रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा - भाग 7

रामप्रसाद बिस्मिल, आत्मकथा

वृहत् संगठन

यद्यपि मैं अपना निश्‍चय कर चुका था कि अब इस प्रकार के कार्यों में कोई भाग न लूँगा, तथापि मुझे पुनः क्रान्तिकारी आन्दोलन में हाथ डालना पड़ा, जिसका कारण यह था कि मेरी तृष्‍णा न बुझी थी, मेरे दिल के अरमान न निकले थे । असहयोग आन्दोलन शिथिल हो चुका था । पूर्ण आशा थी कि जितने देश के नवयुवक उस आन्दोलन में भाग लेते थे, उनमें अधिकतर क्रान्तिकारी आन्दोलन में सहायता देंगे और पूरी लगन से काम करेंगे । जब कार्य आरम्भ हो गया और असहयोगियों को टटोला तो वे आन्दोलन से कहीं अधिक शिथिल हो चुके थे । उनकी आशाओं पर पानी फिर चुका था । निज की पूंजी समाप्‍त हो चुकी थी । घर में व्रत हो रहे थे । आगे की भी कोई विशेष आशा न थी । कांग्रेस में भी स्वराज्य दल का जोर हो गया था । जिनके पास कुछ धन तथा इष्‍ट मित्रों का संगठन था, वे कौंसिलों तथा असेंबली के सदस्य बन गये । ऐसी अवस्था में यदि क्रान्तिकारी संगठनकर्ताओं के पास पर्याप्‍त धन होता तो वे असहयोगियों को हाथ में लेकर उनसे काम ले सकते थे । कितना भी सच्चा काम करने वाला हो, किन्तु पेट तो सबके हैं । दिनभर में थोड़ा सा अन्न क्षुधा निवृत्ति के लिए मिलना परमावश्यक है । फिर शरीर ढ़कने की भी आवश्यकता होती है । अतएव कुछ प्रबन्ध तो ऐसा होना चाहिए, जिसमें नित की आवश्यकताएं पूरी हो जाएं । जितने धनी-मानी स्वदेश-प्रेमी थे उन्होंने असहयोग आन्दोलन में पूर्ण सहायता दी थी । फिर भी कुछ ऐसे कृपालु सज्जन थे, जो थोड़ी-बहुत आर्थिक सहायता देते थे । किन्तु प्रान्त भर के प्रत्येक जिले में संगठन करने का विचार था । पुलिस की दृष्‍टि से बचाने के लिए भी पूर्ण प्रयत्‍न करना पड़ता था । ऐसी परिस्थिति में साधारण नियमों को काम में लाते हुए कार्य करना बड़ा कठिन था । अनेक उद्योगों के पश्‍चात् कुछ भी सफलता न होती थी । दो-चार जिलों में संगठनकर्ता नियत किये गये थे, जिनको कुछ मासिक गुजारा दिया जाता था । पांच-दस महीने तक तो इस प्रकार कार्य चलता रहा । बाद को जो सहायक कुछ आर्थिक सहायता देते थे, उन्होंने भी हाथ खींच लिया । अब हम लोगों की अवस्था बहुत खराब हो गई । सब कार्य-भार मेरे ही ऊपर आ चुका था । कोई भी किसी प्रकार की मदद न देता था । जहां-तहां से पृथक-पृथक जिलों में कार्य करने वाले मासिक व्यय की मांग कर रहे थे । कई मेरे पास आये भी । मैंने कुछ रुपया कर्ज लेकर उन लोगों को एक मास का खर्च दिया । कईयों पर कुछ कर्ज भी हो चुका था । मैं कर्ज न निपटा सका । एक केन्द्र के कार्यकर्त्ता को जब पर्याप्‍त धन न मिल सका, तो वह कार्य छोड़कर चले गये । मेरे पास क्या प्रबन्ध था, जो मैं उसकी उदर-पूर्ति कर सकता ? अद्‌भुत समस्या थी ! किसी तरह उन लोगों को समझाया ।

थोड़े दिनों में क्रान्तिकारी पर्चे आये । सारे देश में निश्‍चित तिथि पर पर्चे बांटे गये । रंगून, बम्बई, लाहौर, अमृतसर, कलकत्ता तथा बंगाल के मुख्य शहरों तथा संयुक्‍त प्रान्त के सभी मुख्य-मुख्य जिलों में पर्याप्‍त संख्या में पर्चों का वितरण हुआ । भारत सरकार बड़ी सशंक हुई कि ऐसी कौन सी और इतनी बड़ी सुसंगठित समिति है, जो एक ही दिन में सारे भारतवर्ष में पर्चे बंट गये ! उसी के बाद मैंने कार्यकारिणी की एक बैठक करके जो केन्द्र खाली हो गया था, उसके लिए एक महाशय को नियुक्‍त किया । केन्द्र में कुछ परिवर्तन भी हुआ, क्योंकि सरकार के पास संयुक्‍त प्रान्त के सम्बन्ध में बहुत सी सूचनाएं पहुंच चुकी थीं । भविष्य की कार्य-प्रणाली का निर्णय किया गया ।

कार्यकर्त्ताओं की दुर्दशा

इस समिति के सदस्यों की बड़ी दुर्दशा थी । चने मिलना भी कठिन था । सब पर कुछ न कुछ कर्ज हो गया था । किसी के पास साबुत कपड़े तक न थे । कुछ विद्यार्थी बन कर धर्म क्षेत्रों तक में भोजन कर आते थे । चार-पांच ने अपने-अपने केन्द्र त्याग दिये । पांच सौ से अधिक रुपये मैं कर्ज लेकर व्यय कर चुका था । यह दुर्दशा देख मुझे बड़ा कष्‍ट होने लगा । मुझसे भी भरपेट भोजन न किया जाता था । सहायता के लिए कुछ सहानुभूति रखने वालों का द्वार खटखटाया, किन्तु कोरा उत्तर मिला । किंकर्त्तव्यविमूढ़ था । कुछ समझ में न आता था । कोमल-हृदय नवयुवक मेरे चारों ओर बैठकर कहा करते, "पण्डित जी, अब क्या करें?" मैं उनके सूखे-सूखे मुख देख बहुधा रो पड़ता कि स्वदेश सेवा का व्रत लेने के कारण फकीरों से भी बुरी दशा हो रही है ! एक एक कुर्ता तथा धोती भी ऐसी नहीं थी जो साबुत होती । लंगोट बांध कर दिन व्यतीत करते थे । अंगोछे पहनकर नहाते थे, एक समय क्षेत्र में भोजन करते थे, एक समय दो-दो पैसे के सत्तू खाते थे । मैं पन्द्रह वर्ष से एक समय दूध पीता था । इन लोगों की यह दशा देखकर मुझे दूध पीने का साहस न होता था । मैं भी सबके साथ बैठ कर सत्तू खा लेता था । मैंने विचार किया कि इतने नवयुवकों के जीवन को नष्‍ट करके उन्हें कहां भेजा जाये । जब समिति का सदस्य बनाया था, तो लोगों ने बड़ी-बड़ी आशाएं बधाई थीं । कईयों का पढ़ना-लिखना छुड़ा कर इस काम में लगा दिया था । पहले से मुझे यह हालत मालूम होती तो मैं कदापि इस प्रकार की समिति में योग न देता । बुरा फँसा । क्या करूँ, कुछ समझ में नहीं आता था । अन्त में धैर्य धारण कर दृढ़तापूर्वक कार्य करने का निश्‍चय किया ।

