लेबल

20 लाख दो तभी खाली होगी दुकान - तथाकथित पत्रकार पर रोती विधवा के गंभीर आरोप


शिवपुरी में एक दुकान को लेकर सामने आए विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। एक ओर जहां एक विधवा महिला ने दुकान पर कब्जा, धमकी और 20 लाख रुपये की मांग जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं, वहीं दूसरी ओर स्वयं को पत्रकार बताने वाले शौकीन अहमद 'पप्पू' ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अपने बड़े भाई की लगभग 40 वर्षों की किरायेदारी और न्यायालय में प्रकरण विचाराधीन होने का दावा किया है।

रोते हुए पत्रकारों के सामने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए महिला ने बताया कि उसकी दुकान पर नसीम अहमद द्वारा लंबे समय से कब्जा किया गया है। महिला का आरोप है कि नसीम का भाई शौकीन अहमद उर्फ 'पप्पू', जो स्वयं को पत्रकार बताते हैं, उन्हें और उनके परिवार को लगातार प्रताड़ित करते हैं। महिला का कहना है कि दोनों भाई उसे "पागल औरत" कहकर अपमानित करते हैं और दुकान खाली करने के बदले 20 लाख रुपये की मांग कर रहे हैं।

महिला ने आरोप लगाया कि जब वह दुकान खाली करने की बात करती है तो उसके पुत्र को जान से मारने की धमकियां दी जाती हैं। उनका कहना है कि वर्तमान में इस मामले से संबंधित कोई भी प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन नहीं है। महिला के अनुसार दुकान किराये पर देने संबंधी कोई वैध लिखित दस्तावेज या किरायानामा भी मौजूद नहीं है। उन्होंने यह भी दावा किया कि तथाकथित पत्रकार द्वारा दी गई धमकियों के प्रमाण उनके मोबाइल फोन में सुरक्षित हैं।

दूसरी ओर, शौकीन अहमद 'पप्पू' ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उनके बड़े भाई लगभग 40 वर्षों से उक्त दुकान में किरायेदार के रूप में व्यवसाय कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि दुकान संबंधी विवाद न्यायालय में चल रहा है और मजिस्ट्रेट द्वारा स्पष्ट कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति दादागिरी के बल पर दुकान खाली नहीं करा सकता और न ही मनमाने ढंग से किराया बढ़ा सकता है। पप्पू का कहना है कि उनके पास न्यायालय का आदेश उपलब्ध है।

उन्होंने बताया कि कोर्ट रोड जैसे व्यस्ततम क्षेत्र में स्थित इस दुकान का मासिक किराया वर्तमान में मात्र 450 रुपये है, जिसे वह नियमित रूप से जमा करते हैं। उन्होंने 40 वर्षों की किराया रसीदें होने का भी दावा किया। हालांकि जब उनसे पूछा गया कि क्या न्यायालय ने उन्हें दुकान का मालिकाना हक प्रदान कर दिया है, तो उन्होंने कहा कि इस संबंध में अधिक जानकारी उनके बड़े भाई ही दे सकते हैं।

दिलचस्प बात यह रही कि एक ओर पप्पू ने कहा कि उन्हें यह नहीं पता कि दुकान किसकी है, वहीं दूसरी ओर उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि महिला के ससुर ने उनके बड़े भाई को यह दुकान किराये पर दी थी और तब से किराया नियमित रूप से दिया जा रहा है।

अब इस पूरे विवाद में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि मामला न्यायालय में विचाराधीन है तो उसका रिकॉर्ड क्या कहता है? यदि 40 वर्षों की किराया रसीदें मौजूद हैं तो क्या वे केवल किरायेदारी सिद्ध करती हैं या कुछ और? यदि महिला के पास धमकियों के प्रमाण हैं तो क्या वे जांच एजेंसियों के सामने प्रस्तुत किए जाएंगे? और सबसे बड़ा सवाल, आखिर इस दुकान का वास्तविक मालिक कौन है और कानून किसके पक्ष में खड़ा है?

फिलहाल दोनों पक्ष अपने-अपने दावों पर कायम हैं। एक पक्ष खुद को पीड़ित बता रहा है तो दूसरा अपने कब्जे को वैधानिक किरायेदारी का परिणाम बता रहा है। ऐसे में इस विवाद का वास्तविक सच दस्तावेजों, साक्ष्यों और न्यायालय के अंतिम निर्णय के बाद ही पूरी तरह सामने आ सकेगा।

(समाचार दोनों पक्षों के बयानों पर आधारित है। आरोपों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना शेष है।)

एक टिप्पणी भेजें

1 टिप्पणियाँ