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नींव से निखार तक: हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्मृतियों और संकल्पों की यात्रा – डॉ. अमरीक सिंह ठाकुर

 

किसी भी विश्वविद्यालय का स्थापना दिवस केवल एक तिथि नहीं होता, वह उसकी सामूहिक स्मृति, संघर्ष और संकल्प का उत्सव होता है। 20 जनवरी को मनाया जाने वाला हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला का स्थापना दिवस भी ऐसा ही एक अवसर है, जब संस्थान अपने अतीत को याद करते हुए भविष्य की ओर आत्मविश्वास के साथ कदम बढ़ाता है। वर्ष 2026 का यह स्थापना दिवस विशेष रूप से इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह विश्वविद्यालय की उस यात्रा को रेखांकित करता है, जिसने सीमित संसाधनों से आरंभ होकर एक सशक्त, आत्मनिर्भर और राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने जाने वाले उच्च शिक्षण संस्थान का स्वरूप ग्रहण किया है और इस यात्रा में कुलगुरु प्रो. (डॉ.) सत प्रकाश बंसल जी का नेतृत्व एक निर्णायक भूमिका में सामने है।

हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना का उद्देश्य प्रारंभ से ही स्पष्ट था—पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा, शोध और ज्ञान-आधारित विकास को सुदृढ़ करना। यह विश्वविद्यालय केवल डिग्रियाँ प्रदान करने वाला संस्थान नहीं, बल्कि हिमालय की पारिस्थितिकी, संस्कृति, समाज और आजीविका से संवाद करने वाला एक जीवंत अकादमिक मंच बनने की कल्पना के साथ आगे बढ़ा। शुरुआती वर्षों में बुनियादी ढांचे, स्थायी परिसर, मानव संसाधन और व्यवस्थागत चुनौतियाँ स्वाभाविक थीं, लेकिन इन सीमाओं के बीच भी विश्वविद्यालय की आत्मा जीवित रही एक सीखने वाली, प्रयोग करने वाली और आगे बढ़ने की इच्छा रखने वाली आत्मा।

जो लोग हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के आरंभिक वर्षों के साक्षी रहे हैं, वे जानते हैं कि यह संस्थान ईंट-पत्थरों से पहले भरोसे और प्रतिबद्धता पर खड़ा हुआ। शिक्षकों ने सीमित सुविधाओं में भी अकादमिक गुणवत्ता से समझौता नहीं किया, गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों ने हर संक्रमण काल में संस्थागत निरंतरता बनाए रखी, और छात्रों ने एक उभरते विश्वविद्यालय पर विश्वास किया। यही साझा प्रयास हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय की असली पूंजी बने।

कुलगुरु प्रो. (डॉ.) सत प्रकाश बंसल जी के नेतृत्व में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय ने एक नया आत्मविश्वास प्राप्त किया। उनके कार्यकाल की विशेषता यह रही कि विकास को केवल विस्तार तक सीमित न रखकर संस्थागत सुदृढ़ीकरण पर बल दिया गया। प्रशासनिक पारदर्शिता, अकादमिक अनुशासन, शोध नैतिकता, गुणवत्ता आश्वासन और दीर्घकालिक योजना इन सभी को एक समग्र दृष्टि के साथ आगे बढ़ाया गया। उनका नेतृत्व यह दर्शाता है कि एक विश्वविद्यालय को दिशा देने के लिए केवल नीतियाँ नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और दूरदृष्टि भी आवश्यक होती है।

