आल्हा ऊदल की कहानी - अंतिम युद्ध

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मलखान के वीरगति पाने के बाद महिल ने प्रथ्वीराज को फिर उकसाया, महाराज अब तो मलखान का काँटा भी निकल गया, लगे हाथ महोबा पर भी कब्जा कर ...



मलखान के वीरगति पाने के बाद महिल ने प्रथ्वीराज को फिर उकसाया, महाराज अब तो मलखान का काँटा भी निकल गया, लगे हाथ महोबा पर भी कब्जा कर लो और फिर दिल्ली की सेना ने महोबा घेर लिया, लेकिन तभी अपने मित्र और जयचंद के बेटे लाखन के साथ ऊदल शिकार खेलते उधर आ निकले और उन्हें मलखान के स्वर्ग सिधारने और प्रथ्वीराज द्वारा महोबा को घेरे जाने का समाचार मिला | दोनों मित्रों ने योगी वेश बनाकर प्रथ्विराज की सेना से युद्ध किया और उन्हें खदेड़ दिया | जैसे ही भेद खुला कि योगी वेश में स्वयं ऊदल ने यह कारनामा किया है, राजा परमाल ने ऊदल के पैरों पर अपना अंगवस्त्र रख कर आग्रह किया कि बहुत हुआ, अब यहीं रुक जाओ | लेकिन ऊदल ने आल्हा के हुकुम के बिना रुकने से इनकार कर दिया और कन्नौज चले गए | राजा परमाल ने आल्हा को बुलाने के लिए जगनिक को भेजा, और मां देवल देवी की प्रेरणा से आल्हा ऊदल वापस महोबा आये | एक बार फिर सब लोग सुख शांति से रहने लगे | 

लेकिन माहिल को चैन कहाँ था | उसने एक दिन राजा परमाल से बेला के गौने की बात चलाई | बोला ब्रह्मा की शादी को एक वर्ष हो गया, अब प्रथ्वीराज की बेटी को विदा कराके ले आना चाहिए | लेकिन समस्या थी कि बिना युद्ध के तो गौना होने से रहा | दरबार लगा, उसमें राजा ने बीड़ा रखबाया कि कौन गौना कराके लाने की जिम्मेदारी लेगा | सब एक दूसरे का मुंह देखने लगे | ऊदल ने आगे बढ़कर बीड़ा उठा लिया | लेकिन माहिल ने राजा और ब्रह्मा के कान भरे और कहा – महाराज यह जिम्मेदारी ब्रह्मा को दीजिये | ऊदल के जाने से तो युद्ध निश्चित है, किन्तु ब्रह्मा के साथ मैं जाऊंगा तो महाराज प्रथ्वीराज राजी से ही बेला का गौना कर देंगे | आखिर उन्हें भी तो अपनी बेटी की चिंता होगी | सो बस ब्रह्मा ने ऊदल से मना कर दिया और कहा, तुम रहने दो मैं ही जाउंगा | बीड़ा उठा चुके ऊदल को यह बात अपमान जनक लगी, और दोनों भाइयों ने साथ न जाने का निर्णय लिया | 

फिर वही हुआ जो होना था | ब्रह्मा अकेले गए | राजी ख़ुशी तो गौना कहाँ होना था, माहिल ने ब्रह्मा को समझाया कि महाराज प्रथ्वीराज तुम्हारी वीरता की परीक्षा लेना चाहते हैं, अतः मित्रता पूर्ण युद्ध करना होगा | ब्रह्मा ने वीरता पूर्वक युद्ध करते हुए दिल्ली की सेना के छक्के छुड़ा दिए | प्रथ्वीराज को चिंतित देखकर एक बार फिर माहिल ने दुष्टता पूर्ण सलाह दी | एक डोली में सेनापति चामुंडराय बैठकर ब्रह्मा के शिविर में पहुंचे | ब्रह्मा को बताया गया कि प्रथ्वीराज ने बेला की डोली पहुंचा दी है | प्रसन्न होकर जैसे ही ब्रह्मा डोली के पास पहुंचे स्त्री वेश धारी चामुंडराय ने असावधान ब्रह्मा पर प्रहार कर दिया | अंगरक्षक के रूप में साथ आये ताहिर ने भी एक वाण से ब्रह्मा को घायल कर दिया | घायल ब्रह्मा मूर्छित होकर प्रथ्वी पर गिर पड़े | इस कायरता पूर्ण कृत्य के बाद ये लोग तुरंत वापस हो गए | यह समाचार पाकर बेला अत्यंत दुखी हुई और उसने ऊदल को सन्देश भेजा, कि आप आकर मेरी मदद करो और मुझे मेरे पति के पास पहुँचाओ | 

