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शब्दों के साधक, साहित्य के सारथी : डॉ. विकास दवे




साहित्य की दुनिया में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी पहचान केवल उनकी लिखी हुई पुस्तकों से नहीं बनती, बल्कि उनकी पूरी जीवन-यात्रा ही साहित्य के प्रति समर्पण की कथा बन जाती है। वे शब्दों को केवल कागज पर नहीं उतारते, बल्कि उन्हें समाज की चेतना, संस्कार और संवेदना से जोड़ने का प्रयास करते हैं। डॉ. विकास दवे ऐसा ही एक बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने बाल साहित्य, पत्रकारिता, शोध, संपादन और भारतीय संस्कृति के अध्ययन के माध्यम से हिंदी की सेवा को अपने जीवन का प्रमुख ध्येय बनाया है। आज मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक के रूप में प्राप्त उनका दायित्व उनकी दीर्घ साहित्य-साधना का महत्वपूर्ण विस्तार है।



3 मई 1969 को जन्मे डॉ. विकास दवे की साहित्यिक यात्रा ने आरंभ से ही अपनी अलग दिशा चुनी। हिंदी साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद बाल पत्रकारिता को शोध का विषय बनाना उनके साहित्यिक सरोकारों की विशिष्टता को रेखांकित करता है। सामान्यतः साहित्यकार का ध्यान जीवन के अनेक पक्षों की ओर जाता है, किंतु डॉ. दवे ने उस मन की दुनिया को समझने का प्रयास किया, जिसमें आने वाले भारत की कल्पनाएँ जन्म लेती हैं। बालमन, उसकी जिज्ञासा, उसकी कल्पनाशीलता और उसके भीतर संस्कारों के निर्माण की प्रक्रिया उनके चिंतन का महत्वपूर्ण आधार बनी।



‘देवपुत्र’ से उनका लंबा जुड़ाव इसी साहित्यिक दृष्टि का परिणाम रहा। एक बाल पत्रिका के संपादक के रूप में उन्होंने बाल साहित्य को केवल मनोरंजन की सीमा में न रखकर उसे संस्कार, संस्कृति, इतिहास और जीवन-मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया। संपादन उनके लिए महज शब्दों को चुनने की कला नहीं था बल्कि वह आने वाली पीढ़ी के मन तक पहुँचने की जिम्मेदारी थी। यही कारण है कि बाल पत्रकारिता पर उनका शोध और उनका संपादकीय अनुभव उनके साहित्यिक व्यक्तित्व के दो महत्वपूर्ण स्तंभ बन गए।



डॉ. दवे की रचनात्मकता का दायरा बाल साहित्य तक सीमित नहीं रहा। भारतीय संस्कृति, शिक्षा, सामाजिक समरसता, राष्ट्रबोध और भारतीय जीवन-दृष्टि जैसे विषय उनके लेखन और चिंतन में प्रमुखता से उपस्थित रहे हैं। उनकी कृतियों में विचार और संवेदना का ऐसा मेल दिखाई देता है, जिसमें परंपरा के प्रति सम्मान के साथ वर्तमान के प्रश्नों से संवाद की आकांक्षा भी दिखाई देती है। उनके लिए साहित्य अतीत का संग्रहालय नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और भविष्य को दिशा देने वाली जीवंत शक्ति है।



यही व्यापक साहित्यिक दृष्टि उन्हें मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी जैसे महत्वपूर्ण संस्थान के दायित्व तक लेकर आती है। साहित्य अकादमी का निदेशक होना केवल एक पद धारण करना नहीं है बल्कि यह प्रदेश की साहित्यिक विरासत की देखभाल और उसके भविष्य को आकार देने की जिम्मेदारी भी है। मध्य प्रदेश की माटी ने हिंदी साहित्य को अनेक महान रचनाकार दिए हैं। इस धरती की साहित्यिक परंपरा जितनी समृद्ध है, उतनी ही विविध भी। कविता से कहानी तक, आलोचना से शोध तक और लोक-साहित्य से आधुनिक विमर्श तक इसकी अपनी विशिष्ट पहचान है।



ऐसे व्यापक साहित्यिक परिदृश्य में डॉ. दवे का दायित्व और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। उनके सामने एक ओर वरिष्ठ साहित्यकारों की सृजन-संपदा को सम्मान और संरक्षण देने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर नई पीढ़ी के रचनाकारों की ऊर्जा को मंच उपलब्ध कराने की चुनौती भी है। साहित्य की नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ते हुए उसे अपने समय के प्रश्नों से संवाद करने के लिए प्रेरित करना किसी भी साहित्यिक संस्था की सबसे बड़ी सार्थकता हो सकती है।



डॉ. दवे के व्यक्तित्व की खूबसूरती यह है कि उन्होंने साहित्य को केवल पुस्तकालयों और सभागारों तक सीमित नहीं माना। उनके लिए साहित्य समाज से संवाद करने वाली जीवंत प्रक्रिया है। इसलिए उनके साहित्यिक सरोकारों में शिक्षा, संस्कृति, बालमन, सामाजिक चेतना और भारतीय जीवन-दृष्टि जैसे विषय साथ-साथ चलते हैं। उनकी वाणी में वक्ता की ऊर्जा है तो लेखनी में शोधकर्ता की गंभीरता और संपादक की सजगता भी दिखाई देती है।