इस दौर में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय ने “स्थापना” के चरण से आगे बढ़कर “पहचान” के चरण में प्रवेश किया है। विभिन्न स्कूलों और केंद्रों ने अपनी अकादमिक पहचान को स्पष्ट किया है। शोध गतिविधियाँ अब केवल प्रकाशनों तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय और राष्ट्रीय समस्याओं से जुड़ती दिखाई देती हैं। हिमालयी अध्ययन, पर्यटन, पर्यावरण, संस्कृति, सामाजिक विज्ञान, भाषाएँ और नवाचार इन सभी क्षेत्रों में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय ने अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज कराई है। यह विश्वविद्यालय धीरे-धीरे अपने भौगोलिक संदर्भ को अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल रहा है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के परिप्रेक्ष्य में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय की यात्रा भी उल्लेखनीय रही है। बहुविषयक शिक्षा, कौशल-आधारित अधिगम, अनुभवात्मक सीख, अनुसंधान-आधारित शिक्षण और छात्र-केंद्रित दृष्टिकोण—इन सभी तत्वों को विश्वविद्यालय ने अपने शैक्षणिक ढांचे में समाहित करने का प्रयास किया है। यह प्रक्रिया सरल नहीं थी, लेकिन संवाद, प्रशिक्षण और सामूहिक प्रयासों के माध्यम से हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय ने परिवर्तन को अवसर के रूप में स्वीकार किया।

हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय की एक और विशेषता यह रही है कि विश्वविद्यालय अकादमिक उत्कृष्टता के साथ-साथ सामाजिक दायित्व को भी समान महत्व दिया है। समावेशन, क्षेत्रीय संतुलन, महिला सहभागिता और वंचित वर्गों तक शिक्षा की पहुँच—ये केवल नीतिगत शब्द नहीं, बल्कि व्यवहारिक प्राथमिकताएँ रही हैं। विश्वविद्यालय का यह दृष्टिकोण उसे केवल “शिक्षा देने वाला” नहीं, बल्कि “समाज के साथ चलने वाला” संस्थान बनाता है।

कक्षा और प्रयोगशाला से बाहर भी विश्वविद्यालय ने एक जीवंत बौद्धिक वातावरण विकसित किया है। सेमिनार, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, व्याख्यान शृंखलाएँ, सांस्कृतिक गतिविधियाँ और सामुदायिक सहभागिता ने विश्वविद्यालय को एक खुले संवाद का केंद्र बनाया है। छात्रों के लिए यह केवल करियर निर्माण की जगह नहीं, बल्कि आत्मविश्वास, विचारशीलता और नागरिक चेतना विकसित करने का मंच बनता जा रहा है।

पिछले कुछ वर्षों में विश्वविद्यालय ने वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर आए संकटों और परिवर्तनों से भी सीख ली है। चाहे वह नीतिगत बदलाव हों, तकनीकी संक्रमण हों या वैश्विक अनिश्चितताएँ—विश्वविद्यालय ने हर चुनौती को संस्थागत परिपक्वता में बदलने का प्रयास किया है। आज विश्वविद्यालय अधिक संगठित, अधिक सजग और अधिक उत्तरदायी संस्थान के रूप में सामने है।

स्थापना दिवस के इस अवसर पर यह स्वीकार करना आवश्यक है कि यात्रा अभी पूर्ण नहीं हुई है। आने वाले वर्षों में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय से अपेक्षाएँ और बढ़ेंगी—गहन शोध प्रभाव, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, डिजिटल नवाचार, और छात्रों की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता। लेकिन यदि अब तक की यात्रा कोई संकेत देती है, तो वह यह कि हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के पास भविष्य के लिए सबसे आवश्यक तत्व मौजूद है—साझा दृष्टि और सामूहिक विश्वास।

20 जनवरी 2026 को जब हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय अपना स्थापना दिवस रहा है, तो वह केवल वर्षों की गणना नहीं रहा है । वह एक विचार के साकार होने, एक संस्थान के परिपक्व होने और एक अकादमिक समुदाय के सशक्त होने का उत्सव रहा है। कुलगुरु प्रो. (डॉ.) सत प्रकाश बंसल जी के मार्गदर्शन में हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय आज जिस आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है, वह यह आश्वासन देता है कि हिमालय की गोद में जन्मा यह विश्वविद्यालय आने वाले समय में राष्ट्रीय और वैश्विक ज्ञान-परिदृश्य में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाएगा।

अतीत की स्मृतियों को सहेजते हुए और भविष्य की जिम्मेदारियों को स्वीकार करते हुए, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय की यह यात्रा हमें यह सिखाती है कि संस्थान केवल बनाए नहीं जाते—उन्हें जिया जाता है। और यही जीवंतता हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी पहचान है।