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इसी बीच में बंगाल आर्डिनेंस निकला और गिरफ्तारियां हुईं । इनकी गिरफ्तारी ने यहां तक असर डाला कि कार्यकर्ताओं में निष्क्रियता के भाव आ गये । क्या प्रबन्ध किया जाये, कुछ निर्णय नहीं कर सके । मैंने प्रयत्‍न किया कि किसी तरह एक सौ रुपया मासिक का कहीं से प्रबन्ध हो जाए । प्रत्येक केन्द्र के प्रतिनिधि से हर प्रकार से प्रार्थना की थी कि समिति के सदस्यों से कुछ सहायता लें, मासिक चन्दा वसूल करें पर किसी ने कुछ न सुनी । कुछ सज्जनों ने व्यक्‍तिगत प्रार्थना की कि वे अपने वेतन में से कुछ मासिक दे दिया करें । किसी ने कुछ ध्यान न दिया । सदस्य रोज मेरे द्वार पर खड़े रहते थे । पत्रों की भरमार थी कि कुछ धन का प्रबन्ध कीजिए, भूखों मर रहे हैं । दो एक को व्यवसाय में लगाने का इन्तजाम भी किया । दो चार जिलों में काम बन्द कर दिया, वहां के कार्यकर्ताओं से स्पष्‍ट शब्दों में कह दिया कि हम मासिक शुल्क नहीं दे सकते । यदि निर्वाह का कोई दूसरा मार्ग हो, और उस ही पर निर्भर रह कर कार्य कर सकते हो तो करो । हमसे जिस समय हो सकेगा देंगे, किन्तु मासिक वेतन देने के लिए हम बाध्य नहीं । कोई बीस रुपये कर्ज के मांगता था, कोई पचास का बिल भेजता था, और कईयों ने असन्तुष्‍ट होकर कार्य छोड़ दिया । मैंने भी समझ लिया - ठीक ही है, पर इतना करने पर भी गुजर न हो सकी ।

अशान्त युवक दल

कुछ महानुभावों की प्रकृति होती है कि अपनी कुछ शान जमाना या अपने आप को बड़ा दिखाना अपना कर्त्तव्य समझते हैं, जिससे भयंकर हानियां हो जाती हैं । भोले-भाले आदमी ऐसे मनुष्यों में विश्‍वास करके उनमें आशातीत साहस, योग्यता तथा कार्यदक्षता की आशा करके उन पर श्रद्धा रखते हैं । किन्तु समय आने पर यह निराशा के रूप में परिणित हो जाती है । इस प्रकार के मनुष्यों की किन्हीं कारणों वश यदि प्रतिष्‍ठा हो गई, अथवा अनुकूल परिस्थितियों के उपस्थित हो जाने से उन्होंने किसी उच्च कार्य में योग दे दिया, तब तो फिर वे अपने आपको बड़ा भारी कार्यकर्त्ता जाहिर करते हैं । जनसाधारण भी अन्धविश्‍वास से उनकी बातों पर विश्‍वास कर लेते हैं । विशेषकर नवयुवक तो इस प्रकार के मनुष्‍यों के जाल में शीघ्र ही फंस जाते हैं । ऐसे ही लोग नेतागिरी की धुन में अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग पकाया करते हैं । इसी कारण पृथक-पृथक दलों का निर्माण होता है । इस प्रकार के मनुष्‍य प्रत्येक समाज तथा प्रत्येक जाति में पाये जाते हैं । इनसे क्रान्तिकारी दल भी मुक्‍त नहीं रह सकता । नवयुवकों का स्वभाव चंचल होता है, वे शान्त रहकर संगठित कार्य करना बड़ा दुष्कर समझते हैं । उनके हृदय में उत्साह की उमंगें उठती हैं । वे समझते हैं दो चार अस्‍त्र हाथ आये कि हमने गवर्नमेंट को नाकों चने चबवा दिए । मैं भी जब क्रान्तिकारी दल में योग देने का विचार कर रहा था, उस समय मेरी उत्कण्ठा थी कि यदि एक रिवाल्वर मिल जाये तो दस बीस अंग्रेजों को मार दूं । इसी प्रकार के भाव मैंने कई नवयुवकों में देखे । उनकी बड़ी प्रबल हार्दिक इच्छा होती है कि किसी प्रकार एक रिवाल्वर या पिस्तौल उनके हाथ लग जाये तो वे उसे अपने पास रख लें । मैंने उनसे रिवाल्वर पास रखने का लाभ पूछा, तो कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे सके । कई नवयुवकों को मैंने इस शौक को पूरा करने में सैंकड़ों रुपये बरबाद करते भी देखा है । किसी क्रान्तिकारी आन्दोलन के सदस्य नहीं, कोई विशेष कार्य भी नहीं, महज शौकिया रिवाल्वर पास रखेंगे । ऐसे ही थोड़े से युवकों का एक दल एक महोदय ने भी एकत्रित किया । वे सब बड़े सच्चरित्र, स्वाभिमानी और सच्चे कार्यकर्त्ता थे । इस दल ने विदेश से अस्‍त्र प्राप्‍त करने का बड़ा उत्तम सूत्र प्राप्‍त किया था, जिससे यथारुचि पर्याप्‍त अस्‍त्र मिल सकते थे । उन अस्‍त्रों के दाम भी अधिक न थे । अस्‍त्र भी पर्याप्‍त संख्या में बिलकुल नये मिलते थे । यहां तक प्रबन्ध हो गया था कि हम लोग रुपये का उचित प्रबन्ध कर देंगे, और यथा समय मूल्य निपटा दिया करेंगे, तो हमको माल उधार भी मिल जाया करेगा और हमें जब किसी प्रकार के जितनी संख्या में अस्‍त्रों की आवश्यकता होगी, मिल जाया करेंगे । यही नहीं, समय आने पर हम विशेष प्रकार की मशीन वाली बन्दूकें भी बनवा सकेंगे । इस समय समिति की आर्थिक अवस्था बड़ी खराब थी । इस सूत्र के हाथ लग जाने और इसके लाभ उठाने की इच्छा होने पर भी बिना रुपये के कुछ होता दिखलाई न पड़ता था । रुपये का प्रबन्ध करना नितान्त आवश्‍यक था । किन्तु वह हो कैसे ? दान कोई न देता था । कर्ज भी न मिलता था, और कोई उपाय न देख डाका डालना तय हुआ । किन्तु किसी व्यक्‍ति विशेष की सम्पत्ति (private property) पर डाका डालना हमें अभीष्‍ट न था । सोचा, यदि लूटना है तो सरकारी माल क्यों न लूटा जाये ? इसी उधेड़बुन में एक दिन मैं रेल में जा रहा था । गार्ड के डिब्बे के पास गाड़ी में बैठा था । स्टेशन मास्टर एक थैली लाया, और गार्ड के डिब्बे में डाल दिया । कुछ खटपट की आवाज हुई । मैंने उतर कर देखा कि एक लोहे का सन्दूक रखा है । विचार किया कि इसी में थैली डाली होगी । अगले स्टेशन पर उसमें थैली डालते भी देखा । अनुमान किया कि लोहे का सन्दूक गार्ड के डिब्बे में जंजीर से बंधा रहता होगा, ताला पड़ा रहता होगा, आवश्यकता होने पर ताला खोलकर उतार लेते होंगे । इसके थोड़े दिनों बाद लखनऊ स्टेशन पर जाने का अवसर प्राप्‍त हुआ । देखा एक गाड़ी में से कुली लोहे के, आमदनी वाले सन्दूक उतार रहे हैं । निरीक्षण करने से मालूम हुआ कि उसमें जंजीरें ताला कुछ नहीं पड़ता, यों ही रखे जाते हैं । उसी समय निश्‍चय किया कि इसी पर हाथ मारूंगा ।

