताओं के मन और वोट को बदलना आसान नहीं होगा। लेकिन बिहार और बंगाल के चुनावों के परिणामों के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा शुरू हुई कि चुनावों में सोशल मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

आने वाले दिनों में मतदाताओं के मानस को भ्रमित करने की गतिविधियां और बढ़ सकती हैं। यहां यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि भारतीय अपने डेटा की गोपनीयता को लेकर उतने गंभीर नहीं हैं, जितना उन्हें होना चाहिए। डेटा लीक होने की खबरें आए दिन सामने आती रहती हैं, लेकिन आम लोगों पर इसका बहुत अधिक असर दिखाई नहीं देता।

पहले असमंजस में रहने वाले मतदाताओं का मन बदलने के लिए भाषणों या टीवी प्रचार पर जोर दिया जाता था। लेकिन आने वाले दिनों में डेटा एनालिटिक्स के माध्यम से चुनावी रणनीति तैयार कर सोशल मीडिया के जरिए उसे लागू किया जाएगा। इसका लाभ भाजपा, कांग्रेस और दूसरे राजनीतिक दल निश्चित रूप से उठाएंगे।

दूसरी ओर अपने उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारी के दुरुपयोग को लेकर फेसबुक की मुश्किलें भी बढ़ती रही हैं। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन की संसद के बाद अमेरिका ने भी उसके खिलाफ जांच शुरू की थी। दुरुपयोग की जानकारी सामने आने के बाद दुनिया भर में आलोचना का सामना कर रहे फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग को यूरोपीय संघ और ब्रिटेन की संसद ने व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने के लिए बुलाया था। इसके बाद अमेरिका ने भी जुकरबर्ग को संसद में उपस्थित होने के लिए कहा था।

राजनीतिक कंसल्टिंग कंपनियां अपने पास मौजूद डेटा के आधार पर मतदाताओं की पसंद-नापसंद जान लेती हैं। बहुसंख्यक लोगों को क्या पसंद है, इसे ध्यान में रखते हुए वे अपने क्लाइंट राजनीतिक दल की छवि उसी प्रकार तैयार करती हैं। परिणाम यह होता है कि जिस राजनीतिक दल ने जनता के लिए वास्तविक काम न भी किया हो, वह भी चुनाव जीत सकता है।

इससे एक बात स्पष्ट होती है कि अब केवल काम करने से ही चुनाव जीतना संभव है, यह धारणा कमजोर पड़ रही है। अच्छी राजनीतिक कंसल्टिंग कंपनी की मदद से सकारात्मक छवि तैयार करना भी चुनावी सफलता का महत्वपूर्ण साधन बन गया है। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को पीछे धकेलकर राजनीतिक दलों को जिताने के लिए नए-नए हथकंडों के इस्तेमाल का खतरा बढ़ता है।

जनमानस को प्रभावित करने के लिए फेक न्यूज यानी नकली समाचार एक आसान हथियार बन गए हैं। अमेरिका की समाचार वेबसाइट ‘वॉक्स’ में प्रकाशित एक लेख में बताया गया था कि फेसबुक पर फेक न्यूज वास्तविक समाचारों की तुलना में अधिक तेजी से फैलती है। बजफीड न्यूज के एक अध्ययन में पाया गया था कि अमेरिकी चुनाव से पहले के तीन महीनों में शीर्ष 20 फेक न्यूज को शीर्ष 20 वास्तविक समाचारों की तुलना में अधिक बार पढ़ा और साझा किया गया।

इससे समझा जा सकता है कि किस तरह आपकी पसंद-नापसंद जानकर आपके विचारों को बदलने का प्रयास किया जाता है, किस तरह आपकी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें उकसाया जाता है और किस तरह फेक न्यूज फैलाकर आपकी भावनाओं को भड़काया जाता है।

लेकिन समस्या केवल इतनी ही नहीं है। आतंकवादी संगठनों द्वारा सोशल मीडिया का जिस तरह दुरुपयोग किया जा रहा है, वह और भी गंभीर तथा खतरनाक विषय है।

डाक युग के बाद मोबाइल युग आया और उसके पीछे-पीछे मोबाइल इंटरनेट ने दुनिया बदल दी। इस संचार क्रांति से मानव जाति को अनेक लाभ मिले हैं, लेकिन अपराधी मानसिकता वाले लोगों से लेकर आतंकवादी संगठनों तक, अनेक लोग इसी तकनीक का दुरुपयोग करके पूरी दुनिया के लिए चुनौती पैदा कर रहे हैं।

तकनीक के दुरुपयोग का सबसे चौंकाने वाला उदाहरण यदि कोई है, तो वह इस्लामिक स्टेट है। इराक और सीरिया में अबू बक्र अल-बगदादी द्वारा बनाया गया यह आतंकवादी संगठन इंटरनेट के माध्यम से दुनिया भर में अपनी विचारधारा और हिंसक गतिविधियों का प्रचार करने में सफल रहा।

इस्लामिक स्टेट की सफलता पश्चिमी देशों के लिए गंभीर अध्ययन का विषय रही है। संगठन के नेताओं ने केवल अपनी विचारधारा का प्रचार करके अमेरिका और यूरोपीय देशों में आतंकवादी हमलों को प्रेरित किया। इंटरनेट के माध्यम से कट्टरपंथी प्रचार और भर्ती की कोशिशें लंबे समय तक चलती रहीं।

इस्लामिक स्टेट की सफलता का मनोवैज्ञानिक प्रभाव दूसरे आतंकवादी संगठनों पर भी पड़ा, जिनमें भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों में शामिल लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन भी शामिल हैं। इंटरनेट के कारण आसानी से उपलब्ध फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब जैसे माध्यमों का दुरुपयोग करके आतंकवादी संगठन अपनी विचारधारा का प्रचार और लोगों को प्रभावित करने का प्रयास करते रहे हैं।

इन्हीं माध्यमों के जरिए आतंकवादी संगठन दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मौजूद समान विचारधारा वाले समूहों से संपर्क स्थापित करने की कोशिश भी करते रहे हैं।

कुछ समय पहले यूट्यूब ने भी स्वीकार किया था कि दुनिया के अनेक देशों में कुछ लोग उसकी मुफ्त स्ट्रीमिंग सेवा का दुरुपयोग कर रहे हैं। यूट्यूब ने अपनी गाइडलाइन के आधार पर लगभग 50 चैनल और पांच लाख से अधिक वीडियो हटाए थे। इस तरह की सामग्री को पहचानने के लिए यूट्यूब ने मशीन लर्निंग तकनीक और स्वचालित उपकरण भी विकसित किए।

आज सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रह गया है। यह लोगों की पसंद, विचारों और व्यवहार को प्रभावित करने की शक्ति भी बन चुका है। डेटा, एल्गोरिद्म, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डीपफेक और फेक न्यूज के इस दौर में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नागरिक किसी भी सूचना को आंख मूंदकर स्वीकार न करें।

लोकतंत्र में मतदाता का विवेक ही सबसे बड़ी ताकत है। यदि वही डेटा और भ्रामक प्रचार के जाल में फँस जाए, तो चुनाव केवल मतों की लड़ाई नहीं रह जाते, बल्कि मतदाता के मन और उसकी सोच को प्रभावित करने की लड़ाई बन जाते हैं।

स्नेहा सिंह
जेड-436ए, सेक्टर-12,
नोएडा-201301 (उ.प्र.)

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