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भारतीय ज्ञान-परंपरा, संस्कार और कर्मयोग : समकालीन संदर्भ - डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर

 



नई दिल्ली स्थित केशव कुंज परिसर में आयोजित प्रो. डॉ. सतप्रकाश बंसल की आत्मकथात्मक कृति ‘संस्कार से संकल्प तक’ के लोकार्पण का कार्यक्रम केवल एक पुस्तक के प्रकाशन का अवसर नहीं था, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा, शिक्षा, संस्कार, नेतृत्व, शोध, चरित्र-निर्माण, कर्मयोग और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण से जुड़े व्यापक प्रश्नों पर केंद्रित वैचारिक संवाद का मंच बन गया। कार्यक्रम में प्रो. योगेश सिंह, डॉ. बालमुकुंद पांडे, प्रो. हरमोहिंदर सिंह बेदी तथा माननीय इंद्रेश कुमार सहित अनेक शिक्षाविदों और विद्वानों ने सहभागिता की। विभिन्न वक्तव्यों को समग्र रूप में देखने पर यह स्पष्ट होता है कि पुस्तक में वर्णित जीवन-यात्रा को वक्ताओं ने केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों के रूप में नहीं, बल्कि शिक्षा-जगत, संस्थागत नेतृत्व और भारतीय ज्ञान-संस्कृति के व्यापक संदर्भ में देखा।


प्रो. योगेश सिंह ने पुस्तक के शीर्षक ‘संस्कार से संकल्प तक’ को उसके मूल वैचारिक आधार के रूप में रेखांकित किया। उनके अनुसार संस्कार व्यक्ति के जीवन का आधार निर्मित करते हैं, जबकि संकल्प उसे दिशा प्रदान करता है। संस्कार परिवार, समाज और परंपरा से प्राप्त हो सकते हैं, किंतु संकल्प व्यक्ति को स्वयं करना पड़ता है। उन्होंने आत्मकथा-लेखन को साहस का कार्य बताते हुए कहा कि अपने जीवन की सफलताओं के साथ असफलताओं और कठिन अनुभवों को सार्वजनिक करना आसान नहीं होता। इस दृष्टि से उन्होंने बंसल जी की आत्मकथा में अनुभवों को ईमानदारी और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किए जाने को महत्वपूर्ण माना।


योगेश सिंह ने जीवन और नेतृत्व की अनिश्चितताओं को स्वीकार करने पर विशेष बल दिया। उन्होंने पुस्तक में निहित ‘अनिश्चितता से मित्रता’ की अवधारणा को विश्वविद्यालय प्रशासन के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। जीवन में तिराहे, चौराहे, कठिन रास्ते और अस्पष्ट परिस्थितियां आती हैं और व्यक्ति को उसी समय निर्णय लेना पड़ता है। सही निर्णय का ज्ञान कई बार उसके परिणाम आने के बाद होता है। इसलिए नेतृत्वकर्ता के लिए अनिश्चितता से भागने के बजाय उसके बीच निर्णय लेने का साहस आवश्यक है। इसी क्रम में ‘निर्णय लो, परिणाम इतिहास को तय करने दो’ जैसी धारणा नेतृत्व की सक्रियता और उत्तरदायित्व को रेखांकित करती है।


उनके वक्तव्य में ‘विरोध से मित्रता’ भी एक महत्वपूर्ण विचार के रूप में सामने आया। उन्होंने विमान के उदाहरण से स्पष्ट किया कि जिस प्रकार प्रतिकूल हवा विमान को उड़ान भरने में सहायक होती है, उसी प्रकार जीवन में विरोध भी व्यक्ति के विकास की शक्ति बन सकता है। इसके लिए परिश्रम, विवेक, आत्मविश्वास और लगन को निरंतर सक्रिय रखना आवश्यक है। उन्होंने विश्वविद्यालय की चयन-प्रक्रिया को समुद्र-मंथन के रूपक से जोड़ते हुए कहा कि नेतृत्वकर्ता को अक्सर आलोचना और असंतोष का ‘विष’ धारण करना पड़ता है, जबकि सफल लोगों को ‘अमृत’ प्राप्त होता है। इस प्रकार नेतृत्व का वास्तविक परीक्षण प्रतिकूलताओं के बीच संयम बनाए रखने में है।