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रेलवे डकैती

उसी समय से धुन सवार हुई । तुरन्त स्थान पर जो टाइम टेबल देखकर अनुमान किया कि सहारनपुर से गाड़ी चलती है, लखनऊ तक अवश्य दस हजार रुपये की आमदनी होती होगी । सब बातें ठीक करके कार्यकर्ताओं का संग्रह किया । दस नवयुवकों को लेकर विचार किया कि किसी छोटे स्टेशन पर जब गाड़ी खड़ी हो, स्टेशन के तारघर पर अधिकार कर लें, और गाड़ी का सन्दूक उतार कर तोड़ डालें, जो कुछ मिले उसे लेकर चल दें । परन्तु इस कार्य में मनुष्यों की अधिक संख्या की आवश्यकता थी । इस कारण यही निश्‍चय किया गया कि गाड़ी की जंजीर खींचकर चलती गाड़ी को खड़ा करके तब लूटा जाये । सम्भव है कि तीसरे दर्जे की जंजीर खींचने से गाड़ी न खड़ी हो, क्योंकि तीसरे दर्जे में बहुधा प्रबन्ध ठीक नहीं रहता है । इस कारण से दूसरे दर्जे की जंजीर खींचने का प्रबन्ध किया गया । सब लोग उसी ट्रेन में सवार थे । गाड़ी खड़ी होने पर सब उतरकर गार्ड के डिब्बे के पास पहुंच गये । लोहे का सन्दूक उतारकर छेनियों से काटना चाहा, छेनियों ने काम न दिया, तब कुल्हाड़ा चला ।

मुसाफिरों से कह दिया कि सब गाड़ी में चढ़ जाओ । गाड़ी का गार्ड गाड़ी में चढ़ना चाहता था, पर उसे जमीन पर लेट जाने की आज्ञा दी, ताकि बिना गार्ड के गाड़ी न जा सके । दो आदमियों को नियुक्‍त किया कि वे लाइन की पगडण्डी को छोड़कर घास में खड़े होकर गाड़ी से हटे हुए गोली चलाते रहें । एक सज्जन गार्ड के डिब्बे से उतरा । उनके पास भी माउजर पिस्तौल था । विचारा कि ऐसा शुभ अवसर जाने कब हाथ आए । माउजर पिस्तौल काहे को चलाने को मिलेगा? उमंग जो आई, सीधी करके दागने लगे । मैंने जो देखा तो डांटा, क्योंकि गोली चलाने की उनकी ड्यूटी (काम) ही न थी । फिर यदि कोई मुसाफिर कौतुहलवश बाहर को सिर निकाले तो उसके गोली जरूर लग जाये ! हुआ भी ऐसा ही । जो व्यक्‍ति रेल से उतरकर अपनी स्‍त्री के पास जा रहा था, मेरा ख्याल है कि इन्हीं महाशय की गोली उसके लग गई, क्योंकि जिस समय यह महाशय सन्दूक नीचे डालकर गार्ड के डिब्बे से उतरे थे, केवल दो तीन फायर हुए थे । उसी समय स्‍त्री ने कोलाहल किया होगा और उसका पति उसके पास जा रहा था, जो उ‍क्‍त महाशय की उमंग का शिकार हो गया ! मैंने यथाशक्‍ति पूर्ण प्रबन्ध किया था कि जब तक कोई बन्दूक लेकर सामना करने न आये, या मुकाबले में गोली न चले तब तक किसी आदमी पर फायर न होने पाए । मैं नर-हत्या कराके डकैती को भीषण रूप देना नहीं चाहता था । फिर भी मेरा कहा न मानकर अपना काम छोड़ गोली चला देने का यह परिणाम हुआ ! गोली चलाने की ड्यूटी जिनको मैंने दी थी वे बड़े दक्ष तथा अनुभवी मनुष्य थे, उनसे भूल होना असम्भव है । उन लोगों को मैंने देखा कि वे अपने स्थान से पांच मिनट बाद फायर करते थे । यही मेरा आदेश था ।

सन्दूक तोड़ तीन गठरियों में थैलियां बांधी । सबसे कई बार कहा, देख लो कोई सामान रह तो नहीं गया, इस पर भी एक महाशय चद्‌दर डाल आए ! रास्ते में थैलियों से रुपया निकालकर गठरी बांधी और उसी समय लखनऊ शहर में जा पहुंचे । किसी ने पूछा भी नहीं, कौन हो, कहाँ से आये हो ? इस प्रकार दस आदमियों ने एक गाड़ी को रोककर लूट लिया । उस गाड़ी में चौदह मनुष्य ऐसे थे, जिनके पास बन्दूकें या राइफलें थीं । दो अंग्रेज सशस्‍त्र फौजी जवान भी थे, पर सब शान्त रहे । ड्राइवर महाशय तथा एक इंजीनियर महाशय दोनों का बुरा हाल था । वे दोनों अंग्रेज थे । ड्राइवर महाशय इंजन में लेटे रहे । इंजीनियर महाशय पाखाने में जा छुपे ! हमने कह दिया था कि मुसाफिरों से न बोलेंगे । सरकार का माल लूटेंगे । इस कारण मुसाफिर भी शान्तिपूर्वक बैठे रहे । समझे तीस-चालीस आदमियों ने गाड़ी को चारों ओर से घेर लिया है । केवल दस युवकों ने इतना बड़ा आतंक फैला दिया । साधारणतः इस बात पर बहुत से मनुष्य विश्‍वास करने में भी संकोच करेंगे कि दस नवयुवकों ने गाड़ी खड़ी करके लूट ली । जो भी हो, वास्तव में बात यही थी । इन दस कार्यकर्ताओं में अधिकतर तो ऐसे थे जो आयु में सिर्फ लगभग बाईस वर्ष के होंगे और जो शरीर से बड़े पुष्‍ट न थे । इस सफलता को देखकर मेरा साहस बढ़ गया । मेरा जो विचार था, वह अक्षरशः सत्य सिद्ध हुआ । पुलिस वालों की वीरता का मुझे अन्दाजा था । इस घटना से भविष्य के कार्य की बहुत बड़ी आशा बन्ध गई । नवयुवकों में भी उत्साह बढ़ गया । जितना कर्जा था निपटा दिया । अस्‍त्रों की खरीद के लिए लगभग एक हजार रुपये भेज दिये । प्रत्येक केन्द्र के कार्यकर्ताओं को यथास्थान भेजकर दूसरे प्रान्तों में भी कार्य-विस्तार करने का निर्णय करके कुछ प्रबन्ध किया । एक युवकदल ने बम बनाने का प्रबन्ध किया, मुझसे भी सहायता चाही । मैंने आर्थिक सहायता देकर अपना एक सदस्य भेजने का वचन दिया । किन्तु कुछ त्रुटियां हुईं जिससे सम्पूर्ण दल अस्त-व्यस्त हो गया ।

