भारत की आजादी और रजवाड़े – भाग 3

गतांक से आगे  हैदराबाद के निजाम मेरे उस्मान अली बहादुर ने ऐलान किया कि वह किसी भी हालत में हैदराबाद का विलय हिन्दुस्तान में नहीं करेंग...

गतांक से आगे 

हैदराबाद के निजाम मेरे उस्मान अली बहादुर ने ऐलान किया कि वह किसी भी हालत में हैदराबाद का विलय हिन्दुस्तान में नहीं करेंगे ! निजाम के साथ थे उनके सलाहकार कासिम रिजवी ! 

हैदराबाद को भारत में मिलाये बिना सयुंक्त भारत महज एक कल्पना होती ! 15 अगस्त १९४७ को हैदराबाद उन रियासतों में से एक था जिसका भारत में शामिल होना तो दूर वह इस बारे में बातचीत करने को भी तैयार नहीं था ! १९४७ के नवम्बर माह में निजाम का बेहद करीबी कासिम रिजवी दिल्ली आया लेकिन उसका मकसद बातचीत नहीं बल्कि धमकी देना था !

रिजवी ने यहाँ सरदार पटेल से मुलाकात की और उनसे कहा – पटेल साहब हमारे निजाम ने साफ़ साफ़ कह दिया है कि दो मुल्कों में समझौता होता है वैसे ही समझौता हम आपके साथ कर सकते है आपकी सुविधा के लिए हैदराबाद अपनी आजादी को आपके पैरों तले नहीं रख सकता ! बेहतर यही है कि आप अपना यह सपना छोड़ दें !

सरदार पटेल – कासिम साहब, हैदराबाद का इतिहास इस बात की गवाही नहीं देता कि आप कभी आजाद मुल्क रहे है ! हैदराबाद हमेशा हिन्दुस्तान की रियासत रहा है और जब अंग्रेज हिन्दुस्तान छोडकर चले गए, तो हैदराबाद को अपना निजाम आवाम के हाथों देना होगा ! इसी में आपकी व आपके निजाम की भलाई है !

कासिम – पटेल साहब, आप हमारी फ़िक्र न करें तो अच्छा है ! वह दिन दूर नहीं जब हैदराबाद की सरहद को अरब सागर की लहरें छूएंगी और हमारा झंडा लाल किले पर लहराएगा ! पटेल साहब निजाम की मांगों को यदि न माना गया तो रियासत में हिन्दुओं के लिए मुश्किलें आ सकती है !

पटेल – कासिम साहब, आप अगर ख़ुदकुशी करने की सोच रहे है तो आप को कोई कैसे रोक सकता है ?

कासिम – पटेल साहब, आप सरदार दिल्ली के है ! हैदराबाद में हजारों वर्षों से हमारा झंडा बुलंद है ! दुनिया की कोई भी ताकत उसे नीचे उतार नहीं सकती !

सरदार पटेल से कासिम रिजवी की यह पहली और आखिरी मुलाक़ात थी ! कासिम रिजवी मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लमीन का नेता था ! उसने रजाकार नाम से संगठित हथियारबंद गिरोह तैयार कर रखा था जो रियासत में खुलेआम साम्प्रदायिक लूटपाट, हत्या और बलात्कार को अंजाम दे रहा था ! निजाम और उसकी सरकार १९४७ आते आते पूरी तरह से इनकी गिरफ्त में थी ! हैदराबाद में वही होता था जो कासिम रिजवी चाहता था !

बहरहाल भारत ने हैदराबाद के साथ Standstill Agreement किया, जिसका मतलब यह था कि वो काम जो हैदराबाद और बाकि हिन्दुस्तान में होता था और जैसे भी होता था, वो एक साल तक वैसे ही चलता रहेगा ! लेकिन हैदराबाद के नवाब ने इस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने से साफ़ इनकार कर दिया ! यह भारत के लिए बड़ी मुश्किल थी, क्यूंकि उसके बगैर हैदराबाद हिन्दुस्तान में शामिल नहीं हो सकता था !

इस एग्रीमेंट को तो हैदराबाद ने ठुकराया ही, साथ ही पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की ! यही नहीं हैदराबाद में पाकिस्तान से हथियार की आमद की खबरें भी आने लगी ! मतलब साफ़ था “बगावत” ! 

सोचिये हिन्दुस्तान के ठीक बीच के 82 हजार कि.मी. में फैली सबसे बड़ी रियासत अपनी अलग ही सरकार चला रही थी ! रियासत की अधिकाँश प्रजा हिन्दू थी और हिन्दुस्तान में शामिल होने की इच्छुक थी, लेकिन नवाब ने उनको बांधकर रखा हुआ था और हथियार से लदे रजाकारो ने अलग खौफ का माहौल बनाया हुआ था ! (हैदराबाद ब्रिटेन जितनी बड़ी एक रियासत थी ! इसमें वर्तमान के आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, म.प्र. और छत्तीसगढ़ के कई जिले शामिल थे ! इस रियासत पर राज करने वाला निजाम दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों में से था !)