डॉ. बालमुकुंद पांडे ने कार्यक्रम को भारतीय ज्ञान-परंपरा और गुरु-शिष्य संबंध के व्यापक संदर्भ से जोड़ा। उन्होंने आत्मकथा को भविष्य के लिए महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत मानते हुए कहा कि किसी व्यक्ति का जीवन-वृत्त केवल निजी घटनाओं का संकलन नहीं होता, बल्कि वह अपने समय की सामाजिक, शैक्षिक और संस्थागत परिस्थितियों को समझने में भी सहायता करता है। इस दृष्टि से श्रेष्ठ व्यक्तियों को आत्मकथा लिखने के लिए प्रेरित करना आवश्यक है, क्योंकि आने वाली पीढ़ियां उनके अनुभवों, संघर्षों और निर्णयों से सीख सकती हैं।


बालमुकुंद पांडे ने ‘श्रद्धा’ को ज्ञान की प्राप्ति का महत्वपूर्ण आधार बताया। तुलसीदास की पंक्ति ‘श्री गुरुचरण सरोज रज निज मन मुकुर सुधारि’ के माध्यम से उन्होंने मन के परिष्कार और गुरु के प्रति श्रद्धा के संबंध को रेखांकित किया। उनके अनुसार आधुनिक शिक्षा-व्यवस्था की एक चुनौती गुरु और विद्यार्थी के बीच घटती आत्मीयता है। शिक्षा को केवल सूचना और प्रमाण-पत्र प्राप्त करने की प्रक्रिया न मानकर जीवन-निर्माण की प्रक्रिया के रूप में देखने की आवश्यकता है।


उन्होंने ‘संस्कार’ से उत्पन्न ‘संकल्प’ की प्रकृति को भी व्यापक सामाजिक संदर्भ में समझाया। भीष्म और कृष्ण के संकल्पों के उदाहरण के माध्यम से उन्होंने संकेत किया कि संकल्प का मूल्य केवल उसकी दृढ़ता में नहीं, बल्कि उसके उद्देश्य में भी निहित होता है। व्यक्तिगत संकल्प जब लोकहित, समाज और मानवता के व्यापक कल्याण से जुड़ता है, तभी वह सार्थक और स्थायी बनता है। इस प्रकार उनके वक्तव्य में संस्कार, श्रद्धा, संकल्प और लोकमंगल एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं।


प्रो. हरमोहिंदर सिंह बेदी ने डॉ. बंसल के व्यक्तित्व के जिन पक्षों को रेखांकित किया, उनमें पारदर्शिता, परिश्रम, कर्मयोग और भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्रति प्रतिबद्धता प्रमुख थे। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के लाहौर प्रवास से जुड़ी घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि विवेकानंद ने अपने व्यक्तित्व और विचारों की एकरूपता को जिस प्रकार व्यक्त किया था, उसी प्रकार बंसल जी को भी किसी भी दिशा से देखने पर पारदर्शी व्यक्तित्व के रूप में अनुभव किया जा सकता है। बेदी ने यह टिप्पणी अपने निकट अनुभव के आधार पर की और बंसल जी के साथ कार्य करने के दौरान उनके व्यवहार में सम्मान तथा आत्मीयता को विशेष रूप से रेखांकित किया।


प्रो. बेदी ने नैक मूल्यांकन की प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए बंसल जी की कार्यनिष्ठा का उल्लेख किया। उनके अनुसार मूल्यांकन के समय बंसल जी विश्वविद्यालय की उपलब्धियों और वर्षों की मेहनत के उचित मूल्यांकन को लेकर गंभीर थे। रात में भी वे इस विषय को लेकर चिंतित रहे और अगले दिन विश्वविद्यालय से संबंधित दस्तावेजों और फाइलों के साथ पूरी तैयारी से उपस्थित हुए। इस प्रसंग के माध्यम से बेदी ने यह दिखाया कि बंसल जी के लिए प्रशासन केवल पद का दायित्व नहीं, बल्कि संस्था की उपलब्धियों और भविष्य के प्रति व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का विषय था।


