पत्रकारिता का सच: लिखने वाले, दिखने वाले और बिकने वाले
पत्रकारिता कभी सवाल पूछने की हिम्मत का नाम थी। स्याही की गंध में सच की आग जलती थी। कलम डरती नहीं थी, झुकती नहीं थी। लेकिन आज उसी पत्रकारिता के आँगन में तीन प्रजातियाँ खुलेआम टहलती दिखती हैं लिखने वाले, दिखने वाले और बिकने वाले पत्रकार। फर्क बस इतना है कि इन तीनों के उद्देश्य, औज़ार और आत्मा एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा हैं।
लिखने वाला पत्रकार आज भी कहीं कोने में बैठा है। फटी डायरी, पुराना मोबाइल, जेब में बस किराए के पैसे और आँखों में नींद से ज़्यादा सवाल। वह गाँव की कच्ची सड़क पर धूल खाता है, किसान की सूनी आँखों में भविष्य ढूँढता है, अस्पताल की टूटी बेंच पर बैठकर सिस्टम की साँसें गिनता है। उसकी खबरें भारी होती हैं, क्योंकि उनमें आँकड़ों के साथ आहें भी होती हैं। मगर विडंबना देखिए उसकी रिपोर्ट छपती नहीं, वायरल नहीं होती, क्योंकि वह न तो किसी दल की जय बोलती है, न किसी अफसर की आरती उतारती है। वह लिखता है, इसलिए अकेला है।
दूसरी ओर दिखने वाला पत्रकार है। कैमरे के बिना उसका अस्तित्व अधूरा है। खबर से ज़्यादा उसका चेहरा ज़रूरी है। घटनास्थल पर पहुँचने से पहले वह लाइट सेट करता है, एंगल खोजता है और फिर एक तयशुदा संवाद बोलता है जिसमें न सवाल होते हैं, न जोखिम। उसे हर मुद्दे पर “एक्सक्लूसिव” चाहिए, भले ही सच गायब हो। वह चीखता है, उछलता है, उत्तेजना बेचता है। उसके लिए पत्रकारिता एक परफॉर्मेंस है, और दर्शक सिर्फ़ तालियाँ बजाने वाली भीड़। सवाल यह है कि जब कैमरा बंद होता है, तब क्या उसका ज़मीर भी ऑफ़लाइन हो जाता है?
और फिर आते हैं बिकने वाले पत्रकार, पत्रकारिता का सबसे खतरनाक संस्करण। ये न लिखते हैं, न दिखते हैं, ये सौदे करते हैं। इनके पास खबर नहीं, रेट लिस्ट होती है। कौन सा घोटाला दबाना है, किस अफसर को क्लीन चिट देनी है, किस नेता को “जनसेवक” बनाना है सबका भाव तय है। ये वही लोग हैं जो प्रेस की आज़ादी की बात करते हुए सत्ता की गोद में बैठे दिखते हैं। ये वही हैं जो भ्रष्टाचार पर बहस के मंच सजाते हैं और पर्दे के पीछे उसी भ्रष्टाचार से हिस्सा वसूलते हैं। सवाल यह नहीं कि ये बिकते क्यों हैं, सवाल यह है कि इन्हें खरीदता कौन है और क्यों?
इस पूरी तस्वीर में सबसे दर्दनाक चेहरा जनता का है। वही जनता जो खबर को सच मानकर अपनी राय बनाती है, अपने वोट तय करती है, अपने भविष्य का फैसला करती है। जब खबर ही मिलावटी हो, तो लोकतंत्र की नींव कैसे मजबूत रह सकती है? जब पत्रकार सत्ता से सवाल पूछने के बजाय सत्ता की भाषा बोलने लगे, तो फिर विपक्ष, न्याय और जवाबदेही किससे माँगी जाए?
यह कोई भावनात्मक विलाप नहीं, यह एक शोधपरक सच्चाई है कि मीडिया संस्थानों का कॉरपोरेट नियंत्रण, सरकारी विज्ञापनों की लत और सोशल मीडिया की टीआरपी भूख ने पत्रकारिता को बाज़ार में ला खड़ा किया है। यहाँ सच एक विकल्प है, मजबूरी नहीं। यहाँ ईमानदारी जोखिम है, समझौता सुरक्षा कवच। ऐसे माहौल में लिखने वाला पत्रकार धीरे-धीरे हताश होता है, निराश होता है, या फिर सिस्टम से बाहर कर दिया जाता है।
लेकिन सवाल पूछने वाले हमेशा कम होते हैं, मगर वही दिशा बदलते हैं। आज ज़रूरत है कि लिखने वाले पत्रकार अपनी आवाज़ को फिर से तेज़ करें, दिखने वाले पत्रकार आत्ममंथन करें और बिकने वाले पत्रकारों को समाज आईना दिखाए। क्योंकि अगर पत्रकारिता पूरी तरह बिक गई, तो सिर्फ़ खबरें नहीं मरेंगी, सच, संविधान और भविष्य सब गिरवी चले जाएँगे।
अब सवाल आख़िरी नहीं, पहला है आप किस पत्रकार के साथ खड़े हैं? लिखने वाले के, जो अकेला है पर ईमानदार है? दिखने वाले के, जो चमकदार है पर खोखला है? या बिकने वाले के, जो ताक़तवर है पर बेचे हुए ज़मीर के साथ? फैसला आपका है, क्योंकि पत्रकारिता का भविष्य कलम से नहीं, समाज की चेतना से तय होगा।

आज के परिप्रेक्ष्य में एकदम कटु सत्य ।
जवाब देंहटाएंशानदार लेख 👍
व्यवहारिक, समाज को आईना दिखाने बाला सटीक लेख!!🙏
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