“मनु स्मृति”- प्रथम अध्याय (सृष्टि उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय) भाग – 7

गतांक से आगे .... ब्रह्म के दिन रात का वर्णन – ब्राह्मस्य तु क्षपाहस्य यत्प्रमाणं समासतः । एकैकशो युगानां तु क्रमशस्तन्निबोधत ||६८||(...

गतांक से आगे ....
ब्रह्म के दिन रात का वर्णन –

ब्राह्मस्य तु क्षपाहस्य यत्प्रमाणं समासतः ।
एकैकशो युगानां तु क्रमशस्तन्निबोधत ||६८||(३७)

अर्थात - (मनु महर्षियों से कहते हैं कि) (ब्राह्मस्य तु क्षपा – अहस्य) परमात्मा के दिन – रात का तु तथा एकैकशः युगानाम् एक – एक युगों का यत् प्रमाणम् जो कालपरिमाण है तत् उसे क्रमशः क्रमानुसार और समासतः संक्षेप से निबोधत सुनो ।

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अनुशीलन – 

ब्रह्मदिन व ब्रह्मरात्री का विशेष परिमाण (१|७२) में दृष्टव्य है ! 

सतयुग का परिमाण –

चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्साणां तत्कृतं युगम् । 
तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः ||६९||(३८)
अर्थात - तत् चत्वारि सहस्त्राणि वर्षाणां कृतं युगम् आहुः उन देवताओं ६७ वें में जिनके दिन – रातों का वर्णन है के चार हजार दिव्य वर्षों का एक ‘सतयुग’ कहा है (तस्य) इस सतयुग की यावत् शती सन्ध्या उतने ही सौ वर्ष की अर्थात् ४०० वर्ष की संध्या होती है और तथाविधः उतने ही वर्षों का अर्थात् संध्यांशः संध्याशं का समय होता है ।

अनुशीलन –

चार गुणों का परिमाण –

किसी भी युग के पूर्व संधि काल को ‘संध्या’ और उत्तर संधि काल को ‘सध्यांश’ कहा जाता है | श्लोक के अनुसार सतयुग का काल परिमाण – ४०००+४०० (संध्यावर्ष) + ४०० (संध्यांश वर्ष) = ४८०० दिव्या वर्ष बनता है | इसे मानुष वर्षों में बदलने के लिए ३६० से गुना करना पड़ेगा | इस प्रकार ४८००+३६०= १७२८००० मानुष वर्षों का एक सतयुग होता है |

त्रेता, द्वापर तथा कलयुग का परिमाण –

इतरेषु ससंध्येषु ससंध्यांशेषु च त्रिषु । 
एकापायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानि च ||७०||(३९)
अर्थात - च और इतरेषु त्रिषु शेष अन्य तीन – त्रेता, द्वापर, कलियुगों में ससंध्येषु संसध्यांशेषु ‘संध्या’ नामक कालों में तथा ‘संध्यांश’ नामक कालों में सहस्त्राणि च शतानि एक – अपायेन क्रमशः एक हजार और एक – एक सौ घटा देने से वर्तन्ते उनका अपना – अपना कालपरिमाण निकल आता है अर्थात् ४८०० दिव्यवर्षों का सतयुग होता है, उसकी संख्याओं मं एक सहस्त्र और संध्या व संध्यांश में एक – एक सौ घटाने से ३००० दिव्यवर्ष + ३०० संध्यावर्ष + ३०० संध्यांशवर्ष – ३६०० दिव्यवर्षों का त्रेतायुग होता है । इसी प्रकार – २०००+२००+२००- २४०० दिव्यवर्षों का द्वापर और १०००+१००+१०० – १२०० दिव्यवर्षों का कलियुग होता है ।

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देवयुग का परिमाण –

यदेतत्परिसंख्यातं आदावेव चतुर्युगम् । 
एतद्द्वादशसाहस्रं देवानां युगं उच्यते ||७१||(४०)
अर्थात - यद् एतत् जो यह आदौ पहले (६९-७० में) चतुर्युगम् चारों युगों को परिसंख्यातम् कालपरिमाण के रूप में गिनाया है एतद् यह द्वादश- साहस्त्रम् बारह हजार दिव्य वर्षों का काल मनुष्यों का एक चतुर्युगी का काल देवानाम् देवताओं का युगम् एक युग उच्यते कहा जाता है ।