बेदी ने बंसल जी के शांत स्वभाव और निर्णय क्षमता की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक निकट से काम करने के बावजूद उन्होंने उन्हें निंदा, अपशब्द अथवा क्रोध में निर्णय लेते नहीं देखा। विपरीत परिस्थितियों में भी वे शांत रहकर विश्वविद्यालय और कर्मचारियों के हित को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेते हैं। इसी कारण बेदी ने पुस्तक के शीर्षक ‘संस्कार से संकल्प तक’ के साथ ‘कर्मयोगी’ शब्द जोड़ने का सुझाव दिया। उनके अनुसार बंसल जी का जीवन संस्कारों से संकल्प, संकल्प से कर्म और कर्म से संस्थागत उपलब्धियों की यात्रा है।


प्रो. बेदी ने भारतीय ज्ञान-परंपरा के क्षेत्र में केंद्रीय विश्वविद्यालय हिमाचल प्रदेश में किए गए कार्यों का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान-परंपरा को पाठ्यक्रम, शोध, गोष्ठियों और पुस्तकों के माध्यम से आगे बढ़ाने का प्रयास हुआ। वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत और श्री गुरु ग्रंथ साहब सहित विविध भारतीय ज्ञान-स्रोतों को अध्ययन के दायरे में शामिल करने का प्रयास किया गया। उनके अनुसार इस कार्य में बंसल जी की पहल, चिंतन और परिश्रम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने स्वयं को इस प्रक्रिया का निकटदर्शी बताते हुए कहा कि एक व्यक्ति की सक्रियता से पूरा विश्वविद्यालय इस दिशा में व्यापक कार्य कर सका।


प्रो. बेदी ने बंसल जी के पारिवारिक जीवन का उल्लेख करते हुए उनकी पत्नी के योगदान को भी रेखांकित किया। उन्होंने पुस्तक में प्रकाशित विवाह के समय की तस्वीर और अयोध्या में राम मंदिर के दर्शन की तस्वीर को जीवन-यात्रा के प्रतीक के रूप में देखा। उनके अनुसार इन दोनों तस्वीरों के बीच संस्कार, परिवार, कर्म और आध्यात्मिक चेतना की एक लंबी यात्रा दिखाई देती है। उन्होंने पुस्तक के प्रकाशन पर बंसल जी को बधाई देते हुए उनके दीर्घायु होने की कामना की तथा केशव कुंज को केवल एक भवन न मानकर विचार और राष्ट्र-चिंतन का केंद्र बताया।


माननीय इंद्रेश कुमार ने अपने संबोधन को भारतीय ज्ञान-परंपरा, शोध, चरित्र और राष्ट्रीय दायित्व के संदर्भ में विस्तृत किया। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के लिए उन्होंने पूर्व में भाषण तैयार किया था, लेकिन मंच पर अन्य वक्ताओं को सुनने के बाद उन्होंने अपनी बात की दिशा बदल दी। इस प्रसंग से उन्होंने सीखने की निरंतर प्रक्रिया को महत्व दिया। अपने छात्र जीवन की घटना का उल्लेख करते हुए उन्होंने शोध और नकल के बीच अंतर पर चर्चा की और मौलिक ज्ञान के निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया।


इंद्रेश कुमार के अनुसार भारतीय ज्ञान-परंपरा की शक्ति केवल पुस्तकीय सामग्री में नहीं, बल्कि तप, साधना, अनुभव और ज्ञान के शोधन में रही है। उन्होंने आधुनिक ज्ञान-व्यवस्था में विदेशी संदर्भों पर अत्यधिक निर्भरता की आलोचना करते हुए भारतीय ज्ञान-परंपरा को आत्मविश्वास के साथ पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता बताई। उनके वक्तव्य में ‘तप’ ज्ञान को शक्ति प्रदान करने वाला तत्व बनकर सामने आया।