बहादुर ऊदल एक अबला की पुकार कैसे अनसुनी करते, वे अपने मित्र और जयचंद के बेटे लाखन के साथ दिल्ली पहुँच गए | एक बार फिर भीषण युद्ध हुआ, जिसमें लाखन ने वीरगति पाई, किन्तु बेला को महल से निकालकर ऊदल ले आने में सफल हुए | बेला ने घायल पति ब्रह्मा के पास पहुंचकर पुकारा तो मूर्छित ब्रह्मा ने आँखें खोल दीं | बेला ने अपना परिचय दिया और कहा कि मुझे आज्ञा दें, कि अब मैं क्या करूं ? ब्रह्मा ने कहा कि जब तक मैं अपने अपराधी विश्वासघाती ताहिर का कटा हुआ सर अपने सामने न देख लूं, तब तक मुझे चैन नहीं आयेगा | दिल्ली की राजकुमारी बेला पति की इच्छा पूरी करने एक घोड़े पर सवार होकर निकल पडी, उन्हें अकेले जाते देख महोबा की सारी सेना भी उनके पीछे चल पडी | साक्षात रणचंडी स्वरूपा बेला को देखकर दिल्ली की सेना को समझ में ही नहीं आया कि वह अपनी राजकुमारी से युद्ध करे या न करे | वे असमंजस में ही रहे और तब तक बेला ने ताहिर के सामने पहुंचकर एक झटके में उसका सर धड से अलग कर दिया और एक भाले में उसे टांगकर पति के पास पहुंची | ब्रह्मा ने ताहिर का सर देखकर शांति के साथ अपना शरीर छोड़ा | बेला ने सती होने का निश्चय प्रगट किया तो प्रथ्वीराज ने अडंगा लगाया कि चिता को अग्नि केवल परमाल वंश का ही कोई व्यक्ति दे सकता है | उस युद्ध क्षेत्र में कोई परमाल वंश का व्यक्ति जीवित ही नहीं बचा था | 

ऊदल प्रथ्वीराज की बात अनसुनी कर चिता को अग्नि देने आगे बढ़ा, तो प्रथ्वीराज के इशारे पर सैकड़ों योद्धा ऊदल पर टूट पड़े | चिता एक तरफ रखी रह गई, एक बार फिर युद्ध शुरू हो गया | तलवारें चलने लगीं | चिता के आसपास की भूमि रक्त से लाल होने लगी | आल्हा ऊदल का बाल सखा ढेबा पंडित व जगनिक चामुंड राय के हाथों मारे गए | ख़ास बात यह कि ढेबा पंडित चामुंड राय के सगे दामाद थे | इस युद्ध में आल्हा ऊदल के पिता के मित्र सैयद ताल्हन भी मारे गए, जिनका उल्लेख प्रारंभिक विडियो में किया जा चूका है | प्रथ्वीराज के जिस वीर धान्धू ने ताल्हन को मारा था, उसे जयचंद के वीर पुत्र लाखन ने सुरपुर पहुंचाया | लाखन का पराक्रम देखकर स्वयं प्रथ्वीराज आगे बढे और उनके तीक्ष्ण वाण से लाखन का सर धड से अलग हो गया | महोबा की सेना बहुत कम शेष रही थी, ऊदल अकेले ही दिल्ली के सैन्य दल में घुस पड़े और मानो प्रलय मचा दी | किन्तु हर पराक्रमी के पराक्रम की एक सीमा होती है | अकेले घिर गए ऊदल को चामुंड राय, चंद, कैमास, संयम राय, निरढू राय आदि दिल्ली के प्रसिद्ध वीरों ने मिलकर अंततः मार गिराया | लेकिन उसके पूर्व ऊदल एक हजार योद्धाओं को मार चुके थे | महाबली ऊदल का अंत होते ही महोबा की सेना में शोक छा गया | 