स्पष्टीकरण – १२००० दिव्य वर्षों की एक चतुर्युगी होती है । उसे मानुष वर्षों में बदलने के लिए ३६० से गुणा करने पर १२००० × ३६० त्र ४३,२०,००० मानुष वर्षों की एक चतुर्युगी होती है । दोनों श्लोकों के कालपरिमाण को तालिका के रूप में इस प्रकार रखा जा सकता है –

ब्रह्म के दिन – रात का परिमाण –

दैविकानां युगानां तु सहस्रं परिसंख्यया ।
ब्राह्मं एकं अहर्ज्ञेयं तावतीं रात्रिं एव च ||७२||(४१)

अर्थात - दैविकानां युगानाम् तु देवयुगों को सहस्त्रं परिसंख्यया हजार से गुणा करने पर जो कालपरिमाण निकलता है , जैसे – चार मानुषयुगों के दिव्यवर्ष १२००० होते हैं उनको हजार से गुणा करने पर १,२०,००,००० दिव्यवर्षों का (ब्राह्मम्) परमात्मा का (एकं अहः) एक दिन (च) और तावतीं रात्रिम् उतने ही दिव्यवर्षों की उसकी एक रात ज्ञेयम् समझनी चाहिए ।

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अनुशीलन –

१२०००*१०००=१२०००००० दिव्य वर्षों का ब्रह्म का एक इन अथवा रात्री हुई | यह १२००००००*३६०=४३२००००००० मानुष वर्षों का काल परिमाण बनता है |चार अरब बत्तीस करोड़ मानुष वर्षों का सृष्टय उत्पत्ति काल है, जो परमात्मा कि जागृत अवस्था (सृष्टि में प्रवृत रहना) का दिन है | इतना ही काल सुषुप्ति अवस्था (सृष्टि कार्यों से निवृत होकर प्रलय रखना) का रात्री काल है ( यही १|५२-५७ श्लोकों में आलंकारिक रूप से वर्णित है) |

तद्वै युगसहस्रान्तं ब्राह्मं पुण्यं अहर्विदुः ।
रात्रिं च तावतीं एव तेऽहोरात्रविदो जनाः ||७३||(४२)

अर्थात - जो लोग तत् युगसहस्त्रान्तं ब्राह्म पुण्यम् अहः उस एक हजार दिव्य युगों के परमात्मा के पवित्र दिन को च और तावतीं एव रात्रिम् उतने ही युगों की परमात्मा की रात्रि को विदुः समझते हैं ते वे ही वै अहोरात्रविदः जनाः वास्तव में दिन – रात – सृष्टि – प्रलय के काल के वेत्ता लोग हैं ।

अनुशीलन –

वेदोत्पत्ति समय पर विचार –

महर्षिदयानन्द ने ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में १।६८ से ७३ श्लोकों को उद्धृत करके उनका भाव निम्न प्रकार प्रस्तुत किया है –

प्रश्न – वेदों की उत्पत्ति में कितने वर्ष हो गये हैं ?

उत्तर – एक वृन्द्र, छानवे करोड़ , आठ लाख, बावन हजार, नव सौ, छहत्तर अर्थात् १,९६,०८,५२,९७६ वर्ष वेदों की और जगत् की उत्पत्ति में हो गये हैं और यह संवत् ७७ सतहत्तरवां वत्र्त रहा है ।

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प्रश्न – यह कैसे निश्चय होय कि इतने ही वर्ष वेद और जगत् की उत्पत्ति में बीत गये हैं ?