उनकी साहित्यिक यात्रा को देखें तो उसमें निरंतर कर्मशीलता दिखाई देती है। कभी बाल साहित्य की दुनिया में शब्दों की तलाश, कभी शोध के माध्यम से साहित्य की किसी धारा का अनुशीलन, कभी संपादन के माध्यम से नए रचनाकारों को स्थान और कभी साहित्यिक संस्थान के माध्यम से व्यापक साहित्यिक समाज को जोड़ने का प्रयास - इन सभी भूमिकाओं में एक ही भाव दिखाई देता है, वह है हिंदी और साहित्य के प्रति आत्मीय समर्पण।



डॉ. विकास दवे की विशेषता केवल यह नहीं कि उन्होंने बहुत लिखा या अनेक मंचों पर अपनी बात रखी। उनकी विशिष्टता यह है कि उन्होंने साहित्य को जीवन-मूल्यों के साथ देखने का प्रयास किया। उनके लिए शब्द तभी सार्थक हैं, जब वे मनुष्य के भीतर संवेदना जगाएँ बल्कि साहित्य तभी उपयोगी है, जब वह समाज को सोचने के लिए प्रेरित करे और संस्कृति तभी जीवंत है, जब वह नई पीढ़ी के जीवन से संवाद कर सके।


आज के समय में जब साहित्य के सामने पाठकीय रुचियों में बदलाव, डिजिटल माध्यमों की बढ़ती उपस्थिति और नई पीढ़ी को हिंदी साहित्य से जोड़ने जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं, तब साहित्यिक संस्थाओं की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे समय में साहित्य को मंच, संवाद और नई अभिव्यक्ति के अवसरों से जोड़ना आवश्यक है। डॉ. दवे का अनुभव इस दिशा में उपयोगी आधार बन सकता है।



उनकी साहित्यिक दृष्टि में भारतीयता का स्वर प्रमुख है। भारतीय संस्कृति, परंपरा और सामाजिक समरसता के प्रश्नों पर उनका निरंतर लेखन और वक्तव्य उनकी वैचारिक पहचान का हिस्सा रहे हैं। उनके चिंतन से असहमति रखने वाले पाठक भी उनके साहित्यिक योगदान और बाल पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके दीर्घ अनुभव को अलग से देख सकते हैं। यही स्वस्थ साहित्यिक परंपरा की खूबसूरती है - जहाँ विचारों का संवाद व्यक्ति से बड़ा होता है।



डॉ. विकास दवे की जीवन-यात्रा इस बात का उदाहरण है कि साहित्य केवल कलम चलाने का नाम नहीं है। साहित्य एक संस्कार है, एक जिम्मेदारी है और समाज से निरंतर संवाद की प्रक्रिया है। उन्होंने बालमन से लेकर व्यापक साहित्यिक समाज तक अपनी सक्रियता का विस्तार किया और अब मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक के रूप में प्रदेश की साहित्यिक चेतना से जुड़े एक बड़े संस्थागत दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं। उनकी यात्रा में शब्द हैं, शोध है, संपादन है, विचार है, संस्कृति है और सबसे बढ़कर साहित्य के प्रति निरंतर सक्रिय रहने की साधना है। शायद इसी कारण उनके व्यक्तित्व को केवल ‘साहित्यकार’ कह देना पर्याप्त नहीं होगा। वे शब्दों के साधक हैं, विचारों के अध्येता हैं और साहित्यिक संस्थान के माध्यम से साहित्य-समाज के बीच संवाद का सेतु बनने वाले कर्मशील व्यक्ति हैं।



मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक के रूप में उनकी नई पारी से साहित्य-जगत की अपेक्षाएँ स्वाभाविक रूप से बड़ी हैं। उम्मीद है कि उनके नेतृत्व में अकादमी की गतिविधियाँ साहित्य की परंपरा और नई रचनात्मकता के बीच संवाद को और मजबूत करेंगी, नवोदित प्रतिभाओं को अवसर मिलेगा और हिंदी साहित्य की समृद्ध धारा नए पाठकों तक पहुँचेगी। आखिर साहित्य की असली शक्ति पुरस्कारों, पदों और प्रशस्तियों में नहीं, बल्कि उस स्पंदन में होती है जो किसी पाठक के मन में एक शब्द पढ़कर पैदा होता है। डॉ. विकास दवे की साहित्य-साधना का मूल्यांकन भी इसी व्यापक संदर्भ में किया जाना चाहिए। उन्होंने शब्द को कर्म से, साहित्य को संस्कार से और सृजन को समाज से जोड़ने की जो कोशिश की है, वही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान है।



आज जब वे मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक के रूप में साहित्य की इस गौरवशाली परंपरा की बागडोर संभाल रहे हैं, तब उनके सामने एक समृद्ध अतीत और संभावनाओं से भरा भविष्य दोनों हैं। उनके शब्दों की यात्रा अब केवल उनकी अपनी नहीं, बल्कि उस व्यापक साहित्यिक संसार की यात्रा है, जिसकी धड़कन हिंदी में सुनाई देती है।



शब्दों के इस साधक की कलम निरंतर चलती रहे, साहित्य के प्रति उनकी साधना नई ऊँचाइयाँ प्राप्त करे और मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी उनके नेतृत्व में हिंदी की साहित्यिक चेतना को नई ऊर्जा प्रदान करे इसी मंगलकामना के साथ।

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