जब इंदल ने जाकर अपने पिता आल्हा को यह समाचार दिया कि चामुंड राय आगे से लड़ता था, चंद पीछे से प्रहार करता था और कैमास बगल से मार रहा था, इस प्रकार जैसे कौरवों ने चक्रव्यूह में अभिमन्यु को मारा था बैसे ही अन्याय पूर्वक चाचा ऊदल को इन लोगों ने मार डाला, यह वीरोचित युद्ध नहीं ह्त्या है | सुनकर आल्हा का खून खौल उठा, उनकी आँखों में ऊदल की मौत का समाचार सुनकर जो आंसू आये थे, वे सूख गए | क्रोध से तमतमाए आल्हा ने बदला लेने की ठान ली | पचशाबद हाथी पर सवार आल्हा के नेतृत्व में एक बार फिर महोबा की सेना युद्ध क्षेत्र में जा पहुंची | यद्यपि दिल्ली की सेना महोबियाओं से कई गुना थी, किन्तु आल्हा के धनुष से छूटते वाण और हाथी पचशाबद की सूंड में पकड़ी सांकल के प्रहारों ने कहर ढा दिया | जैसे ही घोड़े पर बैठा चामुंड राय उनकी आँखों के सामने आया, आल्हा ने हाथ से उसे दबोचकर किसी बच्चे की तरह हाथी के हौदे में खींच लिया और अपने हाथों के प्रहारों से ही पीटपीट कर उसका अंत कर दिया | अपने सेनापति का यह दारुण अंत देखकर स्वयं प्रथ्वीराज आगे बढे, किन्तु क्रुद्ध आल्हा के भीषण वाणों ने उन्हें भी घाबों से भरकर अचेत कर दिया | 

जिस समय आल्हा खंग लेकर शत्रुदल विध्वंश किये जा रहे थे, तभी महातेजस्वी महात्मा गोरख वहां प्रगट हुए और इंदल व आल्हा को अपने साथ लेकर अंतर्ध्यान हो गए | माना जाता है कि उसके बाद आल्हा कजरी वन में तपस्या रत हो गए | उन्हें अमर माना जाता है और यह भी मान्यता है कि देश के कई मंदिरों में वे पूजा करने आज भी पहुंचते हैं | 

उस समय की एक कथा भी कही सुनी जाती है | युद्ध क्षेत्र में जिधर देखो उधर लाशें बिखरी हुई थीं | जमीन रक्त से लाल थी | कोई भी स्वस्थ व्यक्ति वहां शेष नहीं बचा था | ऐसे में घायल पड़े प्रथ्वीराज की आँखें निकालने एक गिद्ध उद्यत हुआ | पास ही घायल पड़े संयमराय यह दृश्य देखकर और तो कुछ नहीं कर सके, पर उन्होंने गिद्ध का ध्यान पर्थ्वीराज पर से हटाने को अपने शरीर का मांस काटकर उस गिद्ध की तरफ फेंका | वे तब तक गिद्ध को अपने शरीर का मांस खिलाते रहे, जब तक कि चंद वरदाई के साथ दिल्ली के बचे हुए कुछ सैनिक बहां न आ पहुंचे | चंदवरदाई प्रथ्वीराज व स्वामीभक्त संयमराय को उठवाकर अपने साथ ले गए | 

चंदवरदाई ने प्रथ्वीराज रासो में लिखा कि जयचंद ने मुहम्मद गौरी को प्रथ्वीराज पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया | हो सकता है कि पुत्र शोक से ग्रस्त जयचंद ने ऐसा किया भी हो, किन्तु चंदवरदाई ने भी यह वर्णन नहीं किया कि जयचंद ने गौरी के साथ मिलकर प्रथ्वीराज से युद्ध किया हो | गौरी को जयचंद ने बुलाया या नहीं, इस पर दो राय हो सकती हैं, किन्तु यह निर्विवाद है कि पारस्परिक युद्धों में भारत की ताकत कम हुई और आक्रमणकारियों को मौका मिला | यह क्षत्रिय और ब्राहण का प्रश्न नहीं है, जैसा कि कई मित्र अपनी टिपण्णी में लिख रहे हैं | प्रथ्वीराज के सेनापति चामुंड राय और आल्हा ऊदल के बाल सखा ढेवा पंडित ब्राहमण ही थे | यह सामाजिक दुरावस्था का चित्रण है, इसे केवल क्षत्रियों की कमजोरी उजागर करना मानना उचित नहीं, यह सामजिक कमजोरी थी | आज भी यह कमजोरी हमें क्षति न पहुंचाए, इस हेतु सजग रहने की आवश्यकता है | यह ऐतिहासिक सचाई है कि गौरी के खिलाफ केवल चित्तौड़ के राणा समरसिंह ने ही प्रथ्वीराज की मदद की, अन्य किसी राजा ने नहीं | 

आल्हा ऊदल की कहानी के शेष भाग -

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