उत्तर – यह जो वर्तमान सृष्टि है इसमें सातवें (७) वैवस्वत मनु का वत्र्तमान है । इससे पूर्व छः मन्वन्तर हो चुके हैं – स्वायंभुव १, स्वारोचिष २, औत्तमि ३, तामस ४, चाक्षुष ६, ये छः तो बीत गये हैं और ७ (सातवां) वैवस्वत वत्र्त रहा है और सावर्णि आदि ७ (सात) मन्वतर आगे भोगेगें । ये सब मिलके १४ (चैदह) मन्वन्तर होते हैं और एकहत्तर चतुर्युगियों का नाम मन्वन्तर धरा गया है, सो उस की गणना इस प्रकार से है कि (१७२८०००) सत्रह लाख अठाईस हजार वर्षों का सतयुग रक्खा है; (१२९६०००) बारह लाख, छानवे हजार वर्षों का नाम त्रेता;(८६४०००) आठ लाख चैंसठ हजार वर्षों का नाम द्वापर और (४३२०००) चार लाख, बत्तीस हजार वर्षों का नाम कलियुग रक्खा है तथा आर्यों ने एक क्षण और निमेष से लेके एक वर्ष पर्यन्त भी काल की सूक्ष्म और स्थूल संज्ञा बांधी है और इन चारों युगों के (४३२००००) तितालीसलाख, बीस हजार वर्ष होते हैं , जिनका चतुर्युगी नाम है ।

एकहत्तर (७१) चतुर्युगियों के अर्थात् (३०६७२००००) तीस करोड़, सरसठ लाख, बीस हजार वर्षों की एक मन्वन्तर संज्ञा की है और ऐसे – ऐसे छः मन्वन्तर मिलकर अर्थात् (१८४०३२००००) एक अर्ब, चैरासी करोड़, तीन लाख, बीस हजार वर्ष हुए और सातवें मन्वन्तर के भोग में यह (२८) अठाईसवीं चतुर्युगी है । इस चतुर्युगी में कलियुग के (४९७६) चार हजार, नौ सौ छहत्तर वर्षों का तो भोग हो चुका है और बाकी (४२७०२४) चार लाख, सत्ताईस हजार चौबीस वर्षों का भोग होने वाला है । जानना चाहिए कि (१२०५३२९७६) बारह करोड़, पांच लाख, बत्तीस हजार, नव सौ छहत्तर वर्ष तो वैवस्वत मनु के भोग हो चुके हैं और (१८६१८७०२४) अठारह करोड़, एकसठ लाख, सत्तासी हजार, चौबीस वर्ष भोगने के बाकी रहे हैं । इनमें से यह वर्तमान वर्ष (७७) सतहत्तरवाँ है जिसको आर्यलोग विक्रम का (१९३३) उन्नीस सौ तेतीसवां संवत् कहते हैं ।

जो पूर्व चतुर्युगी लिख आये हैं उन एक हजार चतुर्युगियों की ब्राह्मदिन संज्ञा रखी है और उतनी ही चतुर्युगियों की रात्रि संज्ञा जाननी चाहिए । सो सृष्टि की उत्पत्ति करके हजार चतुर्युगी पर्यन्त ईश्वर इस को बना रखता है, इसी का नाम ब्राह्मदिन रक्खा है, और हजार चतुर्युगी पर्यन्त सृष्टि को मिटाके प्रलय अर्थात् कारण में लीन रखता है , उस का नाम ब्राह्मरात्रि रक्खा है अर्थात् सृष्टि के वर्तमान होने का नाम दिन और प्रलय होने का नाम रात्रि है । यह जो वर्तमान ब्राह्मदिन है, इसके (१,९६,०८,५२,९७६) एक अर्ब, छानवे करोड़, आठ लाख, बावन हजार, नव सौ छहत्तर वर्ष इस सृष्टि की तथा वेदों की उत्पत्ति में भी व्यतीत हुए हैं और (२३३३२२७०२४) दो अर्ब, तेतीस करोड़, बत्तीस लाख , सत्ताईस हजार चौबीस वर्ष इस सृष्टि को भोग करने के बाकी रहे हैं । इनमें से अन्त का यह चौबीसवां वर्ष भोग रहा है । आगे आने वाले भोग के वर्षों में से एक – एक घटाते जाना और गत वर्षों में क्रम से एक – एक वर्ष मिलाते जाना चाहिये । जैसे आज पर्यन्त घटाते बढ़ाते आये हैं ।

(ऋ० भू० वेदात्पत्ति विषय पृष्ठ क्र.२३-२४)

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सुप्तावस्था से जागने पर सृष्टि उत्पत्ति का प्रारम्भ –