दरअसल हैदराबाद में ज्यादातर सरकारी अफसरों की गद्दी पर मुसलमान ही काबिज थे जबकि उनकी आबादी एक चौथाई से भी कम थी ! कासिम रिजवी ने इन ओहदेदार मुसलमानों को यह डर दिखा रखा था कि यदि निजाम की हुकूमत ख़त्म हुई तो उनके लिए मुसीबत आ सकती है ! उधर कश्मीर में लड़ाई शुरू हो गयी थी ! रिजवी यह समझ गया था कि भारतीय सेना अभी कश्मीर में उलझी हुई है और ऐसे में वह हैदराबाद का रूख नहीं करेगी !

उधर दिल्ली में नेहरु केबिनेट के कई मंत्री और अफसर हैदराबाद के खिलाफ सैनिक कार्यवाही का विरोध कर रहे थे ! उनका तर्क था कि इससे दक्षिण भारत में दंगे फ़ैल सकते है अतः बातचीत से ही रास्ता निकाला जाए ! दिल्ली में असमंजस था ! इस गरमागरम माहौल में हैदराबाद के प्रधानमंत्री लायक अली एक बार पुनः दिल्ली पहुंचे और नेहरु से भेंट कर कहा कि –

कासिम रिजवी के बारे में जो बातें कहीं जा रही है वह सरासर गलत है उसने ऐसी बातें नहीं कही है ! जिस पर नेहरु ने उत्तर देते हुए कहा कि – हमने जांच करा ली है और हैदराबाद में रजाकारों ने रैली की थी जिसमे कासिम रिजवी ने बेहद भड़काऊ भाषण दिया है यह पूरी तरह से सत्य है ! 

इसका जवाब देते हुए लायक अली ने कहा कि –

हमने इस हेतु रिजवी को चेतावनी दे दी है लेकिन इसके लिए आपके नेता भी जिम्मेदार है जो बार बार यह कह रहे है कि हैदराबाद पर कभी भी सैन्य हमला हो सकता है ! अगर आप बातचीत से यह मुद्दा सुलझाना चाहते है तो हम यह कहना चाहते है कि भारत में शामिल होना हमारे विकल्प में नहीं है ! हाँ राजनैतिक समझौता अवश्य कर सकते है !
नेहरु – उसका फैसला कौन लेगा लायक अली साहब, निजाम या वहां की जनता ?

अली – दोनों मिलकर करेंगे !

नेहरु – और यदि कोई मतभेद हुआ तो क्या करेंगे ?

अली- हमारे लिए जनता की चुनी हुई सरकार बहाल करना और पूरी तरह से भारत में शामिल होना दोनों एक है और इसके लिए अभी हम तैयार नहीं है ! 

नेहरु के साथ मुलाक़ात के साथ लायक अली सरदार पटेल से मिले लेकिन पटेल ने उनकी एक न सुनी ! उन्होंने अली को दो टूक शब्दों में समझा दिया कि हैदराबाद की समस्याओं का भी वही हल होगा जो दूसरी रियासतों का हुआ है दूसरा कोई विकल्प नहीं है ! इस पर अली ने कहा –

यदि आप हैदराबाद को दूसरी रियासतों से जोड़कर देखेंगे तो हम किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पायेंगे ! हमारी आजादी नॉन निगेशियेबल है ! 

इस पर पटेल ने जवाब दिया – तो हमारे यहाँ होने का कोई मतलब नहीं है ! हम आजाद हैदराबाद के लिए कभी भी सहमत नहीं होंगे ! जिससे कि भारत की एकता तार तार हो, जिसे हमने अपने खून पसीने से हासिल की है ! फिर भी हम आपकी समस्याओं को बातचीत से सुलझाने के लिए तैयार है, लेकिन इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि हम कभी भी आजाद हैदराबाद के लिए राजी होंगे ! में आपको साफ़ शब्दों में इसलिए कह रहा हूँ ताकि आपके मन में कोई शंका न रह जाए ! आप सभी लोग वापस जाइए और अपने निजाम से कहिये कि वह अपना आखिरी निर्णय लें ताकि पता चले कि हम लोग कहाँ खड़े है !

हैदराबाद का प्रतिनिधि मंडल वापस लौटा और उसने जो भी वादे किये थे, उन्हें भूल कर नई मांग करने लगा ! आजादी मिले 8 महीने हो चुके थे और हैदराबाद रियासत की हैसियत एक अलग देश जैसी बनी हुई थी ! निजाम ने 22 अप्रेल १९४८ को माउंटबेटन को एक ख़त लिखा जिसमे कहा गया कि “हैदराबाद के शासक व प्रजा का रिश्ता उनका अंदरूनी मामला है !”