मैं इस विषय में कुछ भी न जान सका कि दूसरे देश के क्रान्तिकारियों ने प्रारम्भिक अवस्था में हम लोगों की भांति प्रयत्‍न किया या नहीं । यदि पर्याप्‍त अनुभव होता तो इतनी साधारण भूलें न करते । त्रुटियों के होते हुए भी कुछ न बिगड़ता और न कुछ भेद खुलता, न इस अवस्था को पहुंचते, क्योंकि मैंने जो संगठन किया था उसमें किसी ओर से मुझे कमजोरी न दिखाई देती थी । कोई भी किसी प्रकार की त्रुटि न समझ सकता था । इसी कारण आंख बन्द किये बैठे रहे । किन्तु आस्तीन में सांप छिपा हुआ था, ऐसा गहरा मुंह मारा कि चारों खानों चित्त कर दिया !

जिन्हें हम हार समझे थे गला अपना सजाने को,
वही अब नाग बन बैठे हमारे काट खाने को !

नवयुवकों में आपस की होड़ के कारण बहुत वितण्डा तथा कलह भी हो जाती थी, जो भयंकर रूप धारण कर लेती । मेरे पास जब मामला आता तो मैं प्रेम-पूर्वक समिति की दशा का अवलोकन कराके, सबको शान्त कर देता । कभी नेतृत्व को लेकर वाद-विवाद चल जाता । एक केन्द्र के निरीक्षक के वहाँ कार्यकर्त्ता अत्यन्त असन्तुष्‍ट थे । क्योंकि निरीक्षक से अनुभवहीनता के कारण कुछ भूलें हो गई थीं । यह अवस्था देख मुझे बड़ा खेद तथा आश्‍चर्य हुआ, क्योंकि नेतागिरि का भूत सबसे भयानक होता है । जिस समय से यह भूत खोपड़ी पर सवार होता है, उसी समय से सब काम चौपट हो जाता है । केवल एक दूसरे को दोष देखने में समय व्यतीत होता है और वैमनस्य बढ़कर बड़े भयंकर परिणामों का उत्पादक होता है । इस प्रकार के समाचार सुन मैंने सबको एकत्रित कर खूब फटकारा । सब अपनी त्रुटि समझकर पछताए और प्रीतिपूर्वक आपस में मिलकर कार्य करने लगे । पर ऐसी अवस्था हो गई थी कि दलबन्दी की नौबत आ गई थी । इस प्रकार से तो दलबन्दी हो ही गई थी । पर मुझ पर सब की श्रद्धा थी और मेरे वक्‍तव्य को सब मान लेते थे । सब कुछ होने पर भी मुझे किसी ओर से किसी प्रकार का सन्देह न था । किन्तु परमात्मा को ऐसा ही स्वीकार था, जो इस अवस्था का दर्शन करना पड़ा ।

गिरफ्तारी

काकोरी डकैती होने के बाद से ही पुलिस बहुत सचेत हुई । बड़े जोरों के साथ जांच आरम्भ हो गई । शाहजहांपुर में कुछ नई मूर्तियों के दर्शन हुए । पुलिस के कुछ विशेष सदस्य मुझ से भी मिले । चारों ओर शहर में यही चर्चा थी कि रेलवे डकैती किसने कर ली ? उन्हीं दिनों शहर में डकैती के एक दो नोट निकल आये, अब तो पुलिस का अनुसंधान और भी बढ़ने लगा । कई मित्रों ने मुझसे कहा भी कि सतर्क रहो । दो एक सज्जनों ने निश्‍चितरूपेण समाचार दिया कि मेरी गिरफ्तारी जरूर हो जाएगी । मेरी समझ में कुछ न आया । मैंने विचार किया कि यदि गिरफ्तारी हो भी गई तो पुलिस को मेरे विरुद्ध कुछ भी प्रमाण न मिल सकेगा । अपनी बुद्धिमत्ता पर कुछ अधिक विश्‍वास था । अपनी बुद्धि के सामने दूसरों की बुद्धि को तुच्छ समझता था । कुछ यह भी विचार था कि देश की सहानुभूति की परीक्षा की जाए । जिस देश पर हम अपना बलिदान देने को उपस्थित हैं, उस देश के वासी हमारे साथ कितनी सहानुभूति रखते हैं ? कुछ जेल का अनुभव भी प्राप्‍त करना था । वास्तव में, मैं काम करते करते थक गया था । भविष्य के कार्यों में अधिक नर हत्या का ध्यान करके मैं हतबुद्धि सा हो गया था । मैंने किसी के कहने की कोई भी चिन्ता न की ।