तस्य सोऽहर्निशस्यान्ते प्रसुप्तः प्रतिबुध्यते । प्रतिबुद्धश्च सृजति मनः सदसदात्मकम् ||७४||(४३)

अर्थात - प्रसुप्तः सः वह प्रलय – अवस्था में सोया हुआ – सा (१।५२-५७) परमात्मा तस्य अहर्निशस्य अन्ते उस (१।६८-७२) दिन – रात के बाद (प्रति बुध्यते) जागता है – सृष्टयु त्पत्ति में प्रवृत्त होता है (च) और प्रतिबुद्धः जागकर (सद् – असद् – आत्मकम्) जो कारणरूप में विद्यमान रहे और जो विकारी अंश से कार्यरूप में अविद्यमान रहे, ऐसे स्वभाव वाले (मनः) ‘महत्’ नामक प्रकृति के आद्यकार्यतत्त्व की सृजति सृष्टि करता है ।

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सूक्ष्म पञ्चभूतों की उत्पत्ति के क्रम में आकाश की उत्पत्ति-

मनः सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानं सिसृक्षया । आकाशं जायते तस्मात्तस्य शब्दं गुणं विदुः||७५||(४४)

अर्थात - सिसृक्षया सृष्टि को रचने की इच्छा से फिर वह परमात्मा मनः सृष्टिं विकुरूते महत्तत्त्व की सृष्टि को विकारी भाव में लाता है – अहंकार के रूप में विकृत करता है तस्मात् उस विकारी अंश से चोद्यमानं आकाशं जायते प्रेरित हुआ – हुआ ‘आकाश’ उत्पन्न होता है तस्य उस आकाश का गुणं शब्दं विदुः गुण ‘शब्द’ को मानते हैं ।

अनुशीलन –

आकाशोत्पत्ति के विषय में महर्षिदयानन्द लिखते हैं –

‘‘उस परमेश्वर और प्रकृति से आकाश अवकाश अर्थात् जो कारणरूप द्रव्य सर्वत्र फैल रहा है, उसको इकट्ठा करने से अवकाश उत्पनन सा होता है । वास्तव में आकाश की उत्पत्ति नहीं होती । क्यों कि बिना आकाश के प्रकृति और परमाणु कहां ठहर सकें ?’’
(स० प्र० अष्टमसमु०)

वायु की उत्पत्ति –

आकाशात्तु विकुर्वाणात्सर्वगन्धवहः शुचिः ।
बलवाञ् जायते वायुः स वै स्पर्शगुणो मतः||७६||(४५)

अर्थात - आकाशात् तु विकुर्वाणात् उस आकाश के विकारोत्पादक अंश से सर्वगन्धवहः सब गन्धों को वहन करने वाला शुचिः शुद्ध और बलवान् शक्तिशाली वायुः ‘वायु’ जायते उत्पन्न होता है सः वै वह वायु निश्चय से स्पर्शगुणः स्पर्श गुण वाला मतः माना गया है ।

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अग्नि की उत्पत्ति-

वायोरपि विकुर्वाणाद्विरोचिष्णु तमोनुदम् ।
ज्योतिरुत्पद्यते भास्वत्तद्रूपगुणं उच्यते||७७||(४६)

अर्थात - वायोः अपि उस वायु के भी विकुर्वाणात् विकारोत्पादक अंश से विरोचिष्णुः उज्जवल तमोनुदम् अन्धकार को नष्ट करने वाली भास्वत् प्रकाशक ज्योतिः उत्पद्यते ‘अग्नि’ उत्पन्न होती है तत् रूप गुणम् उच्यते उसका गुण ‘रूप’ कहा है ।

जल और पृथ्वी की उत्पत्ति -

ज्योतिषश्च विकुर्वाणादापो रसगुणाः स्मृताः ।
अद्भ्यो गन्धगुणा भूमिरित्येषा सृष्टिरादितः ||७८||(४७)

अर्थात - च और ज्योतिषः विकुर्वाणात् अग्नि के विकारोत्पादक अंश से रसगुणाः आपः स्मृताः ‘रस’ गुण वाला जल उत्पन्न होता है, और अद्भ्यः जल से गन्धगुणा भूमिः ‘गन्ध’ गुण वाली भूमि उत्पन्न होती है इति एषा सृष्टि आदितः यह इस प्रकार प्रारम्भ से लेकर (१।१४ से) यहां तक वर्णित सृष्टि उत्पन्न होने की प्रक्रिया है ।

