मध्य प्रदेश से सबक लेती पश्चिम बंगाल भाजपा
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राजनीति में चुनाव परिणाम दिखाई देते हैं, लेकिन उनके पीछे चलने वाले संगठनात्मक प्रयोग अक्सर दिखाई नहीं देते। भारतीय जनता पार्टी की कार्यशैली को समझने के लिए मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल को साथ पढ़ना इसलिए महत्वपूर्ण है। मध्य प्रदेश को भाजपा की एक ऐसी राजनीतिक प्रयोगशाला कहा जा सकता है, जहां सत्ता, संगठन, नेतृत्व और दूसरे दलों से आए नेताओं के साथ कई प्रयोग हुए और उनके अनुभव आगे की रणनीति का हिस्सा बने।
2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ कांग्रेस के 22 विधायकों के भाजपा में आने और कमलनाथ सरकार के पतन के बाद भाजपा सत्ता में लौटी। तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में यह प्रयोग सफल रहा, लेकिन इसके साथ संगठन के सामने एक चुनौती भी आई। वर्षों तक कांग्रेस से संघर्ष करने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच अचानक वे नेता आ गए जिनसे वे कल तक राजनीतिक मुकाबला कर रहे थे।
यहीं भाजपा के सामने मूल प्रश्न खड़ा हुआ कि सत्ता के लिए दूसरे दल के मजबूत नेताओं को साथ लेना और संगठन को उन्हीं के भरोसे छोड़ देना, दोनों अलग बातें हैं।
2023 में भाजपा ने मध्य प्रदेश में शानदार वापसी की और मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाया। इसके बाद संगठन में संघ पृष्ठभूमि वाले नेताओं की भूमिका को भी महत्व मिला। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का राज्य की सभी 29 सीटें जीतना यह संकेत था कि नेतृत्व परिवर्तन के बावजूद संगठन का आधार मजबूत था। मध्य प्रदेश का अनुभव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां भाजपा ने सीखा कि चुनावी लाभ के लिए बाहर से आए नेता उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन पार्टी की स्थायी शक्ति उसके अपने संगठन और कार्यकर्ता में होती है। शायद यही अनुभव पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक अलग रूप में दिखाई देता है।
बंगाल में भाजपा को सत्ता विरासत में नहीं मिली थी। वहां उसके कार्यकर्ताओं ने लंबे संघर्ष के बाद संगठन खड़ा किया और 2021 में पार्टी प्रमुख विपक्षी शक्ति बनकर उभरी। इसी दौरान तृणमूल कांग्रेस के कई प्रभावशाली नेता और विधायक भाजपा में आए। मुकुल रॉय से लेकर सुवेंदु अधिकारी तक, इन नेताओं ने भाजपा के विस्तार में भूमिका निभाई। लेकिन बड़े पैमाने पर हो रही ‘मास जॉइनिंग’ को लेकर भाजपा नेतृत्व ने बाद में चयनात्मक प्रवेश की नीति अपनाने का संकेत दिया। इसका राजनीतिक संदेश साफ था कि तृणमूल को कमजोर करने के लिए उसके नेताओं का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन भाजपा को तृणमूल की राजनीतिक संस्कृति में बदलना नहीं है।
सुवेंदु अधिकारी इसका महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। तृणमूल से भाजपा में आए, नंदीग्राम में ममता बनर्जी को हराया और बाद में विधानसभा में विपक्ष के नेता बने। लेकिन भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाकर पूरी पार्टी को किसी एक आयातित चेहरे के पीछे खड़ा नहीं किया।
यहीं मध्य प्रदेश और बंगाल की रणनीतियां एक-दूसरे से जुड़ती हैं। मध्य प्रदेश ने भाजपा को सत्ता के लिए बड़े पैमाने पर राजनीतिक विस्तार का अनुभव दिया, बंगाल में पार्टी ने उसी अनुभव की सीमाओं को समझते हुए विस्तार और संगठन के बीच संतुलन साधने की कोशिश की।
किसी दूसरे दल के नेता को साथ लेना आसान है, लेकिन उसे अपनी संगठनात्मक संस्कृति में आत्मसात करना कठिन। भाजपा के लिए चुनौती यही है कि नए चेहरे आएं, चुनावी समीकरण बदलें, लेकिन पुराने कार्यकर्ता और मूल संगठन हाशिये पर न जाएं। दरअसल बंगाल में भाजपा के सामने केवल तृणमूल को हराने की चुनौती नहीं है। उससे बड़ी चुनौती है - तृणमूल को हराते हुए स्वयं तृणमूल जैसी न हो जाना। यही मध्य प्रदेश की प्रयोगशाला से निकला सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक सबक है।
नेता चुनाव जिता सकता है, लेकिन संगठन पार्टी को टिकाता है। बाहर से आया जनाधार किसी सीट का समीकरण बदल सकता है, लेकिन वर्षों से खड़ा कार्यकर्ता ही पार्टी की स्थायी जमीन तैयार करता है। इसलिए मध्य प्रदेश को भाजपा की ‘रिसर्च सेंटर’ कहना केवल एक रूपक नहीं है। सत्ता परिवर्तन, दल-बदल, पुराने और नए नेताओं का समायोजन, नेतृत्व में बदलाव और संगठन की पुनर्संरचना - इन सबके अनुभवों ने भाजपा की कार्यशैली को लगातार आकार दिया है।
पश्चिम बंगाल उसी सीख का अगला अध्याय दिखाई देता है - जहां भाजपा विस्तार चाहती है, लेकिन अपनी पहचान की कीमत पर नहीं। आखिर किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी सफलता केवल यह नहीं कि वह विरोधी को हरा दे बल्कि असली सफलता तब है जब वह विरोधी की जमीन पर अपनी अलग राजनीतिक संस्कृति खड़ी कर दे। मध्य प्रदेश ने भाजपा को सत्ता और संगठन का संतुलन सिखाया है और पश्चिम बंगाल उस संतुलन की अगली परीक्षा है।
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दिवाकर की दुनाली से

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