रात्रि के समय ग्यारह बजे के लगभग एक मित्र के यहां से अपने घर पर गया । रास्ते में खुफिया पुलिस के सिपाहियों से भेंट हुई । कुछ विशेष रूप से उस समय भी वे देखभाल कर रहे थे । मैंने कोई चिन्ता न की और घर जाकर सो गया । प्रातःकाल चार बजने पर जगा, शौचादि से निवृत होने पर बाहर द्वार पर बन्दूक के कुन्दों का शब्द सुनाई दिया । मैं समझ गया कि पुलिस आ गई है । मैं तुरन्त ही द्वार खोलकर बाहर गया । एक पुलिस अफसर ने बढ़कर हाथ पकड़ लिया । मैं गिरफ्तार हो गया । मैं केवल एक अंगोछा पहने हुए था । पुलिस वाले को अधिक भय न था । पूछा यदि घर में कोई अस्‍त्र हो, तो दीजिए । मैंने कहा कोई आपत्तिजनक वस्तु घर में नहीं । उन्होंने बड़ी सज्जनता की । मेरे हथकड़ी आदि कुछ न डाली । मकान की तलाशी लेते समय एक पत्र मिल गया, जो मेरी जेब में था । कुछ होनहार कि तीन चार पत्र मैंने लिखे थे डाकखाने में डालने को भेजे, तब तक डाक निकल चुकी थी । मैंने वे सब इस ख्याल से अपने पास ही रख लिए कि डाक के बम्बे में डाल दूंगा । फिर विचार किया जैसे बम्बे में पड़े रहेंगे, वैसे जेब में पड़े हैं । मैं उन पत्रों को वापिस घर ले आया । उन्हीं में एक पत्र आपत्तिजनक था जो पुलिस के हाथ लग गया । गिरफ्तार होकर पुलिस कोतवाली पहुंचा । वहां पर खुफिया पुलिस के एक अफसर से भेंट हुई । उस समय उन्होंने कुछ ऐसी बातें की, जिन्हें मैं या एक व्यक्‍ति और जानता था । कोई तीसरा व्यक्‍ति इस प्रकार से ब्यौरेवार नहीं जान सकता था । मुझे बड़ा आश्‍चर्य हुआ । किन्तु सन्देह इस कारण न हो सका कि मैं दूसरे व्यक्‍ति के कार्यों में अपने शरीर के समान ही विश्‍वास रखता था । शाहजहांपुर में जिन-जिन व्यक्‍तियों की गिरफ्तारी हुई, वह भी बड़ी आश्‍चर्यजनक प्रतीत होती थी । जिन पर कोई सन्देह भी न था, पुलिस उन्हें कैसे जान गई ? दूसरे स्थानों पर क्या हुआ कुछ भी न मालूम हो सका । जेल पहुंच जाने पर मैं थोड़ा बहुत अनुमान कर सका, कि सम्भवतः दूसरे स्थानों में भी गिरफ्तारियां हुई होंगी । गिरफ्तारियों के समाचार सुनकर शहर के सभी मित्र भयभीत हो गए । किसी से इतना भी न हो सका कि जेल में हम लोगों के पास समाचार भेजने का प्रबन्ध कर देता !

जेल

जेल में पहुंचते ही खुफिया पुलिस वालों ने यह प्रबन्ध कराया कि हम सब एक दूसरे से अलग रखे जाएं, किन्तु फिर भी एक दूसरे से बातचीत हो जाती थी । यदि साधारण कैदियों के साथ रखते तब तो बातचीत का पूर्ण प्रबन्ध हो जाता, इस कारण से सबको अलग अलग तनहाई की कोठड़ियों में बन्द किया गया । यही प्रबन्ध दूसरे जिले की जेलों में भी, जहां जहां भी इस सम्बन्ध में गिरफ्तारियां हुई थी, किया गया था । अलग-अलग रखने से पुलिस को यह सुविधा होती है कि प्रत्येक से पृथक-पृथक मिलकर बातचीत करते हैं । कुछ भय दिखाते हैं, कुछ इधर-उधर की बातें करके भेद जानने का प्रयत्‍न करते हैं । अनुभवी लोग तो पुलिस वालों से मिलने से इन्कार ही कर देते हैं । क्योंकि उनसे मिलकर हानि के अतिरिक्‍त लाभ कुछ भी नहीं होता । कुछ व्यक्‍ति ऐसे होते हैं जो समाचर जानने के लिए कुछ बातचीत करते हैं । पुलिस वालों से मिलना ही क्या है । वे तो चालबाजी से बात निकालने की ही रोटी खाते हैं । उनका जीवन इसी प्रकार की बातों में व्यतीत होता है । नवयुवक दुनियादारी क्या जानें ? न वे इस प्रकार की बातें ही बना सकते हैं ।

जब किसी तरह कुछ समाचार ही न मिलते तब तो जी बहुत घबड़ाता । यही पता नहीं चलता कि पुलिस क्या कर रही है, भाग्य का क्या निर्णय होगा ? जितना समय व्यतीत होता जाता था उतनी ही चिन्ता बढ़ती जाती थी । जेल-अधिकारियों से मिलकर पुलिस यह भी प्रबन्ध करा देती है कि मुलाकात करने वालों से घर के सम्बन्ध में बातचीत करें, मुकदमे के सम्बन्ध में कोई बातचीत न करे । सुविधा के लिए सबसे प्रथम यह परमावश्यक है कि एक विश्‍वास-पात्र वकील किया जाए जो यथासमय आकर बातचीत कर सके । वकील के लिये किसी प्रकार की रुकावट नहीं हो सकती । वकील के साथ अभियुक्‍त की जो बातें होती हैं, उनको कोई दूसरा सुन नहीं सकता । क्योंकि इस प्रकार का कानून है, यह अनुभव बाद में हुआ । गिरफ्तारी के बाद शाहजहांपुर के वकीलों से मिलना भी चाहा, किन्तु शाहजहांपुर में ऐसे दब्बू वकील रहते हैं जो सरकार के विरुद्ध मुकदमें में सहायता देने में हिचकते हैं ।

मुझ से खुफिया पुलिस के कप्‍तान साहब मिले । थोड़ी सी बातें करके अपनी इच्छा प्रकट की कि मुझे सरकारी गवाह बनाना चाहते हैं । थोड़े दिनों में एक मित्र ने भयभीत होकर कि कहीं वह भी न पकड़ा जाए, बनारसीलाल से भेंट की और समझा बुझा कर उसे सरकारी गवाह बना दिया । बनारसीलाल बहुत घबराता था कि कौन सहायता देगा, सजा जरूर हो जायेगी । यदि किसी वकील से मिल लिया होता तो उसका धैर्य न टूटता । पं० हरकरननाथ शाहजहांपुर आए, जिस समय वह अभियुक्‍त श्रीयुत प्रेमकृष्ण खन्ना से मिले, उस समय अभियुक्‍त ने पं० हरकरननाथ से बहुत कुछ कहा कि मुझ से तथा दूसरे अभियुक्‍तों से मिल लें । यदि वह कहा मान जाते और मिल लेते तो बनारसीदास को साहस हो जाता और वह डटा रहता । उसी रात्रि को पहले एक इंस्पेक्टर बनारसीलाल से मिले । फिर जब मैं सो गया तब बनारसीलाल को निकाल कर ले गए । प्रातःकाल पांच बजे के करीब जब बनारसीलाल को पुकारा । पहरे पर जो कैदी था, उससे मालूम हुआ, बनारसीलाल बयान दे चुके । बनारसीलाल के सम्बन्ध में सब मित्रों ने कहा था कि इससे अवश्य धोखा होगा, पर मेरी बुद्धि में कुछ न समाया था । प्रत्येक जानकार ने बनारसीलाल के सम्बन्ध में यही भविष्यवाणी की थी कि वह आपत्ति पड़ने पर अटल न रह सकेगा । इस कारण सब ने उसे किसी प्रकार के गुप्‍त कार्य में लेने की मनाही की थी । अब तो जो होना था सो हो ही गया ।


