सनातन में नारी : शक्ति, ज्ञान और नेतृत्व - शुभा भारद्वाज
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भारतीय संस्कृति की यात्रा को यदि ध्यान से देखा जाए, तो उसके केंद्र में नारी केवल एक भूमिका के रूप में नहीं, बल्कि शक्ति, सृजन, ज्ञान, करुणा और नेतृत्व की जीवंत चेतना के रूप में दिखाई देती है। सनातन परंपरा ने जीवन को पुरुष और नारी के विरोध के रूप में नहीं, बल्कि परस्पर पूरक शक्तियों के रूप में देखने का प्रयास किया है। इसी व्यापक दृष्टि को समझे बिना सनातन में नारी की भूमिका को समझना संभव नहीं है।
हमारे यहाँ शक्ति की कल्पना ही स्त्री के रूप में की गई। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, काली, पार्वती जैसी देवियों के रूप केवल धार्मिक प्रतीक नहीं हैं; वे भारतीय चिंतन में नारी के विविध सामर्थ्यों - शक्ति, समृद्धि, ज्ञान, साहस और सृजन के प्रतीक हैं। यह विचार अपने आप में महत्वपूर्ण है कि परम शक्ति की आराधना स्त्री स्वरूप में भी की जाती है। लेकिन नारी की गरिमा केवल देवी-स्वरूप की पूजा तक सीमित नहीं रही। भारतीय परंपरा में ऐसी अनेक स्त्रियाँ हुईं जिन्होंने ज्ञान, दर्शन, अध्यात्म, साहित्य और सामाजिक जीवन को दिशा दी। वैदिक परंपरा में गार्गी और मैत्रेयी जैसी विदुषियों का उल्लेख हमें यह स्मरण कराता है कि ज्ञान की खोज को केवल पुरुषों तक सीमित नहीं माना गया। गार्गी का दार्शनिक विमर्श और मैत्रेयी का आत्मज्ञान संबंधी प्रश्न भारतीय बौद्धिक परंपरा में नारी की सक्रिय उपस्थिति के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। यही कारण है कि हमें सनातन में नारी की चर्चा केवल “नारी सम्मान” जैसे सामान्य वाक्य तक सीमित नहीं रखनी चाहिए। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारी सामाजिक व्यवस्था नारी को ज्ञान, निर्णय, नेतृत्व और आत्मनिर्णय के पर्याप्त अवसर देती है? यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
सनातन की मूल दार्शनिक दृष्टि में आत्मा को शरीर, लिंग और बाहरी पहचान से परे माना गया है। यदि आत्मा का स्वरूप सार्वभौमिक है, तो ज्ञान और आत्मिक उन्नति की संभावना भी किसी एक लिंग की संपत्ति नहीं हो सकती। भारतीय परंपरा की यही दार्शनिक भूमि हमें नारी को केवल संरक्षण की पात्र नहीं, बल्कि स्वतंत्र चेतना और सामर्थ्य से संपन्न व्यक्ति के रूप में देखने की प्रेरणा देती है। भारतीय इतिहास और लोकपरंपरा में नारी के नेतृत्व के अनेक स्वरूप मिलते हैं। सीता में धैर्य और आत्मसम्मान, द्रौपदी में प्रश्न करने का साहस, गार्गी में बौद्धिक निर्भीकता, मैत्रेयी में ज्ञान की आकांक्षा, रानी दुर्गावती में शासन और प्रतिरोध की क्षमता तथा अहिल्याबाई होलकर में लोककल्याणकारी नेतृत्व - ये सभी अलग-अलग परिस्थितियों में नारी शक्ति के विविध रूप प्रस्तुत करते हैं। इन उदाहरणों को केवल गौरवगाथा के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है। इनसे हमें यह प्रश्न भी पूछना चाहिए कि आज की भारतीय नारी के लिए हम कैसी सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं?