उन्होंने ज्ञान के साथ चरित्र को जोड़ते हुए राम और रावण के उदाहरण का प्रयोग किया। उनका तर्क था कि केवल विद्वत्ता, शक्ति अथवा उपलब्धियां व्यक्ति की अंतिम प्रतिष्ठा निर्धारित नहीं करतीं; चरित्र और लोकहित भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसी क्रम में उन्होंने सत्य, विश्वास, मधुर वाणी और सद्भाव को सामाजिक जीवन के आवश्यक गुण बताया। उनके अनुसार सत्य बोलना आवश्यक है, किंतु उसे कटुता और क्रोध के साथ प्रस्तुत करने से संघर्ष उत्पन्न हो सकता है। इसलिए सत्य के साथ संवेदनशीलता और मधुरता भी आवश्यक है।


इंद्रेश कुमार ने औपचारिक डिग्री और वास्तविक ज्ञान के बीच अंतर पर भी विचार किया। उन्होंने बुजुर्गों के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को महत्व देते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के पास प्रमाण-पत्र न होना उसे अज्ञानी सिद्ध नहीं करता। विश्वास, अनुभव, तप और जीवन से प्राप्त सीख भी ज्ञान के महत्वपूर्ण आधार हैं। इस संदर्भ में उन्होंने शिक्षा को केवल डिग्री प्राप्त करने की प्रक्रिया से ऊपर उठाकर चरित्र और सामाजिक दायित्व से जोड़ने का आग्रह किया।


राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने भारत को विविधता, सह-अस्तित्व, स्वीकार्यता और सद्भाव की परंपरा वाला देश बताया। उनके अनुसार प्रेम, आत्मीयता, शांति और भाईचारा किसी एक स्थान की संपत्ति नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना में निवास करने वाले मूल्य हैं। उन्होंने उपस्थित कुलपतियों और शिक्षाविदों को भारत के भविष्य के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला समूह माना और ज्ञान, तप, शिक्षा तथा चरित्र के माध्यम से भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करने का आह्वान किया।


कार्यक्रम के धन्यवाद ज्ञापन में प्रकाशन संस्था की ओर से प्रो. सतप्रकाश बंसल, डॉ. बालमुकुंद पांडे और उपस्थित विद्वानों के प्रति आभार व्यक्त किया गया। प्रकाशन को राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व निभाने तथा भारतीय और राष्ट्रवादी विचारों को व्यापक समाज तक पहुंचाने का माध्यम बताया गया। इस प्रकार प्रकाशन-कर्म को केवल व्यावसायिक गतिविधि न मानकर वैचारिक और सांस्कृतिक दायित्व के रूप में प्रस्तुत किया गया।


समग्रतः ‘संस्कार से संकल्प तक’ के लोकार्पण समारोह में व्यक्त विचारों का केंद्रीय सूत्र संस्कार, संकल्प, कर्म और चरित्र के पारस्परिक संबंध में निहित है। योगेश सिंह ने संस्कार और संकल्प के साथ अनिश्चितता तथा विरोध से संवाद की नेतृत्व-दृष्टि प्रस्तुत की; बालमुकुंद पांडे ने श्रद्धा, गुरु-शिष्य परंपरा, आत्मकथा और भारतीय ज्ञान-स्रोतों की महत्ता रेखांकित की; हरमोहिंदर सिंह बेदी ने बंसल जी के जीवन में पारदर्शिता, संस्थागत निष्ठा, कर्मयोग और भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्रति प्रतिबद्धता को प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर प्रस्तुत किया; जबकि इंद्रेश कुमार ने शोध की मौलिकता, तप, चरित्र, विश्वास, सद्भाव और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के प्रश्नों को व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान किया। इस अर्थ में यह आयोजन एक पुस्तक के लोकार्पण से आगे बढ़कर शिक्षा, नेतृत्व, ज्ञान, संस्कार और राष्ट्र-चेतना के अंतर्संबंधों पर केंद्रित वैचारिक विमर्श के रूप में देखा जा सकता है।

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