थोड़े दिनों बाद जिला कलक्टर मिले । कहने लगे फांसी हो जाएगी । बचना हो तो बयान दे दो । मैंने कुछ उत्तर न दिया । तत्पश्‍चात् खुफिया पुलिस के कप्‍तान साहिब मिले, बहुत सी बातें की । कई कागज दिखलाए । मैंने कुछ कुछ अन्दाजा लगाया कि कितनी दूर तक ये लोग पहुंच गये हैं । मैंने कुछ बातें बनाई, ताकि पुलिस का ध्यान दूरी की ओर चला जाये, परन्तु उन्हें तो विश्‍वसनीय सूत्र हाथ लग चुका था, वे बनावटी बातों पर क्यों विश्‍वास करते ? अन्त में उन्होंने अपनी यह इच्छा प्रकट की कि यदि मैं बंगाल का सम्बन्ध बताकर कुछ बोलशेविक सम्बंध के विषय में अपना बयान दे दूं, तो वे मुझे थोड़ी सी सजा करा देंगे, और सजा के थोड़े दिनों बाद ही जेल से निकालकर इंग्लैंड भेज देंगे और पन्द्रह हजार रुपये पारितोषिक भी सरकार से दिला देंगे । मैं मन ही मन में बहुत हंसता था । अन्त में एक दिन फिर मुझ से जेल में मिलने को गुप्‍तचर विभाग के कप्‍तान साहब आये । मैंने अपनी कोठरी में से निकलने से ही इन्कार कर दिया । वह कोठरी पर आकर बहुत सी बातें करते रहे, अन्त में परेशान होकर चले गए ।

शिनाख्तें कराई गईं । पुलिस को जितने आदमी मिल सके उतने आदमी लेकर शिनाख्त कराई । भाग्यवश श्री अईनुद्दीन साहब मुकदमे के मजिस्ट्रेट मुकर्रर हुए, उन्होंने जी भर के पुलिस की मदद की । शिनाख्तों में अभियुक्‍तों को साधारण मजिस्ट्रेटों की भांति भी सुविधाएं न दीं । दिखाने के लिए कागजी कार्रवाई खूब साफ रखी । जबान के बड़े मीठे थे । प्रत्येक अभियुक्‍त से बड़े तपाक से मिलते थे । बड़ी मीठी मीठी बातें करते थे । सब समझते थे कि हमसे सहानुभूति रखते हैं । कोई न समझ सका कि अन्दर ही अन्दर घाव कर रहे हैं । इतना चालाक अफसर शायद ही कोई दूसरा हो । जब तक मुकदमा उनकी अदालत में रहा, किसी को कोई शिकायत का मौका ही न दिया । यदि कभी कोई बात हो भी जाती तो ऐसे ढंग से उसे टालने की कौशिश करते कि किसी को बुरा ही न लगता । बहुधा ऐसा भी हुआ कि खुली अदालत में अभियुक्‍तों से क्षमा तक मांगने में संकोच न किया । किन्तु कागजी कार्यवाही में इतने होशियार थे कि जो कुछ लिखा सदैव अभियुक्‍तों के विरुद्ध ! जब मामला सेशन सुपुर्द किया और आज्ञापत्र में युक्‍तियां दी, तब सब की आंखें खुलीं कि कितना गहरा घाव मार दिया ।

मुकदमा अदालत में न आया था, उसी समय रायबरेली में बनवारी लाल की गिरफ्तारी हुई, मुझे हाल मालूम हुआ । मैंने पं० हरकरननाथ से कहा कि सब काम छोड़कर सीधे रायबरेली जाएं और बनारसीलाल से मिलें, किन्तु उन्होंने मेरी बातों पर कुछ भी ध्यान न दिया । मुझे बनारसीलाल पर पहले ही संदेह था, क्योंकि उसका रहन सहन इस प्रकार का था कि जो ठीक न था । जब दूसरे सदस्यों के साथ रहता तब उनसे कहा करता कि मैं जिला संगठनकर्ता हूं । मेरी गणना अधिकारियों में है । मेरी आज्ञा पालन किया करो । मेरे झूठे बर्तन मला करो । कुछ विलासिता-प्रिय भी था, प्रत्येक समय शीशा, कंघा तथा साबुन साथ रखता था । मुझे इससे भय भी था, किन्तु हमारे दल के एक खास आदमी का वह विश्‍वासपात्र रह चुका था । उन्होंने सैंकड़ों रुपये देकर उसकी सहायता की थी । इसी कारण हम लोग भी अन्त तक उसे मासिक सहायता देते रहे थे । मैंने बहुत कुछ हाथ-पैर मारे । पर कुछ भी न चली, और जिसका मुझे भय था, वही हुआ । भाड़े का टट्टू अधिक बोझ न सम्भाल सका, उसने बयान दे दिये । जब तक यह गिरफ्तार न हुआ था कुछ सदस्यों ने इसके पास जो अस्‍त्र थे वे मांगे, पर उसने न दिये । जिला अफसर की शान में रहा । गिरफ्तार होते ही सब शान मिट्टी में मिल गई । बनवारीलाल के बयान दे देने से पुलिस का मुकदमा बहुत कमजोर था । सब लोग चारों ओर से एकत्रित करके लखनऊ जिला जेल में रखे गए । थोड़े समय तक अलग अलग रहे, किन्तु अदालत में मुकदमा आने से पहले ही एकत्रित कर दिए गए ।

