सुकरात की मौत - भूमिका

आज हम जिसे यूरोपीय सभ्यता कहते हैं, उसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान ग्रीस का है | कहा जाता है कि यूरोप ने रोमनों से क़ानून पद्धति तथा रा...


आज हम जिसे यूरोपीय सभ्यता कहते हैं, उसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान ग्रीस का है | कहा जाता है कि यूरोप ने रोमनों से क़ानून पद्धति तथा राज्य संचालन का कौशल प्राप्त किया तो ग्रीस से दर्शन, विज्ञान और साहित्य पाया | महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ग्रीस विद्वानों का अभिमत बहुत कुछ भारतीय तत्व चिंतन से मेल खाता है | जैसे कि पाइथागोरस कहते हैं कि –

दार्शनिक वही है जो लोभ और अहंकार त्याग कर प्रकृति का अध्ययन करता है |

इसे पढ़ सुनकर क्या आपको भारत की ऋषि परम्परा का स्मरण नहीं आता ? इसी कड़ी में इस आलेख के नायक ग्रीक दार्शनिक सुकरात का नाम लिया जा सकता है | उनका समय ईसा पूर्व 441 से 399 के बीच समझा जाता है | संसार के इतिहास में बहुत थोड़े लोग ऐसे हुए हैं, जिनके व्यक्तित्व और जीवन का अपने बाद के लोगों पर इतना प्रभाव पड़ा हो | सुकरात ने सत्य अन्वेषण की बात की, आत्मा के अजर अमर होने की बात की | इन बातों को उस समय के समाज ने युवाओं को पथभ्रष्ट करने वाला कृत्य माना | नतीजतन सुकरात को विष का प्याला पिलाकर मृत्युदंड दिया गया | 

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि सुकरात का मुक़दमा एथेंस की सारी जनता के सामने हुआ था दूसरे शंब्दों में कहा जाए तो लोकतांत्रिक एथेंस में ही सुकरात का मुक़दमा चला जिसमें एथेंस का हर नागरिक न्यायाधीश के आसन पर बैठा था | सुकरात को 220 के मुकाबले 281 मतों से दोषी करार दिया जाकर मृत्युदंड की सजा सुनाई गई | यहाँ एक मौलिक और तात्विक प्रश्न उठता है कि क्या लोकतंत्र की पद्धति वस्तुतः त्रुटिहीन पद्धति है ? जब क्रीटो ने सुकरात को संसार के जनमत की परवाह करने की सलाह दी तो सुकरात ने उसे एक भीड़ की संज्ञा देते हुए कहा कि - 

भीड़ न तो व्यक्ति का उपकार कर सकती है, न अपकार | वह किसी व्यक्ति को न तो ज्ञानी बना सकती है और न ही मूर्ख | भीड़ तो मनमाने ढंग से कार्य करती है |

सुकरात ने स्वयं कोई ग्रन्थ नहीं लिखा | पर उनके शिष्यों ने उनपर बहुत लेख लिखे | उन्हीं के आधार पर हमारे सामने सुकरात का महान व्यक्तित्व उभरता है | मृत्युदंड के पूर्व की उनकी बहस, दण्ड के बाद मित्रों के हार्दिक अनुरोध के बाद भी जेल से भागने से इनकार और फिर साहस के साथ विष का प्याला पीते हुए शांतचित्त से मृत्यु का वरण, सब कुछ अनोखा है | जिस समय वे जेल में भी अपने शिष्यों को सहज प्रश्नोत्तर के माध्यम से जीवन के गूढ़ रहस्य समझाते है, उसे पढ़कर तो हठात श्रीमद्भगवत्गीता का कृष्णअर्जुन संवाद स्मरण हो आता है | विषय भी लगभग वही है – आत्मा की अमरता |

लेख की अगली कड़ी में पढ़ें कि जेल की चहारदीवारी में सुकरात ने अपने मित्रों से क्या संवाद किया ?

साथ ही पढ़ें किस प्रकार इस दुनिया से विदाई हुई सुकरात की -

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सुकरात की मौत - भूमिका
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