आज की नारी शिक्षा प्राप्त कर रही है, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ रही है, प्रशासन और राजनीति में नेतृत्व कर रही है, सेना और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में अपनी क्षमता सिद्ध कर रही है, उद्यमिता में नए अवसर पैदा कर रही है और परिवार तथा समाज के अनेक दायित्वों को भी संभाल रही है। यह परिवर्तन केवल आधुनिकता का परिणाम नहीं है; इसे भारतीय समाज की अपनी दीर्घकालीन सामाजिक ऊर्जा और बदलते समय के साथ संवाद की क्षमता के संदर्भ में भी देखना चाहिए। सनातन की जीवंतता इसी में है कि वह अपने मूल मूल्यों को बनाए रखते हुए नए प्रश्नों से संवाद कर सके।
नारी के संदर्भ में भी हमें अतीत के आदर्शों को वर्तमान की वास्तविकताओं से जोड़ना होगा। केवल यह कहना कि “हमारी संस्कृति में नारी को देवी माना गया है”, पर्याप्त नहीं होगा। देवी की पूजा के साथ बेटी की शिक्षा, महिला की सुरक्षा, उसके सम्मान, आर्थिक आत्मनिर्भरता, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और समान अवसर भी उतने ही आवश्यक हैं। नारी को सम्मानित करने का सबसे प्रभावी तरीका केवल उसके लिए शब्दों का प्रयोग करना नहीं, बल्कि उसके अधिकार, अवसर और गरिमा को व्यवहार में सुनिश्चित करना है।
आज परिवार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। संस्कारों का पहला विद्यालय परिवार ही होता है। यदि हम बेटियों को आत्मविश्वास, शिक्षा और निर्णय क्षमता देंगे और बेटों को सम्मान, संवेदनशीलता तथा समानता का संस्कार देंगे, तो एक अधिक संतुलित समाज का निर्माण होगा। सनातन की “परिवार” की अवधारणा तभी सार्थक होगी जब परिवार में प्रत्येक सदस्य की गरिमा सुरक्षित हो। नारी नेतृत्व का अर्थ पुरुष-विरोध नहीं है। नेतृत्व का अर्थ है निर्णय लेने की क्षमता, जिम्मेदारी स्वीकार करना और समाज के लिए दिशा निर्धारित करना। भारतीय दृष्टि में शक्ति और शिव का संबंध इसी परस्परता की ओर संकेत करता है। समाज की प्रगति भी तब पूर्ण होती है जब पुरुष और नारी दोनों अपनी-अपनी क्षमताओं के साथ समान सम्मान और सहयोग की भावना से आगे बढ़ें। आज जब दुनिया लैंगिक समानता, महिला नेतृत्व और सामाजिक न्याय पर गंभीर विमर्श कर रही है, तब भारत के पास अपने दार्शनिक और सांस्कृतिक अनुभव से दुनिया के सामने एक महत्वपूर्ण दृष्टि रखने का अवसर है। लेकिन इसके लिए हमें अपनी परंपरा का अध्ययन भावुकता से नहीं, ज्ञान और विवेक से करना होगा।
सनातन में नारी का अर्थ केवल अतीत की स्मृतियों में खोजने की आवश्यकता नहीं है। वह आज की वैज्ञानिक, शिक्षिका, सैनिक, उद्यमी, कलाकार, प्रशासक, किसान, चिकित्सक, सामाजिक कार्यकर्ता, गृहिणी और जननेता में भी दिखाई देती है। वह शक्ति है लेकिन केवल शक्ति के रूप में नहीं, वह ज्ञान है लेकिन केवल ज्ञान के रूप में नहीं, वह नेतृत्व है लेकिन केवल पद के रूप में नहीं। वह जीवन की सह-निर्माता है। इसलिए सनातन में नारी का विमर्श वास्तव में भारतीय समाज के भविष्य का विमर्श भी है। यदि हमें एक ऐसा भारत बनाना है जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों पर गर्व करे और आधुनिक विश्व में आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़े, तो उस भारत के निर्माण में नारी की भागीदारी निर्णायक होगी।
हमारी परंपरा का श्रेष्ठ संदेश तभी जीवंत होगा, जब वह हमारे व्यवहार में दिखाई दे। नारी का सम्मान केवल परंपरा नहीं - हमारे वर्तमान का दायित्व और भविष्य की आवश्यकता है।
शुभा भारद्वाज
संपादकीय सलाहकार
क्रांतिदूत
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लेख
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