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मुकदमे में रुपये की जरूरत थी । अभियुक्‍तों के पास क्या था ? उनके लिए धन-संग्रह करना दुष्‍कर था । न जाने किस प्रकार निर्वाह करते थे । अधिकतर अभियुक्‍तों का कोई सम्बन्धी पैरवी भी न कर सकता था । जिस किसी के कोई था भी, वह बाल बच्चों तथा घर को सम्भालता या इतने समय तक घर-बार छोड़कर मुकदमा करता ? यदि चार अच्छे पैरवी करने वाले होते तो पुलिस का तीन-चौथाई मुकदमा टूट जाता । लखनऊ जैसे जनाने शहर में मुकदमा हुआ, जहां अदालत में कोई भी शहर का आदमी न आता था ! इतना भी तो न हुआ कि एक अच्छा प्रेस-रिपोर्टर ही रहता, जो मुकदमे की सारी कार्यवाही को, जो कुछ अदालत में होता था, प्रेस में भेजता रहता ! इण्डियन डेली टेलीग्राफ वालों ने कृपा की । यदि कोई अच्छा रिपोर्टर आ भी गया, और जो कुछ अदालत की कार्यवाही ठीक ठीक प्रकाशित की गई तो पुलिस वालों ने जज साहब से मिलकर तुरन्त उस रिपोर्टर को निकलवा दिया ! जनता की कोई सहानुभूति न थी । जो पुलिस के जी में आया, करती रही । इन सारी बातों को देखकर जज का साहस बढ़ गया । उसने जैसा जी चाहा सब कुछ किया । अभियुक्‍त चिल्लाये - 'हाय! हाय!' पर कुछ भी सुनवाई न हुई ! और बातें तो दूर, श्रीयुत दामोदरस्वरूप सेठ को पुलिस ने जेल में सड़ा डाला । लगभग एक वर्ष तक वे जेल में तड़फते रहे । सौ पौंड से केवल छियासठ पौंड वजन रह गया । कई बार जेल में मरणासन्न हो गए । नित्य बेहोशी आ जाती थी । लगभग दस मास तक कुछ भी भोजन न कर सके । जो कुछ छटांक दो छटांक दूध किसी प्रकार पेट में पहुंच जाता था, उससे इस प्रकार की विकट वेदना होती थी कि कोई उनके पास खड़ा होकर उस छटपटाने के दृश्य को देख न सकता था । एक मैडिकल बोर्ड बनाया गया, जिसमें तीन डाक्टर थे । उनकी कुछ समझ में न आया, तो कह दिया गया कि सेठजी को कोई बीमारी ही नहीं है ! जब से काकोरी षड्यंत्र के अभियुक्‍त जेल में एक साथ रहने लगे, तभी से उनमें एक अद्‍भुत परिवर्तन का समावेश हुआ, जिसका अवलोकन कर मेरे आश्‍चर्य की सीमा न रही । जेल में सबसे बड़ी बात तो यह थी कि प्रत्येक आदमी अपनी नेतागिरी की दुहाई देता था । कोई भी बड़े-छोटे का भेद न रहा । बड़े तथा अनुभवी पुरुषों की बातों की अवहेलना होने लगी । अनुशासन का नाम भी न रहा । बहुधा उल्टे जवाब मिलने लगे । छोटी-छोटी बातों पर मतभेद हो जाता । इस प्रकार का मतभेद कभी कभी वैमनस्य तक का रूप धारण कर लेता । आपस में झगड़ा भी हो जाता । खैर ! जहां चार बर्तन रहते हैं, वहां खटकते ही हैं । ये लोग तो मनुष्य देहधारी थे । परन्तु लीडरी की धुन ने पार्टीबन्दी का ख्याल पैदा कर दिया । जो युवक जेल के बाहर अपने से बड़ों की आज्ञा को वेद-वाक्य के समान मानते थे, वे ही उन लोगों का तिरस्कार तक करने लगे ! इसी प्रकार आपस का वाद-विवाद कभी-कभी भयंकर रूप धारण कर लिया करता । प्रान्तीय प्रश्‍न छिड़ जाता । बंगाली तथा संयुक्‍त प्रान्त वासियों के कार्य की आलोचना होने लगती । इसमें कोई सन्देह नहीं कि बंगाल ने क्रान्तिकारी आन्दोलन में दूसरे प्रान्तों से अधिक कार्य किया है, किन्तु बंगालियों की हालत यह है कि जिस किसी कार्यालय या दफ्तर में एक भी बंगाली पहुंच जाएगा, थोड़े ही दिनों में उस कार्यालय या दफ्तर में बंगाली ही बंगाली दिखाई देंगे ! जिस शहर में बंगाली रहते हैं उनकी बस्ती अलग ही बसती है । बोली भी अलग । खानपान भी अलग । जेल में यही सब अनुभव हुआ ।

जिन महानुभावों को मैं त्याग की मूर्ति समझता था, उनके अन्दर भी बंगालीपने का भाव देखा । मैंने जेल से बाहर कभी स्वप्‍न में भी यह विचार न किया था कि क्रान्तिकारी दल के सदस्यों में भी प्रान्तीयता के भावों का समावेश होगा । मैं तो यही समझता रहा कि क्रान्तिकारी तो समस्त भारतवर्ष को स्वतन्त्र कराने का प्रयत्‍न कर रहे हैं, उनका किसी प्रान्त विशेष से क्या सम्बन्ध ? परन्तु साक्षात् देख लिया कि प्रत्येक बंगाली के दिमाग में कविवर रवीन्द्रनाथ का गीत 'आमर सोनार बांगला आमि तोमाके भालोवासी' (मेरे सोने के बंगाल, मैं तुझसे मुहब्बत करता हूँ) ठूंस-ठूंस कर भरा था, जिसका उनके नैमित्तिक जीवन में पग-पग पर प्रकाश होता था । अनेक प्रयत्‍न करने पर भी जेल के बाहर इस प्रकार का अनुभव कदापि न प्राप्‍त हो सकता था ।

बड़ी भयंकर से भयंकर आपत्ति में भी मेरे मुख से आह न निकली, प्रिय सहोदर का देहान्त होने पर भी आंख से आंसू न गिरा, किन्तु इस दल के कुछ व्यक्‍ति ऐसे थे, जिनकी आज्ञा को मैं संसार में सब से श्रेष्‍ठ मानता था जिनकी जरा सी कड़ी दृष्‍टि भी मैं सहन न कर सकता था, जिनके कटु वचनों के कारण मेरे हृदय पर चोट लगती थी और अश्रुओं का स्रोत उबल पड़ता था । मेरी इस अवस्था को देखकर दो चार मित्रों को जो मेरी प्रकृति को जानते थे, बड़ा आश्‍चर्य होता था । लिखते हुए हृदय कम्पित होता है कि उन्हीं सज्जनों में बंगाली तथा अबंगाली का भाव इस प्रकार भरा था कि बंगालियों की बड़ी से बड़ी भूल, हठधर्मी तथा भीरुता की अवहेलना की गई । यह देखकर अन्य पुरुषों का साहस बढ़ता था, नित्य नई चालें चली जाती थीं । आपस में ही एक दूसरे के विरुद्ध षड्यंत्र रचे जाते थे ! बंगालियों का न्याय-अन्याय सब सहन कर लिया जाता था । इन सारी बातों ने मेरे हृदय को टूक टूक कर डाला । सब कृत्यों को देख मैं मन ही मन घुटा करता ।

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एक बार विचार हुआ कि सरकार से समझौता कर लिया जाए । बैरिस्टर साहब ने खुफिया पुलिस के कप्‍तान से परामर्श आरम्भ किया । किन्तु यह सोचकर कि इससे क्रान्तिकारी दल की निष्‍ठा न मिट जाए, यह विचार छोड़ दिया गया । युवकवृन्द की सम्मति हुई कि अनशन व्रत करके सरकार से हवालाती की हालत में ही मांगें पूरी करा ली जाएं क्योंकि लम्बी-लम्बी सजाएं होंगी । संयुक्‍त प्रान्त की जेलों में साधारण कैदियों का भोजन खाते हुए सजा काटकर जेल से जिन्दा निकलना कोई सरल कार्य नहीं । जितने राजनैतिक कैदी षड्यन्त्रों के सम्बन्ध में सजा पाकर इस प्रान्त की जेलों में रखे गए, उनमें से पांच-छः महात्माओं ने इस प्रान्त की जेलों के व्यवहार के कारण ही जेलों में प्राण त्याग दिये !