भारत की आजादी और राजे रजवाड़े – भाग 2

माउंटबेटन की सिफारिश से भारत सरकार ने हैदराबाद को ऐसी रियायत दे दी जो उसे लगभग एक आजाद देश का दर्जा देती ! ऐसी रियायत किसी अन्य रजवाड़े को नहीं दी गयी थी ! इसके तहत हैदराबाद अपना क़ानून स्वयं बना सकता था, २०००० सैनिकों की फौज रख सकता था ! आंतरिक आपातकाल के दौरान ही भारतीय फौज हैदराबाद में प्रवेश कर सकती थी ! निजाम की सत्ता भी महफूज थी ! माउंटबेटन के इन प्रस्तावों को 13 जून १९४८ को सहमती प्रदान कर दी गयी ! 

इस समझौते के लिए नेहरु के साथ साथ सरदार पटेल की भी आलोचना होने लगी ! सवाल पूछा जा रहा था कि क्या हैदराबाद एक आजाद देश बनने जा रहा है ? अब बाकि थे तो केवल समझौते पर निजाम के हस्ताक्षर !

हैदराबाद की एक अलग हैसियत बनने जा रही थी ! निजाम ने हैदराबाद के लिए एक Special Status माँगा और वह भी उसको मिल गया, लेकिन फिर उसने अपने इरादे बदल लिए ! अब उसने कहना शुरू किया कि हैदराबाद की पूरी आजादी के अलावा कोई और समझौता नहीं हो सकता ! मतलब हिन्दुस्तान के बीच एक पूरा नया देश बनने वाला था ! अब भारत सरकार के सामने कोई और रास्ता नहीं बचा था ! अब इस मसले पर बातचीत का कोई मतलब नहीं था !

एक और तो नेहरु ने प्रेस कांफ्रेंस करके यह कहा कि हिन्दुस्तान की बातचीत हैदराबाद से बंद की जाती है और दूसरी तरफ हैदराबाद के प्रधानमन्त्री लायक अली ने हैदराबाद का मुद्दा यूनाइटेड नेशन के सामने खडा करने की धमकी दे दी ! सरकार ने इन धमकियों को नजरअंदाज कर दिया ! हैदराबाद के निजाम की जिद और वहां के बिगड़ते हालात पर सरदार पटेल ने नेहरु से कोई ठोस कदम उठाने को कहा ! अपने कई फैसलों से हैदराबाद के निजाम ने न सिर्फ अपने लिए बल्कि हिन्दुस्तान के लिए भी बेहद कम विकल्प छोड़े थे ! अब हिन्दुस्तान को सैन्य कार्यवाही के अलावा कोई और रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था !

10 सितम्बर १९४८ को सरदार पटेल ने हैदराबाद के नवाब को एक ख़त लिखा ! जिसमे उन्होंने हैदराबाद को हिन्दुस्तान में शामिल होने का एक आखिरी मौका दिया ! निजाम ने सरदार पटेल के प्रस्ताव को ठुकरा दिया ! जवाब में भारतीय सेना ने 13 सितम्बर १९४८ को ओपरेशन “कैटरपिलर” शुरू कर दिया जिसे ओपरेशन पोलो या पुलिस ओपरेशन भी कहा जाता है !

इस ओपरेशन के तहत भारतीय सेना ने हैदराबाद रियासत पर धाबा बोल दिया ! चारों दिशाओं से भारतीय सेना हैदराबाद में दाखिल हुई ! दोनों सेनाओं के बीच पांच दिन तक संघर्ष चलता रहा ! 17 सितम्बर १९४८ की शाम करीब चार बजे हैदराबाद रेडियो पर निजाम उस्मान अली आया और उसने संबोधित करते हुए कहा –

“हमने भारतीय गवर्नर जनरल श्री राजगोपालाचार्य जी को इत्तल्ला दे दी है कि रियासत के सियासी हालात को देखते हुए हमने हुकूमत को पूरी तरह अपने हाथों में ले लिया है ! हमें अफ़सोस है कि यह फैसला हम पहले नहीं ले सके ! हमने अपनी फौज को जंग रोकने का हुक्म दे दिया है और हम Instrument of Accesion पर हस्ताक्षर करने के लिए भी तैयार है !”

इस एलान के बाद निजाम की सेना ने भारतीय फौज के सामने समर्पण कर दिया और हैदराबाद की रियासत पूरी तरह से भारत में शामिल हो गयी ! नवाब की वजह से सैकड़ों जानें गयी लेकिन लड़ाई के बाद हिन्दुस्तानी सरकार ने मी उस्मान को हैदराबाद का राज प्रमुख घोषित कर दिया !


!!क्रमशः!!

साभार https://www.youtube.com/watch?v=MtYjNgITxMQ

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भारत की आजादी और रजवाड़े – भाग 3
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