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मन्वंतर के काल परिमाण –

यद्प्राग्द्वादशसाहस्रं उदितं दैविकं युगम् ।
तदेकसप्ततिगुणं मन्वन्तरं इहोच्यते||७९||(४८)

अर्थात - प्राक् पहले श्लोकों में (१।७१) यत् जो द्वादशसाहस्त्रम् बारह हजार दिव्य वर्षों का दैविकं युगम् उदितम् एक ‘देवयुग’ कहा है तत् एक – सप्ततिगुणम् उससे इकहत्तर गुना समय अर्थात् १२००० × ७१ – ८, ५२, ००० दिव्यवर्षों का अथवा ८,५२,००० दिव्यवर्ष × ३६० = ३०,६७,२०,००० मानुषवर्षों का इह मन्वन्तरं उच्यते यहां एक ‘मन्वन्तर’ का कालपरिमाण माना गया है ।

मन्वन्तराण्यसंख्यानि सर्गः संहार एव च ।
क्रीडन्निवैतत्कुरुते परमेष्ठी पुनः पुनः ||८०||(४९)

अर्थात - परमेष्ठी वह सबसे महान! परमात्मा असंख्यानि मन्वन्तराणि असंख्य ‘मन्वन्तरों’ को सर्गः सृष्टि – उत्पत्ति च और संहारः एव प्रलय को क्रीडन् इव खेलता हुआ – सा पुनः पुनः बार – बार कुरूते करता रहता है ।

अनुशीलन –

१|७९-८० श्लोकों को उधृत करके इनके भाव को महर्षि दयानंद ने ऋग्वेदादिव्य भूमिका में निम्न प्रकार प्रस्तुत किया है –

“इन श्लोकों में दैव वर्षों की गणना की है अर्थात चारों युगों के बारह हजार वर्षों की दैव युग संज्ञा की है | इसी प्रकार असंख्यात मन्वन्तरों में कि जिनकी संख्या नही हो सकती अनेक बार सृष्टि हो चुकी है और अनेक बार होयगी |सो इस सृष्टि को सदा से सर्व शक्तिमान जगदीश्वर सहज स्वभाव से रचना, पालन और प्रलय करता है और सदा ऐसे ही करेगा |” (पृ.२४)

सृष्टि प्रवाह से अनादी –

“(प्रश्न) कभी सृष्टि का प्रारम्भ है या नहीं ?

इसे भी पढ़ें “मनु स्मृति”- प्रथम अध्याय (सृष्टि उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय) भाग – 6

(उत्तर) नहीं, जैसे दिन के पूर्व रात और रात के पूर्व दिन तथा दिन के पीछे रात और रात के पीछे दिन बराबर चला आता है, इसी प्रकार सृष्टि के पूर्व प्रलय और प्रलय के पूर्व सृष्टि तथा सृष्टि के पीछे प्रलय और प्रलय के आगे सृष्टि, अनादी काल से चक्र चला आता है | इसका आदि व अंत नहीं है | किन्तु जैसे दिन व रात का आरम्भ ओए अंत देखने में आता है, उसी प्रकार सृष्टि और प्रलय का आदि अंत होता रहता है | क्यूंकि जैसे परमात्मा, जीव, जगत का कारण. (ये) तीन स्वरुप से अनादी है वैसे जगत की उत्पत्ति,स्थिति और वर्तमान प्रवाह से अनादी है | जैसे नदी का प्रवाह ही दिखता है, कभी सूख जाता है कभी नहीं दीखता, फिर बरसात में दीखता और उष्णकाल में नहीं दीखता ऐसे व्यवहार को प्रवाह रूप जानना चाहिए |” (स.प्र.२२३)

क्रमशः
साभार – विशुद्ध मनुस्मृति
भाष्यकार – प्रो. सुरेन्द्र कुमार

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“मनु स्मृति”- प्रथम अध्याय (सृष्टि उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय) भाग – 7
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