इस विचार के अनुसार काकोरी के लगभग सब हवालातियों ने अनशन व्रत आरम्भ कर दिया । दूसरे ही दिन सब पृथक कर दिये गए । कुछ व्यक्‍ति डिस्ट्रिक्ट जेल में रखे गए, कुछ सेण्ट्रल जेल भेजे गए । अनशन करते पन्द्रह दिवस बीत गए, तब सरकार के कान पर भी जूं रेंगी । उधर सरकार का काफी नुकसान हो रहा था । जज साहब तथा दूसरे कचहरी के कार्यकर्त्ताओं को घर बैठे वेतन देना पड़ता था । सरकार को स्वयं चिन्ता थी कि किसी प्रकार अनशन छूटे । जेल अधिकारियों ने पहले आठ आने रोज तय किये । मैंने उस समझौते को अस्वीकार कर दिया और बड़ी कठिनता से दस आने रोज पर ले आया । उस अनशन व्रत में पन्द्रह दिवस तक मैंने जल पीकर निर्वाह किया था । सोलहवें दिन नाक से दूध पिलाया गया था । श्रीयुत रोशनसिंह जी ने भी इसी प्रकार मेरा साथ दिया था । वे पन्द्रह दिन तक बराबर चलते-फिरते रहे थे । स्नानादि करके अपने नैमित्तिक कर्म भी कर लिया करते थे । दस दिन तक मेरे मुख को देखकर अनजान पुरुष यह अनुमान भी नहीं कर सकता था कि मैं अन्न नहीं खाता ।

समझौते के जिन खुफिया पुलिस के अधिकारियों से मुख्य नेता महोदय का वार्तालाप बहुधा एकान्त में हुआ करता था, समझौते की बात खत्म होने जाने पर भी आप उन लोगों से मिलते रहे ! मैंने कुछ विशेष ध्यान न दिया । यदा कदा दो एक बात से पता चलता कि समझौते के अतिरिक्त कुछ दूसरी बातें भी होती हैं । मैंने इच्छा प्रकट की कि मैं भी एक समय सी० आई० डी० के कप्‍तान से मिलूं, क्योंकि मुझसे पुलिस बहुत असन्तुष्‍ट थी । मुझे पुलिस से न मिलने दिया गया । परिणामस्वरूप सी० आई० डी० वाले मेरे दुश्‍मन हो गए । सब मेरे व्यवहार की ही शिकायत किया करते । पुलिस अधिकारियों से बातचीत करके मुख्य नेता महोदय को कुछ आशा बंध गई । आपका जेल से निकलने का उत्साह जाता रहा । जेल से निकलने के उद्योग में जो उत्साह था, वह बहुत ढ़ीला हो गया । नवयुवकों की श्रद्धा को मुझ से हटाने के लिए अनेकों प्रकार की बातें की जाने लगीं । मुख्य नेता महोदय ने स्वयं कुछ कार्यकर्ताओं से मेरे सम्बन्ध में कहा कि ये कुछ रुपये खा गए । मैंने एक एक पैसे का हिसाब रखा था । जैसे ही मैंने इस प्रकार की बातें सुनीं, मैंने कार्यकारिणी के सदस्यों के सामने रखकर हिसाब देना चाहा, और अपने विरुद्ध आक्षेप करने वाले को दण्ड देने का प्रस्ताव उपस्थित किया । अब तो बंगालियों का साहस न हुआ कि मुझ से हिसाब समझें । मेरे आचरण पर भी आक्षेप किये गए ।

जिस दिन सफाई की बहस मैंने समाप्‍त की, सरकारी वकील ने उठकर मुक्‍त कण्ठ से मेरी बहस की प्रशंसा की कि आपने सैंकड़ों वकीलों से अच्छी बहस की । मैंने नमस्कार कर उत्तर दिया कि आपके चरणों की कृपा है, क्योंकि इस मुकदमे के पहले मैंने किसी अदालत में समय न व्यतीत किया था, सरकारी तथा सफाई के वकीलों की जिरह सुन कर मैंने भी साहस किया था । इसके बाद जब से पहले मुख्य नेता महाशय के विषय में सरकारी वकील ने बहस करनी शुरू की । खूब ही आड़े हाथों लिया तो मुख्य नेता महाशय का बुरा हाल था, क्योंकि उन्हें आशा थी कि सम्भव है सबूत की कमी से वे छूट जाएं या अधिक से अधिक पांच या दस वर्ष की सजा हो जाए । आखिर चैन न पड़ी । सी० आई० डी० अफसरों को बुला कर जेल में उनसे एकान्त में डेढ़ घण्टे तक बातें हुई । युवक मण्डल को इसका पता चला । सब मिलकर मेरे पास आये । कहने लगे, इस समय सी० आई० डी० अफसर से क्यों मुलाकात की जा रही है ? मेरी जिज्ञासा पर उत्तर मिला कि सजा होने के बाद जेल में क्या व्यवहार होगा, इस सम्बन्ध में बातचीत कर रहे हैं । मुझे सन्तोष न हुआ । दो या तीन दिन बाद मुख्य नेता महाशय एकान्त में बैठ कर कई घंटे तक कुछ लिखते रहे । लिखकर कागज जेब में रख भोजन करने गए । मेरी अन्तरात्मा ने कहा, ' उठ, देख तो क्या हो रहा है?' मैंने जेब से कागज निकाल कर पढ़े । पढ़कर शोक तथा आश्‍चर्य की सीमा न रही । पुलिस द्वारा सरकार को क्षमा-प्रार्थना भेजी जा रही थी । भविष्य के लिए किसी प्रकार के हिंसात्मक आन्दोलन या कार्य में भाग न लेने की प्रतिज्ञा की गई थी । Undertaking दी गई थी । मैंने मुख्य कार्यकर्त्ताओं से सब विवरण कह कर इस सब का कारण पूछा कि क्या हम लोग इस योग्य भी नहीं रहे, जो हमसे किसी प्रकार का परामर्श किया जाए ? तब उत्तर मिला कि व्यक्‍तिगत बात थी । मैंने बड़े जोर के साथ विरोध किया कि यह कदापि व्यक्‍तिगत बात नहीं हो सकती । खूब फटकार बतलाई । मेरी बातों को सुन चारों ओर खलबली मची । मुझे बड़ा क्रोध आया कि कितनी धूर्त्तता से काम लिया गया । मुझे चारों ओर से चढ़ाकर लड़ने के लिए प्रस्तुत किया गया । मेरे विरुद्ध षड्यंत्र रचे गए । मेरे ऊपर अनुचित आक्षेप किए गए, नवयुवकों के जीवन का भार लेकर लीडरी की शान झाड़ी गई और थोड़ी सी आपत्ति पड़ने पर इस प्रकार बीस-बीस वर्ष के युवकों को बड़ी-बड़ी सजाएं दिला, जेल में सड़ने को डाल कर स्वयं बंधेज से निकल जाने का प्रयत्‍न किया गया । धिक्कार है ऐसे जीवन को ! किन्तु सोच-समझ कर चुप रहा ।

क्रमशः 

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क्रांतिदूत: रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा - भाग 7
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा - भाग 7
रामप्रसाद बिस्मिल, आत्मकथा
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